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रविवार, 5 अप्रैल 2026

अरविंद राठौर या..?!

माघ मास, सन 2094 ई0! गुप्त नवरात्रि प्रारम्भ !! सोनम कीर्ति की बेटी - देवेश्वरी कीर्ति अब लगभग 34 वर्ष की थी। समुद्र से कुछ दूरी पर वह खड़ी चारो ओर देख रही थी। अब से 94 वर्ष पूर्व यहां से काफी दूर था - समुद्र। अब …?! समुद्र तल बढ़ते जा रहे हैं। अनेक गांव व शहर समुद्र ने निगल लिये हैं। धरती पर बहुत कुछ बदल चुका है।कुछ दूरी पर स्त्री - पुरुष उपस्थित थे। देवेश्वरी कीर्ति उधर बढ़ गया। उन स्त्री - पुरुषों में अधेड़ उम्र के स्त्री - पुरुषों की संख्या की संख्या ज्यादा थी ।जिनका जन्म लगभग सन 2047 ई0 का था । हम पूर्वजों को क्यों याद करें ? यदु कीर्ति ! आप जिस नजर से कह रही हो ठीक है लेकिन हमें अपना आधार ध्यान रखना चाहिए। मां (शिवानी) कहती थी - याद रखो ,अपना इतिहास पता होना चाहिए लेकिन उसमें उलझो नहीं ।वर्तमान को ऐसा बनाओ कि वह बेहतर से बेहतर हो । आपकी उम्र लगभग 63 - 64 साल की होगी ? सन 2031 ई0 का जन्म है । 31…9……40……94 में … .. (खामोशी) …..63 साल उम्र हो गयी है ।हमसे एक साल छोटी हो । शारीरिक उम्र तो बराबर ही समझ लो लेकिन समझ, अनुभव में हमारा - आपका स्तर अलग अलग हो सकता है। अरे भाई साहब आप भी ?! मुख्य बात को बोलो । आप कल क्या कह रही थीं ? ऐसे हालात बनाओ कि हम जिएं जरूर वर्तमान में लेकिन हम समय की उस स्थिति में जी रहे हों जिसमें हम त्रिकाल दर्शी हों या त्रिकाल से मुक्त हों?
यह ध्यान की ही दशा है । बताया नहीं कि हम पूर्वजों को क्यों याद करें ?हमारा तो अपना विचार है कि अपना ही क्या विचार गीता के अध्ययन से भी पता चलता है कि जीवन यात्रा का मतलब है - भविष्य की ओर बढ़ना ,निरन्तरता में जीना । अतीत या भूत में जीना नहीं।इसके लिए हमें पितरों से आगे देव और देव से आगे की यात्रा पर बढ़ना होगा । ये है क्या है ? श्री लंका का वह कबीला अब उत्सव की तैयारी में है ।जहां श्री हनुमान सूक्ष्म रूप से उपस्थित रहेंगे । ये सब जीवन के पड़ाव हैं।स्थूल जगत के अलावा हम सूक्ष्म जगत से भी एक पड़ाव या स्तर पर जी रहे होते हैं।सूक्ष्म शक्तियां भी एक पड़ाव या स्तर पर होती हैं। गुप्त नवरात्रि का आप के लिए क्या महत्व है ? चारो ओर जो दिख रहा है ,प्रकृति है ।हम सब भी प्रकृति हैं । इस दृश्यता के परे अदृश्यता भी है ,सूक्ष्म भी है ।गुप्त भी है । हमारी शारीरिक इंद्रिक इच्छाओं से परे भी एक सिस्टम है, अभियान है, स्वतः है, निरंतर है । उसके लिए खामोश रहना, मौन रहना और इसके अहसास व महसूस करने को अपने अंदर मन ही मन अवसर देना हमारी गुप्त नवरात्रि साधना है ।उसके लिए किसी प्रकार का प्रदर्शन नहीं ,दिखावा नहीं, कर्मकांड नहीं।बस,नजरिया, आस्था व मन प्रबन्धन ।आचरण में बस धैर्य ,सहनशीलता ,मानवता ,करुणा, सेवा, परिवार भाव ,जीविका के लिए कर्म ,सहकारिता आदि । जब स्वतः है, निरंतर है, पूर्व निर्धारित है तो फिर कर्मठता ,मेहमत, नियमितता आदि की क्या जरूरत ? जरूरत क्यों नहीं ? शरीर को शरीर चाहिए ही ,संसार की वस्तु के लिए ,समाज प्रबन्धन के कर्म चाहिए ही ।लेकिन अंतरात्मा के साथ ,भाव के साथ ,आत्मियता के साथ । अब्दुल जिसकी उम्र लगभग 34 वर्ष वह रश्मि का मित्र । रश्मि की उम्र भी लगभग 35 की रही होगी ।दोनों आकर बैठते हुए - नमस्ते । नमस्ते । रश्मि और अब्दुल ! आपकी दोस्ती इतिहास में हमेशा याद की जाएगी । सब मालिक कृपा । वह अरविंद राठौर इन दिनों अब अस्सी वर्ष का था। हमारी एक पुस्तक - 'बुजुर्ग ' का वह एक काल्पनिक चरित्र। उधर ...?! " ............ " यह सब तो हम पहले भी स्वप्न में देखते आये थे लेकिन इस सब के बाद अब .....?! हम एक स्वप्न में गांव ददीयूरी में थे। पीपल देव स्थान हमारे नजर में था। वह पीपल स्थान कभी हमारे एक पूर्वज के द्वारा ही स्थापित किया गया था। जहां से कोई एक पितर हम पर आक्रमण कर रहे थे।उनसे बचते हुए हम उड़ -उड़ यूक्लिप्टस के पेड़ों पर पहुंच रहे थे। उनके एक आक्रमण में हमने एक पेड़ की आड़ ले ली और जमुना नाम के एक गांव के ही एक निवासी से मदद के विचार को हमारा ही एक रूप सलाह देता है। @@@ @@@@ @@@ अरविंद राठौर बड़ी मुश्किल से अपनी बैसाखियों वे सहारे खड़े हो आगे तख्त की ओर बढ़ा और उसने तख्त पर रखी पुस्तक - ' अशोकबिन्दु :: दैट इज ...?! ' को उठा लिया। वहां आसपास कोई न था। लगता था कि शेर दहाड़ता हुआ उसकी ओर ही आ रहा हो? वह तेजी से बायीं ओर जा कर एक खंडहर में बने कमरे में प्रवेश कर गया और उसका जालीदार लोहे का गेट बंद कर लिया। उस कमरे में एक अधेड़ उम्र की औरत ध्यान मुद्रा में बैठी थी। एक अलमारी में पुस्तक रख कर वह भी एक ओर ध्यान मुद्रा में बैठ गया। ध्यान में बैठने के बाबजूद उसके दिमाग में उसके ही अतीत के दृश्य चल रहे थे ... " सम्भवतः सन 2015 ई0 का समय था और ग्राम पंचायत के चुनाव चल रहे थे। पूर्व प्रधान की जीप से वह सपरिवार गांव पहुंचा था। उस जीप को पूर्व प्रधान के का इकलौता बेटा शिवम चला रहा था। उससे पता चला था कि वह और उसके पिता जी आदि सब मांस -मदिरा आदि इस उम्मीद से छोंड़ चुके हैं कि बस,एक बार प्रधान बन जायें पिता जी? " " हूँ , भक्ति कैसी ? भक्ति की विनिमय या व्यापार? " किसी को उम्मीद नहीं थी शिवम के पिता जी हार जाएंगे?मात्र आठ वोटों से वे हार गये थे। जिस दिन वोट पड़ रहे थे,उस दिन आखिर में सभी उत्साह में आकर ढीले पड़ गये थे और घर में आकर बैठ गये थे।सब यही सोंच रहे थे कि अब तो जीत ही गये? लेकिन अरविंद राठौर के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था? अरविंद राठौर जब कक्षा सात में पढ़ता था तभी उसे शिवम के पिता जी (अर्थात अरविंद राठौर के पिता जी के चचेरे भाई नेतराम ) के प्रति मन ही मन या स्वप्न में उनकी ओर से विविध नकारात्मक संकेत मिलते थे। ऐसे में क्या हो? कैसे में?! सन 2034 ई0 , उनके शादी के 25 साल पूर्ण …इस बीच वह , उसका जीवन का वर्तमान भौतिक स्वरूप क्या ? अरविंद राठौर इन दिनों 80 वर्ष का हो चुका था।सन 2053 ई0 ….. हूँ?! ये मन भी .?! कभी सन 2034 ई0 में शादी की 25 वीं वर्षगांठ के वक्त तो कभी भविष्य के गर्त में कल्पनाओं के पंख लगा ?! मन भागता फिरता है?निद्रा में रहता हूँ तो ठीक । …. और मेडिटशन ?! मेडिटशन के नाम पर भी क्या ?आंख बंद करते करते कहीं खो जाना? अरविंद राठौर की तरह ‘ सर जी ‘भी क्या ?

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

भविष्य अतीत के याद में...?!सन 2075ई 0😭😭😭

समय रहा होगा सन 2075ई 0 का, काफ़ी कुछ बदल गया था सन 2029का जो अब धरती पर था। एक बुजुर्ग के हाथ में एक पुस्तक थी- “क्रांति क्यों? कैसे..?!” जंगल के बीच एक खंडहर जहाँ अनेक बच्चे, बालक बालिकाएँ शस्त्र चलना सीख रहे थे। एक युवती एक तख्त पर बैठी यही पुस्तक पढ़ रही थी। जिसे एक अंधा बुजुर्ग सुन रहा था। तख्त पर एक ओर पुस्तक रखी थी- “लंका में विभीषण?!”
वह पढ़ रही थी…… पुस्तक ::क्रांति क्यों? कैसे? लेखक ::अशोक कुमार वर्मा 'बिंदु ' 😭तत्कालीन कारण!!😭 हर क्रांति के पीछे तत्कालीन कारण होते हैँ। कोई क्रांति रही हो, उसके तत्कालीन कारण थे, तत्कालीन कारण होंगे। हर काल खंड, पल का अपना विशेष कुछ अहम होता है। सन 2011-2025 ई0 का अपना एक महत्व था -संक्रमण काल के रूप में, वह भी एक दिव्य अवसर भी था. उसमें भी अनंत की ओर जाने की अनंत सम्भावनाएं थीं। सन 2011-14 ई 0एक खास उम्मीद बन कर आया था सबके लिए लेकिन सन 2026-29 के आते आते सब बदला है उस उम्मीद का कटोरा भी?! और…….. सन 1945 ई 0में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से सहज मार्ग के माध्यम से मानव शांति व विश्व शांति का आगाज? उसके आलावा हमें जो विश्व शांति के माध्यम से नेता हरकत में दिखाई दे रहे हैं, उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है? उनमें से कौन वास्तव में मानव शांति, मानवता, हर एक जन के हित की बात करना चाहता है जनतंत्र की चर्चा के बाबजूद?! 16वीं सदी से विश्व जिस विकास के चंगुल में फंसा उसमें ब्रिटेन, फ्रांस, रूस की बड़ी भूमिका रही है। मनुष्य की प्रकृति के बाहर जाकर कल्पना नहीं कि जा सकती लेकिन 16 वीं सदी से जो विकास चला उसने मनुष्य को प्रकृति के बाहर ला खड़ा किया। सन 1935 ई0 के आते आते मनुष्यों को जो कानून मिले उसमें कुछ लोगों के षड्यंत्रों का अहसास नजर आने लगा था लेकिन उसकी दिखावी स्वतंत्रता इतनी होशियार व चालाक थी कि भूख प्यास, काम बसनाओं, सिर्फ जीवन यापन में लगी जीवन शैली उसे जान न सकी।मूल निवासी, वन्य समाज, आदिवासी, किसान, पशु पालक, चरवाहों आदि को जिसकी मार झेलनी पड़ी। धरती भर का मनुष्य ही नहीं वरन प्रकृति ,भूमि, विभिन्न संसाधन जो हर एक व्यक्ति के लिए उपलब्ध थे वे मुट्ठी भर कुछ लोगों के पकड़ में आने लगे। ऐसे में एक आम आदमी, एक साधारण परिवार,किसान, पशुपालकों, वन्य समाज, शिल्पकारों, विभिन्न प्रतिभावानों आदि के अवसर पर कुठाराघात हुआ और स्वतंत्रता की बात बेईमानी हो गया। ऐसे में 1926 -45 में ब्रह्मण्ड चेतना कुछ व्यक्तियों के माध्यम से हलचल में आयी लेकिन… दक्षिण पूर्व एशिया…आर्थिक रूप से रूस, चीन, जापान के लिए महत्वपूर्ण था ही ऐसे में 21 अक्टूबर 1943 ई0 को स्थापित आजाद हिंद सरकार की आय का ठिकाना न रहा लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के परिणाम ने सबकुछ बदल दिया। 15 अगस्त 1947 ई0 के सत्ता हस्तांतरण के बाद देश और विश्व में …. “ अब तो लौंडों का जीना दूभर है? “ - एक पतली सी गली में दीवार से सटे खड़े थे।समीप ही एक नाला और कूड़ा का ढेर पड़ा था। और….. हमारा ध्यान गया - उस बालक पर जो कि दबु चमार। खजुहा (फतेहपुर जिला, उत्तर प्रदेश) में स्थित "बावनी इमली" के पेड़ के नीचे अंग्रेजों ने 28 अप्रैल 1858 को 52 क्रांतिकारियों को फांसी दी थी। यह घटना 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुई, जब ठाकुर जोधा सिंह अटैया और उनके 51 साथियों को कर्नल क्रिस्टाइल की सेना ने गिरफ्तार कर एक साथ लटका दिया। शवों को 37 दिनों तक लटकाए रखा गया ताकि दहशत फैलाई जा सके। यह पेड़ आज भी स्मारक के रूप में खड़ा है, हालांकि स्थानीय मान्यता है कि घटना के बाद यह बढ़ना बंद हो गया। वह बालक…..?! उसका नाम …दबु चमार। सर जी कभी कभार दबु चमार का जिक्र करते रहते थे जिसका जिक्र हिंदी साहित्य में मिलता है। औऱ…. जब मैं कक्षा नौ में आया तो पहले दिन सर जी ने पढ़ाया - " पहला चैप्टर क्या है इतिहास में ? " " फ्रांसीसी क्रांति ! " " हां , फ्रांस की क्रांति ! " ग्रीन बोर्ड पर लिखते हुए - पाठ 01,फ्रांस की क्रांति । " क्रांति किसे कहते हैं?क्रांति के क्या कारण हैं? एक मानव के जीवन में क्या क्या समस्याएं होती है? एक इंसान के जिंदा रहते उसके तत्काल में क्या क्या समस्याएं होती हैं? " रक्तहीन क्रांति का क्या मतलब है?" रक्तहीन क्रांति (Bloodless Revolution) का अर्थ है एक ऐसी क्रांति या परिवर्तन, जिसमें हिंसा, रक्तपात या युद्ध के बिना सत्ता, व्यवस्था या समाज में बड़े बदलाव लाए जाते हैं। यह आमतौर पर शांतिपूर्ण तरीकों जैसे प्रदर्शन, बातचीत, असहयोग आंदोलन, या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है।उदाहरण के लिए:भारत में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसक आंदोलन, जैसे नमक सत्याग्रह, को रक्तहीन क्रांति का हिस्सा माना जा सकता है।विश्व इतिहास में, 1989 की मखमली क्रांति (Velvet Revolution) में चेकोस्लोवाकिया में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के माध्यम से कम्युनिस्ट शासन का अंत हुआ, जो एक रक्तहीन क्रांति का उदाहरण है।इस प्रकार, रक्तहीन क्रांति का मतलब है बिना खून-खराबे के समाज या शासन में परिवर्तन लाना। इंग्लैंड की रक्तहीन क्रांति, जिसे "Glorious Revolution" (गौरवपूर्ण क्रांति) भी कहा जाता है, 1688 में हुई एक ऐतिहासिक घटना को संदर्भित करती है। इसका मतलब है कि इस क्रांति में बड़े पैमाने पर हिंसा या रक्तपात नहीं हुआ। इस दौरान इंग्लैंड के राजा जेम्स द्वितीय को सत्ता से हटाया गया, और उनकी जगह उनकी बेटी मैरी द्वितीय और उनके पति विलियम ऑफ ऑरेंज को संयुक्त रूप से राजा-रानी बनाया गया। इस क्रांति को "रक्तहीन" इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें कोई बड़ा युद्ध या हिंसक संघर्ष नहीं हुआ। जेम्स द्वितीय ने बिना ज्यादा प्रतिरोध के सत्ता छोड़ दी और फ्रांस भाग गए।इस क्रांति ने इंग्लैंड में संवैधानिक राजतंत्र को मजबूत किया। बिल ऑफ राइट्स (1689) के माध्यम से संसद की शक्ति बढ़ी, और राजा की शक्तियों को सीमित किया गया।जेम्स द्वितीय एक कैथोलिक राजा थे, और उनके कैथोलिक-समर्थक नीतियों से प्रोटेस्टेंट जनता और संसद में असंतोष था। विलियम और मैरी, जो प्रोटेस्टेंट थे, के सत्ता में आने से प्रोटेस्टेंट धर्म की स्थिति मजबूत हुई।इस क्रांति ने इंग्लैंड में संसदीय लोकतंत्र की नींव रखी और निरंकुश राजतंत्र को कमजोर किया। यह आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणालियों के विकास का एक महत्वपूर्ण कदम था। क्रांति क्या है? क्रांति का अर्थ है किसी समाज, व्यवस्था, या स्थिति में मूलभूत और व्यापक परिवर्तन, जो अक्सर तेजी से और कभी-कभी हिंसक रूप से होता है। यह पुरानी व्यवस्था को उखाड़कर नई व्यवस्था स्थापित करने की प्रक्रिया है, जो सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, या सांस्कृतिक क्षेत्रों में हो सकती है। उदाहरण के लिए, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एक राजनीतिक क्रांति थी, जिसने औपनिवेशिक शासन को समाप्त कर स्वतंत्र भारत की स्थापना की। क्रांति का लक्ष्य आमतौर पर अन्याय, असमानता, या दमन को खत्म करना और बेहतर भविष्य बनाना होता है। क्रांति क्यों आवश्यक है? क्रांति आवश्यक हो सकती है जब मौजूदा व्यवस्था में गहरी खामियां या अन्याय स्थापित हो जाएं, जो सामान्य सुधारों से ठीक न हो सकें। यह निम्नलिखित कारणों से जरूरी हो सकती है: अन्याय का अंत: जब समाज में असमानता, शोषण, या उत्पीड़न चरम पर पहुंच जाता है, जैसे जातिगत भेदभाव, आर्थिक विषमता, या राजनीतिक दमन, तो क्रांति व्यवस्था को बदलने का रास्ता बन सकती है। उदाहरण: भारत की स्वतंत्रता संग्राम एक क्रांति थी जो औपनिवेशिक शासन के खिलाफ थी। प्रगति की मांग: पुरानी व्यवस्थाएं कभी-कभी सामाजिक, आर्थिक, या तकनीकी प्रगति में बाधा बनती हैं। क्रांति नए विचारों और मूल्यों को लागू करने का अवसर देती है। जैसे, औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन और अर्थव्यवस्था को बदल दिया। जागरूकता और सशक्तिकरण: क्रांति जनता में जागरूकता लाती है और उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा देती है। यह सामूहिक शक्ति को उजागर करती है, जैसे फ्रांसीसी क्रांति ने लोकतंत्र के विचार को बढ़ावा दिया। टूटे हुए तंत्र को ठीक करना: जब सरकार या संस्थाएं भ्रष्ट, अक्षम, या जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रहतीं, तो क्रांति एकमात्र रास्ता हो सकता है। उदाहरण: रूसी क्रांति ने जारशाही के दमनकारी शासन को उखाड़ फेंका।हालांकि, क्रांति हमेशा अंतिम उपाय होनी चाहिए, क्योंकि यह अस्थिरता, हिंसा, और अनिश्चितता ला सकती है। सुधार और संवाद पहले आजमाए जाने चाहिए। क्रांति तभी अपरिहार्य होती है, जब व्यवस्था पूरी तरह से जनता की जरूरतों को नजरअंदाज कर दे। वर्तमान में क्या क्रांति की आवश्यकता नहीं है? वर्तमान में किसी भी तरह की हिंसक या उग्र क्रांति की आवश्यकता नहीं है। समाज में परिवर्तन के लिए शांतिपूर्ण, रचनात्मक और सहयोगात्मक दृष्टिकोण अधिक प्रभावी हैं। शिक्षा, तकनीकी नवाचार, और सामाजिक संवाद के माध्यम से बदलाव लाना आज के समय की मांग है। क्रांति की बजाय, सुधार और समावेशी विकास पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन यह सम्भव कहाँ है? आज का सिस्टम इंसान को सबकुछ बना रहा है लेकिन इंसान नहीं।एक टॉपर बालक जरूरी नहीं एक अच्छा इंसान हो? आपका सवाल गहरा और विचारोत्तेजक है। क्रांति के बिना प्रगति की बात करें तो आज का सिस्टम—चाहे वह शिक्षा, तकनीक, या समाज हो—निश्चित रूप से इंसान को कई चीजें दे रहा है: ज्ञान, कौशल, संसाधन, और अवसर। लेकिन यह सिस्टम अक्सर इंसानियत, नैतिकता, और संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर देता है।एक टॉपर बालक का उदाहरण लें। आज की शिक्षा प्रणाली उसे अंक, डिग्री, और नौकरी के लिए तैयार करती है, लेकिन क्या वह उसे सहानुभूति, ईमानदारी, या दूसरों के लिए बलिदान जैसे गुण सिखाती है? जरूरी नहीं। अच्छा इंसान बनने के लिए सिर्फ अकादमिक सफलता काफी नहीं; इसके लिए मूल्यों, संस्कारों, और आत्म-जागरूकता की जरूरत होती है, जो मौजूदा सिस्टम में अक्सर गौण हो जाते हैं।क्रांति की बात करें तो, शायद अब जरूरत ऐसी क्रांति की है जो सिस्टम को इंसान बनाने की दिशा में ले जाए—जहाँ शिक्षा सिर्फ दिमाग न भरे, बल्कि दिल को भी तराशे। आप क्या सोचते हैं, इस सिस्टम को बदलने का पहला कदम क्या हो सकता है? फ्रांस की क्रांति के जो कारण थे, वे क्या आज भी मौजूद नहीं हैं? फ्रांस की क्रांति (1789-1799) के कारण जटिल और बहुआयामी थे, जिनमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक कारक शामिल थे। इन कारणों की आज की दुनिया में मौजूदगी की तुलना करने के लिए हमें पहले उन प्रमुख कारणों को समझना होगा और फिर यह देखना होगा कि क्या वे आज भी प्रासंगिक हैं। नीचे इस प्रश्न का विश्लेषण किया गया है: फ्रांस की क्रांति के प्रमुख कारण सामाजिक असमानता: फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों (एस्टेट्स) में बंटा था। प्रथम वर्ग (पादरी), द्वितीय वर्ग (कुलीन), और तृतीय वर्ग (सामान्य जनता)। तृतीय वर्ग, जो समाज का सबसे बड़ा हिस्सा था, को भारी करों और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता था।आर्थिक संकट: फ्रांस की अर्थव्यवस्था 18वीं शताब्दी के अंत में गंभीर संकट में थी। युद्धों (जैसे अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में सहायता), शाही खर्च, और खराब फसलों के कारण रोटी की कीमतें बढ़ गईं, जिससे जनता में असंतोष बढ़ा। राजनीतिक अक्षमता: लुई सोलहवें की कमजोर और अनिर्णायक शासन शैली ने राजशाही के प्रति अविश्वास को बढ़ाया। इसके अलावा, कोई प्रभावी सुधार नहीं हो रहे थे।प्रबुद्ध विचारों का प्रभाव: रूसो, वॉल्टेयर और मॉन्टेस्क्यू जैसे दार्शनिकों के विचारों ने स्वतंत्रता, समानता और जनता की संप्रभुता जैसे विचारों को प्रोत्साहित किया, जिसने क्रांति को वैचारिक आधार प्रदान किया।करों का बोझ: तृतीय वर्ग पर भारी कर लगाए गए, जबकि प्रथम और द्वितीय वर्ग को करों में छूट थी, जिससे असंतोष बढ़ा। नैतिक और सामाजिक पतन: राजशाही और कुलीन वर्ग की विलासिता और भ्रष्टाचार ने जनता में आक्रोश पैदा किया।क्या ये कारण आज भी मौजूद हैं? आज की दुनिया में इन कारणों की मौजूदगी को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर विश्लेषित किया जा सकता है: सामाजिक असमानता:तब: तृतीय वर्ग को सामाजिक और आर्थिक भेदभाव का सामना करना पड़ता था।अब: आधुनिक समाजों में सामाजिक असमानता अभी भी मौजूद है, खासकर आर्थिक असमानता के रूप में। विश्व बैंक और अन्य स्रोतों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर आय असमानता (जैसे Gini coefficient) और अमीर-गरीब के बीच की खाई बढ़ रही है। हालांकि, फ्रांस जैसे देशों में सामाजिक कल्याण योजनाएं और लोकतांत्रिक व्यवस्था इस असमानता को कम करने का प्रयास करती हैं। फिर भी, जाति, नस्ल, लिंग, और आर्थिक स्थिति के आधार पर असमानता आज भी कई समाजों में देखी जा सकती है। सामाजिक असमानता आज भी मौजूद है, लेकिन इसका स्वरूप और तीव्रता फ्रांस की क्रांति के समय से भिन्न है। आर्थिक संकट:तब: भारी कर्ज, युद्धों में खर्च, और खाद्य संकट ने क्रांति को बढ़ावा दिया।अब: आज कई देश आर्थिक संकटों का सामना करते हैं, जैसे मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, और सार्वजनिक कर्ज। उदाहरण के लिए, हाल के वर्षों में कोविड-19 महामारी और यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई, जिससे खाद्य और ऊर्जा की कीमतें बढ़ीं। हालांकि, आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं पहले की तुलना में अधिक लचीली हैं और केंद्रीय बैंक, अंतरराष्ट्रीय संगठन (जैसे IMF), और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं संकट को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। निष्कर्ष: आर्थिक संकट आज भी मौजूद हैं, लेकिन उनके प्रबंधन के लिए बेहतर तंत्र उपलब्ध हैं। राजनीतिक अक्षमता:तब: लुई सोलहवें की कमजोर शासन शैली और सुधारों की कमी ने क्रांति को बढ़ावा दिया।अब: आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन कई देशों में भ्रष्टाचार, नेतृत्व की अक्षमता, और नीतिगत विफलताएं अभी भी देखी जाती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ देशों में जनता का सरकारों पर भरोसा कम हुआ है, जैसा कि विश्व आर्थिक मंच (WEF) की रिपोर्ट्स में देखा गया है। फिर भी, निरंकुश राजशाही जैसी व्यवस्था अब दुर्लभ है। राजनीतिक अक्षमता आज भी मौजूद है, लेकिन लोकतांत्रिक तंत्र इसे सीमित करते हैं। प्रबुद्ध विचारों का प्रभाव:तब: प्रबुद्ध विचारकों ने स्वतंत्रता और समानता के विचारों को बढ़ावा दिया।अब: आज सूचना क्रांति और सोशल मीडिया ने विचारों के प्रसार को और तेज कर दिया है। मानवाधिकार, सामाजिक न्याय, और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे विचार वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली हैं। हालांकि, गलत सूचना और ध्रुवीकरण भी बढ़ा है, जो सामाजिक अशांति का कारण बन सकता है। वैचारिक क्रांति का प्रभाव आज भी मौजूद है, लेकिन इसका माध्यम और प्रभाव भिन्न है। करों का बोझ:तब: तृतीय वर्ग पर भारी करों ने असंतोष को बढ़ाया।अब: आधुनिक कर प्रणालियां अधिक समावेशी हैं, लेकिन कई देशों में करों की असमानता या उच्च कर दरों के कारण असंतोष देखा जाता है। उदाहरण के लिए, फ्रांस में ही 2018-19 में "येलो वेस्ट" आंदोलन ईंधन करों के विरोध में शुरू हुआ था। करों से संबंधित असंतोष आज भी मौजूद है, लेकिन इसका स्वरूप कम तीव्र है। नैतिक और सामाजिक पतन:तब: राजशाही और कुलीन वर्ग की विलासिता ने जनता में आक्रोश पैदा किया।अब: आज भी कुछ देशों में नेताओं और अभिजात वर्ग की विलासिता या भ्रष्टाचार जनता के असंतोष का कारण बनता है। सोशल मीडिया पर ऐसी घटनाओं का तुरंत खुलासा होने से जनता का गुस्सा तेजी से फैलता है। यह कारक आज भी प्रासंगिक है, लेकिन लोकतांत्रिक जवाबदेही इसे नियंत्रित करती है। फ्रांस की क्रांति के अधिकांश कारण—सामाजिक असमानता, आर्थिक संकट, राजनीतिक अक्षमता, वैचारिक उथल-पुथल, करों का बोझ, और नैतिक पतन—आज भी विभिन्न रूपों में मौजूद हैं। हालांकि, आधुनिक लोकतांत्रिक और आर्थिक व्यवस्थाएं, सामाजिक कल्याण योजनाएं, और वैश्विक सहयोग इन समस्याओं को क्रांतिकारी स्तर तक पहुंचने से रोकते हैं। फ्रांस की क्रांति जैसी परिस्थितियां आज दुर्लभ हैं, क्योंकि आधुनिक समाजों में सुधार और संवाद के लिए संस्थागत तंत्र मौजूद हैं। फिर भी, इन कारकों की उपस्थिति सामाजिक अशांति या आंदोलनों (जैसे येलो वेस्ट या ब्लैक लाइव्स मैटर) को जन्म दे सकती है, जो क्रांति से कम तीव्र लेकिन प्रभावशाली हो सकते हैं। आधुनिक समाजों में सुधार और संवाद के लिए संस्थागत तंत्र मौजूद तो हैं लेकिन भृष्टाचारी,जातिवादी,मजहबी, लोभी -लालची, पक्ष पाती आदि के चलते अनेक लोग पीड़ित होते देखे जाते हैं? हां, यह एक गंभीर मुद्दा है। आधुनिक समाजों में सुधार और संवाद के लिए संस्थागत तंत्र जैसे न्यायपालिका, लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं, और सामाजिक संगठन मौजूद हैं, लेकिन भ्रष्टाचार, जातिवाद, मजहबी कट्टरता, लोभ, और पक्षपात जैसे कारक इन तंत्रों की प्रभावशीलता को कमजोर करते हैं। ये समस्याएं निम्नलिखित तरीकों से लोगों को पीड़ित करती हैं:भ्रष्टाचार: सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों में भ्रष्टाचार के कारण संसाधनों का दुरुपयोग होता है, और जरूरतमंद लोगों तक लाभ नहीं पहुंचता। उदाहरण के लिए, कल्याणकारी योजनाओं का पैसा गलत हाथों में चला जाता है।जातिवाद और मजहबी भेदभाव: सामाजिक और संस्थागत स्तर पर जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव के कारण कई समुदाय अवसरों और न्याय से वंचित रहते हैं। यह सामाजिक तनाव को बढ़ाता है। लोभ और पक्षपात: व्यक्तिगत स्वार्थ और पक्षपात के कारण नीतियां और निर्णय निष्पक्ष नहीं रहते, जिससे आम जनता को नुकसान होता है।समाधान के उपाय:पारदर्शिता और जवाबदेही: संस्थानों में पारदर्शी प्रक्रियाएं और कड़े जवाबदेही तंत्र लागू करना।शिक्षा और जागरूकता: सामाजिक बुराइयों जैसे जातिवाद और मजहबी कट्टरता के खिलाफ जागरूकता फैलाना।कानूनी सुधार: भ्रष्टाचार और पक्षपात को रोकने के लिए कठोर कानून और उनका प्रभावी कार्यान्वयन।सामाजिक भागीदारी: नागरिकों को संस्थागत प्रक्रियाओं में सक्रिय रूप से शामिल करना।इन समस्याओं का समाधान जटिल है, लेकिन निरंतर सामूहिक प्रयासों और सुधारों से समाज में बदलाव संभव है। इन समस्याओं का समाधान जटिल है, लेकिन निरंतर सामूहिक प्रयासों और सुधारों से समाज में बदलाव संभव है? देश की आजादी का मतलब क्या होना चाहिए था?सन 1947 ई0 में इसके लिए क्या हमारे नेता दोषी नहीं हैं? आधुनिक समाजों में भ्रष्टाचार, जातिवाद, मजहबी कट्टरता, लोभ, और पक्षपात जैसी समस्याएं गहरी जड़ें जमा चुकी हैं, और ये सामाजिक न्याय और समानता के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। इनका समाधान जटिल है, लेकिन असंभव नहीं। निरंतर सामूहिक प्रयास, सुधार, और जागरूकता से बदलाव संभव है। इसके लिए कुछ कदम निम्नलिखित हो सकते हैं:संस्थागत सुधार: पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्थाएं बनाना, जैसे कि कठोर भ्रष्टाचार-रोधी कानून, स्वतंत्र निगरानी संस्थाएं, और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रियाएं। शिक्षा और जागरूकता: शिक्षा के माध्यम से जातिवाद और मजहबी कट्टरता जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता फैलाना। स्कूलों में समावेशी मूल्यों को बढ़ावा देना।सामुदायिक भागीदारी: समाज के सभी वर्गों को संवाद और निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना, ताकि कोई भी समूह हाशिए पर न रहे।नेतृत्व और नीति: नेताओं को नैतिकता और जनहित को प्राथमिकता देनी होगी। नीतियों में समानता और सामाजिक न्याय को केंद्र में रखना जरूरी है।देश की आजादी का मतलब1947 में भारत की आजादी का मतलब सिर्फ औपनिवेशिक शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की स्थापना होना चाहिए था जहां सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक समानता हो। आजादी का अर्थ था:सामाजिक न्याय: जाति, धर्म, और लिंग के आधार पर भेदभाव का अंत।आर्थिक स्वतंत्रता: सभी के लिए अवसरों की समानता और गरीबी का उन्मूलन। सांस्कृतिक एकता: विविधता में एकता को बढ़ावा देना।नेताओं की जिम्मेदारी1947 के समय के नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन कुछ कमियां भी रहीं। जैसे:जाति और धर्म का राजनीतिकरण: कुछ नेताओं ने सामाजिक सुधारों पर ध्यान देने के बजाय, वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा दिया, जिससे जातिवाद और मजहबी विभाजन गहराया।आर्थिक नीतियों में कमी: सामाजिक और आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए ठोस नीतियों का अभाव रहा। भूमि सुधार और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में और अधिक ध्यान देना चाहिए था।संस्थागत कमजोरियां: भ्रष्टाचार और पक्षपात को रोकने के लिए मजबूत संस्थागत ढांचे की स्थापना में देरी हुई।हालांकि, यह कहना कि केवल नेता ही दोषी थे, पूरी तरह उचित नहीं। समाज के हर वर्ग की भी जिम्मेदारी थी कि वह इन समस्याओं के खिलाफ एकजुट हो। आजादी के बाद के वर्षों में सामाजिक सुधारों की गति धीमी रही, लेकिन यह एक सामूहिक चुनौती थी, जिसका समाधान भी सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। कुछ नए सङ्गठन उभरे हैं! देश के अंदर सबकुछ ठीक ही नहीं है। कहीं पर एक असंतुष्टि भी पैदा हो रही है? आजादी का असली मतलब सामाजिक और आर्थिक समानता के साथ एक प्रगतिशील समाज बनाना था। नेताओं की कुछ कमियां रहीं, लेकिन आज की पीढ़ी को उन गलतियों से सीखकर, सुधारों और सामूहिक प्रयासों के जरिए समाज को बेहतर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। 21 अक्टूबर 1943 ई0 के आजाद हिंद सरकार से हम क्या उम्मीद कर सकते थे कि देश की आजादी का मतलब क्या होना चाहिए था?आज के हालातों के लिए सन 1947 ई0 में इसके लिए क्या हमारे नेता दोषी नहीं हैं? 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित आजाद हिंद सरकार का उद्देश्य भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराना और एक स्वतंत्र, समृद्ध, और समावेशी राष्ट्र की स्थापना करना था। इस सरकार की नींव सैन्य संघर्ष और राष्ट्रीय एकता पर आधारित थी, जिसने स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं माना, बल्कि सामाजिक-आर्थिक समानता, सांस्कृतिक गौरव, और आत्मनिर्भरता को भी इसका अभिन्न हिस्सा माना। आजाद हिंद सरकार से हम यह उम्मीद कर सकते थे कि स्वतंत्र भारत में:सामाजिक समानता: जाति, धर्म, और लिंग के आधार पर भेदभाव को खत्म करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते। आजाद हिंद फौज में महिलाओं की रानी झांसी रेजिमेंट इसका उदाहरण थी। आर्थिक आत्मनिर्भरता: औपनिवेशिक शोषण से मुक्त अर्थव्यवस्था, जिसमें स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा और जनता के लिए रोजगार के अवसर हों।राष्ट्रीय एकता: विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्द और एक साझा राष्ट्रीय पहचान का निर्माण।मजबूत शासन: भ्रष्टाचार और विदेशी प्रभाव से मुक्त एक मजबूत, जन-केंद्रित प्रशासन।आजादी का मतलब क्या होना चाहिए था?आजाद हिंद सरकार के दृष्टिकोण से, आजादी का मतलब केवल ब्रिटिश शासन का अंत नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की स्थापना था, जहां हर नागरिक को सम्मान, अवसर, और न्याय मिले। यह एक समतामूलक समाज की स्थापना थी, जिसमें विदेशी शोषण की जगह स्वदेशी विकास और आत्मनिर्भरता हो।1947 के नेताओं की जिम्मेदारी और दोष1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, लेकिन आज के हालात—जैसे सामाजिक असमानता, आर्थिक असंतुलन, भ्रष्टाचार, और सांप्रदायिक तनाव—के लिए उस समय के नेताओं को आंशिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। निम्नलिखित बिंदु इसकी व्याख्या करते हैं: बंटवारे का दुखद परिणाम: नेताओं ने धार्मिक आधार पर देश के विभाजन को स्वीकार किया, जिसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों की जान गई और सांप्रदायिक तनाव आज तक बरकरार है। यह एकता के सिद्धांत के खिलाफ था, जिसे आजाद हिंद सरकार ने प्राथमिकता दी थी।सामाजिक सुधारों की कमी: स्वतंत्रता के बाद सामाजिक सुधारों, जैसे जाति व्यवस्था और लैंगिक असमानता को खत्म करने के लिए पर्याप्त जोर नहीं दिया गया। संविधान ने समानता की बात की, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव धीमा रहा।आर्थिक नीतियों की कमियां: शुरुआती दशकों में मिश्रित अर्थव्यवस्था के नाम पर न तो पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल हुई और न ही सामाजिक कल्याण को प्राथमिकता दी गई। औद्योगीकरण और भूमि सुधार जैसे मुद्दों पर सुस्ती रही।नेतृत्व की दूरदृष्टि का अभाव: कुछ नेताओं ने सत्ता के केंद्रीकरण और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को प्राथमिकता दी, जिससे लंबी अवधि की योजना और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं के समावेशी दृष्टिकोण को लागू करने में कमी रही।हालांकि, यह कहना अनुचित होगा कि नेता पूरी तरह दोषी थे। उन्हें एक जटिल, विविध, और आर्थिक रूप से कमजोर देश को संभालना था। विश्व युद्ध के बाद की वैश्विक परिस्थितियां, संसाधनों की कमी, और आंतरिक मतभेदों ने उनकी चुनौतियों को और बढ़ाया। फिर भी, अगर आजाद हिंद सरकार के आदर्शों को स्वतंत्रता के बाद की नीतियों में अधिक शामिल किया गया होता, तो शायद आज का भारत सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक मजबूत और एकजुट होता।आज के हालातआज भारत में सामाजिक-आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, और सांप्रदायिक तनाव जैसी समस्याएं मौजूद हैं। ये समस्याएं आंशिक रूप से उन नीतियों और निर्णयों का परिणाम हैं, जो 1947 के बाद लिए गए। लेकिन इसके लिए केवल नेताओं को दोष देना उचित नहीं; आज की पीढ़ी और वर्तमान नेतृत्व की भी जिम्मेदारी है कि वे उन आदर्शों को पुनर्जनन करें, जिनके लिए आजाद हिंद सरकार और स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया था।निष्कर्ष: आजाद हिंद सरकार से प्रेरणा लेकर, हमें आजादी को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे सामाजिक न्याय, आर्थिक समृद्धि, और राष्ट्रीय एकता के रूप में देखना चाहिए। 1947 के नेता कुछ हद तक अपनी कमियों के लिए जिम्मेदार हैं, लेकिन आज का भारत हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। एक दिन आप कह रहे थे कि शिक्षा स्वयं क्रांति है, लेकिन जिसे वर्तमान समाज व अभिवावक नहीं नहीं ? "शिक्षा स्वयं क्रांति है" का अर्थ है कि शिक्षा व्यक्ति और समाज को बदलने की शक्ति रखती है। यह न केवल ज्ञान प्रदान करती है, बल्कि सोच, चरित्र और सामाजिक जागरूकता को भी आकार देती है। हालांकि, वर्तमान समाज और कुछ अभिभावकों द्वारा इसे पूरी तरह समझा नहीं जा रहा, क्योंकि:उपयोगितावादी दृष्टिकोण: कई अभिभावक और समाज शिक्षा को केवल नौकरी पाने का साधन मानते हैं, न कि व्यक्तित्व विकास या सामाजिक परिवर्तन का। इससे शिक्षा का गहरा उद्देश्य खो जाता है।पारंपरिक सोच: कुछ लोग शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रखते हैं और रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन या नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाली शिक्षा को महत्व नहीं देते।आर्थिक दबाव: समाज में आर्थिक जरूरतें शिक्षा के क्रांतिकारी पहलू को नजरअंदाज कर देती हैं, क्योंकि लोग तत्काल रोजगार पर ध्यान देते हैं।जागरूकता की कमी: कई अभिभावकों को यह समझ नहीं कि शिक्षा सामाजिक असमानताओं को दूर करने और सशक्तिकरण का साधन हो सकती है।शिक्षा को क्रांति के रूप में देखने के लिए समाज और अभिभावकों को इसके व्यापक प्रभावों—जैसे सामाजिक न्याय, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता—पर ध्यान देना होगा ये कैसे वास्तव में शिक्षा समाज व अभिवावक नहीं चाहता ?! सामान्य रूप से, अगर आप शिक्षा के संदर्भ में बात कर रहे हैं, तो कई बार समाज और अभिभावकों की अपेक्षाएँ पारंपरिक या व्यावहारिक परिणामों (जैसे नौकरी, स्थिरता) पर केंद्रित होती हैं। कुछ कारण हो सकते हैं:पारंपरिक सोच: समाज और अभिभावक अक्सर ऐसी शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं जो तत्काल रोज़गार या सामाजिक प्रतिष्ठा दे, न कि ऐसी शिक्षा जो रचनात्मकता या दीर्घकालिक सोच को बढ़ावा दे।आर्थिक दबाव: अभिभावक चाहते हैं कि शिक्षा बच्चों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाए, इसलिए वे नवाचार या वैकल्पिक शिक्षा मॉडल से हिचक सकते हैं।जागरूकता की कमी: समाज में नई शिक्षण पद्धतियों या सुधारों के बारे में जानकारी का अभाव हो सकता है, जिससे वे पुराने ढांचे को ही स्वीकार करते हैं।सांस्कृतिक रूढ़ियाँ: कुछ समुदायों में शिक्षा के प्रति रूढ़िगत धारणाएँ (जैसे केवल विज्ञान या इंजीनियरिंग को महत्व देना) बदलाव का विरोध करती हैं। 25 जून 2025 ई0 सायंकाल हम मोहिउद्दीनपुर बाजार में उपस्थित थे। हम वहां पिताजी के चचेरे भाई रामशरण के पुत्र रजत के साथ आये हुए थे। कुछ समय हम उससे दूर हो वीडियो बनाने में व्यस्त हो गये थे। इस बीच हमारी ममेरे भाई रवि गंगवार से मुलाकात हुई ही,हमें एक बुजुर्ग व्यक्ति मिल गया जो पीले रंग के कुर्ते पायजामे में था और माथे पर सफेद चंदन में गोल तिलक लगा था। उससे आकर्षण की प्रतिक्रिया में हमने उसे " राम राम " बोल दिया। " हमने आपको पहचाना नहीं? " हम हाथ जोड़े जोड़े ही - " यहाँ रोशन लाल गंगवार ,मैं उनका भांजा हूँ! " " अच्छा ,आप छात्रा देवी बहिन जी के बेटे हो ? " " हां! " "आपने तो इंटगाँव में बारात घर बनवा लिया है? " " मैं अशोक हूँ।वो तो मेरे भाई अवनीश ने बनवाया है। " " आप क्या कर रहे हो ? हां, कोई कह तो रहा था कि आप तिलहर - कटरा में कहीं किसी स्कूल में पढ़ा रहे हो? " " भाई आपके पिता भी न जाने क्या चाहते थे? श्यामाचरण की मौत के बाद उन्हें ददीयूरी या बण्डा में व्यवस्था करनी चाहिए थी?वहां प्राइवेट आप पढ़ा रहे हो बैसे ही यहां कहीं पढ़ाते और सम्पत्त्ति कि भी देख भाल करते ? " " अब क्या हो सकता है? " " सुना है तुम सीधे साधे हो ? तुम्हारे भाई व पिता जी को सम्पत्त्ति की व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए था?अपना अपना तो सब कर लेते हैं लेकिन पितरों की व्यवस्था को यों छिन्न भिन्न नहीं कर देना चाहिए? " "हम तो चाहते रहे, हम तो चाहते थे कि बण्डा में रहकर हम कहीं स्कूल में पढ़ाएं और जमीन जायदाद को भी देखें। हमारी पत्नी यहां रही भीं लेकिन कोई यहाँ यह बर्दाश्त नहीं कर पाये? " " तुम्हारे मामा रोशन लाल मामा कहते थे कि वे तो सब भूत योनि के हैं कोई पितर स्तर का नहीं है। एक गुड्डू था और एक आप? गुड्डू तो चल बसा? तुम भी सावधान रहना। " हमें ददीयूरी में किसी की नियति पर विश्वास नहीं। दुनियाबी अपनापन ही तो खतरा है हमारे अपनेपन के विकास में? " " अभी तो रामशरण देख रहे हैं तुम्हारी जमीन? " "उससे क्या ?उनकी नियति पर भी विश्वास थोड़ी है ?यहां से लेकर बीसलपुर तक सब क्या हैं?हमारे लिए कोई अनुकूल नहीं है। " " जो हुआ सो हुआ। बस, स्वयं ईश्वर के भरोसे व अपने नियति पर बने रहो। " " रजत आ रहा है। " " वास्तव में क्रांति की संभावनाएं हमेशा बनी रही हैं? " "लेकिन वेदव्यास व विदुर की भूमिका क्या रही है? " "हां, समझता हूं? " हमने आगे बढ़कर उनसे दूरी बना ली। हम सोंचने लगे थे आगे बढ़कर … 😢जातिगत सब कुछ चाहिए लेकिन जातिगत आरक्षण नहीं चाहिए!!😢 😢हर गांव /वार्ड में बाहुल्य आबादी का प्रकोप चाहिए लेकिन अल्प आबादी के लोगों की सच्चाई तक नहीं चाहिए? 😢 😢धर्म व भक्ति का मतलब धर्म व भक्ति नहीं वरन अल्पमत -बहुमत का संघर्ष है! 😢 मन में सजती रहीं जातियाँ! जातियों के झुरमुट में सहती बेटियां।। आरक्षण तो बना रे दोषी, मगर कबीरों की किसने जलायीं झोपड़ियां? ज्योतिबा फुले विरोधी वंशज आज कहाँ हैं? देहज और घरेलू अपराधों से सज वो झुरमुट, जातियों के झुरमुट में सहती बेटियां ।। जातिगत आरक्षण नहीं चाहना! अपने जाति में ही ब्याहें मगर बेटियां।। पुरोहित चाहिए अपनी ही जाति का, नहीं मतलब वेद में पुरोहित क्या ? श्री कृष्ण के सदेशों पे न चलना , अपनी जाति के अपराधी सहें बेटियां।। और … भक्ति, प्रेम,धर्म , आस्तिकता क्या है ? मन की गहराई से पैदा हुआ भाव न कि किसी से उम्मीदें रखना? कर्म व ज्ञान भी उसी भाव में रहकर जो हमारे आकाश तत्व में महसूस हो?जहां ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग, भक्ति मार्ग एक में लय?! 👍आओ जाति मजहब, धर्म स्थलों आदि के चक्कर में न पड़ कर कल्कि अभियान में सज्ज हों?! हम जमाने की नजर में कुछ भी हों इससे क्या ?👌 हमें 10 जून 2025 को मैसेज मिला है कि महा परिवर्तन को अब समाज मे सबसे नीचे स्तर के स्त्री पुरुषों या फिर सबसे ऊंचे स्तर के व्यक्तियों को योजना में लाओ। जो समाज, जाति, धर्मस्थलों,वर्तमान सिस्टम की मौज में सिर्फ हैं वे परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर सकते। @@@@@ @@@@@ @@@@ जब हम बण्डा ( शाहजहांपुर) पैत्रक गांव जाना होता तो खेतों व खेतों की हरियाली के बीच सिक्ख परिवारों का मकान बना कर रहना बड़ा अच्छा लगता था। हमारे मन में भी विचार आते थे कि काश आगे चल कर हमारा मकान भी हरियाली के बीच हो? ' हरित नगर ' - उन दिनों हरित क्रांति विद्या मंदिर के आसपास खेत खलिहान व बाग बगीचे ही थे। विद्यालय सटे एक ओर अवश्य चीनी मिल था लेकिन हम सबका उसमें आना जाना जारी रहता था।वह चीनी मिल अब बंद पड़ी थी। शैक्षिक सत्र सन 1984 -85 ई0 था। हर सायंकाल अधिकतर हम दीपक सिंह विष्ट, दिनेश सिंह, रजनीश सिंह, सर्वेश सिंह कुशवाह ,राजेश शर्मा, धर्मेंद्र सक्सेना आदि के साथ रहते थे। हम खेलते तो नहीं थे लेकिन इनके साथ बने रहते थे। क्षेत्र हुआ करता था - बीसलपुर में रामलीला मेला मैदान, पीलीभीत मार्ग पर स्थित चीनी मिल ,बाला जी मढ़ी का मैदान आदि । मनोज गंगवार व उसकी फैमिली हरित क्रांति विद्या मंदिर , हरित नगर ,बीसलपुर में ही निबास कर रही थी। अवकाश के दिन उनके पास भी आना रहता था। पीलीभीत मार्ग पर एक सिक्ख सहपाठी सिन्दर सिंह का आवास व खेत था । उसके साथ हमारी सिक्ख पंथ को लेकर जिज्ञासाएं रहती थीं। एक गुरुद्वारा में किसी सिक्ख के द्वारा किया जाने वाले धार्मिक आचरण व जयघोष व कथन आदि क्या होते है? हम पूछते रहते थे कि अरदास क्या है? पंच प्यारे क्या हैं? लंगर क्या है ?आदि आदि ..?! हम किशोरावस्था से चिंतन मनन, कल्पना, स्वप्न में स्रोता, दृष्टा बन या पढ़कर खोने लगे थे। ऐसे में ' आओ सिक्ख बनें ! ' पर भी हमारा चिंतन चलने लगा था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बरेली में दौरा किया था, और उनका अंतिम दौरा 1938 में दर्ज है। उस समय उन्होंने सरस्वती सेकेंडरी स्कूल में एक सभा की थी, जहाँ उन्होंने कहा था कि देश को आजादी अहिंसा से नहीं, बल्कि क्रांति से मिलेगी। सुभाष नगर, बरेली में कुछ बुजुर्ग अब (198-86) भी बरेली में नेता जी के आने का जिक्र करते थे। इस बीच हनुमान गिरी ..?! हनुमान गिरी के नाम से जो सन्त आगे चल 1945 के बाद बरेली आया था उसे भी लोग नेता जी ही कहते थे। हम देख रहे थे, सुन रहे थे कि समाज, देश, कुल में कुछ ऐसा होता रहता है जिस पर बोलने वाला कोई नहीं होता । ऐसे में प्रतिहिंसा, जबरदस्ती , कठोरता आदि जरूरी हो जाती है। ऐसे में हथियार रखना क्या जरूरी नहीं है? पुलिस, कानून, नेता, अमीर आदमी, अदालत आदि का सहयोग कुछ लोगों को मुश्किल हो जाता है। मजहबी, पत्थर बाज, भीड़ हिंसा ,जातीय मनमानी आदि के चलते कुछ लोग शोषण ,अन्याय आदि के ही शिकार होकर रह जाते हैं?उनको समाधान किधर से मिलता है? अनुभव सक्सेना, मनोज गंगवार, रजनीश सिंह, दिनेश सिंह अब भी हमारे सम्पर्क में थे जो कभी हमारे साथ हरित क्रांति विद्या मंदिर, हरित नगर, मो0दुर्गा प्रसाद ,बीसलपुर में सहपाठी हुआ करते थे। हमें ध्यान आया कि उन दिनों इस विद्यालय के सामने से गुजर कर पीलीभीत मार्ग पर सुबह सुबह टहलने जा रहे थे। एक सन्यासी बोला था कि “ इस स्कूल से देखना कुछ बच्चे निकल कर इतिहास रचेंगे? “ तब उसके साथ चल रहा एक बुजुर्ग सन्यासी बोला कि सम्भवनाएं तो हर ज़र्रे ,हर स्तर से होती हैं अनन्त तक की । डगर में कठनाइयों बीच काफी बड़ी संकल्प शक्ति, साहस व और भी बहुत कुछ चाहिए। हम दौड़ लगाते हुए आगे निकल गये थे। आगे हमें मनोज गंगवार भी मिल गया था।जिसके साथ हम धीमे धीमे चलने लगा।वह एक पैर से कमजोर था। मोहल्ला दुबे में चौसरा मार्ग पर एक फैमिली रहने लगी थी जिसका एक इकलौता एक आठ वर्षीय बालक था। वह रोज तालाब के पास लगने वाले एक ठेले से रोज समोसे खाता था। जब उसके पेट में दर्द उठा और उसे अस्पताल में एडमिट कराया गया तो सात दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो गयी। जांच से पता चला कि उसके पेट भयानक रूप से फेट जमा था। आओ न देखा ताव उसका पिता लाठी लेकर उस समोसे वाले पर टूट पड़ा था।कुछ लोगों ने जिससे समोसे बिक्रेता को बचाया।उसे शुद्ध तेल व खाद्य पदार्थ से समोसे बनाने की सलाह दी गयी। “ क्रांति की सम्भवनाएं कब और कहां नहीं हैं? “- मैं सोंच रहा था। क्रांति कैसी? वह आठ वर्षीय बालक का चाचा था जो पैत्रक सम्पत्त्ति इसे दूर एक आश्रम में रह रहा था।जिससे हिस्से की जमीन जायदाद को हड़पा जा चुका। उसके पिता ने सब सम्पत्त्ति हड़प रखी थी। गुस्से में आकर न जाने क्या क्या सोंचने को विवश हो जाता था लेकिन… “ हमें क्या चाहिए?शांति, मानव शान्ति, समाज शांति, मानवता और फिर तीन कन्याएं हैं उनके प्रति फर्ज निभाएं? “ उसने आश्रम से सटी जमीन तालाब किनारे अपने आवास के लिए कब्जा कर रखी थी। जिसमें उसने झोपड़ी व खपरैल डाल रखा था।उसकी पत्नी व तीनों कन्याएं वहां रखा करती थीं। समाज में उसकी छबि उसके भाई से बेहतर थी। “ हूँ, पहले ज्यादा अपने सोंच से ही परेशान रहता है? “ वह एक प्राइवेट स्कूल में भी काम करता था, जहां वह NC,KGआदि के बच्चों की व्यवस्था देखता था। “ लोगों के बीच तभी जाओ तब लोगों को झेल सको! “ - अचानक उसके मन में विचार आ गया था। वह कुछ दिनों से स्कूल नहीं जा रहा था। परसों हाफ डे के दिन जब पहुंचा भी तो परेशान हो उठा। उसका नाम रामेश्वर शर्मा । @@@@ @@@@ @@@@ अंकित यादव किसी सोंच में था। सामने एक बुजुर्ग को देख कर … “ आपने जयगुरुदेव को पढा है, इसलिए आप कह रहे हैं कि दिल्ली की गद्दी से देश का भला कब हुआ है?राजधानी परिवर्तन से देश का भला होगा? “ “ जब से भारत का इतिहास शुरू होता है, तब से अध्ययन कीजिए। किस काल खंड में किस राजधानी नगर से गौरबशाली स्वर्णमयी विकास हुआ है? प्राचीन काल से स्वर्ण काल कब था ?तब क्या दिल्ली राजधानी थी?राजधानी के रूप में दिल्ली से कब देश का भला हुआ है? “ “स्थान का क्या कोई महत्व नहीं? “ ' महाकश्यप आदि गोत्रीय वृद्धाश्रम ! ' मुम्बई के समीप बाहरी इलाके में यह आश्रम ,जहां अंकित यादव बुजुर्गों के बीच उपस्थित था। जहां एक बालक इकबाल भी। बालक इकबाल वृद्धाश्रम में एक बेंच पर बैठा बुजुर्ग स्त्री - पुरुषों को देख कर सोंच रहा था …” आठ दिन बाद मदर डे होगा।सोशल मीडिया पर जो मदर डे हैपी हैपी का तूफान सा ला देंगे वे क्या रोजमर्रे 365 दिन इन वृद्धों व वृद्धाश्रमों के बारे में क्या कुछ करते हैं? “ ये बुजुर्ग ..?! बुजुर्ग ..मेरे पिताश्री किस अवस्था में थे ? वे बुजुर्ग ही थे । जब मैं इस दुनिया में आया तो मेरे पिता जी लगभग पचास साल के थे। इकबाल अपने पिता की दूसरी पत्नी से था। पहली पत्नी से तीन लड़कियां थीं।पहली पत्नी फरीदपुर में एक साम्प्रदायिक हिंसा में मार दी गयी थी,जहां उसका मायका था। अभी पिछले साल पिताश्री चल बसे, लोग तो कहते हैं कि उन्हें कोरोना है। मां कोरोना के डर से मायके से आयी ही नहीं थी। परिवार वालों ने भी दूरी बना ली थी। तीनों बहिनों ने पिता की सेवा की थी, मैं भी संग लगा रहता था। तीनों बहिनें दहशत में थीं और डॉक्टरों ने उन्हें भी कोरोना साबित कर दिया था।हमें भी बुखार व सर्दी रहने लगी थी।कोई करीब आना तो दूर एक नजर देखना भी नहीं चाहता था।होटल का काम धंधा भी चौपट। बात यहां पर बुजुर्गों के दशा की है।घर का मुखिया जब बुजुर्ग हो तब भी हालत खस्ता और जब परिवार का मुखिया जब बुजुर्गों व अन्य भाइयों को अलग थलग कर सोंचने लगे तो भी हालत खस्ता हो। एक तरफ राजा दशरथ दूसरी तरफ राजा रावण!!दोनों बुजुर्ग हो चले थे।राजा दशरथ ने बुढापा में पुत्रों की प्राप्ति की।जो भी हो? लेकिन बुढापा की संतानों व जवानी की संतानों में फर्क होता है। अनेक फैमलीज में मैं देखता था ,जहां माता पिता जवान हैं, वहां बच्चे ज्यादा उत्साह महसूस करते हैं यदि माता पिता बच्चों व बुजुर्गों के साथ सिर्फ गम्भीर ही नहीं रहते वरन खेलते हैं, खिलखिलाते हैं, कॉमेडी देखते हैं। साथ साथ मार्केटिंग,शॉपिंग में व्यस्त रहते हैं, अपने विचार फ्री स्टाइल शेयर करते हैं।एक दूसरे की समस्याओं व कार्यों में सहयोगी रहते हैं। एक दूसरे की समस्याओं व कार्यों में सहयोगी रहते हैं ।वहीं दूसरी ओर बुजुर्ग माता पिता थकान, ऊब ,ज्यादा कार्य, व्यस्तता आदि के बीच उदास, निराश ,खिन्नता का वातावरण निर्मित करते हैं। हम एक संकरी ,पतली गली से निकल कर जा रहे थे। किनारे किनारे नाला और कूड़े का ढेर। एक स्थान पर नाला पे सीमेंट का पटला पड़ा था जिस पर दो लड़के दीवार का सहारा लिए खड़े थे। “ अब तो लौंडों का जीना दूभर है? “ “ करें तो करें क्या? “ “ बिजनिस नहीं कर सकते,पढ़ भी ठीक से पाये नहीं?सरकारी स्कूल में पढ़े लेकिन क्या पढ़े?प्राइवेट में पढ़ाने को बाप के पास रुपया नहीं?लेबरी भी कर नहीं सकते? “ सब खुदा की मर्जी कैसे?भूखा हूँ, बेरोजगार हूँ?सब खुदा की मर्जी कैसे? खुदा की ने इंसान को ‘ आजाद इच्छा ‘ से पैदा किया है?लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अपने देह, अपने कुनबे, अपने मजहब के लिए कायनात में और इंसानों की जमातों में शांति सुकून को छीन कर हिंसा, उन्माद से सारी इंसानी सभ्यता को भर देना? ऐसे में ऐसे में वास्तव में ‘ रोजा रखने ‘ का मतलब क्या है? हर हालत में अपने को व दूसरों को सहज रखना। भूख, प्यास, सेक्स भावों के बाबजूद इसके बाद लिए दूसरों को परेशान न करना, मानव समाज को अशांति में न धकेलना न ही प्रकृति विदोहन व प्रदूषण में? जो प्रकृति विदोहन ,प्रदूषण में सहायक है विकास के नाम पर वे कैसे तेरे मर्जी से चल रहे हैं?वे ही स्वयं कह ने रहे हैं कि "सब प्रभु की मर्जी! " मानव पथ क्या है आखिर? विकास के का मतलब क्या है ?वन्य, ग्रामीण जीवन जीना पशुपालन, कृषि, बागवानी आदि के बीच न कि बड़ी बड़ी फैक्ट्रियां लगा कर प्रदूषण फैलाने का काम करना? आपका प्रश्न गहरा और विचारोत्तेजक है। यह ईश्वर की इच्छा (प्रभु की मर्जी), मानव स्वतंत्रता, प्रकृति के शोषण, प्रदूषण और विकास के बीच के विरोधाभास को छूता है, तथा अंत में पूछता है कि मानव का सच्चा पथ आखिर क्या है? प्रभु की मर्जी और मानव कर्म का संबंधभारतीय दर्शन (विशेषकर हिंदू, वेदांत और कर्म सिद्धांत) में सब कुछ "प्रभु की मर्जी" से ही होता है, यह सही है – क्योंकि ब्रह्म या परमात्मा सर्वव्यापी है। लेकिन यह fatalism (नियतिवाद) नहीं है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन – तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। मानव को स्वतंत्र इच्छा (free will) दी गई है, जो ईश्वरीय योजना का हिस्सा है। जो लोग प्रकृति का विदोहन करते हैं, प्रदूषण फैलाते हैं और विकास के नाम पर जंगलों को काटते हैं, नदियों को विषैला बनाते हैं – वे अपनी स्वतंत्र इच्छा का दुरुपयोग कर रहे हैं। वे कहते हैं "सब प्रभु की मर्जी", लेकिन यह बहाना मात्र है। यह उनकी जिम्मेदारी से भागना है। असल में, उनके कर्मों का फल (कर्मा) उन्हें और पूरी सृष्टि को भुगतना पड़ता है – जलवायु परिवर्तन, बाढ़, सूखा, बीमारियां आदि।प्रभु की मर्जी से सब चलता है, लेकिन मानव को धर्मपालन का दायित्व दिया गया है। प्रकृति का शोषण अधर्म है।प्रकृति और मानव का संबंध भारतीय दर्शन में वेदों, उपनिषदों और पुराणों में प्रकृति को देवतुल्य माना गया है: पृथ्वी को माता कहा गया (पृथ्वी सूक्त में: माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः)।नदियां (गंगा, यमुना), पर्वत, वृक्ष, वायु, जल – सभी में दिव्यता है।अहिंसा (non-violence) सभी जीवों और प्रकृति पर लागू होती है।अपरिग्रह (non-possessiveness) और संयम सिखाया गया, ताकि लालच से अतिदोहन न हो।हिंदू धर्म में पांच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से शरीर बना है, और प्रकृति से हम अलग नहीं। उसका शोषण स्वयं का शोषण है।