शुक्रवार, 11 सितंबर 2026
सिस्टम जब भस्मासुर?!
सन 2075 ईस्वी।
पुराने नगर का अधिकांश भाग खंडहर बन चुका था। एक विद्यालय की टूटी हुई इमारत में कुछ युवक और बुजुर्ग शरण लिए हुए थे। दीवार पर लगा उपस्थिति-पट्ट अब भी बचा था। उस पर धुँधले अक्षरों में लिखा था—
“प्रत्येक विद्यार्थी की नियमित उपस्थिति अनिवार्य है।”
बुजुर्ग अनुराग ने उस पट्ट को देखते हुए कहा—
“अशोक सर कहा करते थे कि जब कोई व्यवस्था अपने उद्देश्य को भूलकर केवल आँकड़ों, कागजों और आदेशों में उलझ जाती है, तब वह स्वयं अपने ही लोगों को फँसाने लगती है।”
एक युवक ने पूछा—
“सिस्टम अपने ही लोगों को कैसे फँसा सकता है?”
अनुराग ने विद्यालय के पुराने दिनों की एक घटना सुनानी शुरू की।
उपस्थिति का जाल
एक विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही थी। कई बच्चे पारिवारिक कठिनाइयों, कामकाज, बीमारी अथवा पढ़ाई में रुचि न होने के कारण विद्यालय नहीं आते थे। लेकिन अधिकारियों की ओर से निर्देश था कि उपस्थिति कम नहीं होनी चाहिए।
प्रधानाचार्य ने शिक्षकों से कहा—
“यदि बच्चों की उपस्थिति कम दिखाई गई, तो विद्यालय पर प्रश्न उठेंगे। अनुदान घट सकता है और शिक्षकों के विरुद्ध कार्रवाई भी हो सकती है।”
एक शिक्षक ने पूछा—
“लेकिन जो विद्यार्थी आया ही नहीं, उसे उपस्थित कैसे दिखाएँ?”
प्रधानाचार्य ने धीमे स्वर में कहा—
“मैं गलत उपस्थिति लगाने को नहीं कह रहा, लेकिन आँकड़े अच्छे होने चाहिए।”
यह ऐसा आदेश था जिसमें बात स्पष्ट भी थी और अस्पष्ट भी। शिक्षक वास्तविक उपस्थिति लिखते, तो उनसे खराब परिणाम का उत्तर माँगा जाता। अनुपस्थित विद्यार्थियों को उपस्थित दिखाते, तो वे गलत अभिलेख तैयार करने के दोषी बनते।
कुछ दिनों बाद एक विद्यार्थी विद्यालय के समय बाहर किसी विवाद में पकड़ा गया। अभिलेख में वह उस दिन विद्यालय में उपस्थित था। जाँच अधिकारी ने शिक्षक से पूछा—
“यदि यह विद्यार्थी विद्यालय में उपस्थित था, तो बाहर कैसे मिला?”
शिक्षक के पास कोई उत्तर नहीं था। जिस झूठे आँकड़े ने कुछ समय तक विद्यालय की छवि बचाई थी, वही अब शिक्षक के विरुद्ध प्रमाण बन गया।
अशोक सर ने यह घटना सुनकर कहा था—
“यही वह स्थिति है जिसमें सिस्टम अपने को बचाने के लिए झूठ माँगता है और फिर उसी झूठ के आधार पर अपने कर्मचारी को दंडित करता है।”
थाने का सिपाही
उसी नगर के थाने में एक सिपाही कार्यरत था। उसका वेतन सीमित था, काम के घंटे निश्चित नहीं थे और ऊपर से अनेक प्रकार के अनौपचारिक दबाव आते थे।
यदि वह रिश्वत लेता, तो कानून और नैतिकता दोनों की दृष्टि से गलत था। यदि रिश्वत लेने से इनकार करता, तो कुछ प्रभावशाली लोग उससे नाराज हो जाते। यदि वह नियम के अनुसार कार्रवाई करता, तो फोन आने लगते—
“उसे छोड़ दो, वह अपने लोगों में से है।”
यदि वह दबाव में किसी को छोड़ देता, तो बाद में वही अधिकारी पूछते—
“तुमने कानून का पालन क्यों नहीं किया?”
एक दिन सिपाही ने अशोक सर से कहा—
“सर, नौकरी का अर्थ अब कर्तव्य निभाना नहीं, परस्पर विरोधी आदेशों के बीच स्वयं को बचाना हो गया है। रिश्वत लूँ तो अपराधी, न लूँ तो व्यवस्था का विरोधी!”
अशोक सर ने उत्तर दिया—
“रिश्वत कभी उचित नहीं हो सकती। लेकिन केवल नीचे के कर्मचारी को दोष देकर समस्या समाप्त नहीं होती। यह भी देखना होगा कि उसके ऊपर कौन-से दबाव हैं, आदेश कैसे दिए जाते हैं और ईमानदार कर्मचारी को संस्था कितना संरक्षण देती है।”
बसों का हिसाब
नगर से जयपुर जाने वाली बसों के कुछ ठेकेदार यात्रियों की संख्या के आधार पर एक अनौपचारिक रकम अलग रखते थे। लोगों में चर्चा थी कि उसका एक भाग किसी प्रभावशाली जनप्रतिनिधि तक पहुँचता है। वह प्रतिनिधि सार्वजनिक मंचों पर परिवहन सुधारने की बातें करता था, लेकिन भीतर चल रही व्यवस्था पर मौन रहता था।
उसकी बिरादरी के कुछ लोग कहते—
“विधायक जी अपने आदमी हैं। उनकी आलोचना मत करो।”
एक यात्री ने पूछा—
“यदि गलत काम करने वाला अपनी जाति या बिरादरी का हो, तो क्या उसका गलत काम सही हो जाता है?”
दूसरे व्यक्ति ने उत्तर दिया—
“लोग प्रतिनिधि को जनता का सेवक नहीं, अपनी बिरादरी की शक्ति मानने लगते हैं। इसलिए वे सार्वजनिक हित से पहले सामुदायिक निष्ठा को रखते हैं।”
जब बसों में निर्धारित संख्या से अधिक यात्रियों को बैठाया जाता, किराया मनमाने ढंग से बढ़ता और शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती, तब उसका बोझ सामान्य यात्रियों को सहना पड़ता। ठेकेदार सोचता था कि हिस्सा देकर उसने सुरक्षा खरीद ली है। अधिकारी सोचता था कि ऊपर से संरक्षण है। नेता सोचता था कि बिरादरी उसका साथ देगी। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति व्यवस्था का “खास” बनने का प्रयत्न कर रहा था—और यही विशेष संबंध पूरी व्यवस्था के लिए उलझन बन रहा था।
भस्मासुर का रूपक
अनुराग ने युवकों से पूछा—
“भस्मासुर की कथा जानते हो?”
एक युवक ने कहा—
“उसे ऐसी शक्ति मिली थी कि जिसके सिर पर हाथ रखे, वह भस्म हो जाए। बाद में वह उसी शक्ति के कारण स्वयं संकट में पड़ गया।”
अनुराग ने कहा—
“सिस्टम भी भस्मासुर तब बनता है, जब उसे दी गई शक्ति नियंत्रण और सेवा के स्थान पर भय, पक्षपात तथा निजी लाभ के लिए प्रयोग होने लगे। वह पहले सामान्य नागरिक को परेशान करता है, फिर अपने कर्मचारियों को और अंत में स्वयं अपनी विश्वसनीयता को नष्ट कर देता है।”
विद्यालय में झूठी उपस्थिति, थाने में अनैतिक दबाव और परिवहन में कथित कमीशन—तीनों घटनाएँ अलग दिखाई देती थीं, पर उनकी जड़ एक थी: नियमों और वास्तविक परिस्थितियों के बीच दूरी।
अशोक सर की सभा
एक नागरिक सभा में अशोक सर ने कहा—
“किसी भी व्यवस्था का उद्देश्य मनुष्य की समस्या का समाधान होना चाहिए। लेकिन जब उसका ध्यान वास्तविक परिणाम से हटकर केवल आँकड़े, लक्ष्य, कमीशन, जातीय समर्थन और अधिकारियों को प्रसन्न करने पर टिक जाता है, तब साधन ही उद्देश्य बन जाते हैं।”
उन्होंने श्यामपट्ट पर लिखा—
अस्पष्ट आदेश → झूठे आँकड़े → दबाव → दोषारोपण → अविश्वास
फिर बोले—
“व्यवस्था को बचाने के लिए सत्य छिपाया जाता है। बाद में उसी छिपे हुए सत्य के कारण बड़ा संकट उत्पन्न होता है। तब ऊपर वाला नीचे वाले को दोष देता है और नीचे वाला परिस्थितियों को। उत्तरदायित्व कहीं निश्चित नहीं होता।”
सभा में बैठे एक शिक्षक ने पूछा—
“फिर समाधान क्या है?”
अशोक सर ने उत्तर दिया—
“विद्यार्थी अनुपस्थित है तो उसकी वास्तविक अनुपस्थिति दर्ज हो। साथ ही यह खोजा जाए कि वह विद्यालय क्यों नहीं आ रहा। सिपाही को ईमानदार कार्रवाई के लिए संस्थागत सुरक्षा मिले। ठेके, यात्रियों की संख्या, किराया और भुगतान सार्वजनिक हों। जनप्रतिनिधि को जाति का संरक्षक नहीं, पूरी जनता का उत्तरदायी सेवक माना जाए। शिकायत करने वाले व्यक्ति को शत्रु न समझा जाए।”
अंतिम प्रश्न
कथा समाप्त करते हुए बुजुर्ग अनुराग ने कहा—
“सिस्टम कोई आकाश से उतरी हुई वस्तु नहीं है। वह नियमों, संस्थाओं और मनुष्यों से मिलकर बनता है। इसलिए यह कहना अधूरा है कि केवल सिस्टम खराब है। प्रश्न यह भी है कि उसके भीतर बैठे लोग किस मूल्य के साथ काम कर रहे हैं और नागरिक किस आधार पर उनका समर्थन कर रहे हैं।”
बाहर सुबह का प्रकाश फैलने लगा था। टूटी हुई दीवार पर लिखा उपस्थिति का नियम अब साफ दिखाई दे रहा था।
अनुराग ने अंतिम बात कही—
“जिस व्यवस्था में सच बोलने वाला दंडित हो, झूठे आँकड़े देने वाला पुरस्कृत हो और प्रभावशाली व्यक्ति नियमों से ऊपर हो जाए, वह भस्मासुर बनने लगती है। फिर वह केवल जनता को नहीं, अपने शिक्षक, सिपाही, अधिकारी और नेताओं को भी उलझाती है।”
सिस्टम का सुधार तब आरम्भ होगा, जब कागजी सफलता के स्थान पर वास्तविक समस्या का समाधान, निजी संरक्षण के स्थान पर समान नियम और जातीय निष्ठा के स्थान पर सार्वजनिक उत्तरदायित्व को महत्त्व मिलेगा।
शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
अंतर्मन का दीपक.?!❤️❤️
अंतर्मन का दीपक
सन 2075 ईस्वी।
जंगल के बीच बने एक पुराने आश्रम के चारों ओर गहरी निस्तब्धता थी। कभी वहाँ एक विद्यालय हुआ करता था, पर अब उसकी दीवारों पर लताएँ फैल चुकी थीं। टूटी खिड़कियों से हवा आती तो पुराने कमरों में ऐसा स्वर गूँजता, मानो बीते समय के विद्यार्थी आज भी अपने शिक्षक से प्रश्न पूछ रहे हों।
उसी आश्रम के बरामदे में बुजुर्ग अनुराग बैठे थे। उनके बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे, किंतु आँखों में आज भी विद्यार्थी जैसी जिज्ञासा थी। उनके हाथों में अशोक सर की कुछ पुरानी पुस्तकें थीं—शिक्षा, शिक्षा का असल, क्रांति : क्यों? कैसे?, लंका में विभीषण?! और कुछ अन्य पुस्तकें, जिनके पन्ने समय के साथ पीले पड़ चुके थे।
आश्रम में रहने वाले कुछ बच्चे उनके चारों ओर बैठ गए। उनमें अब्दुल, रश्मि, दीया और कबीर भी थे। नई सभ्यता के इन बच्चों ने पुराने विद्यालय कभी नहीं देखे थे। उनके लिए जंगल ही पाठशाला था और जीवन की कठिनाइयाँ ही पाठ्यपुस्तक।
कबीर ने अनुराग के हाथों की पुस्तकों की ओर देखते हुए पूछा—
“बाबा, इनमें किसका ज्ञान लिखा है?”
अनुराग ने पुस्तकों पर हाथ फेरते हुए कहा—
“इनमें अशोक सर के विचार हैं। वे मेरे शिक्षक थे।”
रश्मि ने उत्सुकता से पूछा—
“क्या वे आपको केवल इतिहास, भूगोल और भाषा पढ़ाते थे?”
अनुराग कुछ क्षण शांत रहे। फिर सामने खड़े विशाल वृक्ष की ओर देखते हुए बोले—
“उन्होंने हमें विषय भी पढ़ाए, लेकिन उनकी वास्तविक शिक्षा पुस्तकों से कहीं बड़ी थी। उन्होंने हमें यह नहीं बताया कि क्या सोचना है; उन्होंने हमें सिखाया कि सोचना कैसे है।”
अब्दुल ने पूछा—
“तो वास्तविक शिक्षक कौन होता है?”
अनुराग ने शिक्षा का असल पुस्तक खोली और बोले—
“शिक्षक केवल वह व्यक्ति नहीं होता जो पाठ्यक्रम पूरा करे, उपस्थिति दर्ज करे और महीने के अंत में वेतन पाए। ये उसके कार्य का एक भाग हो सकते हैं। वास्तविक शिक्षक वह है जो विद्यार्थी के भीतर छिपी जिज्ञासा, विवेक, साहस और मानवीय चेतना को जाग्रत कर दे।”
उन्होंने बच्चों के सामने जंगल की मिट्टी से एक छोटा-सा दीपक बनाया और उसमें तेल डालकर बाती जला दी।
“देखो, शिक्षक विद्यार्थी के मस्तिष्क को किसी खाली बर्तन की तरह भरने वाला व्यक्ति नहीं है। विद्यार्थी के भीतर प्रकाश पहले से मौजूद होता है। शिक्षक केवल उस प्रकाश की बाती को जगा देता है।”
दीया ने पूछा—
“लेकिन लोग तो कहते हैं कि शिक्षक भी एक कर्मचारी होता है।”
अनुराग मुस्कराए—
“शिक्षक किसी संस्था में कर्मचारी हो सकता है, पर उसकी संपूर्ण पहचान कर्मचारी की नहीं होती। कर्मचारी को एक निर्धारित काम दिया जाता है और वह उसे पूरा करता है। शिक्षक का काम केवल निर्धारित अध्याय समाप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज का भविष्य बनाना है।”
उन्होंने थोड़ा रुककर कहा—
“इसका अर्थ यह भी नहीं कि शिक्षक नियमों से ऊपर है। वास्तविक शिक्षक उत्तरदायी होता है। वह उचित नियमों का सम्मान करता है, लेकिन यदि कोई आदेश विद्यार्थी, सत्य या न्याय के विरुद्ध हो तो वह अपने विवेक का उपयोग करता है।”
रश्मि ने उनके हाथ से क्रांति : क्यों? कैसे? पुस्तक उठाई।
“बाबा, इसमें क्रांति क्यों लिखी है? क्या शिक्षक कोई क्रांतिकारी होता है?”
अनुराग ने उत्तर दिया—
“हाँ, लेकिन अशोक सर जिस क्रांति की बात करते थे, वह हिंसा और विनाश की क्रांति नहीं थी। वह अज्ञान से ज्ञान, भय से साहस, संकीर्णता से विश्व-बंधुत्व और निष्क्रियता से उत्तरदायित्व की ओर बढ़ने वाली क्रांति थी।”
उन्होंने बच्चों से पूछा—
“यदि कोई विद्यार्थी अपने शिक्षक की प्रत्येक बात आँख बंद करके मानता रहे, तो क्या वह शिक्षित कहलाएगा?”
बच्चे चुप रहे।
अनुराग स्वयं बोले—
“नहीं। वास्तविक शिक्षक अपनी नकल तैयार नहीं करता। वह ऐसे विद्यार्थी तैयार करता है जो उससे प्रश्न कर सकें, उसके विचारों की जाँच कर सकें और आवश्यकता पड़ने पर उससे आगे निकल सकें।”
तभी दीया ने पूछा—
“लेकिन शिक्षक और विद्यार्थी के बीच तीसरे का कोई महत्व नहीं होता—इसका क्या अर्थ है?”
अनुराग ने पास बहती छोटी जलधारा की ओर संकेत किया।
“देखो, बादल वर्षा करता है और धरती उस जल को ग्रहण करती है। यदि दोनों के बीच कोई दीवार खड़ी कर दी जाए, तो जल धरती तक नहीं पहुँचेगा। इसी प्रकार शिक्षा का मूल संबंध शिक्षक और विद्यार्थी के बीच का जीवंत मानसिक संबंध है। उसमें विश्वास, संवाद और आत्मीयता आवश्यक है।”
“परिवार, विद्यालय और समाज सहयोगी हो सकते हैं। उनका सहयोग आवश्यक भी है। लेकिन जब कोई तीसरा व्यक्ति राजनीति, भय, स्वार्थ या सत्ता के आधार पर यह तय करने लगे कि शिक्षक क्या प्रश्न पूछे, विद्यार्थी क्या सोचे और कौन-सा सत्य स्वीकार करे, तब शिक्षा की स्वतंत्रता बाधित होने लगती है।”
अब्दुल ने पूछा—
“क्या अशोक सर के साथ भी कभी ऐसा हुआ था?”
अनुराग की दृष्टि दूर अतीत में चली गई।
“हाँ। एक बार विद्यालय के कुछ प्रभावशाली लोगों ने उनसे कहा था कि वे विद्यार्थियों को केवल परीक्षा में आने वाले प्रश्न पढ़ाएँ। जीवन, समाज, प्रकृति और अन्याय से संबंधित प्रश्नों पर चर्चा न करें।”
“अशोक सर ने पूछा था—‘यदि विद्यार्थी परीक्षा उत्तीर्ण कर ले, लेकिन सत्य और असत्य का अंतर न समझ पाए, तो क्या मेरी शिक्षा पूरी मानी जाएगी?’”
“लोगों ने उत्तर दिया—‘आपको वही करना चाहिए जिसका निर्देश मिला है।’”
“अशोक सर ने शांत स्वर में कहा था—‘मैं व्यवस्था का विरोधी नहीं हूँ, लेकिन शिक्षक होने के कारण प्रत्येक निर्देश को ज्ञान, न्याय और विद्यार्थी-हित की कसौटी पर परखना मेरा उत्तरदायित्व है। शिक्षा आज्ञापालन की मशीन नहीं बनाती; वह विवेकवान मनुष्य बनाती है।’”
बच्चे ध्यान से सुनते रहे।
कबीर ने पूछा—
“फिर शिक्षक दिवस पर अशोक सर को क्या चाहिए होता था? फूल, माला या उपहार?”
अनुराग की आँखों में चमक आ गई।
“एक शिक्षक दिवस पर हम भी उनके लिए फूल लेकर गए थे। उन्होंने फूल स्वीकार किए, लेकिन कहा—‘यदि वास्तव में मेरा सम्मान करना चाहते हो तो आज एक संकल्प लो। प्रश्न पूछना कभी मत छोड़ना। ज्ञान को केवल उत्तर-पुस्तिका में मत लिखना, उसे अपने व्यवहार में उतारना। जाति, मजहब, भाषा और धन के आधार पर किसी मनुष्य को छोटा मत समझना। प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मत मानना और अन्याय के सामने अपने विवेक को मौन मत होने देना।’”
अनुराग ने अपने सामने बैठे बच्चों की ओर देखा।
“उस समय हम उनके कथन का पूरा अर्थ नहीं समझ सके थे। हमें लगता था कि चरण-स्पर्श, फूल और प्रशंसा ही शिक्षक का सम्मान हैं। लेकिन वर्षों बाद समझ में आया कि शिक्षक का सबसे बड़ा सम्मान विद्यार्थी का जाग्रत विवेक है।”
उन्होंने अशोक सर की पुस्तकों को बच्चों के बीच रख दिया।
“आज ये पुस्तकें मेरे हाथ में अवश्य हैं, लेकिन अशोक सर की शिक्षा केवल इनके पन्नों में नहीं है। जब कोई विद्यार्थी प्रश्न पूछने का साहस करता है, जब वह ज्ञान को आचरण में बदलता है, जब वह दूसरे मनुष्य की गरिमा और प्रकृति की रक्षा करता है—तब शिक्षक उसके भीतर जीवित हो उठता है।”
रश्मि ने पूछा—
“तो क्या विद्यार्थी भी कभी शिक्षक बन सकता है?”
अनुराग ने जलते दीपक से दूसरा दीपक जला दिया।
“यही तो शिक्षा का उद्देश्य है। वास्तविक शिक्षक विद्यार्थी को जीवन भर अपना अनुयायी नहीं बनाए रखता। वह उसे इतना सक्षम बनाता है कि वह स्वयं प्रकाश बने और दूसरों के भीतर भी प्रकाश जगा सके।”
धीरे-धीरे प्रत्येक बच्चे ने उसी दीपक से अपना छोटा दीपक जला लिया। बरामदे का अँधेरा कम होने लगा। जंगल की निस्तब्धता के बीच अनेक दीपक चमक रहे थे।
अनुराग ने लंका में विभीषण?! पुस्तक उठाते हुए कहा—
“सच्चा शिक्षक कभी-कभी विभीषण की तरह अपने ही वातावरण के अनुचित आचरण पर प्रश्न उठाता है। लोग उसे विद्रोही समझ सकते हैं, लेकिन यदि उसका आधार सत्य, विवेक और लोकमंगल है, तो उसका प्रश्न ही परिवर्तन का आरंभ बन सकता है।”
“पर याद रखना—क्रांतिकारी होने का अर्थ मनमानी करना नहीं है। वास्तविक शिक्षक स्वयं भी सीखता है, अपनी भूल स्वीकार करता है और अपनी बात की समीक्षा से नहीं डरता। वह व्यक्ति नहीं, सत्य को बड़ा मानता है।”
संध्या अब रात में बदल रही थी। अनुराग ने आकाश की ओर देखा और धीमे स्वर में कहा—
“अशोक सर कहते थे—शिक्षक पाठ नहीं भरता, वह अंतर्मन में प्रकाश जगाता है। उसे अपने सम्मान में फूलों से अधिक जाग्रत मनुष्य चाहिए।”
उस रात जंगल का पुराना विद्यालय फिर से जीवित हो उठा। वहाँ घंटी नहीं बजी, उपस्थिति नहीं ली गई और कोई परीक्षा भी नहीं हुई। फिर भी शिक्षा आरंभ हो चुकी थी—क्योंकि बच्चों के भीतर प्रश्न जाग चुके थे।
और जहाँ प्रश्न, विवेक, संवेदना तथा सत्य की खोज जाग जाए, वहीं वास्तविक शिक्षक उपस्थित होता है।
सोमवार, 31 अगस्त 2026
खंडहरों में बची हुई पुस्तकें?!
खंडहरों में बची हुई पुस्तक
सन 2164 ई० की एक सर्द संध्या।
घने जंगल के बीच एक प्राचीन किले का खंडहर था। कभी उस किले को बेकार पत्थरों का ढेर समझा गया था, लेकिन अब उसकी मोटी दीवारें तूफानों, गर्म हवाओं और हिंसक संघर्षों से लोगों की रक्षा कर रही थीं। नीचे वर्षा का पानी जमा करने के कुंड बनाए गए थे। आसपास वनस्पतियाँ उगाई जा रही थीं।
उसी खंडहर में कुछ बुजुर्ग आग के चारों ओर बैठे थे। उनके बीच एक पुरानी पुस्तक रखी थी—
“एक और भविष्य कथांश?!”
लेखक—अशोक कुमार वर्मा ‘बिंदु’
पुस्तक के पृष्ठ पीले पड़ चुके थे, मगर उसके प्रश्न अभी जीवित थे।
बुजुर्ग राज ने पुस्तक उठाते हुए कहा—
“कभी लोगों की निगाह इस पुस्तक पर थी। कुछ इसे चेतावनी मानते थे, कुछ कल्पना और कुछ अशोक सर की निराशा।”
एक महिला ने पूछा, “इसमें ऐसा क्या लिखा था?”
राज ने पहला पृष्ठ खोला और पढ़ना प्रारम्भ किया।
कलि कोई बाहर बैठा राक्षस नहीं था
पृथु महि पर कुछ प्रभावशाली समूहों ने धन, सूचना, तकनीक और प्राकृतिक संसाधनों पर बड़ा नियंत्रण स्थापित कर लिया था। जनता भौतिक सुविधाओं में उलझी हुई थी। दल और नेता भी उन्हीं व्यवस्थाओं से लाभ पाते थे। लोग नेताओं के नाम पर लड़ते रहे, लेकिन व्यवस्था की दिशा पर प्रश्न कम करते थे।
प्राकृतिक आपदाओं, युद्धों और हिंसा के कारण बहुत से लोग विस्थापित हो चुके थे। हिमालय, उत्तराखंड, बिहार और पूर्वोत्तर के अनेक क्षेत्रों में जीवन कठिन होता जा रहा था।
सन 2016–17 से अशोक सर कहते थे—
“संहारक शक्तियों की गति बढ़ रही है। राक्षस कलि मनुष्यों के दिमाग पर बैठ चुका है।”
खंडहर में बैठा एक युवक बीच में बोल पड़ा—
“क्या वे सचमुच किसी राक्षस की बात करते थे?”
बुजुर्ग राज ने समझाया—
“उनकी भाषा प्रतीकात्मक थी। ‘कलि’ मनुष्य के भीतर का लोभ, भय, घृणा, अहंकार और संवेदनहीनता था। जब अधिकांश लोग इन्हीं प्रवृत्तियों से संचालित होने लगें, तो ऐसा लगता है जैसे कोई अदृश्य शक्ति पूरी सभ्यता को नियंत्रित कर रही हो।”
“और शून्य योग?”
“शून्य योग का आशय अपनी चेतना को कुछ समय जाति, मजहब, दल, कर्मकांड और निजी स्वार्थ के शोर से खाली करना था। अशोक सर और निशांत सर चाहते थे कि मनुष्य पहले अपने भीतर उठते विकारों को देखे।”
लेकिन उस दौर में पढ़े-लिखे लोग भी उनका उपहास करते थे।
कोई कहता, “ध्यान करने से पहाड़ बचेंगे क्या?”
निशांत सर उत्तर देते—
“ध्यान अपने आप पहाड़ नहीं बचाता। लेकिन यदि मनुष्य का लोभ नियंत्रित नहीं हुआ, तो वह विज्ञान और तकनीक का प्रयोग भी विनाशकारी ढंग से करेगा। आंतरिक विवेक और बाहरी विज्ञान—दोनों की आवश्यकता है।”
सन 2147 ई०—डूबी मुंबई के ऊपर
खंडहर में बैठे बुजुर्गों के सामने एक पुराना दृश्य-यंत्र चालू किया गया।
समुद्र में डूबी मुंबई के ऊपर एक उड़नतश्तरी उड़ रही थी। उसके भीतर तीन नेत्रधारी वृद्ध सजाकदक्फक्फ और युवा शोधार्थी तिराश्मिका पृथु महि का इतिहास देख रहे थे।
तिराश्मिका ने पूछा—
“क्या अशोक सर सन 1990 में मुंबई के डूबने के स्वप्न देखने लगे थे?”
सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया—
“उनकी पुस्तकों में ऐसी आशंकाओं का उल्लेख मिलता है। लेकिन स्वप्न को वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता। वह उनके मन में उठी चेतावनी या प्रतीकात्मक अनुभूति हो सकती थी।”
“फिर उन्होंने सन 2100 से पहले मुंबई के डूबने की घोषणा क्यों की?”
“क्योंकि वे समुद्र के बढ़ते स्तर, तटीय अतिक्रमण, अत्यधिक निर्माण और जलवायु-संकट से चिंतित थे। उनकी बात का सार यह था कि कोई भी नगर प्रकृति की सीमा से बड़ा नहीं हो सकता।”
युवती ने समुद्र के नीचे स्कैन किया। सात प्राचीन द्वीपों की रूपरेखा दिखाई दी। कभी उन्हें भूमि-पुनर्निर्माण, बाँधों और कॉज़वे से जोड़कर विशाल मुंबई बनाई गई थी।
“यदि वे सातों द्वीप अलग रहते तो क्या मुंबई बच जाती?” उसने पूछा।
वृद्ध ने कहा—
“यह निश्चित नहीं। समुद्र-स्तर बढ़ने और तूफानों से उन्हें भी खतरा रहता। पर जनसंख्या, निर्माण और तटीय पारिस्थितिकी का स्वरूप अलग हो सकता था। मूल प्रश्न द्वीप जोड़ने का नहीं, विकास की सीमा भूल जाने का था।”
तिराश्मिका ने अभिलेख में अशोक सर को पांडुलिपियों के बीच बैठे देखा।
“वे इतने बेचैन क्यों थे?”
“उन्हें लगता था कि शरीर का समय कम है और लिखे हुए विचार अभी जनता तक नहीं पहुँचे। वे अधिक से अधिक पुस्तकें प्रकाशित करना चाहते थे। वे अपना नाम ही नहीं, अपने प्रश्न भविष्य के लिए बचाना चाहते थे।”
अतीत की मूर्तियों पर हँसती पीढ़ी
पृथु महि के दूसरे भाग में बचे हुए लोग जंगलों, किलों और खंडहरों में आश्रय ले चुके थे। पुरानी सभ्यता के भव्य नगर असुरक्षित हो गए थे, जबकि कभी उपेक्षित दुर्गम क्षेत्र जीवन बचाने के साधन बने।
कुछ बच्चे एक टूटी हुई मूर्ति के सामने खड़े थे।
एक बालक बोला—
“अतीत के लोग अपनी मूर्तियाँ बनाते रहे, लेकिन नदियाँ, वन और पहाड़ नहीं बचा सके!”
दूसरा हँसने लगा।
पास खड़ी बुजुर्ग अनंता ने उन्हें रोक दिया।
“मूर्ति का उपहास मत करो। पत्थर ने प्रकृति का विनाश नहीं किया। मनुष्य के गलत निर्णयों ने किया। अतीत में भी सभी लोग दोषी नहीं थे। अनेक वैज्ञानिक, किसान, आदिवासी, साधक और लेखक लगातार चेतावनी दे रहे थे।”
“फिर उनकी बात क्यों नहीं सुनी गई?”
“क्योंकि तत्काल लाभ की आवाज भविष्य की धीमी चेतावनी से अधिक आकर्षक लगती थी।”
राज ने कहा—
“अतीत को दोष देना आसान है। कठिन यह पूछना है कि यदि वही लोभ आज हमारे भीतर आ गया, तो क्या हम भी वही भूल नहीं दोहराएँगे?”
खंडहर में मौन छा गया।
पुस्तक का भयानक अध्याय
राज ने पुस्तक का अगला अध्याय खोला। शीर्षक था—
“फरवरी 2165 ई०—क्या पृथु महि चटक जाएगी?”
पुस्तक में एक भयावह कल्पना लिखी थी—24 फरवरी को एक तीव्र भूकम्प से सूरत, हरिद्वार, उत्तरकाशी, मानसरोवर और चीन से होते हुए कोरियाई क्षेत्र तक भूमि चटक गई। बाँध टूटे, बाढ़ आई और अरब सागर से प्रशांत महासागर तक एक नया समुद्री मार्ग बन गया। भारतीय भूभाग पूर्व की ओर खिसक गया तथा म्यांमार और वियतनाम विनाश के साक्षी बने।
पढ़ते-पढ़ते राज रुक गया।
एक बुजुर्ग ने भयभीत होकर पूछा—
“आज सन 2164 है। पुस्तक में तो यह घटना लगभग एक वर्ष बाद लिखी है! क्या यह सच होने वाली है?”
राज ने पुस्तक बंद कर दी।
“नहीं। हमें किसी कथा को निश्चित वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं मानना चाहिए। पृथ्वी की विशाल भू-पट्टियाँ चलती अवश्य हैं, पर सामान्यतः उनकी गति प्रतिवर्ष कुछ सेंटीमीटर होती है। इतने लंबे भूभाग का एक ही दिन में चटककर नया महासागर बन जाना कथा की अतिरंजित कल्पना है।”
“तो लेखक ने ऐसा क्यों लिखा?”
“क्योंकि कभी-कभी साहित्य आने वाली आपदा का सही नक्शा नहीं, बल्कि वर्तमान लापरवाही का बड़ा दर्पण बनाता है। यह अध्याय कहता है—यदि मनुष्य प्रकृति का अंधविदोहन करता रहा, तो परिणाम उसकी कल्पना से भी बड़े हो सकते हैं।”
एक अन्य बुजुर्ग बोला—
“और भूकम्पों के लिए मनुष्य को दोषी मानना?”
राज ने उत्तर दिया—
“प्रमुख भूकम्प विवर्तनिक प्लेटों की प्राकृतिक गति से आते हैं। मनुष्य उनका मूल कारण नहीं है। लेकिन खनन, बड़े जलाशय, भूमिगत द्रव निकालने या भरने जैसी गतिविधियाँ कुछ क्षेत्रों में छोटे अथवा प्रेरित भूकम्पों का जोखिम प्रभावित कर सकती हैं। सबसे बड़ी मानवीय भूल असुरक्षित निर्माण और संवेदनशील भूभाग की उपेक्षा है, जिससे प्राकृतिक घटना महाविपत्ति बन जाती है।”
कुशक्तियों को क्या मिला?
पुस्तक की कथा में कुछ लोग मानते थे कि दुनिया को विभाजित करने वाली “कुशक्तियों” ने भूगर्भीय संकट का लाभ उठाया था। उन्होंने भय के बीच शासन, संसाधनों और जनसंख्या पर अधिक नियंत्रण स्थापित कर लिया।
लेकिन विनाश के बाद उनके पास भी क्या बचा?
बाजार थे, पर ग्राहक नहीं।
महल थे, पर सुरक्षित भूमि नहीं।
मुद्रा थी, पर स्वच्छ जल नहीं।
तकनीक थी, पर विश्वास नहीं।
निशांत सर की पुरानी आवाज अभिलेख से सुनाई दी—
“जो शक्ति जीवन की रक्षा नहीं कर सकती, वह अंततः शक्तिहीनता है। दूसरों को जकड़ने वाला व्यक्ति स्वयं भी उसी जाल में फँस जाता है।”
खंडहर में बैठी महिला ने कहा—
“इसलिए प्रश्न यह नहीं कि कुशक्तियाँ जीतीं या हारीं। प्रश्न यह है कि उनके संघर्ष में जन, धन और प्रकृति नष्ट हुई।”
सुनामी—प्रकृति या षड्यंत्र?
पुस्तक में 2004 की सुनामी का उल्लेख भी था। कुछ पात्र संदेह करते थे कि वह किसी गुप्त शक्ति की हरकत थी।
इस पर बुजुर्ग राज ने स्पष्ट किया—
“26 दिसम्बर 2004 की हिंद महासागर सुनामी समुद्र के नीचे आए अत्यंत शक्तिशाली भूकम्प के कारण उत्पन्न प्राकृतिक घटना थी। किसी कृत्रिम षड्यंत्र का विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला। बड़ी त्रासदी के बाद अफवाहें इसलिए फैलती हैं क्योंकि मनुष्य असाधारण घटना के लिए किसी दिखाई देने वाले अपराधी को खोजता है।”
“लेकिन प्रकृति का अंधविदोहन?”
“वह वास्तविक चिंता है। अंधाधुंध तटीय निर्माण, मैंग्रोव विनाश और कमजोर आपदा-तैयारी सुनामी या चक्रवात के प्रभाव को गंभीर बना सकते हैं। प्राकृतिक घटना और मानवीय असावधानी को अलग-अलग समझना आवश्यक है।”
सन 1947 और एलियन्स का प्रश्न
पुस्तक के अंतिम भाग में लिखा था कि सन 1947 में कुछ शक्तियों ने एलियन्स से संपर्क किया और फिर पृथ्वी तथा अंतरिक्ष में साजिशें रचने लगीं।
तिराश्मिका ने उड़नतश्तरी में सजाकदक्फक्फ से यही प्रश्न पूछा था—
“क्या सन 1947 में मनुष्यों और एलियन्स के बीच कोई समझौता हुआ था?”
वृद्ध ने कहा—
“ऐसी कथाएँ पृथु महि की लोककल्पनाओं में प्रचलित थीं, पर उनका प्रमाणित ऐतिहासिक या वैज्ञानिक आधार नहीं मिला। अज्ञात उड़ती वस्तु देखने का अर्थ अपने आप बाहरी ग्रह का अंतरिक्षयान नहीं होता।”
“तो अशोक सर ने एलियन्स को क्यों जोड़ा?”
“शायद वे मनुष्य के अहंकार को ब्रह्मांड के विशाल परिप्रेक्ष्य में रखना चाहते थे। एलियन उनकी कथा में कभी बाहरी जीव था, कभी बाहरी नियंत्रण का प्रतीक और कभी मनुष्य से अधिक दूरदर्शी सभ्यता की कल्पना।”
“और हमारे तीन नेत्र?”
सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया—
“तीसरा नेत्र केवल शरीर पर उपस्थित अंग नहीं—वह परिणाम देखने वाली दृष्टि है। पृथु महि का मनुष्य बुद्धिमान था, लेकिन उसने अक्सर दूरदृष्टि का उपयोग नहीं किया।”
फरवरी 2165 का आगमन
समय बीतता गया। पुस्तक में लिखी तारीख निकट आ गई।
24 फरवरी 2165 की सुबह खंडहर के सभी लोग सतर्क थे। उन्होंने भय फैलाने के बजाय जल, भोजन, औषधि, संचार और सुरक्षित स्थानों की तैयारी की। भूवैज्ञानिक उपकरणों से प्राप्त सूचनाएँ सुनी गईं। बच्चों को अफवाह और प्रमाण का अंतर समझाया गया।
दिन बीता।
पुस्तक में वर्णित महाविभाजन नहीं हुआ।
एक बालक बोला—
“तो भविष्यवाणी गलत थी?”
राज मुस्कराया—
“घटना सच नहीं हुई, लेकिन चेतावनी व्यर्थ भी नहीं हुई। उसके कारण हमने तैयारी की, भूगोल समझा और अपने लालच पर प्रश्न उठाया। कथा का उद्देश्य भय में जीना नहीं, जागरूक होकर वर्तमान को सुधारना है।”
अनंता ने पुस्तक के अंतिम खाली पृष्ठ पर लिखा—
भविष्य पहले से लिखा हुआ दंड नहीं है।
वह वर्तमान के ज्ञान, कर्म और सामूहिक चुनाव से बनती हुई संभावना है।
खंडहर के बाहर नए पौधे उग रहे थे। किले की दीवारों पर सौर उपकरण लगे थे। वर्षाजल कुंड भरे हुए थे। जंगल को काटे बिना छोटी बस्ती विकसित की जा रही थी।
दूर आकाश में उड़नतश्तरी एक चमकते बिंदु की तरह दिखाई दी।
सजाकदक्फक्फ ने तिराश्मिका से कहा—
“पृथु महि का मनुष्य तब जागेगा, जब वह हर अज्ञात घटना को षड्यंत्र और हर आपदा को दैवी दंड कहना छोड़कर प्रमाण, आत्मचिंतन और उत्तरदायित्व—तीनों को साथ रखेगा।”
तिराश्मिका ने नीचे नई बस्ती देखी।
“तो अशोक सर की पुस्तक भविष्य का नक्शा नहीं थी?”
वृद्ध बोला—
“नहीं। वह भविष्य के द्वार पर लगाया गया एक प्रश्नचिह्न थी।”
और खंडहर में बैठे बुजुर्गों को पहली बार पुस्तक के शीर्षक का अर्थ समझ आया—
“एक और भविष्य कथांश?!” में विस्मयादिबोधक से अधिक महत्वपूर्ण वह प्रश्नचिह्न था, जो पूछ रहा था—
क्या मनुष्य अपने भीतर बैठे कलि को पहचानकर विनाश की दिशा बदल सकता है?
उत्तर किसी एलियन, नेता अथवा अदृश्य शक्ति के पास नहीं था।
उत्तर पृथु महि के प्रत्येक जागरूक मनुष्य के वर्तमान कर्म में छिपा था।
समुद्र के ऊपर उड़ता इतिहास?!
समुद्र के ऊपर उड़ता इतिहास
अब सन 2147 था।
एक चमकीली उड़नतश्तरी उस स्थान के ऊपर उड़ रही थी जहाँ कभी मुंबई का विशाल महानगर था। नीचे समुद्र का अथाह विस्तार था। कहीं-कहीं पुरानी ऊँची इमारतों के अवशेष जल से बाहर झाँक रहे थे। शेष नगर समुद्र, गाद और नई समुद्री वनस्पतियों के नीचे छिप चुका था।
उड़नतश्तरी के भीतर तीन नेत्रों वाला वृद्ध इतिहासवेत्ता सजाकदक्फक्फ बैठा था। उसके सामने तीन नेत्रधारी युवती तिराश्मिका पृथु महि के पुराने अभिलेख पढ़ रही थी।
उसने पूछा—
“क्या अशोक सर ने सन 1990 में ही मुंबई के डूबने का सपना देखा था?”
वृद्ध ने उत्तर दिया—
“उनकी कुछ पुस्तकों में ऐसे स्वप्न और आशंकाओं का उल्लेख मिलता है। लेकिन स्वप्न वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होता। उसे भविष्य की निश्चित घोषणा के बजाय किसी संवेदनशील मन की चेतावनी समझना अधिक उचित है।”
“फिर उन्होंने सन 2100 से पहले मुंबई के डूबने की बात क्यों कही?”
“क्योंकि वे समुद्र के बढ़ते स्तर, तटीय अतिक्रमण, जलवायु परिवर्तन और मनुष्य की विकास-दृष्टि को लेकर चिंतित थे। उनकी भाषा भविष्यवाणी जैसी थी, पर उसके भीतर एक प्रश्न छिपा था—क्या मनुष्य प्रकृति को जीतने के भ्रम में अपने ही नगरों को असुरक्षित कर रहा है?”
तिराश्मिका ने अगला अभिलेख खोला। उसमें एक छोटा-सा कमरा दिखाई दिया। चारों ओर पांडुलिपियों के ढेर रखे थे और अशोक सर बेचैनी से उन्हें सँभाल रहे थे।
“उन्हें सन 2023 तक समाज से काफी उम्मीदें थीं,” वृद्ध ने बताया, “लेकिन जब लोगों ने विचारों की अपेक्षा प्रचार और मनोरंजन को अधिक महत्व दिया, तो वे निराश हुए। वे गुप्त रूप से लिखते रहे। उनकी बेचैनी यह थी कि देहांत से पहले अधिक से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो जाएँ।”
“क्या वे अपना नाम बचाना चाहते थे?”
“शायद नाम से अधिक प्रश्नों को बचाना चाहते थे। लेखक जानता है कि उसका शरीर समाप्त होगा, पर लिखे हुए प्रश्न दूसरी पीढ़ी के विवेक को जगा सकते हैं।”
समुद्र के नीचे सात द्वीप
सजाकदक्फक्फ ने एक उपकरण सक्रिय किया। समुद्र के नीचे छिपी धरती का त्रिआयामी मानचित्र सामने आ गया। सात अलग-अलग भूभाग चमक उठे—
माहिम, वर्ली, परेल, मझगांव, बॉम्बे द्वीप, कुलाबा और लिटिल कुलाबा।
तिराश्मिका आश्चर्य से बोली—
“तो मुंबई वास्तव में सात द्वीपों का समूह थी?”
“हाँ। भूमि-पुनर्निर्माण, बाँधों और कॉज़वे द्वारा इन्हें धीरे-धीरे जोड़कर एक महानगर बनाया गया। यह मनुष्य के निर्माण-कौशल का उदाहरण था, लेकिन साथ ही समुद्र के स्वाभाविक क्षेत्र में बड़े हस्तक्षेप की कहानी भी।”
“यदि इन्हें कभी जोड़ा ही न गया होता तो?”
वृद्ध ने एक काल्पनिक दृश्य उत्पन्न किया। सातों द्वीपों पर अलग-अलग छोटी बस्तियाँ थीं। उनके बीच जल-बसें और नौकाएँ चल रही थीं। मैंग्रोव की चौड़ी पट्टियाँ तूफानी लहरों को कमजोर कर रही थीं। हर द्वीप की आबादी और भवनों की ऊँचाई सीमित थी।
वृद्ध बोला—
“तब जीवन संभवतः ऐसा होता—
द्वीपों के बीच नावें, जलमार्ग और सीमित पुल प्रमुख साधन होते।
भूमि कम होने के कारण जनसंख्या और उद्योगों पर नियंत्रण आवश्यक होता।
बंदरगाहों का विकास अलग ढंग से होता।
मैंग्रोव और ज्वारीय क्षेत्र अधिक सुरक्षित रह सकते थे।
आवागमन कठिन और महँगा भी हो सकता था।
तूफानों के समय प्रत्येक द्वीप के लिए स्वतंत्र सुरक्षा-व्यवस्था चाहिए होती।”
“तो क्या सात द्वीपों वाला मुंबई पूरी तरह सुरक्षित रहता?”
“नहीं। प्रकृति में पूर्ण सुरक्षा नहीं होती। लेकिन यदि विकास समुद्र के स्वभाव को समझकर किया जाता, तो नुकसान कम किया जा सकता था। समस्या केवल द्वीपों को जोड़ना नहीं थी; समस्या यह थी कि बाद की पीढ़ियों ने निर्माण की सीमा पहचानना छोड़ दिया।”
मूर्तियों से प्रश्न करती नई पीढ़ी
उधर पृथु महि पर बचे हुए लोग किलों, खंडहरों, गुफाओं और जंगलों के दुर्गम क्षेत्रों में छोटी-छोटी बस्तियाँ बना चुके थे। जिन स्थानों को पुरानी सभ्यता पिछड़ेपन का प्रतीक मानती थी, वही अब आश्रय बने हुए थे।
एक पुराने किले में बच्चों का समूह अतीत की मूर्तियाँ देख रहा था। किसी मूर्ति के हाथ में तलवार थी, किसी के सिर पर मुकुट और किसी के नीचे लिखा था—“महान विकास-पुरुष।”
एक किशोर हँसते हुए बोला—
“इन लोगों ने अपनी इतनी विशाल मूर्तियाँ बनवाईं, लेकिन नदियों और जंगलों को क्यों नहीं बचाया?”
दूसरी बालिका ने कहा—
“जिन्होंने पृथ्वी को संकट में डाला, उन्हें महान क्यों कहा गया?”
पास बैठे बुजुर्ग राज ने दोनों को रोक दिया।
“मूर्तियों का उपहास करके तुम अतीत की भूल नहीं सुधार सकते। पत्थर न दोषी है, न महान। प्रश्न उन विचारों और कर्मों का है जिनका वह प्रतीक बनाया गया।”
“तो हम अतीत के मनुष्य को दोष न दें?” बालिका ने पूछा।
राज ने कहा—
“उससे प्रश्न अवश्य करो, पर याद रखो—उस समय भी चेतावनी देने वाले लोग मौजूद थे। वैज्ञानिक, पर्यावरणविद्, किसान, आदिवासी, लेखक और साधक लगातार कहते रहे कि प्रकृति साधन मात्र नहीं है। गलती पूरी प्रजाति की नहीं, उस सामूहिक चुनाव की थी जिसमें सुविधा को उत्तरदायित्व से ऊपर रखा गया।”
एक बच्चे ने पूछा—
“क्या राक्षस कलि ने सबको नियंत्रित कर लिया था?”
राज मुस्कराया—
“राक्षस कलि मनुष्य के बाहर बैठा कोई राजा नहीं था। वह भीतर की वह अवस्था थी जिसमें सत्य मालूम होने के बाद भी मनुष्य सुविधा के कारण गलत व्यवस्था का साथ देता है। जब लोभ सामूहिक हो जाए तो वह व्यवस्था बन जाता है; जब करुणा सामूहिक हो जाए तो वही नई सभ्यता बन सकती है।”
तीसरे नेत्र का वास्तविक अर्थ
उड़नतश्तरी में तिराश्मिका ने अपना तीसरा नेत्र बंद किया और पूछा—
“क्या हम तीन नेत्रधारी इसलिए बच गए क्योंकि हमारी जाति अधिक विकसित थी?”
सजाकदक्फक्फ ने कहा—
“तीसरा नेत्र शरीर का अतिरिक्त अंग मात्र नहीं। उसका वास्तविक अर्थ दूरदृष्टि है—कर्म के तत्काल लाभ के साथ उसके दूरगामी परिणाम देखना। पृथु महि के पुराने मनुष्यों के दो नेत्र खुले थे, पर दूरदृष्टि अक्सर बंद थी।”
नीचे समुद्र की लहरें उन सात द्वीपों की पुरानी सीमाओं पर घूम रही थीं। ऐसा लगता था जैसे प्रकृति मनुष्य द्वारा मिटाया गया अपना मानचित्र फिर बना रही हो।
वृद्ध ने अंतिम अभिलेख खोला। उसमें अशोक सर की आवाज सुनाई दी—
“शून्य होना मिट जाना नहीं है।
शून्य होना अपने अहंकार, लोभ और पूर्वाग्रह को कुछ समय शांत करना है।
इसी शून्य में मनुष्य को पृथ्वी की आवाज सुनाई दे सकती है।”
तिराश्मिका ने पूछा—
“क्या पृथु महि का मनुष्य असफल हो गया था?”
सजाकदक्फक्फ ने किले और जंगलों में बसते नए समुदायों की ओर देखा।
“पूरी तरह नहीं। जब तक कोई बच्चा अतीत से प्रश्न करता है, कोई मनुष्य वृक्ष लगाता है, कोई समुदाय जल बचाता है और कोई साधक अपने भीतर के कलि को पहचानता है—तब तक सुधार की संभावना जीवित रहती है।”
उड़नतश्तरी समुद्र से ऊपर उठने लगी।
नीचे डूबी मुंबई थी, दूर सुरक्षित खंडहरों में नई बस्तियाँ थीं और उनके बीच इतिहास का एक गंभीर संदेश गूँज रहा था—
सभ्यता मूर्तियों, इमारतों और बाजारों से महान नहीं बनती।
वह इस बात से महान बनती है कि उसके बीच सबसे कमजोर मनुष्य, जीव-जंतु, नदी, जंगल और आने वाली पीढ़ी कितनी सुरक्षित है।
और शायद सात द्वीप भी यही कह रहे थे—
“मनुष्य ने हमें जोड़कर एक नगर बनाया, लेकिन स्वयं विभाजित रहा। नई सभ्यता तभी बचेगी, जब वह धरती को जीतने के बजाय उसके साथ जीना सीखेगी।”
पृथु-मही के ऊपर उड़ती तश्तरी?!
पृथु-मही के ऊपर उड़ती तश्तरी
सन 2100 ईस्वी।
अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसी दिखाई देने वाली एक नई दुनिया चमक रही थी। वहाँ के निवासियों ने उसका नाम “पृथु-मही” रखा था। उसके नीले वातावरण के ऊपर एक उड़नतश्तरी शांत गति से चक्कर लगा रही थी।
तश्तरी के पारदर्शी कक्ष में दो त्रिनेत्री यात्री बैठे थे—वृद्ध सनड्रेक्सन और उसकी शिष्या अनंता। उनके तीन नेत्र केवल शारीरिक अंग नहीं थे। पहला नेत्र दृश्य जगत को, दूसरा इतिहास को और तीसरा किसी निर्णय के दूरगामी परिणाम को देखने का प्रतीक था।
अनंता ने नीचे फैली बस्तियों को देखते हुए पूछा—
“क्या यह सच है कि पृथ्वी को संकट में डालने वाले कुछ शक्तिशाली लोग ही सन 2027 तक दूसरी दुनिया में बसने की योजनाएँ बनाने लगे थे?”
सनड्रेक्सन ने उत्तर दिया—
“अंतरिक्ष में बसने की वैज्ञानिक योजनाएँ वास्तव में बनने लगी थीं, लेकिन उस समय ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ के नाम से अनेक राजनीतिक आशंकाएँ और विवादित धारणाएँ भी फैली हुई थीं। राजीव दीक्षित, देवेंद्र बल्हारा और अनेक व्यवस्था-विरोधी चिंतकों के विचारों को लोग अपने-अपने ढंग से समझते थे। कुछ इसे वैश्विक केंद्रीकरण की चेतावनी मानते थे, जबकि कुछ इसे अप्रमाणित षड्यंत्र-कथा कहते थे।”
उसने सामने का विशाल इतिहास-पटल खोल दिया। उस पर इक्कीसवीं शताब्दी की पृथ्वी दिखाई देने लगी—ऊँची इमारतें, विशाल कारखाने, सूखती नदियाँ, जंगलों की कटाई और झुग्गियों में रहते श्रमिक।
“समस्या केवल जनसंख्या थी?” अनंता ने पूछा।
“नहीं,” वृद्ध बोला, “जनसंख्या दबाव एक वास्तविक चुनौती थी, पर समस्या का पूरा कारण मनुष्यों की संख्या नहीं था। असमान उपभोग, संसाधनों पर कुछ लोगों का नियंत्रण, प्रकृति का अनियंत्रित दोहन और अवसरों का असमान वितरण भी उतने ही बड़े कारण थे।”
पटल पर अशोक सर की एक पुरानी सभा उभर आई। वे लोगों से कह रहे थे—
“यदि जनसंख्या सात गुनी भी हो जाए, तब भी मनुष्य बुद्धि, श्रम, विज्ञान और न्यायपूर्ण वितरण से अनेक कठिनाइयाँ संभाल सकता है। मगर इसके लिए हर व्यक्ति और हर परिवार को व्यवस्था का सक्रिय भाग बनाना होगा। किसी को केवल उपभोक्ता, वोट या सस्ता मजदूर समझना बंद करना होगा।”
सभा में बैठे एक युवक ने पूछा—
“लेकिन प्रत्येक परिवार को सिस्टम से जोड़ने का मतलब क्या है?”
अशोक सर ने समझाया—
“इसका अर्थ है—हर परिवार को शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, आजीविका और निर्णय-प्रक्रिया तक वास्तविक पहुँच। श्रम करने वाले को सम्मान और उत्पादन में उचित भागीदारी मिले। गाँव, वार्ड और नगर केवल आदेश पाने वाली इकाइयाँ न रहें; वे अपने संसाधनों और आवश्यकताओं पर जिम्मेदारी से निर्णय भी लें।”
एक महिला मजदूर खड़ी हुई—
“फिर पूँजी का क्या होगा?”
अशोक सर मुस्कराए—
“पूँजी स्वयं शत्रु नहीं है। वह संगृहीत श्रम और साधन है। समस्या तब होती है, जब पूँजी मनुष्य और शासन दोनों की मालिक बन जाए। इसी तरह सत्ता व्यवस्था के लिए आवश्यक हो सकती है, लेकिन सत्तावाद तब जन्म लेता है जब प्रश्न पूछना अपराध बना दिया जाए।”
उन्होंने भूमि पर छह वृत्त बनाए और उनमें लिखा—
पूँजीवाद का एकाधिकार, सामंतवाद, सत्तावाद, जातिवाद, जन्मजात उच्चता और जन्मजात हीनता।
फिर बोले—
“ये अलग-अलग दिखाई देते हैं, पर इनकी जड़ एक ही है—कुछ मनुष्यों को जन्म, धन या पद के कारण अधिक मनुष्य और दूसरों को कम मनुष्य मान लेना।”
दृश्य बदल गया।
सन 2031 तक बेरोजगारी, महँगाई, पर्यावरणीय संकट और असमानता के विरुद्ध अनेक स्थानों पर जन-आंदोलन होने लगे थे। उनमें शांतिपूर्ण सभाएँ भी थीं और कुछ जगह क्रोध से उपजी अव्यवस्था भी। शासन ने कई वास्तविक शिकायतों को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या समझा। कहीं संवाद हुआ, कहीं दमन।
अशोक सर हर सभा में सावधान करते—
“क्रांति का अर्थ हिंसा नहीं है। हिंसा अक्सर पुरानी सत्ता की जगह नई कठोर सत्ता बैठा देती है। वास्तविक क्रांति मनुष्य, संस्थाओं और संसाधनों के संबंध बदलती है। आंदोलन अनुशासित, तथ्यपूर्ण और मानवीय होगा, तभी वह न्यायपूर्ण व्यवस्था बना पाएगा।”
उनकी पुस्तक “क्रांति क्यों? कैसे?” में भी यही प्रश्न उठाया गया था—
व्यवस्था क्यों बदलनी चाहिए और परिवर्तन के बाद उसके स्थान पर क्या स्थापित होगा?
पुस्तक में लिखा था कि केवल विरोध पर्याप्त नहीं। यदि आंदोलन के पास पारदर्शी प्रशासन, समान अवसर, विकेंद्रीकरण, पर्यावरण-संरक्षण और उत्तरदायी नागरिकता की स्पष्ट रूपरेखा नहीं होगी, तो क्रांति केवल सत्ता के चेहरे बदल देगी।
सन 2036 आते-आते पुस्तक विश्वविद्यालयों, श्रमिक सभाओं, ग्राम परिषदों और युवा समूहों में चर्चा का विषय बन चुकी थी। किसी ने उसे क्रांतिकारी ग्रंथ कहा, किसी ने आदर्शवादी कल्पना और किसी ने व्यवस्था के लिए चुनौती। पर उसके प्रश्नों को अनसुना करना कठिन हो गया था।
उसी वर्ष एक विशाल जनसभा में अशोक सर ने कहा—
“मुट्ठी भर शक्तिशाली लोगों को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। अन्यायपूर्ण व्यवस्था इसलिए भी टिकती है क्योंकि बहुत से लोग सुविधा, भय, जाति और निजी लाभ के कारण मौन रहते हैं। परिवर्तन ऊपर बैठे लोगों से ही नहीं, नीचे खड़े नागरिकों के चरित्र से भी शुरू होगा।”
पृथु-मही के ऊपर उड़ती तश्तरी में इतिहास-पटल बंद हो गया।
अनंता कुछ देर मौन रही। फिर बोली—
“तो पृथ्वी की लड़ाई जनसंख्या और संसाधनों के बीच नहीं, बल्कि स्वार्थपूर्ण अधिकार और जिम्मेदार सहभागिता के बीच थी?”
सनड्रेक्सन ने उत्तर दिया—
“हाँ। पृथ्वी पर सबके लिए पर्याप्त संभावनाएँ थीं, पर असीम लालच के लिए कोई पृथ्वी पर्याप्त नहीं थी।”
“और तीसरे नेत्र का वास्तविक अर्थ?”
वृद्ध ने नीचे पृथु-मही की बस्तियों की ओर संकेत किया—
“पहले नेत्र से मनुष्य समस्या देखता है। दूसरे से उसका इतिहास समझता है। लेकिन तीसरा नेत्र तब खुलता है, जब वह अपने निर्णय का भविष्य भी देखने लगता है।”
अनंता ने देखा—पृथु-मही पर प्रत्येक बस्ती के बीच खेत, जलाशय, विद्यालय, वन और सामुदायिक सभागृह थे। वहाँ कोई काम छोटा नहीं माना जाता था और जन्म के आधार पर किसी की प्रतिष्ठा निर्धारित नहीं होती थी।
वृद्ध ने अंतिम बात कही—
“नई धरती खोज लेना मनुष्यता की विजय नहीं है। विजय तब है जब मनुष्य पुरानी धरती को नष्ट करने वाली अपनी प्रवृत्तियों को नई धरती पर न ले जाए। अन्यथा ग्रह बदल जाएगा, पर इतिहास नहीं।”
उड़नतश्तरी आगे बढ़ गई। पीछे पृथु-मही चमक रही थी—एक दूसरी पृथ्वी के रूप में नहीं, बल्कि पृथ्वी की भूलों से सीखे गए एक नए सामाजिक संकल्प के रूप में।
रविवार, 30 अगस्त 2026
वीरता का असली उत्तराधिकार?
वीरता का असली उत्तराधिकार
जंगल के बीच एक प्राचीन खंडहर था। कभी वहाँ किसी राजा का विशाल दुर्ग रहा होगा, पर सन 2075 में उसकी टूटी दीवारों पर पीपल की जड़ें फैल चुकी थीं। आसपास अनेक बुजुर्ग गोल घेरा बनाकर बैठे थे। उनके बीच धरती, मनुष्य और भविष्य पर चर्चा चल रही थी।
एक बालिका ने दूर से आते हुए बालक को पुकारा—
“अब्दुल, इधर आना!”
अब्दुल उसके पास आकर बैठ गया।
“क्या बात है, रश्मि?”
रश्मि ने धीरे से कहा—
“अभी इन्हें सुनो। ये ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ का अर्थ बता रहे हैं।”
घेरे के बीच बैठे बुजुर्ग विश्वमित्र अलखेंद्र ने प्रश्न किया—
“हम कहते आए हैं—‘वीर भोग्या वसुंधरा’, अर्थात धरती वीरों द्वारा भोगी जाती है। लेकिन हमें धरती को भोगने की आवश्यकता ही क्यों है? क्या मनुष्य धरती का मालिक है?”
कुछ देर तक खामोशी रही।
एक बुजुर्ग बोले—
“शायद इसका अर्थ है कि जो शक्तिशाली होगा, वही भूमि, धन और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार करेगा।”
विश्वमित्र मुस्कराए—
“मनुष्य ने सदियों तक इसका यही अर्थ निकाला। उसने वीरता को विजय, कब्जे और संग्रह से जोड़ दिया। जंगल काटना विकास कहलाया, पर्वतों को खोदना पुरुषार्थ और नदियों को बाँधना उपलब्धि। अंततः धरती ऐसी ‘भोगी’ गई कि अगली पीढ़ी के लिए साँस लेने योग्य हवा और पीने योग्य पानी तक संकट में पड़ गया।”
अब्दुल ने खंडहर की टूटी छत की ओर देखते हुए पूछा—
“क्या यह दुर्ग भी किसी ऐसे ही वीर राजा का था?”
“हाँ,” एक वृद्धा ने उत्तर दिया, “उस राजा ने अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिए अनेक युद्ध किए थे। उसके खजाने में सोना था, पर प्रजा के कुएँ सूख रहे थे। उसने अपने नाम के स्मारक बनवाए, लेकिन जंगल और खेत उजाड़ दिए। उसे विश्वास था कि वह धरती का स्वामी है। आज उसका नाम किसी को याद नहीं; केवल यह खंडहर बचा है।”
रश्मि बोली—
“तो क्या ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ का कथन गलत है?”
विश्वमित्र ने कहा—
“कथन से अधिक महत्त्वपूर्ण उसकी व्याख्या है। संस्कृत में ‘भोग’ केवल उपभोग या विनाश नहीं है; इसका एक अर्थ किसी वस्तु को प्राप्त करके उसका अनुभव करना और उसके प्रति उत्तरदायित्व निभाना भी हो सकता है। इसलिए इसका नया अर्थ होना चाहिए—धरती का सच्चा आनंद वही वीर प्राप्त कर सकता है, जो उसकी रक्षा करने का साहस रखता हो।”
उन्होंने मिट्टी की एक मुट्ठी उठाई और आगे कहा—
“धरती कायर उपभोक्ता की वस्तु नहीं, वीर संरक्षक की जिम्मेदारी है। कायर वह है जो अपने थोड़े-से लाभ के लिए नदी को प्रदूषित कर दे, जंगल कटवा दे और भविष्य की पीढ़ियों का हिस्सा भी आज ही खर्च कर डाले। वीर वह है जो लोभ का सामना करे, अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध बोले और अपने हिस्से के सुख को भी जीव-जगत के साथ बाँटे।”
एक अन्य बुजुर्ग ने संत राबिया का स्मरण करते हुए कहा—
“संत राबिया जैसी सूफी साधिका सांसारिक संपत्ति के प्रति विरक्ति का संदेश देती थीं। भाव यह था—यदि मेरे हिस्से की दुनियावी संपत्ति मेरे विरोधी को भी मिल जाए तो कोई दुख नहीं, क्योंकि आत्मिक संपदा किसी से छीनी नहीं जा सकती।”
अब्दुल ने पूछा—
“लेकिन यदि हम अपना सब कुछ छोड़ दें, तो जीवन कैसे चलेगा?”
“त्याग का अर्थ जिम्मेदारी छोड़ देना नहीं,” बुजुर्ग ने समझाया, “विरक्ति का अर्थ है—वस्तु का उपयोग करो, पर उसे अपनी पहचान मत बनाओ। घर हो, पर घर के लिए किसी को बेघर मत करो। भोजन लो, पर धरती की उर्वरता नष्ट मत करो। जल लो, पर नदी का जीवन मत छीनो। आवश्यकता पूरी करो, लोभ नहीं।”
रश्मि ने कहा—
“अशोक सर भी कहते थे कि अपनेपन के अहसास में जीने का अर्थ सब पर अधिकार जमाना नहीं है।”
“बिल्कुल,” विश्वमित्र बोले, “अपनेपन के दो रूप होते हैं। एक बच्चा खिलौने को पकड़कर कहता है—‘यह केवल मेरा है।’ यह स्वामित्व का अपनापन है। दूसरा व्यक्ति वृक्ष को देखकर कहता है—‘यह अपना है, इसलिए इसे बचाना मेरा कर्तव्य है।’ यह चेतना का अपनापन है।”
तभी तेज हवा चली। खंडहर की दीवार से मिट्टी का एक हिस्सा गिर पड़ा। वृद्धा ने बच्चों की ओर देखकर कहा—
“यह खंडहर हमें बता रहा है कि अधिकार पर बना प्रत्येक साम्राज्य एक दिन टूट जाता है। केवल संरक्षण और सद्भाव पर बनी संस्कृति जीवित रहती है।”
अब्दुल ने जमीन से एक बीज उठाया और रश्मि से बोला—
“तो आज से ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ का अर्थ होगा—धरती वीरों को अपना सौंदर्य और आनंद देती है, लेकिन वीर वही है जो उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखे।”
रश्मि ने पास की नम मिट्टी में वह बीज दबा दिया।
विश्वमित्र ने प्रसन्न होकर कहा—
“हाँ! धरती पर कब्जा करना वीरता नहीं। अपने लोभ पर विजय पाना वीरता है। भूमि को जीतना नहीं, उसके घाव भरना वीरता है। वसुंधरा हमारी संपत्ति नहीं—हमारी साझा माता, कर्मभूमि और भावी पीढ़ियों की धरोहर है।”
सूर्य खंडहर के पीछे उतरने लगा था। सभी बुजुर्गों ने बच्चों द्वारा लगाए गए बीज को देखा। उस छोटे-से बीज में उन्हें एक ऐसे भविष्य की संभावना दिखाई दी, जहाँ मनुष्य धरती का भोगकर्ता नहीं, उसका सजग सहयात्री और संरक्षक होगा।
संदेश:
“वीर भोग्या वसुंधरा” का श्रेष्ठ अर्थ धरती पर बलपूर्वक अधिकार करना नहीं, बल्कि साहस, संयम और उत्तरदायित्व के साथ उसके वरदानों का उपयोग करना है। सच्चा वीर धरती को जीतता नहीं—अपने लोभ को जीतकर धरती की रक्षा करता है।
स्वाभिमान की असली परीक्षा
स्वाभिमान की असली परीक्षा
विद्यालय की छुट्टी के बाद बरामदे में कुछ शिक्षक और विद्यार्थी बैठे थे। बाहर वर्षा हो रही थी। डॉ. रजनीश गंगवार की एक सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा का विषय बनी हुई थी।
अशोक सर ने गंभीर स्वर में कहा—
“लगभग अस्सी वर्षों में सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन अनेक लोगों ने व्यवस्था के सामने अपना स्वाभिमान गिरवी रख दिया है। अब अन्याय देखकर भी आदमी सोचता है—मुझे क्या लेना-देना?”
शिक्षक ब्रजेश यादव बोले—
“आज मनुष्य के लिए सुविधा और शांतिपूर्वक जीवन बिताना इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि कभी-कभी वह घर-परिवार की प्रतिष्ठा पर हमला होने पर भी चुप रह जाता है।”
गौरव सिंह ने उत्तेजित होकर कहा—
“हम तो अपमान सहने के बजाय मरना या मारना बेहतर समझेंगे!”
अशोक सर ने तुरंत उसे रोका—
“नहीं गौरव! स्वाभिमान का अर्थ मरना या मारना नहीं है। हिंसा कभी-कभी परिस्थिति को और भी भयानक बना देती है। असली स्वाभिमान है—अन्याय के सामने विवेक, साहस और संगठन के साथ खड़ा होना।”
इसके बाद अशोक सर ने एक पुरानी कथा सुनाई।
युद्ध के दिनों में सैनिकों का एक दल एक गाँव में घुस आया। उन्होंने गाँव की महिलाओं पर अत्याचार किया। उनमें से एक स्त्री ने साहसपूर्वक प्रतिरोध किया और स्वयं को बचाने में सफल रही।
सैनिकों के चले जाने के बाद गाँव की स्त्रियाँ बाहर निकलीं। वे भयभीत, घायल और गहरे सदमे में थीं। प्रतिरोध करने वाली स्त्री भी उनके बीच खड़ी थी।
उसने कहा—
“हमारे साथ जो हुआ, उसका दोष हमारा नहीं है। अपराध केवल अत्याचारियों का है। हमें एक-दूसरे का सहारा बनकर न्याय माँगना चाहिए।”
लेकिन कुछ स्त्रियों के मन में भय पैदा हो गया। उन्हें लगा कि जब परिवार के लोग लौटेंगे, तब प्रतिरोध करने वाली स्त्री का उदाहरण देकर उनसे सवाल किए जाएँगे। भय और सामाजिक बदनामी ने उनकी बुद्धि को ढक लिया। वे उसी साहसी स्त्री को दोष देने लगीं।
तभी गाँव की वृद्धा माता हरप्रीत आगे आईं। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा—
“रुको! तुम अपने अपराधियों को छोड़कर अपनी ही बहन को दोष दे रही हो। जिसने अत्याचार सहा, उसकी गरिमा नष्ट नहीं होती। लज्जा पीड़ित की नहीं, अपराधी की होती है। और जिसने प्रतिरोध किया, वह दूसरों से श्रेष्ठ नहीं हो जाती—क्योंकि संकट में हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग होती है।”
वृद्धा ने सभी महिलाओं को गले लगाया और कहा—
“यदि हम भय के कारण साहस की आवाज दबा देंगे, तो अत्याचारियों को दूसरी विजय मिल जाएगी। पहली विजय उन्होंने बल से प्राप्त की थी; दूसरी विजय उन्हें हमारी आपसी फूट से मिलेगी।”
अगले दिन गाँव की पंचायत बैठी। पहले वहाँ प्रायः कमजोर लोगों को ही दोषी ठहराया जाता था, पर इस बार महिलाओं ने एकजुट होकर कहा—
“हम किसी पीड़ित को अपमानित नहीं होने देंगे। हम अपराधियों के विरुद्ध प्रमाण जुटाएँगे, प्रशासन से न्याय माँगेंगे और भविष्य में गाँव की सुरक्षा के लिए सामूहिक व्यवस्था बनाएँगे।”
उनकी एकता ने गाँव की दिशा बदल दी। अब साहस किसी एक महिला का बोझ नहीं था; वह पूरे समुदाय का चरित्र बन गया था।
कथा समाप्त हुई तो बरामदे में कुछ देर मौन छाया रहा।
सिख विद्यार्थी आकाशदीप बोला—
“सर, हम अपना स्वाभिमान कभी गिरवी नहीं रखेंगे।”
अशोक सर मुस्कराए—
“यही बात ठीक है, लेकिन याद रखना—जान दे देना ही स्वाभिमान नहीं होता। कभी-कभी जीवित रहकर सत्य बोलना, कानून का सहारा लेना, पीड़ित के साथ खड़ा होना और लंबे समय तक भ्रष्ट व्यवस्था से संघर्ष करना अधिक बड़ा साहस होता है।”
ब्रजेश यादव ने पूछा—
“इस कथा का आज के भ्रष्ट समाज से क्या संबंध है?”
अशोक सर ने उत्तर दिया—
“भ्रष्ट व्यवस्था भी ऐसा ही करती है। पहले वह ईमानदार व्यक्ति को अकेला करती है। फिर उसका मजाक उड़ाती है, उसके चरित्र पर प्रश्न उठाती है और बाकी लोगों को डराती है—क्योंकि एक ईमानदार व्यक्ति की उपस्थिति अनेक लोगों की बेईमानी का आईना बन जाती है।”
“इसलिए भ्रष्ट लोग आईना तोड़ना चाहते हैं, अपना चेहरा सुधारना नहीं।”
आकाशदीप ने कहा—
“तब समाधान क्या है?”
अशोक सर बोले—
“ईमानदार व्यक्ति को अकेला मत छोड़ो। प्रमाण के साथ सत्य बोलो, शांतिपूर्ण संगठन बनाओ, संवैधानिक उपाय अपनाओ और पीड़ित को दोषी मत बनाओ। स्वाभिमान अहंकार नहीं है; वह अपने और दूसरों के मानवीय अधिकारों की रक्षा करने का साहस है।”
वर्षा थम चुकी थी। सब लोग बाहर निकले। आकाश में बादल अभी थे, पर उनके बीच से प्रकाश की एक किरण धरती पर उतर रही थी—मानो कह रही हो कि अँधेरा तभी टिकता है, जब दीपक अलग-अलग और अकेले रहते हैं।
कथा का संदेश:
जब समाज ईमानदार व्यक्ति को इसलिए मिटाना चाहता है कि उसकी उपस्थिति भ्रष्ट लोगों को लज्जित करती है, तब वह वास्तव में अपने ही सम्मान की हत्या करता है। समाधान हिंसक प्रतिशोध नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, एकता और विवेकपूर्ण प्रतिरोध है।
पुस्तक "मॉय ड्रीम :अमिताभ बच्चन "से...?!
अशोक सर अपने किशोरावस्था में बी आर चौपड़ा के टीवी सीरियल महाभारत में मुकेश खन्ना अभिनीत भीष्म चरित्र व अमिताभ बच्चन अभिनीत शहंशाह, खुदा गबाह फ़िल्म से काफी प्रभावित थे।
सन 2147 ई०!
भारत में ब्रिटिश सत्ता-हस्तांतरण के दो सौ वर्ष पूरे हो चुके थे। सरकारी अभिलेखों में 1947 को स्वतंत्रता का वर्ष लिखा था, किंतु अनेक विचारक उसे अधूरी स्वतंत्रता मानते थे। उनका प्रश्न था—यदि आर्थिक नीतियाँ, मुद्रा-व्यवस्था और व्यापार आज भी विदेशी प्रभाव से मुक्त नहीं हैं, तो क्या केवल शासकों के बदल जाने को पूर्ण आजादी कहा जा सकता है?
इतिहासकारों का दूसरा वर्ग सावधान करता था कि राष्ट्रमंडल की सदस्यता स्वेच्छा पर आधारित है और भारतीय रिज़र्व बैंक भी स्वतंत्र भारत की वैधानिक संस्था है। इसलिए इतिहास को प्रमाणों के साथ समझना चाहिए। फिर भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस, आज़ाद हिंद सरकार, आज़ाद हिंद फौज और आज़ाद हिंद बैंक से संबंधित अनेक प्रश्न लोगों के मन में जीवित थे।
लेकिन अब इन बहसों से बहुत आगे का समय आ चुका था।
सन 2147 में पृथ्वी का तापमान काफी बढ़ चुका था। समुद्र का जलस्तर ऊपर उठने, अनियंत्रित भूमि-निर्माण, तटीय क्षरण और बार-बार आने वाले तूफानों ने मुंबई का भूगोल बदल दिया था। पुराने महानगर का बड़ा भाग समुद्र में समा चुका था। कहीं ऊँची इमारतों के टूटे शिखर पानी से बाहर झाँकते थे, तो कहीं पुराने पुल समुद्री जीवों के बसेरे बन चुके थे।
उसी डूबी हुई मुंबई के ऊपर एक चमकीली उड़नतश्तरी मंडरा रही थी।
उसके पारदर्शी कक्ष में तीन नेत्रों वाला वृद्ध सजाकदक्फक्फ बैठा था। उसके साथ उसी ग्रह की युवा शोधार्थी तिराश्मिका पृथ्वी के प्राचीन अभिलेख देख रही थी। उसका तीसरा नेत्र किसी अद्भुत यंत्र की तरह समुद्र के नीचे छिपी संरचनाओं का चित्र सामने ला रहा था।
“गुरुदेव!” तिराश्मिका ने पूछा, “क्या यह नगर आरम्भ से ही इतना विशाल था?”
सजाकदक्फक्फ ने समुद्र की ओर संकेत किया। सामने एक त्रिआयामी मानचित्र उभर आया। उसमें सात छोटे-छोटे द्वीप दिखाई दे रहे थे—माहिम, वर्ली, परेल, मझगांव, बॉम्बे द्वीप, कुलाबा और लिटिल कुलाबा।
“नहीं,” वृद्ध ने उत्तर दिया, “मुंबई कभी सात द्वीपों का समूह थी। बाद में भूमि-पुनर्निर्माण, बाँधों और कॉज़वे के माध्यम से समुद्र के कुछ हिस्सों को भरकर इन द्वीपों को जोड़ा गया। इसी से विशाल महानगर का निर्माण हुआ।”
“यदि इन्हें नहीं जोड़ा जाता तो?”
“तब संभवतः प्रत्येक द्वीप का अपना छोटा नगर होता। उनके बीच नावें, जल-रेल और समुद्री पुल चलते। जनसंख्या का दबाव शायद सीमित रहता। मैंग्रोव और ज्वारीय क्षेत्र अधिक सुरक्षित होते। किंतु जीवन आसान ही होता, यह निश्चित नहीं—तूफानों, आवागमन और आवास की अपनी समस्याएँ भी होतीं।”
कुछ पल बाद तिराश्मिका ने अभिलेख में एक पुराना नाम पढ़ा—अशोक कुमार वर्मा ‘बिंदु’।
“ये कौन थे?”
सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया, “बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी के संधिकाल में रहने वाले एक लेखक। उनके लेखन में इतिहास, भविष्य, प्रकृति और ब्रह्मांडीय चेतना आपस में मिलते थे। बताया जाता है कि सन 1990 के आसपास से वे मुंबई के समुद्र में डूबने जैसे स्वप्न देखते थे। उन्होंने अपने कुछ लेखों और पुस्तकों में इसकी आशंका व्यक्त की थी।”
“क्या उनकी भविष्यवाणी वैज्ञानिक थी?”
वृद्ध मुस्कराया, “स्वप्न वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होते, तिराश्मिका। किसी भविष्यवाणी को सत्य सिद्ध करने के लिए तिथि, मूल प्रकाशन और स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक होते हैं। लेकिन कभी-कभी किसी संवेदनशील व्यक्ति की आशंका समाज के लिए चेतावनी बन सकती है। उसका मूल्य अंधविश्वास में नहीं, बल्कि उस प्रश्न में होता है जिसे वह हमारे सामने रखती है।”
स्क्रीन पर अशोक सर के जीवन के कुछ दृश्य उभरने लगे। एक छोटे-से कमरे में किताबों की पांडुलिपियाँ बिखरी थीं। वे बार-बार उन्हें क्रम से लगाते और सोचते—
“देह का समय सीमित है। जो विचार लिखे जा चुके हैं, वे पाठकों तक पहुँचने चाहिए।”
उन्हें सन 2023 तक समाज से बड़ी आशाएँ थीं। वे चाहते थे कि लोग राजनीतिक दलों और नेताओं के नामों से आगे बढ़कर व्यवस्था, इतिहास और प्रकृति पर प्रश्न करें। लेकिन जब उनकी अनेक पांडुलिपियाँ अप्रकाशित रह गईं, तो वे बेचैन हो उठे। उन्होंने अधिक से अधिक पुस्तकों को अपने जीवनकाल में प्रकाशित करने का संकल्प लिया।
एक सभा में उन्होंने कहा था—
“मैं निश्चित भविष्य बताने वाला ज्योतिषी नहीं हूँ। मैं केवल चेतावनी देता हूँ—यदि समुद्र के स्वाभाविक क्षेत्र पर लगातार कब्जा होगा, मैंग्रोव काटे जाएँगे, प्रदूषण और तापवृद्धि नहीं रुकेगी, तो सन 2100 से पहले ही मुंबई के अनेक तटीय हिस्सों पर गंभीर संकट आ सकता है। इसे भविष्यवाणी नहीं, सावधानी की पुकार समझो!”
तिराश्मिका ने पूछा, “फिर लोगों ने क्या किया?”
वृद्ध की तीनों आँखों में उदासी उतर आई।
“कुछ लोगों ने चेतावनी को सनसनी बना दिया। कुछ ने उसका उपहास किया। कुछ राजनीति में उलझे रहे। वे बहस करते रहे कि किस दल ने अधिक विकास किया, लेकिन बहुत कम लोगों ने पूछा कि विकास किसकी कीमत पर हुआ। समुद्र को पीछे धकेलकर बनाए गए नगर में समुद्र के अधिकार को लगभग भुला दिया गया।”
उड़नतश्तरी धीरे-धीरे नीचे उतरी। समुद्र के भीतर पुराने सात द्वीपों की रूपरेखा प्रकाशमान होने लगी। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति मनुष्य द्वारा मिटाई गई सीमाओं को फिर से उकेर रही हो।
सजाकदक्फक्फ बोला—
“मनुष्य ने द्वीपों को जोड़ दिया, पर अपने हृदयों को नहीं जोड़ पाया। उसने समुद्र को बाँटने का प्रयत्न किया, जबकि स्वयं जाति, मजहब, दल और स्वार्थ में बँटा रहा। यही उसके विकास की सबसे बड़ी विडम्बना थी।”
“तो क्या प्रकृति मनुष्य से बदला लेती है?” युवती ने पूछा।
“नहीं। प्रकृति बदला नहीं लेती; वह अपने नियमों के अनुसार संतुलन बनाती है। जल को मार्ग चाहिए। नदी को तट चाहिए। समुद्र को ज्वारीय क्षेत्र और धरती को वन चाहिए। जब मनुष्य इन सीमाओं की उपेक्षा करता है, तो परिणाम दंड जैसे दिखाई देते हैं।”
उड़नतश्तरी की स्क्रीन पर अंतिम संदेश चमका—
आजादी केवल सत्ता बदलने का नाम नहीं।
आजादी इतिहास को प्रमाण सहित समझने, आर्थिक निर्णय स्वयं लेने और प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करने की सामूहिक क्षमता है।
तिराश्मिका ने डूबी हुई मुंबई की ओर देखा। समुद्र के बीच सात हरित द्वीपों की काल्पनिक छवि उभर रही थी—जहाँ छोटी बस्तियाँ थीं, जलमार्गों पर स्वच्छ नौकाएँ चल रही थीं और मैंग्रोव नगरों की रक्षा कर रहे थे।
वह बोली, “यदि मुंबई सात द्वीपों में ही रहती, तो शायद उसका जीवन धीमा और कठिन होता—लेकिन संभव है कि समुद्र के साथ उसका रिश्ता अधिक जीवित रहता।”
सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया—
“इतिहास को बदला नहीं जा सकता, लेकिन उससे भविष्य के लिए विवेक पाया जा सकता है। अशोक सर की बेचैनी भी शायद इसी बात के लिए थी—उनकी पुस्तकें केवल उनका नाम बचाने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सामने प्रश्न बचाए रखने के लिए प्रकाशित हों।”
उड़नतश्तरी ऊपर उठने लगी। नीचे समुद्र की लहरें मानो कह रही थीं—
नगर मनुष्य का हो सकता है, पर भूमि, जल और आकाश पर केवल मनुष्य का अधिकार नहीं। विकास वही है, जिसमें आने वाली पीढ़ियों और पूरी प्रकृति के लिए भी स्थान शेष रहे।
मंगलवार, 25 अगस्त 2026
राक्षस कौन थे?!
राक्षस कौन थे?
सन 2075 ई०!
जंगल के बीच स्थित पुराने किले के पुस्तकालय में उस दिन अशोक सर की दो पुस्तकें रखी थीं—
“लंका में विभीषण?!”
और
“दशानन गीता”
विद्यार्थियों और बुजुर्गों की सभा चल रही थी। चर्चा का विषय था—प्रकृति-संरक्षण करने वाले प्राचीन समुदाय और बाद के इतिहास में बदलती उनकी पहचान।
एक युवक ने सामने बैठे बुजुर्ग राज से पूछा—
“राज! तुम तो अशोक सर के निकट रहे हो। बताओ, वे राक्षसों, यक्षों और कायस्थों को किस दृष्टि से देखते थे?”
राज कुछ क्षण मौन रहा। उसने खंडहर की टूटी छत से दिखाई दे रहे आकाश को देखा और कहा—
“अशोक सर कहते थे कि हमारे भीतर, आसपास और पूरे ब्रह्मांड में एक ऐसी निरंतर प्रक्रिया चल रही है, जो हमारे बनाए नामों और सीमाओं पर निर्भर नहीं है। जीवन, प्रकृति और चेतना का प्रवाह स्वतः चलता रहता है। उसे समझने के लिए बाहरी अध्ययन के साथ अंतर्मुखी होना भी आवश्यक है।”
ब्रह्मा की पहली सभा
राज ने पुस्तक खोली और कथा सुनाने लगा—
सृष्टि के प्रारंभिक काल में, जब बड़े नगर और राजमहल नहीं बने थे, ब्रह्मा ने विभिन्न समुदायों को अलग-अलग उत्तरदायित्व सौंपे।
कुछ से कहा गया—
“ज्ञान, स्मृति और मंत्रों को सुरक्षित रखो।”
कुछ से कहा गया—
“जलस्रोतों, वनों और पर्वतों की रक्षा करो।”
कुछ को प्रशासन, लेखा और सामाजिक व्यवस्था का कार्य मिला। कुछ को पूजा-अर्चना और लोगों के आंतरिक विकास में सहायता करने का उत्तरदायित्व दिया गया।
ब्रह्मा ने अंत में कहा—
“इन कार्यों में कोई ऊँचा या नीचा नहीं है। ज्ञान प्रकृति के बिना जीवित नहीं रह सकता; शासन सेवा के बिना न्यायपूर्ण नहीं हो सकता और पूजा सदाचरण के बिना सार्थक नहीं हो सकती।”
लेकिन समय बीतने के साथ सेवा के ये कार्य वंशगत अधिकार बनने लगे। उत्तरदायित्व पद बन गया, पद प्रतिष्ठा बना और प्रतिष्ठा ने श्रेष्ठता का रूप धारण कर लिया।
कायस्थ का प्रश्न
सभा में बैठी अनंता ने पूछा—
“क्या ब्रह्मा की काया के निकट आने वाले ही कायस्थ कहलाए और वे पृथ्वी के पहले ब्राह्मण थे?”
राज ने उत्तर दिया—
“यह एक प्रतीकात्मक अथवा पौराणिक व्याख्या हो सकती है। ‘काया में स्थित’ के आधार पर कायस्थ शब्द को समझने की कथाएँ मिलती हैं। किंतु ऐतिहासिक रूप से कायस्थ भारत में लेखन, अभिलेख, प्रशासन और राजकीय सेवा से जुड़े विविध समुदायों के रूप में विकसित हुए। उन्हें पृथ्वी के प्रथम ब्राह्मण कहना प्रमाणित इतिहास नहीं है।”
एक वृद्ध बोले—
“तब ‘ब्रह्मा के निकट’ होने का क्या अर्थ लिया जाए?”
राज बोला—
“जो सृष्टि की व्यवस्था, ज्ञान और उत्तरदायित्व के निकट हो, वह प्रतीकात्मक रूप से ब्रह्मा के निकट है। यह निकटता जन्म से नहीं, आचरण और कार्य से होनी चाहिए।”
शिव-उपासक और गिरिजाघर
दूसरे युवक ने पूछा—
“जोशी, गोस्वामी और गिरि जैसे शिव-उपासक समुदायों तथा यूरोप के गिरिजाघरों के बीच कोई संबंध था?”
राज ने कहा—
“अलग-अलग क्षेत्रों में शिव और शक्ति की अनेक संन्यासी तथा पुरोहित परंपराएँ रही हैं। लेकिन यूरोप के चर्चों में कभी शिवलिंग स्थापित थे—इस दावे के लिए विश्वसनीय भौतिक प्रमाण चाहिए। हिंदी का ‘गिरजाघर’ शब्द भी सामान्यतः यूरोपीय भाषा-संपर्क से आया माना जाता है; केवल ‘गिरिजा’ से ध्वनि मिलने पर ऐतिहासिक संबंध सिद्ध नहीं होता।”
उसने आगे कहा—
“फिर भी दोनों प्रकार के पूजा-स्थलों में एक भाव समान खोजा जा सकता है—मनुष्य का अपने से बड़ी संरक्षणकारी सत्ता का स्मरण करना। समान आध्यात्मिक आवश्यकता और समान ऐतिहासिक उत्पत्ति अलग बातें हैं।”
राक्षस का प्राचीन दायित्व
राज ने कथा आगे बढ़ाई—
ब्रह्मा ने कुछ शक्तिशाली समुदायों को जंगलों, जलाशयों, औषधियों और खनिजों की रक्षा सौंपी। उनसे कहा गया—
“जो जीवन-स्रोतों को अनुचित ढंग से नष्ट करने आए, उसे रोको।”
वे कठोर वन्य प्रदेशों में रहते थे। नगरवासियों की भाषा, वेशभूषा और जीवन-पद्धति से वे अलग थे। कुछ परंपराओं ने उन्हें रक्ष अर्थात रक्षा से जुड़ा मानकर “राक्षस” के रूप में समझा। यक्ष और यक्षिणियाँ भी वन, जल, वृक्ष तथा संपदा के संरक्षक माने गए।
लेकिन राज ने कथा रोककर कहा—
“यह एक अर्थपूर्ण व्याख्या है, सर्वमान्य शब्द-इतिहास नहीं। प्राचीन ग्रंथों में ‘राक्षस’ के अलग-अलग अर्थ और चित्र मिलते हैं। कहीं वे विरोधी शक्तियाँ हैं, कहीं विशिष्ट समुदाय और कहीं मनुष्य के भीतर की विनाशकारी प्रवृत्तियों के प्रतीक।”
“फिर वे बदनाम कैसे हुए?” अनंता ने पूछा।
राज बोला—
“जब नगरों और साम्राज्यों को वन, भूमि तथा खनिज चाहिए थे, तब स्थानीय संरक्षकों से संघर्ष हुआ होगा। इतिहास में सत्ता अक्सर अपने विरोधी को असभ्य या दुष्ट कहती रही है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि प्रत्येक वनवासी समूह निर्दोष था अथवा हर नगरवासी शोषक। हर समाज में रचनात्मक और विनाशकारी—दोनों प्रकार की प्रवृत्तियाँ हो सकती हैं।”
रावण, पुलस्त्य और पश्चिम एशिया
एक विद्यार्थी ने धीमे स्वर में पूछा—
“अशोक सर रावण को ‘रा-अवन’ या ‘रा-यवन’ के रूप में क्यों देखते थे? क्या पुलस्त्य ऋषि का आश्रम यरूशलम के आसपास था?”
राज ने उत्तर दिया—
“वे इन शब्द-विभाजनों को सूक्ष्म संकेत और वैकल्पिक परिकल्पना की तरह देखते थे। उन्हें सोमालिया, सुमाली और रावण के मातृवंश में भी कोई प्राचीन संबंध महसूस होता था। लेकिन वे स्वीकार करते थे कि उनके पास इसका भौतिक प्रमाण नहीं है।”
“फिर ऐसी अनुभूति का मूल्य क्या है?” युवक ने पूछा।
“अनुभूति शोध का प्रश्न पैदा कर सकती है,” राज ने कहा, “लेकिन वही उत्तर नहीं बन जाती। रावण का जन्म पश्चिम एशिया में हुआ था या पुलस्त्य का आश्रम यरूशलम के आसपास था—इसे प्रमाणित इतिहास नहीं कहा जा सकता। इसके लिए समकालीन अभिलेख, पुरातत्त्व, भाषा-विज्ञान और विश्वसनीय कालक्रम चाहिए।”
‘रा’ का आंतरिक अर्थ
सभा में बैठे वृद्ध प्रकृति-साधक ने पूछा—
“प्रकृति अभियान और अनन्तयात्रा में ‘रा’ का क्या अर्थ है?”
राज ने भूमि पर एक वृत्त बनाया और उसके केंद्र में बिंदु रख दिया।
“अशोक सर की आध्यात्मिक व्याख्या में ‘रा’ उस वर्तमान स्तर का संकेत था, जहाँ से साधक अपनी यात्रा आरंभ करता है। मनुष्य को पहले यह स्वीकार करना पड़ता है कि वह अभी कहाँ खड़ा है—उसमें कितना भय, लोभ, करुणा और विवेक है।”
“और रावण?”
“रावण को केवल बाहर का पात्र न मानकर अपने भीतर भी देखा जा सकता है। ज्ञानवान होने के बावजूद जब मनुष्य अहंकार, अधिकार और भोग की लालसा से संचालित होने लगे, तो उसके भीतर का दशानन जागता है। उसकी अनेक बुद्धियाँ एक केंद्रित विवेक के अधीन नहीं रहतीं।”
जब संरक्षक स्वामी बन गए
राज ने फिर कथा का द्वार खोला—
जिन रक्षकों को प्रकृति की रक्षा का कार्य मिला था, उनमें से कुछ धीरे-धीरे संसाधनों के स्वामी बन बैठे। जिन पुरोहितों को आंतरिक प्रकाश जगाना था, उनमें से कुछ ने पूजा को अधिकार बना लिया। जिन प्रशासकों को लेखा रखना था, उनमें से कुछ ने व्यवस्था को अपने लाभ का साधन बना लिया।
तब ब्रह्मा ने उन्हें बुलाकर कहा—
“तुम्हारा पतन तुम्हारे मूल कार्य में नहीं, उस कार्य पर किए गए अधिकार में है। संरक्षक जब स्वामी बनता है, पुरोहित जब सत्य का ठेकेदार बनता है और शासक जब सेवक के स्थान पर मालिक बनता है—तभी अराजकता जन्म लेती है।”
विभीषण भी उस सभा में उपस्थित था। उसने पूछा—
“अब समाधान क्या है?”
ब्रह्मा ने उत्तर दिया—
“प्रत्येक पद को फिर से सेवा बनाओ। जन्म से मिली पहचान के स्थान पर कर्म और उत्तरदायित्व को महत्त्व दो। प्रकृति के संसाधनों को लूट की वस्तु नहीं, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर समझो।”
विभीषण की नई लंका
युद्ध के बाद विभीषण ने लंका में एक नई परिषद बनाई। उसमें पुरोहितों और योद्धाओं के साथ वनवासियों, पशुपालकों, किसानों, शिल्पकारों, लेखकों, यक्ष-परंपरा के प्रतिनिधियों और स्त्रियों को भी स्थान मिला।
उसने घोषणा की—
“किसी समुदाय को केवल इसलिए राक्षस नहीं कहा जाएगा कि उसकी भाषा, पूजा या जीवन-पद्धति हमसे अलग है। राक्षसी प्रवृत्ति जन्म में नहीं—उस आचरण में है जो जीवन, स्वतंत्रता और प्रकृति को नष्ट करता है।”
मंदोदरी ने कहा—
“और देवत्व भी किसी जाति की संपत्ति नहीं। जहाँ संरक्षण, न्याय और करुणा है, वहीं देवत्व प्रकट होता है।”
राज का निष्कर्ष
कथा समाप्त हुई तो किले में मौन छा गया।
अनंता ने पूछा—
“तो अशोक सर की पुस्तकों का मूल विचार क्या है?”
राज ने उत्तर दिया—
“उनका एक संभावित संदेश यह है कि पौराणिक पात्रों को केवल जातियों और युद्धों में बाँधकर न देखें। रावण ज्ञान और अहंकार के संघर्ष का प्रतीक हो सकता है; विभीषण अन्यायपूर्ण अपनेपन से ऊपर उठते विवेक का; यक्ष प्रकृति-संपदा के संरक्षण का और कायस्थ स्मृति तथा व्यवस्था के उत्तरदायित्व का।”
वह कुछ क्षण रुका और फिर बोला—
“सूक्ष्म अनुभूति हमें खोज की प्रेरणा दे सकती है, पर इतिहास का दावा प्रमाण माँगता है। शब्दों को मनमाने ढंग से तोड़कर बनाई गई व्युत्पत्ति चिंतन का रूपक हो सकती है, इतिहास का अंतिम निष्कर्ष नहीं।”
सभा के द्वार पर यह वाक्य लिख दिया गया—
“देव और राक्षस दो जन्मजात जातियाँ नहीं, मनुष्य के भीतर उपस्थित दो संभावनाएँ भी हैं। जो जीवन की रक्षा करे वह देवत्व की ओर बढ़ता है; जो ज्ञान और शक्ति का उपयोग अधिकार तथा विनाश के लिए करे, वही राक्षसी प्रवृत्ति का पोषण करता है।”
खंडहर के बाहर जंगल शांत था। राज ने वृक्षों की ओर देखते हुए कहा—
“शहर बनाना विकास हो सकता है, पर जंगल मिटाकर और मूल समुदायों की आवाज दबाकर किया गया विकास अधूरा है। असली प्रश्न यह नहीं कि प्राचीन राक्षस कौन थे। प्रश्न यह है कि आज प्रकृति की रक्षा कौन कर रहा है—और उसे नष्ट कौन कर रहा है।”
सोमवार, 24 अगस्त 2026
तीन नेत्रों वाली पीढ़ी?!
सन 5020 ई०।
पृथ्वी से हजारों प्रकाश-वर्ष दूर एक ग्रह था—“सनडरेकसन”। वहाँ का आकाश हल्का बैंगनी था और दो छोटे सूर्य उसके क्षितिज पर चमकते रहते थे। उस ग्रह पर तीन नेत्रों वाले मानव निवास करते थे। उनके दो नेत्र बाहरी संसार को देखते थे, जबकि तीसरा नेत्र इतिहास, चेतना और भविष्य को समझने का प्रतीक माना जाता था।
एक दिन युवा इतिहास-अन्वेषक ‘सदप्सक्क’ प्राचीन अभिलेखागार पहुँचा। वहाँ बुजुर्ग महिला इतिहासकार ‘पसब्मितड़क’ पृथ्वी से प्राप्त एक पुराना डिजिटल पात्र पढ़ रही थी। उसके ऊपर धुँधले अक्षरों में लिखा था—
“पृथु महि : मानव सभ्यता का वृत्तांत”
सदप्सक्क ने उत्सुकता से पूछा—
“और बताइए! क्या पृथु महि की पुरानी पीढ़ी को वास्तव में भविष्य की पीढ़ियों की चिंता थी?”
पसब्मितड़क कुछ देर शांत रही। उसका तीसरा नेत्र हल्की नीली आभा से चमक उठा। फिर वह बोली—
“चिंता तो थी, पुत्र! मगर चिंता और जिम्मेदारी के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है।”
“कैसा अंतर?”
“वे भविष्य के बच्चों के नाम पर भाषण देते थे, स्मारक बनाते थे और विकास की बड़ी-बड़ी योजनाएँ घोषित करते थे। पर उसी समय वे नदियों को प्रदूषित, जंगलों को समाप्त और मिट्टी को विषैला भी कर रहे थे। वे आने वाली पीढ़ी को सुविधाएँ देना चाहते थे, लेकिन उसके लिए स्वच्छ धरती छोड़ने का साहस नहीं जुटा सके।”
सदप्सक्क ने अभिलेख के अगले पृष्ठ को खोला।
सन 2024 ई० : दो वर्षों की चेतावनी
अभिलेख में दर्ज था कि सन 2024 के आसपास पृथु महि पर कुछ चिंतक कहने लगे थे—
“मनुष्य को अपने आचरण में सुधार करने के लिए अब बहुत कम समय बचा है।”
उनका संकेत किसी निश्चित भविष्यवाणी से अधिक एक नैतिक चेतावनी था। वे कहना चाहते थे कि प्रकृति का दोहन, युद्ध, उपभोग और सामाजिक विभाजन इसी तरह बढ़ता रहा तो उसके परिणाम शीघ्र दिखाई देने लगेंगे।
पसब्मितड़क बोली—
“कुछ लोग चेतावनियाँ सुनते थे, कुछ उनका मजाक उड़ाते थे और अधिकांश सोचते थे—हमारे जीवनकाल में क्या होगा?”
“क्या किसी ने बदलाव का प्रयास नहीं किया?” सदप्सक्क ने पूछा।
“अनेक लोगों ने किया। किसी ने पेड़ लगाए, किसी ने नदियाँ बचाईं, किसी ने शिक्षा और समानता की बात की। कुछ लोगों ने अपनी चेतना को व्यापक मानवता और ब्रह्माण्ड से जोड़ने का अभ्यास भी किया। लेकिन उनके प्रयास बिखरे हुए थे। सत्ता, बाजार और समाज की सामूहिक दिशा अब भी उपभोग की ओर थी।”
सन 2016–17 : परिवर्तन की आहट
पृथु महि पर कुछ संवेदनशील लोग सन 2016–17 से ही भारी परिवर्तन की आहट महसूस करने लगे थे। वे तापमान, मौसम, मानवीय व्यवहार और बढ़ती सामाजिक कटुता को परस्पर जुड़ी चेतावनियों की तरह देखते थे।
उनमें एक वृद्ध शिक्षक कहा करते थे—
“प्रकृति केवल जंगल और नदियों का नाम नहीं है। मनुष्य की चेतना भी प्रकृति का भाग है। बाहर का प्रदूषण और भीतर का लोभ एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।”
उस समय अधिकांश लोगों को यह बात दार्शनिक कल्पना जैसी लगी। लेकिन कुछ युवाओं ने इसे जीवन का आधार बना लिया। उन्होंने छोटे-छोटे समूह बनाए, जिनमें बच्चों को प्रकृति, ध्यान, विज्ञान, सेवा और सहयोग की शिक्षा दी जाती थी।
सन 2075 ई० : जंगल की शरण
सन 2075 तक पृथु महि बहुत बदल चुकी थी। अनेक क्षेत्रों में पानी और भोजन की समस्या बढ़ गई थी। समुद्री तटों तथा अत्यधिक गर्म प्रदेशों से लोगों का पलायन होने लगा था। कई परिवार जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों की ओर चले गए।
एक ऐसे ही जंगल में पुराने विद्यालय, प्रयोगशाला और पुस्तकालय के अवशेषों से एक छोटी बस्ती बनाई गई थी। वहाँ दीवार पर लिखा था—
“हम अपने पूर्वजों की गलतियों को कोसने के लिए नहीं, उनसे सीखने के लिए जीवित हैं।”
उस बस्ती में अलग-अलग जाति, मजहब और देशों से आए लोग साथ रहते थे। संकट ने उन्हें सिखा दिया था कि भूख किसी की जाति नहीं पूछती, दूषित हवा मजहब नहीं देखती और बदलती जलवायु किसी सीमा-रेखा का सम्मान नहीं करती।
एक शाम वृद्ध विश्व मित्र अल्कक्षेंद्र ने बच्चों से पूछा—
“मनुष्य की सबसे बड़ी भूल क्या थी?”
एक बालिका बोली—
“उसने विकास को प्रकृति पर विजय समझ लिया।”
दूसरे बालक ने कहा—
“वह भविष्य की चिंता तो करता था, लेकिन वर्तमान की आदतें बदलना नहीं चाहता था।”
वृद्ध मुस्कराए—
“और तीसरी भूल?”
जंगल से आया एक बालक बोला—
“उसने पहचान के छोटे दायरों को मानवता से बड़ा मान लिया।”
यह सुनकर सभा शांत हो गई।
चीन आगे, भारत उलझा हुआ?
अभिलेखों में लिखा था कि तकनीकी प्रगति की दौड़ में चीन कई क्षेत्रों में बहुत आगे निकल गया था। अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऊर्जा में उसने बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। लेकिन पसब्मितड़क ने सदप्सक्क को समझाया—
“किसी देश का दो सौ वर्ष आगे निकल जाना एक साहित्यिक प्रतीक भी हो सकता है। तकनीकी श्रेष्ठता और सभ्यतागत परिपक्वता एक ही बात नहीं होती।”
“और भारत?” युवक ने पूछा।
“भारत के पास दर्शन, विविधता और सह-अस्तित्व की बड़ी विरासत थी। फिर भी उसके बहुत से लोग जाति, मजहब, अगड़ा-पिछड़ा और हिन्दू-मुसलमान के विवादों में उलझे रहे। वे अतीत के गौरव पर बहस करते रहे, जबकि भविष्य उनके सामने सहायता माँग रहा था।”
लेकिन भारत की पूरी कहानी निराशाजनक नहीं थी। वहीं से अनेक छोटे समुदाय भी उभरे जिन्होंने समान शिक्षा, जल-संरक्षण, ग्राम स्वावलंबन और विश्व-नागरिकता को अपनाया। उन्हीं समुदायों के अभिलेख बाद में पृथु महि से बाहर जाने वाले यात्रियों के साथ अंतरिक्ष तक पहुँचे।
सन 2091 ई० : नगरों का मौन
सन 2091 तक अनेक बड़े नगर संकटग्रस्त हो चुके थे। कहीं जल की कमी, कहीं भीषण मौसम और कहीं अव्यवस्थित पलायन ने जीवन कठिन बना दिया था। विशाल इमारतें खड़ी थीं, लेकिन उनमें रहने योग्य परिस्थितियाँ नहीं बची थीं।
मूर्तियाँ और स्मारक भी खड़े थे। उन पर उन लोगों के नाम अंकित थे जिन्होंने अपने समय में स्वयं को महान कहलवाया था। मगर भूखे बच्चे उनके नाम नहीं जानते थे।
एक वृद्ध महिला ने स्मारक की छाया में बैठे बच्चों से कहा—
“इन पत्थरों पर बहुत धन खर्च हुआ था।”
एक बच्चे ने सरलता से पूछा—
“क्या उन्होंने हमारे लिए पानी भी बचाया था?”
उस प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं था।
सन 5020 ई० : इतिहास का निर्णय
पसब्मितड़क ने डिजिटल अभिलेख बंद कर दिया।
सदप्सक्क ने फिर पूछा—
“तो क्या हमें कहना चाहिए कि पुरानी पीढ़ी को भविष्य की कोई चिंता नहीं थी?”
बुजुर्ग महिला ने सिर हिलाया—
“नहीं। ऐसा निर्णय भी अन्यायपूर्ण होगा। प्रत्येक पीढ़ी में तीन प्रकार के लोग होते हैं—एक वे जो संकट पैदा करते हैं, दूसरे वे जो उसे देखकर भी चुप रहते हैं और तीसरे वे जो अपने सीमित साधनों से भविष्य को बचाने का प्रयास करते हैं।”
“फिर शहरों, मूर्तियों और स्मारकों की यहाँ मजाक क्यों बनती है?”
“क्योंकि समय पूछता है—तुमने क्या बनाया नहीं, बल्कि जो बनाया वह जीवन के कितने काम आया? यदि किसी सभ्यता की भव्यता उसके बच्चों को स्वच्छ वायु, पानी, न्याय और प्रेम न दे सके तो भविष्य में उसकी विशाल इमारतें भी खोखली प्रतीत होती हैं।”
सदप्सक्क ने आकाश की ओर देखा। वहाँ पृथु महि एक छोटे नीले तारे जैसी दिखाई दे रही थी।
पसब्मितड़क ने अंतिम बात कही—
“भविष्य की पीढ़ी की वास्तविक चिंता आँसू बहाने या भाषण देने में नहीं होती। उसका प्रमाण यह है कि हम आज कितना संयम रखते हैं, कितना न्याय करते हैं और कितनी प्रकृति अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित छोड़ते हैं।”
सदप्सक्क का तीसरा नेत्र पहली बार सुनहरी रोशनी से चमक उठा। उसने इतिहास-पात्र पर एक नई पंक्ति अंकित की—
“जो पीढ़ी वर्तमान की सुविधाओं के लिए भविष्य का जीवन गिरवी रख देती है, वह अपने वंशजों से प्रेम का दावा नहीं कर सकती।”
दूर अंतरिक्ष में पृथु महि अब भी चमक रही थी—मानो अपनी गलतियों के बीच किए गए कुछ छोटे, सच्चे प्रयासों की गवाही दे रही हो।
कथा का भावार्थ: भविष्य की चिंता केवल चेतावनी, स्मारक या विकास के दावों से सिद्ध नहीं होती। उसका वास्तविक प्रमाण वर्तमान जीवन-शैली, प्रकृति-संरक्षण, सामाजिक एकता और आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी है। यह कथा सन 5020 की वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं, बल्कि आज के निर्णयों पर आधारित एक कल्पनात्मक चेतावनी है।
शनिवार, 22 अगस्त 2026
सन 2075 ई० की एक कथ!
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पुस्तक :: क्रांति क्यों? कैसे?
लेखक ::Ashok Kumar Verma Bindu
सन 2075 ई० की एक कथा
समय सन 2075 ई० का रहा होगा।
धरती पर बहुत कुछ बदल चुका था। सन 2029 के बाद जिन परिवर्तनों की शुरुआत हुई थी, उनके परिणाम अब नगरों, जंगलों और मनुष्य के व्यवहार तक में दिखाई दे रहे थे। पुराने नगरों के अनेक हिस्से खंडहर बन चुके थे और जंगल फिर से धरती पर अपना विस्तार करने लगे थे।
ऐसे ही एक घने जंगल के बीच किसी प्राचीन किले का खंडहर था। उसके खुले प्रांगण में बालक-बालिकाएँ प्रशिक्षण ले रहे थे। कुछ तीरंदाजी का अभ्यास कर रहे थे, कुछ आत्मरक्षा सीख रहे थे और कुछ घायल व्यक्ति की सहायता करने का प्रशिक्षण ले रहे थे। उनके गुरु उन्हें बार-बार समझा रहे थे—
“शस्त्र हाथ की शक्ति है, लेकिन विवेक मनुष्य की असली शक्ति। विवेक के बिना उठाया गया शस्त्र स्वयं अन्याय बन जाता है।”
खंडहर के एक कोने में पत्थरों से बना ऊँचा तख्त था। उस पर एक युवती बैठी थी। उसका नाम अनंता था। उसके हाथों में पुरानी और पीली पड़ चुकी पुस्तक थी—
“क्रांति क्यों? कैसे..?!”
लेखक—अशोक कुमार वर्मा ‘बिंदु’
उसके पास एक वृद्ध व्यक्ति शांत भाव से बैठा था। उसकी आँखों की रोशनी जा चुकी थी, पर स्मृतियाँ आज भी जीवित थीं। लोग उसे बुजुर्ग राज कहते थे।
तख्त पर एक दूसरी पुस्तक भी रखी थी—“लंका में विभीषण?!”
अनंता पुस्तक से पढ़ने लगी—
“हर क्रांति के पीछे तत्कालीन कारण होते हैं। कोई भी क्रांति अचानक पैदा नहीं होती। प्रत्येक कालखंड और प्रत्येक पल का अपना विशेष महत्त्व होता है।”
कुछ दूर बैठे लोगों ने यह सुनकर आपस में चर्चा शुरू कर दी।
एक युवक बोला, “यदि अन्याय हमेशा से था, तो क्रांति किसी विशेष समय में ही क्यों होती है?”
एक बुजुर्ग महिला ने उत्तर दिया, “क्योंकि सूखी लकड़ियाँ वर्षों तक पड़ी रह सकती हैं, लेकिन आग तभी लगती है जब कोई तत्कालीन चिनगारी उन्हें छूती है।”
सबकी निगाह राज की ओर गई, मगर वह खामोश था। वह उस दिन जंगल के खंडहर में नहीं, अपनी स्मृतियों के किसी पुराने कक्ष में बैठा था।
अशोक सर की स्मृति
राज को अपनी किशोरावस्था याद आने लगी। वह पहली बार अशोक सर की कक्षा में बैठा था। शरीर से वे उस समय जवान दिखाई देते थे, पर उनकी आँखों में लंबे संघर्ष की थकान छिपी रहती थी।
जीविका के लिए वे निजी विद्यालयों में बहुत कम वेतन पर पढ़ाते थे। धन का अभाव था, स्वास्थ्य भी हमेशा साथ नहीं देता था और पारिवारिक सम्पत्ति को लेकर भी उन्हें अनेक परेशानियों से जूझना पड़ता था। फिर भी वे विद्यार्थियों के सामने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा का प्रदर्शन नहीं करते थे।
एक दिन उन्होंने बोर्ड पर लिखा था—
“क्रांति का अर्थ केवल सत्ता बदलना नहीं; मनुष्य की सोच और व्यवस्था का चरित्र बदलना है।”
राज ने पूछा था, “सर, क्या हर क्रांति में संघर्ष और हिंसा आवश्यक होती है?”
अशोक सर मुस्कराए थे।
“नहीं, राज। हिंसा क्रांति की पहचान नहीं, कई बार उसकी असफलता का प्रमाण होती है। सच्ची क्रांति शिक्षा, सत्य, संगठन, संवेदना और न्यायपूर्ण व्यवस्था से शुरू होती है। यदि सत्ता बदल जाए, पर शोषण करने की मानसिकता न बदले, तो वह क्रांति नहीं—सिर्फ कुर्सियों का परिवर्तन है।”
वे अपने लेखों में “अहिंसक नक्सलवाद” जैसे विचार का उल्लेख करते थे। उनका आशय किसी हिंसक गतिविधि से नहीं था। वे समझाते थे कि यदि नक्सल शब्द को अन्याय और शोषण के विरुद्ध पैदा हुए असंतोष से जोड़कर देखा जाए, तो उसका अहिंसक रूप लोकतांत्रिक प्रश्न, वैचारिक प्रतिरोध, गरीबों की शिक्षा और वंचितों के अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष हो सकता है।
उनकी कुछ कहानियाँ ब्लॉग पर प्रकाशित थीं। वे सामाजिक संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से भी अपने विचार रखते तथा अधिकारियों और संस्थाओं को पत्र लिखते थे। उनकी भाषा कभी-कभी तीखी थी, मगर उद्देश्य व्यवस्था को सावधान करना था—मनुष्य को नुकसान पहुँचाना नहीं।
राज ने सुना था कि कुछ संस्थाओं ने उनकी गोपनीय जाँच भी करवाई थी। पर जाँच में किसी हिंसक अथवा संदिग्ध गतिविधि का प्रमाण नहीं मिला। सामने केवल एक संघर्षशील शिक्षक, लेखक और विचारक का जीवन था, जो सीमित साधनों में व्यवस्था से प्रश्न पूछ रहा था।
उम्मीद का कटोरा
अनंता ने पुस्तक का अगला अंश पढ़ा—
“सन 2011 से 2025 ई० तक का काल संक्रमण का समय था। वह एक दिव्य अवसर भी था, क्योंकि उसमें अनंत की ओर जाने की अनेक सम्भावनाएँ थीं। सन 2011-14 एक विशेष उम्मीद बनकर आया, लेकिन सन 2026-29 तक आते-आते उस उम्मीद का कटोरा भी बदल गया।”
यह वाक्य सुनते ही राज स्मृतियों से बाहर आया।
उसने पूछा, “तुम जानते हो—उम्मीद का कटोरा बदलने का क्या अर्थ है?”
एक बालिका ने कहा, “शायद लोगों की आशाएँ समाप्त हो गई थीं?”
राज बोला, “आशा समाप्त नहीं हुई थी; उसका पात्र बदल गया था। लोग पहले किसी नेता, दल या संस्था से परिवर्तन की आशा करते थे। जब उन्हें निराशा मिली, तो वही आशा असंतोष का रूप लेने लगी। कुछ लोग हिंसा की ओर मुड़े, कुछ निराश होकर चुप हो गए और कुछ ने अपने भीतर परिवर्तन शुरू किया।”
अनंता ने पूछा, “तो सन 2029 के बाद जो हुआ, उसका कारण केवल तत्कालीन सरकारें थीं?”
“नहीं,” राज ने गंभीरता से उत्तर दिया, “किसी एक व्यक्ति या सरकार को पूरे इतिहास का दोषी घोषित कर देना भी अधूरा सत्य है। क्रांति के दो प्रकार के कारण होते हैं—दीर्घकालीन और तत्कालीन।”
उसने भूमि पर लकड़ी से दो वृत्त बनाए।
“गरीबी, असमान शिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन और न्याय मिलने में देरी—ये दीर्घकालीन कारण थे। लेकिन किसी विशेष घटना, कठोर निर्णय, अन्यायपूर्ण कार्रवाई या जनता की उपेक्षा ने चिनगारी का काम किया—वह तत्कालीन कारण बना।”
एक युवक ने पूछा, “फिर जिम्मेदार कौन था?”
राज ने कहा—
“वह सत्ता, जो सुन नहीं रही थी; वह समाज, जो दूसरों का दुःख नहीं देख रहा था; वह नागरिक, जो अपने अधिकार तो चाहता था पर कर्तव्य भूल गया था; और वह विद्रोही भी, जिसने न्याय की लड़ाई में मानवता छोड़ दी थी। इतिहास में जिम्मेदारी प्रायः एक ओर नहीं होती।”
सबसे बड़ी क्रांति
तभी प्रशिक्षण कर रहे एक बालक के हाथ से लकड़ी का अभ्यास-धनुष छूट गया। वह झुँझलाकर उसे तोड़ने वाला था, पर प्रशिक्षक ने उसका हाथ रोक दिया।
राज ने यह देखकर कहा, “यही क्रांति की पहली परीक्षा है।”
सबने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
“जिस मनुष्य को अपने क्रोध पर अधिकार नहीं, वह व्यवस्था बदलने निकलेगा तो नई व्यवस्था में भी पुराने अत्याचार पैदा कर देगा। इसीलिए अशोक सर कहा करते थे—पहली क्रांति अपने भीतर करनी होगी।”
उसने बच्चों को अपने पास बुलाकर कहा—
“तुम्हें यह प्रशिक्षण किसी से घृणा करने के लिए नहीं दिया जा रहा। तुम्हें कमजोर की रक्षा, संकट में सहायता और अपने समुदाय की सुरक्षा सीखनी है। हमारा प्रथम मार्ग संवाद, न्याय और अहिंसा होगा। शक्ति का उपयोग केवल जीवन की रक्षा के लिए और अंतिम आवश्यकता में होना चाहिए।”
अनंता ने तख्त पर रखी दूसरी पुस्तक “लंका में विभीषण?!” उठाई और पूछा, “इस पुस्तक का यहाँ क्या अर्थ है?”
राज ने उत्तर दिया—
“विभीषण हमें बताता है कि अपने परिवार, दल अथवा समुदाय का साथ देना ही धर्म नहीं होता। जब अपना पक्ष अन्याय पर उतर आए, तब सत्य का साथ देना चाहिए। लेकिन सत्य का साथ देने वाले को पहले अपने स्वार्थ और अहंकार की भी जाँच करनी चाहिए।”
अब राज के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
“यदि अशोक सर आज जीवित होंगे, तो सौ वर्ष की आयु पार कर चुके होंगे। पता नहीं वे कहाँ हैं। किंतु शिक्षक का वास्तविक जीवन उसके शरीर में नहीं, विद्यार्थियों के विवेक में चलता रहता है।”
अनंता ने पुस्तक बंद कर दी। दूर क्षितिज पर सूर्य ढल रहा था। प्रशिक्षण समाप्त हुआ और बच्चों ने अपने अभ्यास-शस्त्र एक ओर रख दिए। फिर सभी ने मिलकर खंडहर के पास पौधे लगाए और रात की पाठशाला की तैयारी शुरू कर दी।
राज ने कहा—
“क्रांति तब पूर्ण नहीं होती जब पुराना भवन गिर जाए। वह तब पूर्ण होती है जब उसके स्थान पर न्यायपूर्ण समाज खड़ा हो। तोड़ना क्षण भर का काम है; निर्माण कई पीढ़ियों की साधना है।”
उस रात खंडहर में किसी युद्ध की योजना नहीं बनी। वहाँ शिक्षा, जल-संरक्षण, समान अवसर, ग्रामसभा और शांतिपूर्ण न्याय-व्यवस्था की रूपरेखा तैयार हुई।
अशोक सर वहाँ शरीर से उपस्थित नहीं थे, लेकिन उनके विचार हर प्रश्न के बीच जीवित थे।
कथा का संदेश: क्रांति किसी एक घटना से अचानक जन्मी दिखाई दे सकती है, पर उसके पीछे लंबे समय से जमा समस्याएँ होती हैं। तत्कालीन घटना केवल चिनगारी बनती है। वास्तविक परिवर्तन हिंसा, प्रतिशोध अथवा सत्ता-परिवर्तन से नहीं, बल्कि आत्म-सुधार, शिक्षा, न्याय, संवेदना और उत्तरदायी व्यवस्था के निर्माण से आता है।
शनिवार, 15 अगस्त 2026
अभी महाभारत बाकी है!!
अभी महाभारत बाकी है!
सन 2075 ईस्वी।
मीरानपुर कटरा अब पहले जैसा नहीं रहा था। कस्बे के बाहर कभी हरे दिखाई देने वाले खेतों के बीच जंग लगी मशीनों के अवशेष पड़े थे। पुराने बाजार की अनेक दुकानें खंडहर बन चुकी थीं। फिर भी एक प्राचीन पीपल के नीचे प्रत्येक पूर्णिमा को कुछ वृद्ध, युवक और साधक एकत्र होते थे।
उस शाम तेज हवा चल रही थी। पीपल के पत्तों से उठती ध्वनि के बीच राज ने पूछा—
“क्या यह सच है कि कल्कि महाराज का अवतार हो चुका है?”
सामने बैठे निशांत सर ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। कुछ समय बाद बोले—
“किसी के जन्म की अप्रमाणित घोषणा करना सरल है, राज! लेकिन कल्कि-तत्त्व को पहचानना कठिन है। संभव है कि ‘कल्कि’ किसी एक देह का नाम हो; यह भी संभव है कि वह मनुष्य और व्यवस्था के भीतर फैले अधर्म के विरुद्ध जागती हुई सामूहिक चेतना का प्रतीक हो।”
राज को अशोक सर की बातें याद आने लगीं। वे कहा करते थे—
“मीरानपुर कटरा छोटा कस्बा अवश्य है, लेकिन ब्रह्माण्ड चेतना के मानचित्र पर कोई स्थान छोटा नहीं होता। यहाँ भी कुछ मनुष्य ऐसे हो सकते हैं जिनका स्थूल शरीर सामान्य जीवन जीता दिखाई देता है, जबकि उनका सूक्ष्म शरीर सत्य, मानवता और प्रकृति की रक्षा के संकल्प में लगा रहता है।”
लोग निशांत सर का नाम भी उन्हीं साधकों में लेते थे। पर निशांत सर स्वयं कभी ऐसा दावा नहीं करते। वे बच्चों को पढ़ाते, पौधे लगाते, परेशान लोगों की सहायता करते और प्रतिदिन मौन साधना करते थे। उनका कहना था—
“यदि सूक्ष्म साधना तुम्हें अधिक विनम्र, न्यायप्रिय और सेवाभावी नहीं बनाती, तो वह केवल कल्पना भी हो सकती है।”
राज ने फिर पूछा—
“लेकिन अशोक सर युग-परिवर्तनकारी घटनाएँ अनुभव करते थे। वे कहते थे—‘अभी महाभारत बाकी है!’ इसका क्या अर्थ था?”
निशांत सर ने पास रखी महाभारत की प्रति उठाई।
“इसका अर्थ यह आवश्यक नहीं कि फिर वही अस्त्र-शस्त्र वाला युद्ध होगा। आज का कुरुक्षेत्र मनुष्य की चेतना, समाज और व्यवस्था के भीतर है। एक ओर लोभ, हिंसा, अन्याय, प्रकृति का दोहन और मनुष्य को मशीन बनाने वाली व्यवस्था है; दूसरी ओर विवेक, करुणा, सत्य और सह-अस्तित्व।”
“और वेदव्यास?” राज ने पूछा।
“वेदव्यास पर चिंतन हमें यह समझा सकता है कि महाभारत केवल बीती हुई घटना नहीं, बल्कि बार-बार उपस्थित होने वाला नैतिक संकट भी है। जब सत्ता धर्म से बड़ी हो जाए, सभा अन्याय देखकर मौन रहे और मनुष्य लाभ के लिए प्रकृति को नष्ट करने लगे—तब महाभारत की परिस्थितियाँ लौट आती हैं।”
तभी एक वृद्ध साधक ने जगन्नाथ की ओर संकेत करती छोटी-सी प्रतिमा के सामने दीपक रख दिया। उसने कहा—
“जगन्नाथ का अर्थ है—जगत का नाथ। उनके विशाल नेत्र मानो चेतावनी देते हैं कि कोई कर्म व्यापक चेतना की दृष्टि से छिपा नहीं रहता। लेकिन उनके संदेशों के नाम पर भविष्य की निश्चित घोषणा करने के बजाय हमें उन्हें नैतिक संकेत की तरह समझना चाहिए।”
राज ने अगला प्रश्न किया—
“भविष्य में रूस की बड़ी भूमिका होने की बात क्यों कही जाती है?”
अशोक सर के पुराने हस्तलिखित पन्ने पढ़ रहे एक बुजुर्ग ने उत्तर दिया—
“कुछ लोककथाओं में कहा जाता है कि महाभारत के समय उत्तर दिशा का कोई राजा श्रीकृष्ण की शरण में आया था और श्रीकृष्ण ने उसे भविष्य के लिए लौट जाने को कहा। किंतु इसे प्रमाणित इतिहास नहीं माना जा सकता। ‘रूस’ जैसे आधुनिक राष्ट्र को सीधे महाभारतकाल से जोड़ना भी ऐतिहासिक सावधानी की माँग करता है।”
उन्होंने पन्ना बंद करते हुए आगे कहा—
“फिर भी इस कथा का प्रतीकात्मक अर्थ महत्वपूर्ण है। उत्तर की सुरक्षित रखी गई शक्ति शायद उस सामर्थ्य का संकेत है जिसकी आवश्यकता किसी भावी विश्व-संकट में पड़ेगी। रूस हो, भारत हो या कोई अन्य देश—उसकी भूमिका तभी कल्याणकारी होगी, जब उसकी शक्ति विनाश नहीं, विश्व-संतुलन और शांति की रक्षा करे।”
अचानक दूर बादल गरजे। राज ने धीमे स्वर में पूछा—
“और अश्वत्थामा? क्या वे सचमुच कल्कि के लिए लड़ेंगे?”
निशांत सर बोले—
“धार्मिक परम्पराओं में अश्वत्थामा को चिरंजीवी माना गया है। भविष्य में उनकी भूमिका की कथाएँ आस्था का विषय हैं, प्रमाणित वर्तमान समाचार नहीं। कथा के स्तर पर अश्वत्थामा उस शक्ति का प्रतीक हैं जो ज्ञान और सामर्थ्य रखते हुए भी क्रोध के कारण भटक गई थी। कल्कि के लिए उनका संघर्ष तभी सार्थक होगा, जब वह बाहरी शत्रुओं से पहले अपने क्रोध, प्रतिशोध और अपराधबोध पर विजय पाएँ।”
राज ने कल्पना की—एक थका हुआ अश्वत्थामा युगों की यात्रा करके किसी रणभूमि में नहीं, बल्कि शांत नदी के किनारे खड़ा है। उसके हाथ में अस्त्र है, पर कल्कि की वाणी सुनाई देती है—
“इस युग का महान योद्धा वह नहीं जो अधिक लोगों को पराजित करे। वह है जो अपनी शक्ति को निर्दोषों की रक्षा, प्रकृति के संरक्षण और अन्याय को रोकने में लगाए।”
“द्रौपदी के चीरहरण के समय कौरव राज्य छोड़ने वालों की क्या भूमिका होगी?” राज ने पूछा।
एक वृद्धा ने उत्तर दिया—
“महाभारत के सभी प्रसंगों के विषय में अनेक लोकपरम्पराएँ प्रचलित हैं। संभव है यह भी ऐसी ही एक कथा हो। लेकिन उसका संदेश स्पष्ट है—अन्यायपूर्ण सत्ता का साथ छोड़ देना आवश्यक पहला कदम है, पर पर्याप्त नहीं। यदि कोई सभा छोड़कर चला गया, किंतु पीड़ित की रक्षा के लिए कुछ नहीं किया, तो उसका धर्म अधूरा रह गया।”
“तो भविष्य में उनकी भूमिका क्या होगी?”
“वे उन लोगों के प्रतीक बनेंगे जो सत्ता की सुविधा त्यागकर सत्य के पक्ष में आते हैं। इस बार उन्हें केवल सभा छोड़नी नहीं होगी; उन्हें अन्याय के विरुद्ध अहिंसक साहस, सेवा और सत्य के साथ खड़ा होना होगा।”
रात गहरी होने लगी। बिजली चली गई, पर पीपल के नीचे रखा दीपक जलता रहा।
निशांत सर उठे और बोले—
“यदि कल्कि आ चुके हैं, तो उनकी पहचान चमत्कारों से नहीं, उनके प्रभाव से होगी। क्या मनुष्यों में करुणा बढ़ रही है? क्या कमजोर को न्याय मिल रहा है? क्या जल, जंगल और जमीन बच रहे हैं? क्या धर्म भय और घृणा से मुक्त होकर मानवता की रक्षा कर रहा है? यही कसौटियाँ हैं।”
राज ने पूछा—
“तब मीरानपुर कटरा के साधकों का कार्य क्या है?”
“किसी अदृश्य युद्ध की कल्पना में खो जाना नहीं,” निशांत सर ने उत्तर दिया, “बल्कि अपने भीतर और आसपास धर्म की भूमि तैयार करना—ध्यान द्वारा चेतना को निर्मल करना, शिक्षा द्वारा अज्ञान घटाना, सेवा द्वारा पीड़ा कम करना और सत्य बोलते हुए भी हिंसा से बचना। यही सूक्ष्म शरीर का स्थूल संसार में प्रमाण होगा।”
प्रातःकाल होने लगा। क्षितिज पर प्रकाश की पहली रेखा दिखाई दी। राज ने समझा कि “अभी महाभारत बाकी है” किसी युद्ध का आह्वान नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—
हर युग में दुर्योधन बाहर पैदा होने से पहले मनुष्य के भीतर जन्म लेता है।
हर युग में द्रौपदी का अपमान तब होता है जब समाज अन्याय देखकर मौन रहता है।
हर युग में अश्वत्थामा की शक्ति को विवेक की आवश्यकता होती है।
और हर युग में कल्कि का मार्ग उन्हीं लोगों से बनता है जो अपने भीतर के छल, भय, लोभ और हिंसा को पराजित करके मानवता तथा प्रकृति की रक्षा में खड़े होते हैं।
पीपल के नीचे दीपक अब भी जल रहा था। अशोक सर की पुरानी डायरी के अंतिम पृष्ठ पर लिखा था—
“महाभारत बाकी है, पर उसका कुरुक्षेत्र तुम्हारे भीतर है। कल्कि की प्रतीक्षा मत करो—अपने कर्मों से उनके योग्य संसार तैयार करो।”
यह कथा धार्मिक विश्वासों, लोककथाओं और प्रतीकों की साहित्यिक व्याख्या है; रूस, अश्वत्थामा अथवा कल्कि से संबंधित उक्त बातों को प्रमाणित ऐतिहासिक या समकालीन तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
रविवार, 12 जुलाई 2026
इन भविष्य संदेशों से हटकर भी है क्या कुछ?!
हम तो कहेंगे कि यदि 10 प्रतिशत मनुष्य भी यदि अपनी चेतना को ब्रह्माण्ड चेतना से जोड़ अपने अंतरयात्रा को अपना धर्म मान अभ्यास में लगा रहे तो इन भविष्य संदेशों को भी टाला जा सकता है लेकिन तब भी....
❤️ सतयुग में प्रवेश?! ❤️
क्या सतयुग में
👉 सिर्फ 15 करोड़ भारतीय ही प्रवेश करेंगे?
क्या सच में
🌍 पूरे विश्व से केवल 60 करोड़ लोग
सतयुग में प्रवेश करेंगे?
📖 'भविष्य मालिका' के अनुसार:
🔸 लगभग 64 करोड़ लोग ही जीवित रहेंगे
🔸 इनमें से करीब 33 करोड़ भारत से होंगे
🔸 ये ही “33 करोड़ देवतुल्य आत्माएं” मानी गई हैं
⚠️ लेकिन कब और कैसे?
▪️ एक कठिन दौर के बाद
▪️ प्राकृतिक आपदाएँ
▪️ महायुद्ध और भारी परिवर्तन
🌿 कौन प्रवेश करेगा सतयुग में?
✔️ जो सत्य के मार्ग पर चले
✔️ जिनके जीवन में प्रेम, करुणा, क्षमा हो
✔️ जो धर्म और भक्ति (त्रिकाल संध्या) में स्थिर रहें
💫 संदेश:
"सतयुग बाहर नहीं…
हमारे कर्मों और चेतना से शुरू होता है!"
🙏 आओ, हम स्वयं को बदलें
और सतयुग के योग्य बनें 🙏
अपनी चेतना को ब्राह्मड चेतना से जोड़े बिना ये सम्भव नहीं!#❤️
"33 करोड़ देवतुल्य आत्माएं”.... आत्मा तो आत्मा है क्या देवतुल्य क्या अदेव तुल्य?!
आत्मा तो निष्प्रभावित होती है। बस, वह सूक्ष्म आवरणों से प्रभावित होती है!
✍️ लेखक:
अशोक कुमार वर्मा "बिंदु"
🌐 www.akvashokbindu.blogspot.com
शुक्रवार, 19 जून 2026
अदृश्य सभ्यता?!
“अदृश्य सभ्यता”
🏫 बीसलपुर का वह समय (जुलाई 1990 ई. के आसपास)
जुलाई की उमस भरी दोपहर थी।
अशोक, जो अब राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बीसलपुर में स्नातक का छात्र था, धीरे-धीरे बदल रहा था।
उसकी आँखों में सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि सवाल थे—
ऐसे सवाल जो किताबों से नहीं, भीतर के शून्य से निकलते हैं।
🛒 सुनील की दुकान – चर्चा जो साधारण नहीं थी
रामलीला मार्ग पर स्थित सुनील संवेदी की छोटी-सी दुकान—
जहाँ चाय, बीड़ी और बहसें बराबर चलती थीं।
उस दिन विषय था — एलियन्स।
अशोक ने धीमे लेकिन ठोस स्वर में कहा:
“मैं मानता हूँ कि एलियन्स हैं… लेकिन वे हमें दिखते नहीं, क्योंकि वे छिपे हुए हैं।”
“क्यों छिपे हुए?” किसी ने पूछा।
अशोक मुस्कुराया—
“जैसे एक सच्चा आदमी समाज में छिपकर जीता है… वैसे ही।”
सभी चुप हो गए।
🧠 सोच का तूफ़ान
अशोक ने अपनी पुरानी डायरी निकाली और लिखना शुरू किया—
“सच्चाई कभी भीड़ में नहीं रहती…
उसे हमेशा अकेले रहना पड़ता है…”
वह सोचने लगा—
क्या एलियन्स वास्तव में कोई दूसरी दुनिया के जीव हैं?
या वे वही लोग हैं जो इस दुनिया में फिट नहीं बैठते?
उसके विचार गहराते गए—
“जब सत्ता नहीं थी, व्यापार नहीं था, तब मनुष्य सरल था।
लेकिन अब… सच्चे को जीने नहीं दिया जाता।”
उसे लगा—
एलियन्स कोई अंतरिक्ष के जीव नहीं, बल्कि धरती पर जन्मे असली इंसान हैं—
जो इस व्यवस्था से मेल नहीं खाते।
🌳 ध्यान के स्थान – जहाँ रहस्य खुलता है
अशोक अक्सर इन जगहों पर जाता:
रामलीला मैदान के पीछे गुलेश्वर नाथ मंदिर
पीपल के पेड़ के नीचे
अमरा कासिमपुर मार्ग का एकांत स्थान
बाबा कालसे महाराज की शांति भूमि
वहाँ वह सिर्फ बैठता नहीं था…
वह सुनता था।
एक दिन ध्यान में उसे एक आवाज़ सुनाई दी—
“हम एलियन्स हैं…
लेकिन हम कहीं और नहीं…
तुम्हारे बीच ही हैं…”
अशोक चौंका नहीं…
जैसे वह पहले से जानता हो।
👁️ सच का खुलासा
आवाज़ फिर आई—
“हम वो हैं जिन्हें तुम पागल कहते हो,
जिनको समाज अपनाता नहीं,
जिनकी बातों को दबा दिया जाता है…”
अशोक की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसे समझ आ गया—
👉 एलियन्स कोई और नहीं…
👉 वह खुद भी उनमें से एक है।
⚖️ समाज और सच्चाई
अब उसकी सोच और स्पष्ट हो चुकी थी—
जो सच्चा है, वह अकेला है
जो गहरा सोचता है, वह अलग है
और जो अलग है… वही “एलियन” है
उसने डायरी में अंतिम पंक्ति लिखी—
“शायद एक दिन…
यह दुनिया एलियन्स को समझेगी…
या फिर… सब एलियन बन जाएंगे।”
और....
मकान पर आकर वह लिखने लगा था कि...
ऐसा नहीं है कि एलियन्स नहीं हैं?हैं लेकिन हम भी उनके लिए एलियन्स हैं क्योंकि उनके लिए यह दूसरी धरती है.
अशोक अब "राजकीय स्नात्तकोत्तर महाविद्याल, बीसलपुर "में स्नातक का छात्र था. जुलाई 1900ई के लगभग।
वह एक दिन मित्र सुनील संवेदी की दुकान पर था और कुछ लोगों के साथ एलियन्स की चर्चा में था.
वह बोला मैं तो विश्वस्त हूं कि एलियन्स हैं लेकिन वे हम सबकी नजरों से छिपे हुए हैं.
"क्यों, ऐसा क्यों?!"
"ऐसे ही समझो कि परिवार,वार्ड, गांव व नगर में जैसे सहज व्यक्ति का जीना मुश्किल होता है."
फिर अशोक डायरी निकाल कुछ लिखने लगा.
"समझा नहीं!"
"ऐसे कि जैसे सीधे साधे, विचारवान, किताबों के ज्ञान में सर्च करने वाले, सोचने वाले को शांति से अपना काम करना पड़ता है. हर व्यक्ति व समाज उसके साथ नहीं खड़ा होता?!"
फिर अशोक सोचने लगा....
"जब तक दुनिया में सत्ता व राजनीति का प्रभाव न था, विश्व व्यापार का प्रभाव न था तब तक ठीक था लेकिन अब तो सच्चे को जीना ही मुश्किल है? किसी को सूली, किसी को जहर, किसी को झूठी बदनामी... और किसी का जीवन ही सजा हो जाये लेकिन उनके मरने के बाद उनके परिजन v समाज के लोग उन के तस्बीर को ताख में रख धंधा करने लगें?!"
उसके मित्र सुनील संवेदी की दुकान रामलीला मार्ग पर बीसलपुर के मोहल्ला दुर्गा प्रसाद में थी.
जहां पड़ोस में जनता इंटर कालेज!
उसके फील्ड में सुबह या शाम अशोक पहुंच आँख बंद कर बैठता था.
कभी कभी वह रामलीला मैदान में स्थित गुलेश्वर नाथ बाबा मंदिर के पीछे पीपल के वृक्ष नीचे आँख बंद कर बैठता था.
जहाँ उत्तर अमरा क़ासिम पुर जाने वाले मार्ग पर एक दिव्य स्थान पर भी जाता था.
काफी आगे उत्तर बाबा कालसे महाराज वह वहाँ भी जाया करता था.
इन स्थानों पर वह आँख बंद कर ही नहीं बैठता था वरन लेखन कार्य भी करता था.
अब वह साइंस स्टूडेंट्स से आर्ट स्टूडेंट्स ग्रुप में था लेकिन उसकी रूचि साइंस में कम न थी और वह भी एक अहसास, चिंतन के साथ प्रकृति, साहित्य, अध्यात्म सदेशों के साथ, ध्यान पद्धतियों में रूचि के साथ।
गुरुवार, 18 जून 2026
त्वचा से प्रकाशिय भोजन?!
किशोर अशोक की आँखों में हमेशा कुछ अलग चमक होती थी। वह साधारण गाँव-शहर का एक लड़का था, लेकिन उसके भीतर जैसे कोई असाधारण संसार पल रहा था। कक्षा आठ में ही उसने लिखना शुरू कर दिया था—कविताएँ, छोटे-छोटे विचार, और कभी-कभी ऐसे सपनों का वर्णन जो किसी और के लिए कल्पना मात्र होते।
एक रात, जब आकाश में तारे कुछ ज्यादा ही स्पष्ट दिखाई दे रहे थे, अशोक ने एक अजीब स्वप्न देखा।
वह खुद को अंतरिक्ष में तैरता हुआ पाता है—पृथ्वी से करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर। वहाँ एक विचित्र ग्रह था—“हा हा हूस!”
उस ग्रह की धरती पर विशालकाय जीव विचरण कर रहे थे, जो पृथ्वी के डायनासोर जैसे लगते थे, पर उनसे भी अधिक विकसित।
लेकिन असली आश्चर्य वहाँ के वैज्ञानिक थे—कुछ मानव जैसे, कुछ बिल्कुल अलग—एलियन्स। वे मिलकर एक अद्भुत प्रयोग कर रहे थे।
उनका लक्ष्य था—मानव त्वचा को ऐसा बनाना कि वह सीधे सूर्य की रोशनी से भोजन बना सके!
अशोक ने देखा—एक मनुष्य को एक कक्ष में रखा गया है। उसकी त्वचा में सूक्ष्म परिवर्तन किए जा रहे हैं। धीरे-धीरे उसकी त्वचा हरी-सी चमकने लगती है, जैसे पत्तियाँ।
एलियन वैज्ञानिक मुस्कुरा रहे थे—“अब मानव भूख से मुक्त होगा… वह प्रकृति के और करीब होगा…”
अचानक एक आवाज़ गूँजी—
“अशोक! यह केवल विज्ञान नहीं, यह भविष्य का संकेत है…”
और उसी क्षण उसकी नींद खुल गई।
सन 1989
देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी। समाज और राजनीति में उथल-पुथल थी, लेकिन अशोक के भीतर एक अलग ही हलचल थी।
वह कक्षा 11 में था। एक दिन शाम के समय, अपने मित्र जसकरण सिंह के साथ वह “विज्ञान प्रगति” पत्रिका पढ़ रहा था।
“देखो ये—‘हम सुझाएँ, आप बनाएं!’” जसकरण ने उत्साह से कहा।
दोनों ने मिलकर योजना बनाई—कुछ नया करेंगे, कुछ प्रयोग करेंगे।
उनका दिमाग विज्ञान के नए-नए विचारों से भरा रहता था।
अशोक ने हिचकते हुए कहा—
“अगर इंसान की त्वचा भी पेड़-पौधों की तरह हो जाए तो…?”
जसकरण हँस पड़ा—“तू भी ना, अशोक! ये तो फिल्मी बात है।”
लेकिन अशोक चुप रहा। उसे अपने स्वप्न की हर बात याद थी।
समय बीतता गया।
इंटर के बाद जब विषय चुनने का समय आया, तो जीवन ने एक मोड़ लिया।
अशोक ने विज्ञान छोड़कर कला वर्ग चुन लिया।
सबको आश्चर्य हुआ—
“इतना साइंस में रुचि, और अब आर्ट्स?”
लेकिन अशोक के भीतर कुछ बदल चुका था।
अब वह केवल प्रयोग नहीं, अनुभव भी समझना चाहता था।
वह ध्यान (मेडिटेशन) करने लगा।
उसके स्वप्न और भी गहरे होने लगे।
कभी वह खुद को तारों के बीच पाता,
कभी किसी अनजान भाषा को समझने लगता,
कभी ऐसा महसूस करता जैसे कोई उसे भीतर से मार्ग दिखा रहा हो।
एक दिन ध्यान में उसे फिर वही ग्रह दिखा—“हा हा हूस!”
इस बार एलियन्स ने उससे सीधे संवाद किया—
“तुम्हारी पृथ्वी अभी तैयार नहीं है… लेकिन तुम्हारे जैसे कुछ लोग हैं जो पुल बनेंगे—विज्ञान और चेतना के बीच…”
अशोक ने पूछा—
“क्या सच में ऐसा संभव है कि मानव धूप से जी सके?”
उत्तर आया—
“जब वह प्रकृति से अलग नहीं, उसका हिस्सा बन जाएगा—तब सब संभव है।”
धीरे-धीरे अशोक को विश्वास हो गया—
कि ब्रह्मांड में हम अकेले नहीं हैं।
और जो स्वप्न वह देखता है, वे केवल कल्पना नहीं, किसी गहरे सत्य की झलक हैं।
उसने लिखना शुरू किया—
अपने स्वप्न, अपने अनुभव, अपने प्रश्न…
लोगों ने उसे कभी पागल कहा,
कभी दार्शनिक,
कभी स्वप्नद्रष्टा।
लेकिन अशोक जानता था—
उसकी यात्रा अभी शुरू हुई है।
क्योंकि कहीं न कहीं, करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर,
“हा हा हूस!” पर
वह प्रयोग अभी भी जारी था…
और शायद एक दिन—
मानव सच में प्रकाश से जीवन जीना सीख जाएगा।
बुधवार, 17 जून 2026
किशोर अशोक डायनसोर की धरती पर?!
इस धरती से करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर एक धरती जिसका नाम -"हा हा हूस!"
जहां डायनसोर व अन्य विशालकाय जानवर!!
जब अशोक किशोर अवस्था में था तभी उसने उस धरती का अहसास किया था।
जहाँ एक पहाड़ी में एक प्रयोगशाला जिसमें इस धरती के कुछ वैज्ञानिक कार्य कर रहे थे।
एक दिन किशोर अशोक का सूक्ष्म शरीर वहाँ पहुंचता है।
वह विशालकाय नागों को देख डर जाता है। एक नाग उसकी ओर बढ़ता है।
वह काफी तेजी से भागता है और एक झाड़ी में फंस जाता है।
लेकिन वह झाड़ी तो मांसाहारी थी जो उसके शरीर से कहीं कहीं चिपकने लगती है और खून चूसने लगती है। अपनी पूरी दम लगा कर वह बल दे उछल झाड़ी से बाहर आ जाता है।
"अरे!यह तो स्वप्न था?" -वह अपने को विस्तर पर लेटे पाता है।
सुबह हो चुकी थी. विस्तर से उठ कर वह दैनिक कार्यों से निपट स्कूल जाने को तैयार हो गया.
वह अपनी दोनों बहिनों और एक भाई के साथ स्कूल पहुंचा.
स्कूल का नाम... "हरित क्रांति विद्या मंदिर, हरित नगर, बीसलपुर (पीलीभीत ), उत्तर प्रदेश.
स्कूल के गेट पर एक अधेड़ टीचर धोती कुर्ता पहने खडे थे।
अशोक व उसके भाई अवनीश ने उनके पैर छुए और आगे जाकर अंदर बढ़ गये.
जहाँ दायी ओर झोपड़ी व बायीं ओर पक्का आफिस बना था.
उसके बाद भी एक गेट, जिसके अंदर बच्चे जा रहे थे।
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