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सोमवार, 31 अगस्त 2026

खंडहरों में बची हुई पुस्तकें?!

खंडहरों में बची हुई पुस्तक सन 2164 ई० की एक सर्द संध्या। घने जंगल के बीच एक प्राचीन किले का खंडहर था। कभी उस किले को बेकार पत्थरों का ढेर समझा गया था, लेकिन अब उसकी मोटी दीवारें तूफानों, गर्म हवाओं और हिंसक संघर्षों से लोगों की रक्षा कर रही थीं। नीचे वर्षा का पानी जमा करने के कुंड बनाए गए थे। आसपास वनस्पतियाँ उगाई जा रही थीं। उसी खंडहर में कुछ बुजुर्ग आग के चारों ओर बैठे थे। उनके बीच एक पुरानी पुस्तक रखी थी— “एक और भविष्य कथांश?!” लेखक—अशोक कुमार वर्मा ‘बिंदु’
पुस्तक के पृष्ठ पीले पड़ चुके थे, मगर उसके प्रश्न अभी जीवित थे। बुजुर्ग राज ने पुस्तक उठाते हुए कहा— “कभी लोगों की निगाह इस पुस्तक पर थी। कुछ इसे चेतावनी मानते थे, कुछ कल्पना और कुछ अशोक सर की निराशा।” एक महिला ने पूछा, “इसमें ऐसा क्या लिखा था?” राज ने पहला पृष्ठ खोला और पढ़ना प्रारम्भ किया। कलि कोई बाहर बैठा राक्षस नहीं था पृथु महि पर कुछ प्रभावशाली समूहों ने धन, सूचना, तकनीक और प्राकृतिक संसाधनों पर बड़ा नियंत्रण स्थापित कर लिया था। जनता भौतिक सुविधाओं में उलझी हुई थी। दल और नेता भी उन्हीं व्यवस्थाओं से लाभ पाते थे। लोग नेताओं के नाम पर लड़ते रहे, लेकिन व्यवस्था की दिशा पर प्रश्न कम करते थे। प्राकृतिक आपदाओं, युद्धों और हिंसा के कारण बहुत से लोग विस्थापित हो चुके थे। हिमालय, उत्तराखंड, बिहार और पूर्वोत्तर के अनेक क्षेत्रों में जीवन कठिन होता जा रहा था। सन 2016–17 से अशोक सर कहते थे— “संहारक शक्तियों की गति बढ़ रही है। राक्षस कलि मनुष्यों के दिमाग पर बैठ चुका है।” खंडहर में बैठा एक युवक बीच में बोल पड़ा— “क्या वे सचमुच किसी राक्षस की बात करते थे?” बुजुर्ग राज ने समझाया— “उनकी भाषा प्रतीकात्मक थी। ‘कलि’ मनुष्य के भीतर का लोभ, भय, घृणा, अहंकार और संवेदनहीनता था। जब अधिकांश लोग इन्हीं प्रवृत्तियों से संचालित होने लगें, तो ऐसा लगता है जैसे कोई अदृश्य शक्ति पूरी सभ्यता को नियंत्रित कर रही हो।” “और शून्य योग?” “शून्य योग का आशय अपनी चेतना को कुछ समय जाति, मजहब, दल, कर्मकांड और निजी स्वार्थ के शोर से खाली करना था। अशोक सर और निशांत सर चाहते थे कि मनुष्य पहले अपने भीतर उठते विकारों को देखे।” लेकिन उस दौर में पढ़े-लिखे लोग भी उनका उपहास करते थे। कोई कहता, “ध्यान करने से पहाड़ बचेंगे क्या?” निशांत सर उत्तर देते— “ध्यान अपने आप पहाड़ नहीं बचाता। लेकिन यदि मनुष्य का लोभ नियंत्रित नहीं हुआ, तो वह विज्ञान और तकनीक का प्रयोग भी विनाशकारी ढंग से करेगा। आंतरिक विवेक और बाहरी विज्ञान—दोनों की आवश्यकता है।” सन 2147 ई०—डूबी मुंबई के ऊपर खंडहर में बैठे बुजुर्गों के सामने एक पुराना दृश्य-यंत्र चालू किया गया। समुद्र में डूबी मुंबई के ऊपर एक उड़नतश्तरी उड़ रही थी। उसके भीतर तीन नेत्रधारी वृद्ध सजाकदक्फक्फ और युवा शोधार्थी तिराश्मिका पृथु महि का इतिहास देख रहे थे। तिराश्मिका ने पूछा— “क्या अशोक सर सन 1990 में मुंबई के डूबने के स्वप्न देखने लगे थे?” सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया— “उनकी पुस्तकों में ऐसी आशंकाओं का उल्लेख मिलता है। लेकिन स्वप्न को वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता। वह उनके मन में उठी चेतावनी या प्रतीकात्मक अनुभूति हो सकती थी।” “फिर उन्होंने सन 2100 से पहले मुंबई के डूबने की घोषणा क्यों की?” “क्योंकि वे समुद्र के बढ़ते स्तर, तटीय अतिक्रमण, अत्यधिक निर्माण और जलवायु-संकट से चिंतित थे। उनकी बात का सार यह था कि कोई भी नगर प्रकृति की सीमा से बड़ा नहीं हो सकता।” युवती ने समुद्र के नीचे स्कैन किया। सात प्राचीन द्वीपों की रूपरेखा दिखाई दी। कभी उन्हें भूमि-पुनर्निर्माण, बाँधों और कॉज़वे से जोड़कर विशाल मुंबई बनाई गई थी। “यदि वे सातों द्वीप अलग रहते तो क्या मुंबई बच जाती?” उसने पूछा। वृद्ध ने कहा— “यह निश्चित नहीं। समुद्र-स्तर बढ़ने और तूफानों से उन्हें भी खतरा रहता। पर जनसंख्या, निर्माण और तटीय पारिस्थितिकी का स्वरूप अलग हो सकता था। मूल प्रश्न द्वीप जोड़ने का नहीं, विकास की सीमा भूल जाने का था।” तिराश्मिका ने अभिलेख में अशोक सर को पांडुलिपियों के बीच बैठे देखा। “वे इतने बेचैन क्यों थे?” “उन्हें लगता था कि शरीर का समय कम है और लिखे हुए विचार अभी जनता तक नहीं पहुँचे। वे अधिक से अधिक पुस्तकें प्रकाशित करना चाहते थे। वे अपना नाम ही नहीं, अपने प्रश्न भविष्य के लिए बचाना चाहते थे।” अतीत की मूर्तियों पर हँसती पीढ़ी पृथु महि के दूसरे भाग में बचे हुए लोग जंगलों, किलों और खंडहरों में आश्रय ले चुके थे। पुरानी सभ्यता के भव्य नगर असुरक्षित हो गए थे, जबकि कभी उपेक्षित दुर्गम क्षेत्र जीवन बचाने के साधन बने। कुछ बच्चे एक टूटी हुई मूर्ति के सामने खड़े थे। एक बालक बोला— “अतीत के लोग अपनी मूर्तियाँ बनाते रहे, लेकिन नदियाँ, वन और पहाड़ नहीं बचा सके!” दूसरा हँसने लगा। पास खड़ी बुजुर्ग अनंता ने उन्हें रोक दिया। “मूर्ति का उपहास मत करो। पत्थर ने प्रकृति का विनाश नहीं किया। मनुष्य के गलत निर्णयों ने किया। अतीत में भी सभी लोग दोषी नहीं थे। अनेक वैज्ञानिक, किसान, आदिवासी, साधक और लेखक लगातार चेतावनी दे रहे थे।” “फिर उनकी बात क्यों नहीं सुनी गई?” “क्योंकि तत्काल लाभ की आवाज भविष्य की धीमी चेतावनी से अधिक आकर्षक लगती थी।” राज ने कहा— “अतीत को दोष देना आसान है। कठिन यह पूछना है कि यदि वही लोभ आज हमारे भीतर आ गया, तो क्या हम भी वही भूल नहीं दोहराएँगे?” खंडहर में मौन छा गया। पुस्तक का भयानक अध्याय राज ने पुस्तक का अगला अध्याय खोला। शीर्षक था— “फरवरी 2165 ई०—क्या पृथु महि चटक जाएगी?” पुस्तक में एक भयावह कल्पना लिखी थी—24 फरवरी को एक तीव्र भूकम्प से सूरत, हरिद्वार, उत्तरकाशी, मानसरोवर और चीन से होते हुए कोरियाई क्षेत्र तक भूमि चटक गई। बाँध टूटे, बाढ़ आई और अरब सागर से प्रशांत महासागर तक एक नया समुद्री मार्ग बन गया। भारतीय भूभाग पूर्व की ओर खिसक गया तथा म्यांमार और वियतनाम विनाश के साक्षी बने। पढ़ते-पढ़ते राज रुक गया। एक बुजुर्ग ने भयभीत होकर पूछा— “आज सन 2164 है। पुस्तक में तो यह घटना लगभग एक वर्ष बाद लिखी है! क्या यह सच होने वाली है?” राज ने पुस्तक बंद कर दी। “नहीं। हमें किसी कथा को निश्चित वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं मानना चाहिए। पृथ्वी की विशाल भू-पट्टियाँ चलती अवश्य हैं, पर सामान्यतः उनकी गति प्रतिवर्ष कुछ सेंटीमीटर होती है। इतने लंबे भूभाग का एक ही दिन में चटककर नया महासागर बन जाना कथा की अतिरंजित कल्पना है।” “तो लेखक ने ऐसा क्यों लिखा?” “क्योंकि कभी-कभी साहित्य आने वाली आपदा का सही नक्शा नहीं, बल्कि वर्तमान लापरवाही का बड़ा दर्पण बनाता है। यह अध्याय कहता है—यदि मनुष्य प्रकृति का अंधविदोहन करता रहा, तो परिणाम उसकी कल्पना से भी बड़े हो सकते हैं।” एक अन्य बुजुर्ग बोला— “और भूकम्पों के लिए मनुष्य को दोषी मानना?” राज ने उत्तर दिया— “प्रमुख भूकम्प विवर्तनिक प्लेटों की प्राकृतिक गति से आते हैं। मनुष्य उनका मूल कारण नहीं है। लेकिन खनन, बड़े जलाशय, भूमिगत द्रव निकालने या भरने जैसी गतिविधियाँ कुछ क्षेत्रों में छोटे अथवा प्रेरित भूकम्पों का जोखिम प्रभावित कर सकती हैं। सबसे बड़ी मानवीय भूल असुरक्षित निर्माण और संवेदनशील भूभाग की उपेक्षा है, जिससे प्राकृतिक घटना महाविपत्ति बन जाती है।” कुशक्तियों को क्या मिला? पुस्तक की कथा में कुछ लोग मानते थे कि दुनिया को विभाजित करने वाली “कुशक्तियों” ने भूगर्भीय संकट का लाभ उठाया था। उन्होंने भय के बीच शासन, संसाधनों और जनसंख्या पर अधिक नियंत्रण स्थापित कर लिया। लेकिन विनाश के बाद उनके पास भी क्या बचा? बाजार थे, पर ग्राहक नहीं। महल थे, पर सुरक्षित भूमि नहीं। मुद्रा थी, पर स्वच्छ जल नहीं। तकनीक थी, पर विश्वास नहीं। निशांत सर की पुरानी आवाज अभिलेख से सुनाई दी— “जो शक्ति जीवन की रक्षा नहीं कर सकती, वह अंततः शक्तिहीनता है। दूसरों को जकड़ने वाला व्यक्ति स्वयं भी उसी जाल में फँस जाता है।” खंडहर में बैठी महिला ने कहा— “इसलिए प्रश्न यह नहीं कि कुशक्तियाँ जीतीं या हारीं। प्रश्न यह है कि उनके संघर्ष में जन, धन और प्रकृति नष्ट हुई।” सुनामी—प्रकृति या षड्यंत्र? पुस्तक में 2004 की सुनामी का उल्लेख भी था। कुछ पात्र संदेह करते थे कि वह किसी गुप्त शक्ति की हरकत थी। इस पर बुजुर्ग राज ने स्पष्ट किया— “26 दिसम्बर 2004 की हिंद महासागर सुनामी समुद्र के नीचे आए अत्यंत शक्तिशाली भूकम्प के कारण उत्पन्न प्राकृतिक घटना थी। किसी कृत्रिम षड्यंत्र का विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला। बड़ी त्रासदी के बाद अफवाहें इसलिए फैलती हैं क्योंकि मनुष्य असाधारण घटना के लिए किसी दिखाई देने वाले अपराधी को खोजता है।” “लेकिन प्रकृति का अंधविदोहन?” “वह वास्तविक चिंता है। अंधाधुंध तटीय निर्माण, मैंग्रोव विनाश और कमजोर आपदा-तैयारी सुनामी या चक्रवात के प्रभाव को गंभीर बना सकते हैं। प्राकृतिक घटना और मानवीय असावधानी को अलग-अलग समझना आवश्यक है।” सन 1947 और एलियन्स का प्रश्न पुस्तक के अंतिम भाग में लिखा था कि सन 1947 में कुछ शक्तियों ने एलियन्स से संपर्क किया और फिर पृथ्वी तथा अंतरिक्ष में साजिशें रचने लगीं। तिराश्मिका ने उड़नतश्तरी में सजाकदक्फक्फ से यही प्रश्न पूछा था— “क्या सन 1947 में मनुष्यों और एलियन्स के बीच कोई समझौता हुआ था?” वृद्ध ने कहा— “ऐसी कथाएँ पृथु महि की लोककल्पनाओं में प्रचलित थीं, पर उनका प्रमाणित ऐतिहासिक या वैज्ञानिक आधार नहीं मिला। अज्ञात उड़ती वस्तु देखने का अर्थ अपने आप बाहरी ग्रह का अंतरिक्षयान नहीं होता।” “तो अशोक सर ने एलियन्स को क्यों जोड़ा?” “शायद वे मनुष्य के अहंकार को ब्रह्मांड के विशाल परिप्रेक्ष्य में रखना चाहते थे। एलियन उनकी कथा में कभी बाहरी जीव था, कभी बाहरी नियंत्रण का प्रतीक और कभी मनुष्य से अधिक दूरदर्शी सभ्यता की कल्पना।” “और हमारे तीन नेत्र?” सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया— “तीसरा नेत्र केवल शरीर पर उपस्थित अंग नहीं—वह परिणाम देखने वाली दृष्टि है। पृथु महि का मनुष्य बुद्धिमान था, लेकिन उसने अक्सर दूरदृष्टि का उपयोग नहीं किया।” फरवरी 2165 का आगमन समय बीतता गया। पुस्तक में लिखी तारीख निकट आ गई। 24 फरवरी 2165 की सुबह खंडहर के सभी लोग सतर्क थे। उन्होंने भय फैलाने के बजाय जल, भोजन, औषधि, संचार और सुरक्षित स्थानों की तैयारी की। भूवैज्ञानिक उपकरणों से प्राप्त सूचनाएँ सुनी गईं। बच्चों को अफवाह और प्रमाण का अंतर समझाया गया। दिन बीता। पुस्तक में वर्णित महाविभाजन नहीं हुआ। एक बालक बोला— “तो भविष्यवाणी गलत थी?” राज मुस्कराया— “घटना सच नहीं हुई, लेकिन चेतावनी व्यर्थ भी नहीं हुई। उसके कारण हमने तैयारी की, भूगोल समझा और अपने लालच पर प्रश्न उठाया। कथा का उद्देश्य भय में जीना नहीं, जागरूक होकर वर्तमान को सुधारना है।” अनंता ने पुस्तक के अंतिम खाली पृष्ठ पर लिखा— भविष्य पहले से लिखा हुआ दंड नहीं है। वह वर्तमान के ज्ञान, कर्म और सामूहिक चुनाव से बनती हुई संभावना है। खंडहर के बाहर नए पौधे उग रहे थे। किले की दीवारों पर सौर उपकरण लगे थे। वर्षाजल कुंड भरे हुए थे। जंगल को काटे बिना छोटी बस्ती विकसित की जा रही थी। दूर आकाश में उड़नतश्तरी एक चमकते बिंदु की तरह दिखाई दी। सजाकदक्फक्फ ने तिराश्मिका से कहा— “पृथु महि का मनुष्य तब जागेगा, जब वह हर अज्ञात घटना को षड्यंत्र और हर आपदा को दैवी दंड कहना छोड़कर प्रमाण, आत्मचिंतन और उत्तरदायित्व—तीनों को साथ रखेगा।” तिराश्मिका ने नीचे नई बस्ती देखी। “तो अशोक सर की पुस्तक भविष्य का नक्शा नहीं थी?” वृद्ध बोला— “नहीं। वह भविष्य के द्वार पर लगाया गया एक प्रश्नचिह्न थी।” और खंडहर में बैठे बुजुर्गों को पहली बार पुस्तक के शीर्षक का अर्थ समझ आया— “एक और भविष्य कथांश?!” में विस्मयादिबोधक से अधिक महत्वपूर्ण वह प्रश्नचिह्न था, जो पूछ रहा था— क्या मनुष्य अपने भीतर बैठे कलि को पहचानकर विनाश की दिशा बदल सकता है? उत्तर किसी एलियन, नेता अथवा अदृश्य शक्ति के पास नहीं था। उत्तर पृथु महि के प्रत्येक जागरूक मनुष्य के वर्तमान कर्म में छिपा था।

समुद्र के ऊपर उड़ता इतिहास?!

समुद्र के ऊपर उड़ता इतिहास अब सन 2147 था।
एक चमकीली उड़नतश्तरी उस स्थान के ऊपर उड़ रही थी जहाँ कभी मुंबई का विशाल महानगर था। नीचे समुद्र का अथाह विस्तार था। कहीं-कहीं पुरानी ऊँची इमारतों के अवशेष जल से बाहर झाँक रहे थे। शेष नगर समुद्र, गाद और नई समुद्री वनस्पतियों के नीचे छिप चुका था। उड़नतश्तरी के भीतर तीन नेत्रों वाला वृद्ध इतिहासवेत्ता सजाकदक्फक्फ बैठा था। उसके सामने तीन नेत्रधारी युवती तिराश्मिका पृथु महि के पुराने अभिलेख पढ़ रही थी। उसने पूछा— “क्या अशोक सर ने सन 1990 में ही मुंबई के डूबने का सपना देखा था?” वृद्ध ने उत्तर दिया— “उनकी कुछ पुस्तकों में ऐसे स्वप्न और आशंकाओं का उल्लेख मिलता है। लेकिन स्वप्न वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होता। उसे भविष्य की निश्चित घोषणा के बजाय किसी संवेदनशील मन की चेतावनी समझना अधिक उचित है।” “फिर उन्होंने सन 2100 से पहले मुंबई के डूबने की बात क्यों कही?” “क्योंकि वे समुद्र के बढ़ते स्तर, तटीय अतिक्रमण, जलवायु परिवर्तन और मनुष्य की विकास-दृष्टि को लेकर चिंतित थे। उनकी भाषा भविष्यवाणी जैसी थी, पर उसके भीतर एक प्रश्न छिपा था—क्या मनुष्य प्रकृति को जीतने के भ्रम में अपने ही नगरों को असुरक्षित कर रहा है?” तिराश्मिका ने अगला अभिलेख खोला। उसमें एक छोटा-सा कमरा दिखाई दिया। चारों ओर पांडुलिपियों के ढेर रखे थे और अशोक सर बेचैनी से उन्हें सँभाल रहे थे। “उन्हें सन 2023 तक समाज से काफी उम्मीदें थीं,” वृद्ध ने बताया, “लेकिन जब लोगों ने विचारों की अपेक्षा प्रचार और मनोरंजन को अधिक महत्व दिया, तो वे निराश हुए। वे गुप्त रूप से लिखते रहे। उनकी बेचैनी यह थी कि देहांत से पहले अधिक से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो जाएँ।” “क्या वे अपना नाम बचाना चाहते थे?” “शायद नाम से अधिक प्रश्नों को बचाना चाहते थे। लेखक जानता है कि उसका शरीर समाप्त होगा, पर लिखे हुए प्रश्न दूसरी पीढ़ी के विवेक को जगा सकते हैं।” समुद्र के नीचे सात द्वीप सजाकदक्फक्फ ने एक उपकरण सक्रिय किया। समुद्र के नीचे छिपी धरती का त्रिआयामी मानचित्र सामने आ गया। सात अलग-अलग भूभाग चमक उठे— माहिम, वर्ली, परेल, मझगांव, बॉम्बे द्वीप, कुलाबा और लिटिल कुलाबा। तिराश्मिका आश्चर्य से बोली— “तो मुंबई वास्तव में सात द्वीपों का समूह थी?” “हाँ। भूमि-पुनर्निर्माण, बाँधों और कॉज़वे द्वारा इन्हें धीरे-धीरे जोड़कर एक महानगर बनाया गया। यह मनुष्य के निर्माण-कौशल का उदाहरण था, लेकिन साथ ही समुद्र के स्वाभाविक क्षेत्र में बड़े हस्तक्षेप की कहानी भी।” “यदि इन्हें कभी जोड़ा ही न गया होता तो?” वृद्ध ने एक काल्पनिक दृश्य उत्पन्न किया। सातों द्वीपों पर अलग-अलग छोटी बस्तियाँ थीं। उनके बीच जल-बसें और नौकाएँ चल रही थीं। मैंग्रोव की चौड़ी पट्टियाँ तूफानी लहरों को कमजोर कर रही थीं। हर द्वीप की आबादी और भवनों की ऊँचाई सीमित थी। वृद्ध बोला— “तब जीवन संभवतः ऐसा होता— द्वीपों के बीच नावें, जलमार्ग और सीमित पुल प्रमुख साधन होते। भूमि कम होने के कारण जनसंख्या और उद्योगों पर नियंत्रण आवश्यक होता। बंदरगाहों का विकास अलग ढंग से होता। मैंग्रोव और ज्वारीय क्षेत्र अधिक सुरक्षित रह सकते थे। आवागमन कठिन और महँगा भी हो सकता था। तूफानों के समय प्रत्येक द्वीप के लिए स्वतंत्र सुरक्षा-व्यवस्था चाहिए होती।” “तो क्या सात द्वीपों वाला मुंबई पूरी तरह सुरक्षित रहता?” “नहीं। प्रकृति में पूर्ण सुरक्षा नहीं होती। लेकिन यदि विकास समुद्र के स्वभाव को समझकर किया जाता, तो नुकसान कम किया जा सकता था। समस्या केवल द्वीपों को जोड़ना नहीं थी; समस्या यह थी कि बाद की पीढ़ियों ने निर्माण की सीमा पहचानना छोड़ दिया।” मूर्तियों से प्रश्न करती नई पीढ़ी उधर पृथु महि पर बचे हुए लोग किलों, खंडहरों, गुफाओं और जंगलों के दुर्गम क्षेत्रों में छोटी-छोटी बस्तियाँ बना चुके थे। जिन स्थानों को पुरानी सभ्यता पिछड़ेपन का प्रतीक मानती थी, वही अब आश्रय बने हुए थे। एक पुराने किले में बच्चों का समूह अतीत की मूर्तियाँ देख रहा था। किसी मूर्ति के हाथ में तलवार थी, किसी के सिर पर मुकुट और किसी के नीचे लिखा था—“महान विकास-पुरुष।” एक किशोर हँसते हुए बोला— “इन लोगों ने अपनी इतनी विशाल मूर्तियाँ बनवाईं, लेकिन नदियों और जंगलों को क्यों नहीं बचाया?” दूसरी बालिका ने कहा— “जिन्होंने पृथ्वी को संकट में डाला, उन्हें महान क्यों कहा गया?” पास बैठे बुजुर्ग राज ने दोनों को रोक दिया। “मूर्तियों का उपहास करके तुम अतीत की भूल नहीं सुधार सकते। पत्थर न दोषी है, न महान। प्रश्न उन विचारों और कर्मों का है जिनका वह प्रतीक बनाया गया।” “तो हम अतीत के मनुष्य को दोष न दें?” बालिका ने पूछा। राज ने कहा— “उससे प्रश्न अवश्य करो, पर याद रखो—उस समय भी चेतावनी देने वाले लोग मौजूद थे। वैज्ञानिक, पर्यावरणविद्, किसान, आदिवासी, लेखक और साधक लगातार कहते रहे कि प्रकृति साधन मात्र नहीं है। गलती पूरी प्रजाति की नहीं, उस सामूहिक चुनाव की थी जिसमें सुविधा को उत्तरदायित्व से ऊपर रखा गया।” एक बच्चे ने पूछा— “क्या राक्षस कलि ने सबको नियंत्रित कर लिया था?” राज मुस्कराया— “राक्षस कलि मनुष्य के बाहर बैठा कोई राजा नहीं था। वह भीतर की वह अवस्था थी जिसमें सत्य मालूम होने के बाद भी मनुष्य सुविधा के कारण गलत व्यवस्था का साथ देता है। जब लोभ सामूहिक हो जाए तो वह व्यवस्था बन जाता है; जब करुणा सामूहिक हो जाए तो वही नई सभ्यता बन सकती है।” तीसरे नेत्र का वास्तविक अर्थ उड़नतश्तरी में तिराश्मिका ने अपना तीसरा नेत्र बंद किया और पूछा— “क्या हम तीन नेत्रधारी इसलिए बच गए क्योंकि हमारी जाति अधिक विकसित थी?” सजाकदक्फक्फ ने कहा— “तीसरा नेत्र शरीर का अतिरिक्त अंग मात्र नहीं। उसका वास्तविक अर्थ दूरदृष्टि है—कर्म के तत्काल लाभ के साथ उसके दूरगामी परिणाम देखना। पृथु महि के पुराने मनुष्यों के दो नेत्र खुले थे, पर दूरदृष्टि अक्सर बंद थी।” नीचे समुद्र की लहरें उन सात द्वीपों की पुरानी सीमाओं पर घूम रही थीं। ऐसा लगता था जैसे प्रकृति मनुष्य द्वारा मिटाया गया अपना मानचित्र फिर बना रही हो। वृद्ध ने अंतिम अभिलेख खोला। उसमें अशोक सर की आवाज सुनाई दी— “शून्य होना मिट जाना नहीं है। शून्य होना अपने अहंकार, लोभ और पूर्वाग्रह को कुछ समय शांत करना है। इसी शून्य में मनुष्य को पृथ्वी की आवाज सुनाई दे सकती है।” तिराश्मिका ने पूछा— “क्या पृथु महि का मनुष्य असफल हो गया था?” सजाकदक्फक्फ ने किले और जंगलों में बसते नए समुदायों की ओर देखा। “पूरी तरह नहीं। जब तक कोई बच्चा अतीत से प्रश्न करता है, कोई मनुष्य वृक्ष लगाता है, कोई समुदाय जल बचाता है और कोई साधक अपने भीतर के कलि को पहचानता है—तब तक सुधार की संभावना जीवित रहती है।” उड़नतश्तरी समुद्र से ऊपर उठने लगी। नीचे डूबी मुंबई थी, दूर सुरक्षित खंडहरों में नई बस्तियाँ थीं और उनके बीच इतिहास का एक गंभीर संदेश गूँज रहा था— सभ्यता मूर्तियों, इमारतों और बाजारों से महान नहीं बनती। वह इस बात से महान बनती है कि उसके बीच सबसे कमजोर मनुष्य, जीव-जंतु, नदी, जंगल और आने वाली पीढ़ी कितनी सुरक्षित है। और शायद सात द्वीप भी यही कह रहे थे— “मनुष्य ने हमें जोड़कर एक नगर बनाया, लेकिन स्वयं विभाजित रहा। नई सभ्यता तभी बचेगी, जब वह धरती को जीतने के बजाय उसके साथ जीना सीखेगी।”

पृथु-मही के ऊपर उड़ती तश्तरी?!

पृथु-मही के ऊपर उड़ती तश्तरी सन 2100 ईस्वी।
अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसी दिखाई देने वाली एक नई दुनिया चमक रही थी। वहाँ के निवासियों ने उसका नाम “पृथु-मही” रखा था। उसके नीले वातावरण के ऊपर एक उड़नतश्तरी शांत गति से चक्कर लगा रही थी। तश्तरी के पारदर्शी कक्ष में दो त्रिनेत्री यात्री बैठे थे—वृद्ध सनड्रेक्सन और उसकी शिष्या अनंता। उनके तीन नेत्र केवल शारीरिक अंग नहीं थे। पहला नेत्र दृश्य जगत को, दूसरा इतिहास को और तीसरा किसी निर्णय के दूरगामी परिणाम को देखने का प्रतीक था। अनंता ने नीचे फैली बस्तियों को देखते हुए पूछा— “क्या यह सच है कि पृथ्वी को संकट में डालने वाले कुछ शक्तिशाली लोग ही सन 2027 तक दूसरी दुनिया में बसने की योजनाएँ बनाने लगे थे?” सनड्रेक्सन ने उत्तर दिया— “अंतरिक्ष में बसने की वैज्ञानिक योजनाएँ वास्तव में बनने लगी थीं, लेकिन उस समय ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ के नाम से अनेक राजनीतिक आशंकाएँ और विवादित धारणाएँ भी फैली हुई थीं। राजीव दीक्षित, देवेंद्र बल्हारा और अनेक व्यवस्था-विरोधी चिंतकों के विचारों को लोग अपने-अपने ढंग से समझते थे। कुछ इसे वैश्विक केंद्रीकरण की चेतावनी मानते थे, जबकि कुछ इसे अप्रमाणित षड्यंत्र-कथा कहते थे।” उसने सामने का विशाल इतिहास-पटल खोल दिया। उस पर इक्कीसवीं शताब्दी की पृथ्वी दिखाई देने लगी—ऊँची इमारतें, विशाल कारखाने, सूखती नदियाँ, जंगलों की कटाई और झुग्गियों में रहते श्रमिक। “समस्या केवल जनसंख्या थी?” अनंता ने पूछा। “नहीं,” वृद्ध बोला, “जनसंख्या दबाव एक वास्तविक चुनौती थी, पर समस्या का पूरा कारण मनुष्यों की संख्या नहीं था। असमान उपभोग, संसाधनों पर कुछ लोगों का नियंत्रण, प्रकृति का अनियंत्रित दोहन और अवसरों का असमान वितरण भी उतने ही बड़े कारण थे।” पटल पर अशोक सर की एक पुरानी सभा उभर आई। वे लोगों से कह रहे थे— “यदि जनसंख्या सात गुनी भी हो जाए, तब भी मनुष्य बुद्धि, श्रम, विज्ञान और न्यायपूर्ण वितरण से अनेक कठिनाइयाँ संभाल सकता है। मगर इसके लिए हर व्यक्ति और हर परिवार को व्यवस्था का सक्रिय भाग बनाना होगा। किसी को केवल उपभोक्ता, वोट या सस्ता मजदूर समझना बंद करना होगा।” सभा में बैठे एक युवक ने पूछा— “लेकिन प्रत्येक परिवार को सिस्टम से जोड़ने का मतलब क्या है?” अशोक सर ने समझाया— “इसका अर्थ है—हर परिवार को शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, आजीविका और निर्णय-प्रक्रिया तक वास्तविक पहुँच। श्रम करने वाले को सम्मान और उत्पादन में उचित भागीदारी मिले। गाँव, वार्ड और नगर केवल आदेश पाने वाली इकाइयाँ न रहें; वे अपने संसाधनों और आवश्यकताओं पर जिम्मेदारी से निर्णय भी लें।” एक महिला मजदूर खड़ी हुई— “फिर पूँजी का क्या होगा?” अशोक सर मुस्कराए— “पूँजी स्वयं शत्रु नहीं है। वह संगृहीत श्रम और साधन है। समस्या तब होती है, जब पूँजी मनुष्य और शासन दोनों की मालिक बन जाए। इसी तरह सत्ता व्यवस्था के लिए आवश्यक हो सकती है, लेकिन सत्तावाद तब जन्म लेता है जब प्रश्न पूछना अपराध बना दिया जाए।” उन्होंने भूमि पर छह वृत्त बनाए और उनमें लिखा— पूँजीवाद का एकाधिकार, सामंतवाद, सत्तावाद, जातिवाद, जन्मजात उच्चता और जन्मजात हीनता। फिर बोले— “ये अलग-अलग दिखाई देते हैं, पर इनकी जड़ एक ही है—कुछ मनुष्यों को जन्म, धन या पद के कारण अधिक मनुष्य और दूसरों को कम मनुष्य मान लेना।” दृश्य बदल गया। सन 2031 तक बेरोजगारी, महँगाई, पर्यावरणीय संकट और असमानता के विरुद्ध अनेक स्थानों पर जन-आंदोलन होने लगे थे। उनमें शांतिपूर्ण सभाएँ भी थीं और कुछ जगह क्रोध से उपजी अव्यवस्था भी। शासन ने कई वास्तविक शिकायतों को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या समझा। कहीं संवाद हुआ, कहीं दमन। अशोक सर हर सभा में सावधान करते— “क्रांति का अर्थ हिंसा नहीं है। हिंसा अक्सर पुरानी सत्ता की जगह नई कठोर सत्ता बैठा देती है। वास्तविक क्रांति मनुष्य, संस्थाओं और संसाधनों के संबंध बदलती है। आंदोलन अनुशासित, तथ्यपूर्ण और मानवीय होगा, तभी वह न्यायपूर्ण व्यवस्था बना पाएगा।” उनकी पुस्तक “क्रांति क्यों? कैसे?” में भी यही प्रश्न उठाया गया था— व्यवस्था क्यों बदलनी चाहिए और परिवर्तन के बाद उसके स्थान पर क्या स्थापित होगा? पुस्तक में लिखा था कि केवल विरोध पर्याप्त नहीं। यदि आंदोलन के पास पारदर्शी प्रशासन, समान अवसर, विकेंद्रीकरण, पर्यावरण-संरक्षण और उत्तरदायी नागरिकता की स्पष्ट रूपरेखा नहीं होगी, तो क्रांति केवल सत्ता के चेहरे बदल देगी। सन 2036 आते-आते पुस्तक विश्वविद्यालयों, श्रमिक सभाओं, ग्राम परिषदों और युवा समूहों में चर्चा का विषय बन चुकी थी। किसी ने उसे क्रांतिकारी ग्रंथ कहा, किसी ने आदर्शवादी कल्पना और किसी ने व्यवस्था के लिए चुनौती। पर उसके प्रश्नों को अनसुना करना कठिन हो गया था। उसी वर्ष एक विशाल जनसभा में अशोक सर ने कहा— “मुट्ठी भर शक्तिशाली लोगों को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। अन्यायपूर्ण व्यवस्था इसलिए भी टिकती है क्योंकि बहुत से लोग सुविधा, भय, जाति और निजी लाभ के कारण मौन रहते हैं। परिवर्तन ऊपर बैठे लोगों से ही नहीं, नीचे खड़े नागरिकों के चरित्र से भी शुरू होगा।” पृथु-मही के ऊपर उड़ती तश्तरी में इतिहास-पटल बंद हो गया। अनंता कुछ देर मौन रही। फिर बोली— “तो पृथ्वी की लड़ाई जनसंख्या और संसाधनों के बीच नहीं, बल्कि स्वार्थपूर्ण अधिकार और जिम्मेदार सहभागिता के बीच थी?” सनड्रेक्सन ने उत्तर दिया— “हाँ। पृथ्वी पर सबके लिए पर्याप्त संभावनाएँ थीं, पर असीम लालच के लिए कोई पृथ्वी पर्याप्त नहीं थी।” “और तीसरे नेत्र का वास्तविक अर्थ?” वृद्ध ने नीचे पृथु-मही की बस्तियों की ओर संकेत किया— “पहले नेत्र से मनुष्य समस्या देखता है। दूसरे से उसका इतिहास समझता है। लेकिन तीसरा नेत्र तब खुलता है, जब वह अपने निर्णय का भविष्य भी देखने लगता है।” अनंता ने देखा—पृथु-मही पर प्रत्येक बस्ती के बीच खेत, जलाशय, विद्यालय, वन और सामुदायिक सभागृह थे। वहाँ कोई काम छोटा नहीं माना जाता था और जन्म के आधार पर किसी की प्रतिष्ठा निर्धारित नहीं होती थी। वृद्ध ने अंतिम बात कही— “नई धरती खोज लेना मनुष्यता की विजय नहीं है। विजय तब है जब मनुष्य पुरानी धरती को नष्ट करने वाली अपनी प्रवृत्तियों को नई धरती पर न ले जाए। अन्यथा ग्रह बदल जाएगा, पर इतिहास नहीं।” उड़नतश्तरी आगे बढ़ गई। पीछे पृथु-मही चमक रही थी—एक दूसरी पृथ्वी के रूप में नहीं, बल्कि पृथ्वी की भूलों से सीखे गए एक नए सामाजिक संकल्प के रूप में।