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मंगलवार, 29 सितंबर 2026

दंड देने वाला कौन था?!

दंड देने वाला कौन था?! सन 10050 ईस्वी! अंतरिक्ष के असीम विस्तार में एक उड़नतश्तरी पृथ्वी के पुराने सौरमंडल की ओर बढ़ रही थी। उसके पारदर्शी कक्ष में तीन नेत्रधारी बुजुर्ग सफहेफज्जफ़्स बैठा था। उसके सामने तारों, ग्रहों और नष्ट हो चुकी सभ्यताओं का विशाल मानचित्र चमक रहा था। उसके पास बैठी तीन नेत्रधारी युवती कग्वफ्फग उस स्थान को देख रही थी, जहाँ कभी नीली पृथ्वी हुआ करती थी। अब वहाँ धूल, चट्टानों और कृत्रिम धातुओं का विशाल मलबा सूर्य की परिक्रमा कर रहा था। सफहेफज्जफ़्स ने पृथ्वी के प्राचीन अभिलेख खोलते हुए कहा— “सन 1990 ईस्वी के आते-आते कुछ लोग मनुष्यों को सचेत करने लगे थे कि भविष्य कैसा होने वाला है। वे जंगलों के विनाश, जल और वायु के प्रदूषण, तापमान-वृद्धि, परमाणु अस्त्रों तथा असीमित उपभोग के खतरे बता रहे थे। लेकिन न जनता ने पर्याप्त ध्यान दिया, न सत्ता ने।” कग्वफ्फग ने पूछा— “तो इस पृथु-मही की प्रकृति और मनुष्य-सभ्यता को नष्ट करने के लिए स्वयं मनुष्य ही जिम्मेदार था?” “हाँ।” “वह कैसे? क्या इतने मूर्ख थे मनुष्य?” सफहेफज्जफ़्स ने कहा— “वे ज्ञानहीन नहीं थे। उनके पास विज्ञान था, विश्वविद्यालय थे, धर्मग्रंथ थे और भविष्य का अनुमान लगाने वाले उपकरण भी थे। उनकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे जानते कुछ थे, कहते कुछ थे और करते कुछ और थे।” “क्या प्रत्येक मनुष्य समस्या बन चुका था?” “प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से दोषी नहीं था। किसी का अपराध बहुत बड़ा था, किसी की भागीदारी छोटी थी और कोई विरोध भी कर रहा था। फिर भी अधिकांश मनुष्य जिस व्यवस्था में जी रहे थे, उसे अपने आचरण से चलाते भी थे। जो समाधान रखते थे, उन्हें महत्व नहीं दिया जाता था। कई बार उनका मजाक तक उड़ाया जाता था।” “और?” सफहेफज्जफ़्स कुछ क्षण रुका। उसने पृथ्वी के अतीत का एक दृश्य खोल दिया। “और क्या? सुनो…” सन 1990 ईस्वी—नदी किनारे की सभा एक छोटे नगर से होकर जीवना नदी बहती थी। कभी उसका पानी इतना स्वच्छ था कि लोग उसमें अपना प्रतिबिंब देख लेते थे। लेकिन अब नदी के किनारे एक विशाल कारखाना लग चुका था। नगर की नालियाँ भी उसी में गिरती थीं। नदी के तट पर उस दिन एक जनसभा आयोजित हुई। सभा में पर्यावरणविद् ऋषिराज, वैज्ञानिक डॉ. माधवी, कारखाने का मालिक धनवर्धन, मंत्री लोकपाल सिंह और नगर के सैकड़ों लोग उपस्थित थे। ऋषिराज ने नदी का काला पड़ चुका पानी एक पात्र में भरकर सबके सामने रखा और कहा— “यह केवल नदी का रंग नहीं बदला है। यह हमारे भविष्य का रंग है। आज हम जो नदी को दे रहे हैं, कल वही हमारे शरीर में लौटकर आएगा।” सभा में बैठे कुछ लोग हँस पड़े। एक व्यक्ति बोला— “यह बूढ़ा हमेशा विनाश की बातें करता है!” दूसरे ने कहा— “कारखाना बंद हो गया तो हमें नौकरी कौन देगा?” मंत्री लोकपाल सिंह ने मंच से घोषणा की— “विकास के रास्ते में बाधा डालने वालों से सावधान रहिए। यह कारखाना हमारे नगर की प्रगति का प्रतीक है।” ऋषिराज ने पूछा— “जो प्रगति नदी को मार दे, खेतों को विषैला कर दे और बच्चों को बीमार बना दे, उसे प्रगति कहेंगे या भविष्य से लिया गया कर्ज?” कारखाने के मालिक धनवर्धन ने उत्तर दिया— “हम सभी सरकारी नियमों का पालन कर रहे हैं।” डॉ. माधवी ने कुछ कागज उठाए— “नियम इतने कमजोर हैं कि उनका पालन करने के बाद भी विष नदी में पहुँच रहा है। यदि अभी व्यवस्था नहीं बदली गई तो इसका कुप्रभाव आने वाली कई पीढ़ियाँ सहेंगी।” एक पत्रकार ने पूछा— “क्या आप कह रही हैं कि प्रकृति मनुष्य को दंड देगी?” ऋषिराज ने उत्तर दिया— “प्रकृति किसी न्यायाधीश की तरह क्रोधित होकर दंड देने नहीं बैठती। कर्म के कुप्रभाव का सामने आना ही दंड है। विष नदी में डालोगे तो वही विष जल, अन्न, वनस्पति और शरीर से होकर लौटेगा। यह बदला नहीं, प्रतिक्रिया है।” मंत्री ने उपहास करते हुए कहा— “तो क्या नदी मुकदमा दर्ज कराएगी?” सभा ठहाकों से भर गई। ऋषिराज खामोश हो गया। उसने पात्र का काला पानी वापस नदी में उड़ेलते हुए कहा— “नदी मुकदमा दर्ज नहीं कराएगी। उसका मौन ही भविष्य का निर्णय लिख रहा है।” कग्वफ्फग ने पूछा— “क्या उनकी चेतावनी सच हुई?” सफहेफज्जफ़्स ने अगला दृश्य खोल दिया। सन 2025 ईस्वी जीवना नदी के आसपास रहने वाले लोगों में गंभीर बीमारियाँ बढ़ चुकी थीं। खेतों की उपज घट रही थी। भूजल में जहरीले रसायन मिल गए थे। उपचार के लिए बड़े अस्पताल खुल गए थे। नगर की नई पीढ़ी शिकायत कर रही थी— “हमें यह दंड क्यों मिला? हमने तो नदी को प्रदूषित नहीं किया था!” एक वृद्ध किसान ने उत्तर दिया— “तुमने प्रदूषण शुरू नहीं किया, लेकिन अब तुम उसके कुप्रभाव के बीच जन्मे हो। पुराने कर्म का प्रभाव कभी-कभी कर्ता से आगे बढ़कर उसकी संतानों तक पहुँचता है।” तभी एक युवती ने पूछा— “फिर न्याय कहाँ है? अपराध किसी ने किया और कष्ट किसी दूसरे को मिला!” वृद्ध किसान ने कहा— “प्राकृतिक प्रतिक्रिया मनुष्य के न्यायालय जैसी नहीं होती। एक पीढ़ी जंगल काटती है, अगली पीढ़ी सूखे का सामना करती है। एक देश वातावरण को प्रदूषित करता है, लेकिन उसका प्रभाव समुद्र के किसी छोटे द्वीप पर रहने वालों को भी झेलना पड़ सकता है। इसीलिए सामूहिक कर्मों में जिम्मेदारी की समझ बहुत आवश्यक है।” दृश्य समाप्त हो गया। कग्वफ्फग ने पूछा— “तो दंड का वास्तविक अर्थ क्या था?” सफहेफज्जफ़्स ने समझाया— “दंड केवल किसी राजा, न्यायालय अथवा ईश्वर द्वारा दी गई पीड़ा नहीं है। प्रत्येक कर्म किसी न किसी दिशा में प्रभाव उत्पन्न करता है। हितकारी प्रभाव फल बनता है और हानिकारक प्रभाव दंड बनकर सामने आता है।” “क्या हर कुप्रभाव तुरंत लौटता है?” “नहीं। कोई प्रभाव तुरंत दिखाई देता है, कोई वर्षों बाद और कोई कई पीढ़ियों के बाद। आग को छुओ तो दंड तुरंत मिलता है। जंगलों को नष्ट करो तो परिणाम दशकों बाद वर्षा, तापमान और जलचक्र में दिखाई दे सकता है।” “लेकिन यदि प्रभाव देर से आता है तो मनुष्य उसे अपने कर्म से जोड़ नहीं पाता होगा?” “यही सबसे बड़ी समस्या थी। मनुष्य तत्काल घटना को तो समझता था, पर दीर्घकालीन कारण और परिणाम की शृंखला को नहीं। वह कहता था—‘हमने आज पेड़ काटा, आज तो कुछ नहीं हुआ।’ उसे यह दिखाई नहीं देता था कि उसका कर्म भविष्य के सूखे में जुड़ रहा है।” कग्वफ्फग ने पूछा— “मनुष्य द्वारा मनुष्य के साथ किए गए कर्मों की भी ऐसी ही प्रतिक्रिया होती थी?” “अवश्य। किसी मनुष्य का अपमान करो तो उसके भीतर पीड़ा, भय या प्रतिशोध उत्पन्न हो सकता है। किसी समुदाय का लगातार शोषण करो तो एक दिन असंतोष विद्रोह बन सकता है। बच्चों को हिंसा और स्वार्थ का वातावरण दो तो वही संस्कार आगे समाज के व्यवहार में प्रकट होंगे।” “अर्थात कर्म केवल बाहर की वस्तुओं पर नहीं, चेतना पर भी प्रभाव डालता है?” “हाँ। मनुष्य के कर्म वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, जल, भूमि और दूसरे मनुष्यों के शरीर पर ही नहीं, उनकी चेतना पर भी प्रभाव डालते हैं। भय का वातावरण भयभीत चेतना बनाता है; करुणा का व्यवहार करुणामय चेतना को जन्म देता है।” सन 2075 ईस्वी—पृथ्वी न्यायसभा सफहेफज्जफ़्स ने एक और अभिलेख खोला। धरती पर संकट अत्यंत गंभीर हो चुका था। समुद्र का स्तर बढ़ रहा था, जंगल जल रहे थे और कई क्षेत्रों में पीने योग्य जल समाप्त हो रहा था। विश्व के प्रतिनिधियों ने एक विशाल सभा बुलाई थी। उस सभा का नाम रखा गया—पृथ्वी न्यायसभा। सभा के बीच एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित न्यायमंच स्थापित था। उसने प्रश्न किया— “पृथ्वी की वर्तमान दशा के लिए दोषी कौन है?” एक प्रतिनिधि बोला— “उद्योगपति दोषी हैं।” उद्योगपतियों ने कहा— “हमने वही वस्तुएँ बनाईं जिनकी जनता ने माँग की।” जनता के प्रतिनिधि बोले— “सरकारों ने हमें ऐसे जीवन के लिए प्रेरित किया।” सरकारों ने कहा— “हमें सत्ता में बने रहने के लिए जनता की इच्छाएँ पूरी करनी पड़ीं।” वैज्ञानिकों ने कहा— “हमने चेतावनी दी थी, लेकिन हमारी नहीं सुनी गई।” कुछ वैज्ञानिकों से प्रश्न किया गया— “फिर तुमने विनाशकारी हथियार और प्रदूषण फैलाने वाली तकनीकें क्यों बनाईं?” उन्होंने उत्तर दिया— “हम ज्ञान की खोज कर रहे थे। उसके उपयोग का निर्णय सत्ता और बाजार ने किया।” सत्ता ने बाजार को दोष दिया। बाजार ने उपभोक्ता को और उपभोक्ता ने अपनी परिस्थितियों को। अंततः सभा में एक बालक खड़ा हुआ। उसने पूछा— “यदि सभी केवल परिस्थितियों के शिकार थे, तो इन परिस्थितियों को बनाया किसने?” सभा में सन्नाटा छा गया। तभी वृद्ध ऋषिराज की वर्षों पुरानी रिकॉर्डिंग चलाई गई— “एक व्यवस्था किसी अदृश्य आकाश से नहीं उतरती। उसे मनुष्य अपने चुनाव, उपभोग, मौन, भय और स्वार्थ से प्रतिदिन बनाता है।” कृत्रिम न्यायमंच ने कहा— “सभी मनुष्य समान रूप से अपराधी नहीं हैं। जिसने जंगल कटवाए और जिसने उनका विरोध किया, दोनों को समान दोष नहीं दिया जा सकता। जिसने अरबों का लाभ कमाकर प्रदूषण फैलाया और जिसके पास जीवन-निर्वाह का दूसरा साधन नहीं था, उनकी जिम्मेदारी भी समान नहीं हो सकती।” सभा में उपस्थित लोगों ने राहत की साँस ली। लेकिन न्यायमंच ने आगे कहा— “फिर भी यह कहकर कोई पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकता कि वह अकेला क्या कर सकता था। जिसने सत्य जानकर भी सुविधा के कारण मौन धारण किया, वह भी परिणाम की शृंखला का एक अंश बना। जिम्मेदारी का भार सब पर समान नहीं है, लेकिन जिम्मेदारी से पूर्ण मुक्ति भी सबको नहीं दी जा सकती।” एक प्रतिनिधि ने पूछा— “तो दंड किसे दिया जाए?” न्यायमंच ने उत्तर दिया— “दंड आरम्भ हो चुका है।” “किसने दिया?” “किसी राजा ने नहीं। तुम्हारे अपने कर्मों ने।” स्क्रीन पर सूखे खेत, जलते जंगल, बीमार बच्चे और समुद्र में डूबते नगर दिखाई देने लगे। “यह किसी क्रोधित देवता का बदला नहीं। यह कारणों का परिणाम है। तुमने प्रकृति के संतुलन को चोट पहुँचाई; असंतुलन तुम्हारे जीवन में लौट आया। तुमने समाज में असमानता बोई; अविश्वास और संघर्ष की फसल उगी। तुमने जीवों को वस्तु समझा; अंततः मनुष्य भी बाजार की वस्तु बन गया।” एक व्यक्ति चिल्लाया— “लेकिन हमने तो केवल सुख चाहा था!” न्यायमंच ने उत्तर दिया— “तुमने सुख नहीं, असीमित उपभोग चाहा था। सुख संबंधों, संतुलन और चेतना में था; तुमने उसे वस्तुओं में खोजा। वस्तुओं की भूख बढ़ती गई और पृथ्वी छोटी पड़ती गई।” अंतरिक्षयान में बैठी कग्वफ्फग की तीनों आँखें नम हो गईं। उसने पूछा— “तो क्या पूरी जनता मुजरिम थी? क्या सारा सिस्टम मुजरिम था?” सफहेफज्जफ़्स ने कहा— “‘सभी मुजरिम हैं’ कहना उतना ही अधूरा है जितना यह कहना कि ‘कोई दोषी नहीं है।’ न्याय के लिए हमें तीन बातें देखनी पड़ती हैं—किसके पास कितनी शक्ति थी, उसे परिणामों का कितना ज्ञान था और उसने उपलब्ध विकल्पों में से क्या चुना।” “तो अधिक शक्तिशाली व्यक्ति की जिम्मेदारी अधिक थी?” “हाँ। जिसके निर्णय से करोड़ों लोगों और विशाल जंगलों का भविष्य प्रभावित होता था, उसकी जिम्मेदारी सामान्य व्यक्ति से अधिक थी। पर सामान्य व्यक्ति भी अपने छोटे क्षेत्र में पूरी तरह उत्तरदायित्व-विहीन नहीं था।” “और जिन लोगों ने विरोध किया?” “वे सामूहिक दोष में समान भागीदार नहीं थे। उन्होंने मानवता की चेतना को जीवित रखने का प्रयास किया। किंतु उनकी संख्या कम थी और उनकी आवाज लाभ, प्रचार तथा सुविधा के शोर में दबती गई।” “फिर मनुष्य-सभ्यता को बचाने का अंतिम उपाय क्या था?” “दंड से डरना नहीं, कर्म के प्रभाव को समझना। यदि उन्हें मालूम हो जाता कि हर कर्म लौटता है, तो वे प्रकृति के साथ अपने व्यवहार को बदल सकते थे। दंड का श्रेष्ठ रूप प्रतिशोध नहीं, सुधार होता है।” उसी समय उड़नतश्तरी पृथ्वी के अवशेषों के निकट पहुँची। मलबे में घूमता हुआ एक प्राचीन यंत्र सक्रिय हो गया। उसमें मानवता का अंतिम संदेश सुरक्षित था— “हम न्यायालयों में पूछते रहे कि अपराधी कौन है। प्रकृति हमारे सामने परिणाम रखती रही। हम दंड देने वाले को खोजते रहे, जबकि दंड हमारे कर्मों से ही जन्म ले चुका था।” कग्वफ्फग ने धीरे से पूछा— “क्या कर्म ही न्यायाधीश था?” सफहेफज्जफ़्स ने उत्तर दिया— “कर्म न्यायाधीश नहीं था; कर्म कारण था और दंड उसका कुप्रभाव। प्रकृति ने कोई मुकदमा नहीं चलाया। उसने केवल वही लौटाया, जो मानव-सभ्यता ने उसके भीतर छोड़ दिया था।” “क्या हमारी सभ्यता भी ऐसा कर सकती है?” “यदि हमने पृथ्वी की कथा को केवल कहानी समझा, तो अवश्य। किंतु यदि हमने इसे दर्पण माना, तो शायद बच जाएँ।” सफहेफज्जफ़्स ने अपना तीसरा नेत्र बंद कर लिया। उड़नतश्तरी पृथ्वी के मलबे से आगे बढ़ने लगी। पीछे से मानवता का अंतिम संदेश अब भी गूँज रहा था— “दंड कहीं बाहर बैठी हुई क्रूर शक्ति नहीं है। हमारे अहितकारी कर्म जब मनुष्य, समाज, जीव-जंतु, वनस्पति और प्रकृति को घायल करके हमारे पास लौटते हैं, वही दंड है। उसका आगमन शीघ्र हो या देर से—कर्म का प्रभाव मिटता नहीं, केवल समय की परतों में छिप जाता है।”

जब समाधान भी व्यवस्था का भोजन बन गया?!

जब समाधान भी व्यवस्था का भोजन बन गया?!
सन 10050 ईस्वी! अनंत अंतरिक्ष में एक उड़नतश्तरी पृथ्वी के पुराने सौरमंडल की ओर बढ़ रही थी। उसके भीतर तीन नेत्रधारी बुजुर्ग सफहेफज्जफ़्स एक पारदर्शी आसन पर बैठा था। उसके सामने ब्रह्मांड का विशाल मानचित्र चमक रहा था। पास बैठी तीन नेत्रधारी युवती कग्वफ्फग उस स्थान को देख रही थी, जहाँ कभी नीली पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती थी। अब वहाँ धूल, चट्टानों और मानव-निर्मित धातुओं का एक विशाल मलबा घूम रहा था। कग्वफ्फग ने पूछा— “क्या इस पृथु-मही की प्रकृति और मनुष्य-सभ्यता को नष्ट करने के लिए स्वयं मनुष्य ही जिम्मेदार था?” सफहेफज्जफ़्स ने गंभीर स्वर में कहा— “हाँ! यद्यपि सभी मनुष्य समान रूप से दोषी नहीं थे, फिर भी उनकी सामूहिक जीवन-व्यवस्था ऐसी बन चुकी थी कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति जाने-अनजाने संकट को बढ़ा रहा था।” “लेकिन वे इतने मूर्ख कैसे हो सकते थे?” “मूर्खता हमेशा ज्ञान का अभाव नहीं होती, कग्वफ्फग! कभी-कभी मनुष्य सब कुछ जानता है, फिर भी अपनी सुविधा और स्वार्थ के कारण कुछ बदलना नहीं चाहता।” “क्या उन्हें भविष्य के संकट का पता नहीं था?” “पता था। सन 1990 ईस्वी के आते-आते कुछ लोग उन्हें सचेत करने लगे थे कि भविष्य कैसा हो सकता है। वे पर्यावरण-विनाश, जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई, जल-संकट, प्रदूषण, परमाणु अस्त्रों और अनियंत्रित तकनीक के खतरे बता रहे थे।” “फिर जनता और सत्ता ने उनकी बात क्यों नहीं मानी?” सफहेफज्जफ़्स कुछ देर खामोश रहा। फिर उसने अपने सामने पृथ्वी के पुराने अभिलेख खोल दिए। सन 1990 ईस्वी—पृथ्वी का एक छोटा नगर नगर के पुराने विद्यालय में उस दिन एक सभा बुलाई गई थी। सभा में एक वृद्ध पर्यावरणविद् अनंतदास, एक वैज्ञानिक डॉ. नीलिमा, स्थानीय उद्योगपति धनपाल, विधायक वीरेन्द्र प्रताप और नगर के अनेक नागरिक उपस्थित थे। मंच पर खड़े अनंतदास ने कहा— “धरती हमें संकेत दे रही है। नदियों का जल घट रहा है, हवा दूषित हो रही है और जंगल तेजी से काटे जा रहे हैं। यदि विकास की यही दिशा बनी रही तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वायु, जल और भोजन भी कठिनाई से मिलेगा।” सभा में बैठे कुछ लोग हँसने लगे। धनपाल ने कहा— “बाबा जी, आप हर नई फैक्ट्री का विरोध करते हैं। यदि कारखाने नहीं लगेंगे तो रोजगार कहाँ से आएगा?” अनंतदास ने शांत स्वर में उत्तर दिया— “मैं उत्पादन का विरोध नहीं कर रहा। मैं उस उत्पादन का विरोध कर रहा हूँ जो रोजगार देने के नाम पर नदी को मार दे, धरती को जहरीला बना दे और कुछ वर्षों बाद मनुष्य को ही बीमार कर दे।” विधायक वीरेन्द्र प्रताप ने कहा— “भविष्य की बातें छोड़िए। जनता को अभी सड़क, बिजली और नौकरी चाहिए। पचास वर्ष बाद क्या होगा, उसकी चिंता पचास वर्ष बाद की सरकार करेगी।” तभी डॉ. नीलिमा खड़ी हुईं— “लेकिन कुछ संकट ऐसे होते हैं जिन्हें पचास वर्ष बाद ठीक नहीं किया जा सकता। आज लगाया गया प्रदूषण का बीज भविष्य में ऐसी फसल देगा जिसे काटने का कोई उपाय नहीं होगा।” सभा में पीछे बैठे एक व्यक्ति ने व्यंग्य किया— “इन वैज्ञानिकों को तो हर जगह खतरा ही दिखाई देता है!” दूसरे ने कहा— “जब संकट आएगा, तब विज्ञान कोई मशीन बना देगा।” अनंतदास मुस्कराए— “विज्ञान मशीन बना सकता है, लेकिन मनुष्य का लालच समाप्त करने वाली मशीन कौन बनाएगा?” पूरा सभागार कुछ क्षण के लिए शांत हो गया। फिर धनपाल ने जोर से तालियाँ बजाते हुए कहा— “ये सब भावुक बातें हैं! विकास को रोका नहीं जा सकता।” तालियों के शोर में अनंतदास की चेतावनी दब गई। अंतरिक्षयान में बैठी कग्वफ्फग ने पूछा— “क्या उस समय समाधान उपस्थित था?” “हाँ,” सफहेफज्जफ़्स ने कहा, “समाधान उपस्थित था—पर वह लाभदायक व्यापार नहीं था। प्रकृति की सीमा में रहना, स्थानीय संसाधनों की रक्षा करना, उत्पादन को आवश्यकता से जोड़ना, गाँवों को स्वावलंबी बनाना और उपभोग कम करना—ये उपाय संभव थे।” “फिर लोगों ने उन्हें क्यों नहीं अपनाया?” “क्योंकि मनुष्य समाधान चाहता था, किंतु अपनी आदतों को बचाए रखते हुए। वह प्रदूषण से मुक्ति चाहता था, पर अनावश्यक उपभोग नहीं छोड़ना चाहता था। वह स्वच्छ नदी चाहता था, पर अपने घर, उद्योग और नगर का कचरा उसी नदी में डालता था।” “क्या सत्ता कुछ नहीं कर सकती थी?” “सत्ता कर सकती थी, पर सत्ता को अगला चुनाव दिखाई देता था; आने वाली शताब्दी नहीं। उद्योगपति को अगली तिमाही का लाभ दिखाई देता था; धरती की अगली पीढ़ी नहीं। जनता को तत्काल सुविधा दिखाई देती थी; उस सुविधा की दीर्घकालीन कीमत नहीं।” कग्वफ्फग ने पूछा— “पर कुछ लोग ऐसा क्यों मानने लगे थे कि मानव-सभ्यता उलझ चुकी है और अब आसानी से सुलझने वाली नहीं है?” सफहेफज्जफ़्स ने पृथ्वी का एक और दृश्य दिखाया। एक विशाल कारखाना नगर के लोगों को रोजगार देता था, लेकिन वही कारखाना नदी को प्रदूषित करता था। नदी के दूषित जल से लोग बीमार होते थे। बीमारियों के इलाज के लिए बड़े अस्पताल खुले। अस्पतालों ने रोजगार दिया। औषधियों के कारखाने खुले। उनमें भी उत्पादन और लाभ बढ़ा। बुजुर्ग ने कहा— “देखो, यही उलझाव था। जिस व्यवस्था ने बीमारी पैदा की, उसी ने बीमारी के उपचार को भी बाजार बना दिया। यदि बीमारी समाप्त हो जाती तो उपचार का बाजार घट जाता। इस प्रकार समस्या और समाधान दोनों एक ही आर्थिक जाल के अंग बन गए थे।” दृश्य बदल गया। महानगरों में वाहन बढ़ रहे थे। वाहनों के कारण प्रदूषण और यातायात की समस्या बढ़ी। समाधान के नाम पर और चौड़ी सड़कें बनाई गईं। सड़कें चौड़ी हुईं तो वाहन और बढ़ गए। उनके लिए जंगल काटे गए और नगर दूर तक फैलते गए। सफहेफज्जफ़्स ने कहा— “हर समाधान पुरानी समस्या को घटाने के साथ एक नई समस्या उत्पन्न करने लगा था। मनुष्य समस्या की जड़—अपने लालच, असमानता और असीमित उपभोग—को छूना ही नहीं चाहता था।” “तो वह केवल समस्याओं का स्थान बदल रहा था?” “हाँ। वह कचरा घर से निकालकर नगर के बाहर फेंक देता और समझता कि सफाई हो गई। उद्योग अपना प्रदूषण गरीब क्षेत्रों में भेज देते और कहते कि विकसित नगर स्वच्छ हो गया। शक्तिशाली देश अपने पुराने जहरीले उपकरण दूसरे देशों को बेचकर स्वयं को पर्यावरण-रक्षक घोषित कर देते थे।” “और हर मनुष्य समस्या कैसे बन गया था?” “हर मनुष्य नहीं, बल्कि मनुष्य की आदतों का विशाल जाल समस्या बन गया था। एक व्यक्ति सस्ता सामान चाहता था। उसे बनाने वाला उद्योग मजदूर और प्रकृति का शोषण करता था। उपभोक्ता वस्तु खरीदकर प्रसन्न होता, उद्योगपति लाभ कमाता और सरकार उत्पादन बढ़ने के आँकड़े दिखाती। उस वस्तु के पीछे छिपी पीड़ा किसी को दिखाई नहीं देती थी।” सफहेफज्जफ़्स ने आगे कहा— “कुछ लोग जानते थे कि व्यवस्था गलत दिशा में जा रही है, लेकिन वे कहते थे—‘पहले दूसरे बदलें, तब हम बदलेंगे।’ प्रत्येक व्यक्ति अपने छोटे-से योगदान को महत्वहीन समझता रहा। लेकिन अरबों छोटे योगदान मिलकर ही तो महाविनाश बने थे।” “जो समाधान रखते थे, उनका क्या हुआ?” “कुछ की उपेक्षा हुई। कुछ का मजाक उड़ाया गया। कुछ को व्यवस्था-विरोधी कहा गया। और कुछ समाधानों को बाजार ने सुंदर वस्तुओं में बदलकर बेच दिया।” “समाधान भी बेच दिए गए?” “हाँ। ध्यान को आत्मपरिवर्तन के स्थान पर तनाव घटाने की तकनीक बना दिया गया, ताकि मनुष्य उसी तनावपूर्ण व्यवस्था में अधिक देर तक काम कर सके। योग को जीवन-संतुलन से हटाकर शरीर-प्रदर्शन बना दिया गया। प्रकृति-प्रेम को महँगे पर्यटन में बदल दिया गया और क्रांति को नारों तथा वस्त्रों पर छपे चिह्नों तक सीमित कर दिया गया।” “अर्थात व्यवस्था विरोध को भी अपने भोजन में बदल लेती थी?” “ठीक समझी। जो विचार मनुष्य को बदल सकता था, उसे मनोरंजन बना दिया जाता था। जो प्रश्न सत्ता को असहज कर सकता था, उसे चर्चा और प्रचार की भीड़ में दबा दिया जाता था।” सफहेफज्जफ़्स ने पृथ्वी के अभिलेख में सन 2050 ईस्वी का दृश्य खोला। उसी नगर में अब अनंतदास का पोता अंश लोगों को संबोधित कर रहा था— “साठ वर्ष पहले मेरे दादा ने इस संकट की चेतावनी दी थी। तब लोगों ने कहा था कि संकट बहुत दूर है। आज संकट हमारे घर के द्वार पर खड़ा है।” एक व्यक्ति बोला— “लेकिन अब हम क्या करें? कारखाने बंद हुए तो रोजगार चला जाएगा।” दूसरे ने कहा— “वाहन बंद हुए तो हमारा जीवन रुक जाएगा।” तीसरे ने कहा— “रासायनिक खेती छोड़ी तो उत्पादन घट जाएगा।” चौथे ने कहा— “नगर छोड़कर गाँव कौन जाएगा?” अंश ने कहा— “इसी को मेरे दादा उलझाव कहते थे। हमने अपनी आवश्यकताओं, रोजगार, भोजन और यातायात को ऐसी व्यवस्था से बाँध दिया है, जिसका चलते रहना भी विनाश है और अचानक रुकना भी संकट।” सभा में सन्नाटा छा गया। एक बालिका ने पूछा— “तो क्या अब कोई रास्ता नहीं है?” अंश ने कहा— “रास्ता अब भी है, लेकिन अब वह सरल नहीं है। हमें धीरे-धीरे जीवन की दिशा बदलनी होगी। स्थानीय उत्पादन, सहकारी व्यवस्था, प्राकृतिक खेती, सीमित उपभोग और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण अपनाना होगा। सबसे पहले हमें यह भ्रम छोड़ना होगा कि अधिक वस्तुएँ होने का अर्थ अधिक सुख है।” पीछे से किसी ने फिर हँसकर कहा— “इन आदर्शवादी बातों से दुनिया नहीं चलती!” अंश ने उसकी ओर देखकर उत्तर दिया— “और जिस यथार्थवादी व्यवस्था को तुम चला रहे हो, उससे दुनिया बचेगी नहीं।” दृश्य समाप्त हो गया। कग्वफ्फग ने उदास स्वर में पूछा— “क्या मानव-सभ्यता का अंत उसी दिन निश्चित हो गया था?” “नहीं,” बुजुर्ग ने उत्तर दिया, “किसी एक दिन उसका अंत निश्चित नहीं हुआ। प्रत्येक पीढ़ी के सामने कुछ अवसर आए। प्रत्येक अवसर पर कुछ लोगों ने त्याग के स्थान पर सुविधा, सत्य के स्थान पर प्रचार और भविष्य के स्थान पर तत्काल लाभ चुना। विनाश किसी एक बड़े निर्णय का परिणाम नहीं था; वह करोड़ों छोटे गलत निर्णयों का संचय था।” “तो क्या सचेत करने वाले लोग निराशावादी थे?” “नहीं। वास्तविक चेतावनी निराशा नहीं होती। वह भविष्य बदलने का अंतिम आग्रह होती है। चिकित्सक जब रोग बताता है तो वह मृत्यु की कामना नहीं करता; वह उपचार का अवसर देता है।” “फिर मनुष्यों ने चेतावनी देने वालों को अपना शत्रु क्यों माना?” “क्योंकि चेतावनी उनके आरामदायक भ्रम को तोड़ती थी। जो व्यक्ति कहता था—‘तुम्हें स्वयं बदलना होगा’, वह उन्हें कठोर लगता था। जो कहता था—‘कुछ मत बदलो, कोई नई मशीन तुम्हें बचा लेगी’, वह लोकप्रिय हो जाता था।” उड़नतश्तरी अब पृथ्वी के अवशेषों के बहुत पास पहुँच चुकी थी। वहाँ एक टूटा हुआ कृत्रिम उपग्रह घूम रहा था। उसके भीतर संरक्षित अंतिम संदेश अचानक यान के उपकरण पर सुनाई दिया— “हमने सोचा था कि पृथ्वी हमारी संपत्ति है। बहुत देर बाद समझे कि हम पृथ्वी की अस्थायी संतान थे।” कग्वफ्फग की तीनों आँखों में आँसू आ गए। उसने पूछा— “यदि पृथ्वीवासी समय रहते केवल एक सत्य समझ लेते, तो वह कौन-सा सत्य होता?” सफहेफज्जफ़्स ने उत्तर दिया— “यही कि मनुष्य व्यवस्था से अलग नहीं है। वह जिन वस्तुओं को खरीदता है, जिन लोगों को सत्ता देता है, जिस अन्याय पर मौन रहता है और जिस सुविधा के लिए प्रकृति को नुकसान पहुँचाता है—इन सबके माध्यम से प्रतिदिन व्यवस्था का निर्माण करता है।” “तो समाधान कहाँ था?” “समाधान केवल संसदों, प्रयोगशालाओं अथवा आश्रमों में नहीं था। वह प्रत्येक मनुष्य की चेतना और आचरण के बीच छिपा था। यदि मनुष्य के विचार और कर्म में अंतर बना रहे, तो सर्वोत्तम समाधान भी केवल पुस्तक में बंद शब्द रह जाता है।” उड़नतश्तरी आगे बढ़ने लगी। कग्वफ्फग ने पृथ्वी के मलबे को अंतिम बार देखा और कहा— “उनके पास ज्ञान था, विज्ञान था और चेतावनी भी थी—फिर भी वे बच न सके।” सफहेफज्जफ़्स ने अपना तीसरा नेत्र बंद करते हुए कहा— “क्योंकि सभ्यताएँ ज्ञान की कमी से ही नष्ट नहीं होतीं। वे तब भी नष्ट होती हैं, जब सत्य सबको मालूम हो, पर उसे स्वीकार करने और उसके अनुसार जीने का साहस किसी में न हो।” अंतरिक्ष में पृथ्वी का अंतिम संदेश गूँज रहा था— “जिस व्यवस्था को हम प्रतिदिन अपने आचरण से मजबूत करते हैं, उसे केवल भाषणों में दोष देकर नहीं बदला जा सकता। जब प्रत्येक व्यक्ति समस्या का छोटा-सा हिस्सा बन जाता है, तब समाधान की शुरुआत भी प्रत्येक व्यक्ति के भीतर से ही करनी पड़ती है।”

संकेत, जिसे पृथ्वीवासी सुन न सके?!

संकेत, जिसे पृथ्वीवासी सुन न सके?!
सन 10050 ईस्वी! अंतरिक्ष के अथाह अँधेरे में एक चाँदी-सी उड़नतश्तरी निस्तब्ध गति से आगे बढ़ रही थी। उसके चारों ओर तारों का प्रकाश ऐसे बिखरा था, मानो ब्रह्मांड की किसी प्राचीन पुस्तक के असंख्य अक्षर चमक रहे हों। उड़नतश्तरी के पारदर्शी कक्ष में तीन नेत्रों वाला एक बुजुर्ग बैठा था। उसका नाम था—सफहेफज्जफ़्स। उसके सामने उसी प्रजाति की एक युवती बैठी थी—कग्वफ्फग। बुजुर्ग के पहले दो नेत्र बाहर के अंतरिक्ष को देख रहे थे, जबकि तीसरा नेत्र बंद था। उनकी सभ्यता में तीसरा नेत्र अंतर्दृष्टि का प्रतीक माना जाता था—वह दृष्टि, जो घटना के पीछे छिपे कारण को देखती थी। उनके सामने एक विशाल त्रिआयामी मानचित्र खुला हुआ था। उसमें एक युवा तारे के पास घूमता हुआ विशाल ग्रह चमक रहा था। कग्वफ्फग ने उत्सुकता से पूछा— “क्या यही वह ग्रह है, जहाँ से प्राचीन पृथ्वी के वैज्ञानिकों को रहस्यमयी रेडियो तरंगें मिली थीं?” सफहेफज्जफ़्स ने उत्तर दिया— “हाँ। पृथ्वीवासियों ने इसे ‘बीटा पिक्टोरिस बी’ कहा था। यह उनकी पृथ्वी से लगभग तिरसठ प्रकाश वर्ष दूर था। इसका द्रव्यमान उनके बृहस्पति से लगभग ग्यारह गुना अधिक बताया गया था। यह अपने तारे की एक परिक्रमा लगभग तेईस दशमलव छह पृथ्वी-वर्ष में करता था और अपनी धुरी पर इतनी तेजी से घूमता था कि वहाँ का एक दिन केवल आठ से नौ घंटे के बराबर था।” “तो क्या वे रेडियो संकेत किसी विकसित सभ्यता ने भेजे थे?” बुजुर्ग मुस्कराया— “नहीं। उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार वे किसी एलियन सभ्यता के संदेश नहीं थे। ग्रह के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र और आवेशित कणों की परस्पर क्रिया से वैसी रेडियो तरंगें उत्पन्न हो सकती थीं—जैसे पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्रों में अरोरा बनते थे। पृथ्वी के वैज्ञानिकों के लिए यह खोज इसलिए महत्त्वपूर्ण थी कि उन्हें अपने सौरमंडल से बाहर किसी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र को समझने का नया साधन मिला था।” कग्वफ्फग कुछ क्षण उस ग्रह को देखती रही। फिर उसने मानचित्र पर एक दूसरे स्थान की ओर संकेत किया। वहाँ कभी पृथ्वी नाम का नीला ग्रह हुआ करता था। अब उस स्थान पर धूल, चट्टानों और कृत्रिम मलबे की एक विस्तृत पट्टी घूम रही थी। उसने गंभीर स्वर में पूछा— “क्या इस पृथु-मही की प्रकृति और मनुष्य-सभ्यता को नष्ट करने के लिए स्वयं मनुष्य ही जिम्मेदार था?” सफहेफज्जफ़्स का तीसरा नेत्र धीरे-धीरे खुल गया। “हाँ।” “वह कैसे? क्या इतने मूर्ख थे मनुष्य?” “मूर्खता केवल ज्ञान की कमी नहीं होती, कग्वफ्फग! ज्ञान होने के बाद भी उसके अनुसार आचरण न करना उससे बड़ी मूर्खता है। पृथ्वीवासियों के पास विज्ञान था, आँकड़े थे, चेतावनियाँ थीं और समाधान भी थे—फिर भी उनका सामूहिक आचरण विनाश की ओर बढ़ता रहा।” “लेकिन हर मनुष्य कैसे समस्या बन गया था?” “हर व्यक्ति समान रूप से दोषी नहीं था,” बुजुर्ग ने समझाया, “पर उनकी जीवन-व्यवस्था ऐसी बन चुकी थी कि अधिकांश लोग अनजाने या जानबूझकर समस्या को बढ़ाते थे। कोई आवश्यकता से अधिक उपभोग करता था, कोई जंगल काटता था, कोई नदियों को प्रदूषित करता था, कोई युद्ध के अस्त्र बनाता था और कोई इन सबको ‘विकास’ कहकर उचित ठहराता था।” “और जो ऐसा नहीं करते थे?” “उनमें से बहुत-से लोग खामोश रहते थे।” “तो क्या खामोश रहना भी दोष था?” “जब अन्याय और विनाश सामने दिखाई दें, तब मौन कभी-कभी अपराध को शक्ति देता है। कुछ लोग कहते थे—‘मैं अकेला क्या कर सकता हूँ?’ किंतु वे भूल जाते थे कि पूरी मानव-सभ्यता भी ऐसे ही असंख्य ‘अकेले’ मनुष्यों से बनी थी।” कग्वफ्फग ने पूछा— “क्या किसी ने उन्हें बचाने का उपाय नहीं बताया?” सफहेफज्जफ़्स ने सामने एक प्राचीन अभिलेख खोल दिया। उसमें पृथ्वी के गाँव, जंगल, नदियाँ, विद्यालय, कारखाने और विशाल नगर दिखाई देने लगे। “समाधान रखने वाले लोग थे। वे कहते थे कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका सहयोगी है। वे ग्राम-आधारित जीवन, सीमित उपभोग, स्थानीय उत्पादन, जल और जंगलों की रक्षा तथा मानवीय सहकार की बात करते थे। कुछ मनुष्य अपनी चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ने की साधना सिखाते थे। उनका कहना था कि बाहर की व्यवस्था तब तक नहीं बदलेगी, जब तक मनुष्य के भीतर का लालच, भय और अहंकार नहीं बदलेगा।” “फिर उन लोगों की बात क्यों नहीं मानी गई?” “क्योंकि समाधान त्याग माँगते थे, जबकि भ्रम सुविधाएँ देता था। समाधान कहता था—अपनी आदत बदलो। व्यवस्था कहती थी—कुछ खरीद लो और स्वयं को सफल समझो। समाधान कहता था—प्रकृति के साथ चलो। बाजार कहता था—प्रकृति पर विजय प्राप्त करो।” बुजुर्ग कुछ देर खामोश रहा। फिर बोला— “जो लोग खतरे की चेतावनी देते थे, उन्हें कभी पिछड़ा, कभी पागल और कभी विकास-विरोधी कहा गया। उनके विचारों पर चर्चा करने के स्थान पर उनका मजाक उड़ाया गया।” “और वैज्ञानिक?” “वैज्ञानिक पृथ्वी से तिरसठ प्रकाश वर्ष दूर ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र खोज रहे थे। यह उनकी अद्भुत उपलब्धि थी। उन्होंने आकाश के सूक्ष्म संकेत तक पकड़ लिए थे, लेकिन मानव-समाज अपनी धरती की कराह नहीं सुन पाया।” कग्वफ्फग ने विस्मय से कहा— “अर्थात मनुष्य दूर के ग्रह से आने वाली रेडियो तरंगें तो सुन सकता था, पर अपने जंगल, नदी और भूख से पीड़ित मनुष्य की आवाज नहीं?” “यही उनकी सभ्यता की सबसे बड़ी विडम्बना थी,” सफहेफज्जफ़्स ने उत्तर दिया। “उनकी मशीनें अत्यंत संवेदनशील होती गईं, पर उनका हृदय असंवेदनशील होता गया। दूरबीनें दूर तक देखने लगीं, पर मनुष्य परिणामों को देखने में असमर्थ होता गया।” अचानक उनके यान के उपकरण पर वही प्राचीन रेडियो-तरंग पुनः उभरी। ध्वनि में नियमित उतार-चढ़ाव था। कग्वफ्फग ने पूछा— “यदि वह किसी जीव का संदेश नहीं था, तो हम उसे क्या मानें?” सफहेफज्जफ़्स ने कहा— “प्रकृति का संदेश। प्रकृति शब्दों में नहीं बोलती। तारे प्रकाश से बोलते हैं, ग्रह चुंबकीय तरंगों से, नदियाँ अपने प्रवाह से और जंगल अपनी निस्तब्धता से। समस्या यह नहीं कि ब्रह्मांड संकेत नहीं देता; समस्या यह है कि चेतना उन्हें किस अर्थ में ग्रहण करती है।” “तब पृथ्वी का अंतिम संदेश क्या था?” बुजुर्ग ने पृथ्वी के अंतिम दिनों का दृश्य दिखाया। समुद्र नगरों में प्रवेश कर रहे थे। लोग दूषित हवा में कृत्रिम श्वास-यंत्र लगाए घूम रहे थे। कहीं युद्ध था, कहीं जल के लिए संघर्ष और कहीं भोजन पर अधिकार पाने की होड़। फिर भी एक निर्जन स्थान पर कुछ बच्चे पौधे लगा रहे थे। एक वृद्ध उन्हें समझा रहा था— “पेड़ लगाने का अर्थ केवल पेड़ बचाना नहीं है। इसका अर्थ अपने भीतर उस मनुष्य को बचाना है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सोच सकता है।” दृश्य समाप्त हो गया। सफहेफज्जफ़्स बोला— “पृथ्वी का अंतिम संदेश विनाश नहीं था। उसका संदेश था—समाधान जान लेना पर्याप्त नहीं; समाधान बनना आवश्यक है।” “फिर पृथ्वी बची क्यों नहीं?” “क्योंकि समाधान की प्रशंसा करने वाले बहुत थे, पर उसे अपने जीवन में उतारने वाले बहुत कम। लोग परिवर्तन चाहते थे, किंतु स्वयं बदलना नहीं चाहते थे। प्रत्येक व्यक्ति व्यवस्था को दोष देता रहा, जबकि अपने छोटे-छोटे स्वार्थों से उसी व्यवस्था को पोषण देता रहा।” कग्वफ्फग की आँखों में नमी उतर आई। “यदि हमें कभी पृथ्वी जैसी परिस्थिति दिखाई दे, तो हमें क्या करना चाहिए?” बुजुर्ग ने उसके कंधे पर हाथ रखा— “किसी महाविनाश की प्रतीक्षा मत करना। तुम्हारी सभ्यता का प्रत्येक नागरिक स्वयं से तीन प्रश्न पूछे— मैं प्रकृति से कितना ले रहा हूँ? मैं उसे क्या लौटा रहा हूँ? और जिस सत्य को जानता हूँ, उसके लिए क्या कर रहा हूँ?” उड़नतश्तरी पृथ्वी के अवशेषों से आगे बढ़ने लगी। पीछे रह गई धूल के बीच सूर्य का प्रकाश पड़ रहा था। वह मलबा कुछ क्षणों के लिए एक चमकते हुए दर्पण जैसा दिखाई दिया। कग्वफ्फग ने अंतिम बार पीछे देखकर कहा— “तो पृथ्वी नष्ट होकर भी दर्पण बन गई?” सफहेफज्जफ़्स ने अपना तीसरा नेत्र बंद करते हुए उत्तर दिया— “हाँ। कुछ सभ्यताएँ जीवित रहकर शिक्षा देती हैं और कुछ अपने विनाश के बाद। पृथ्वी का दर्पण ब्रह्मांड की हर सभ्यता से पूछता रहेगा— तुम अंतरिक्ष के संकेत तो सुन रहे हो, लेकिन क्या अपने भीतर से आती चेतावनी भी सुन रहे हो?” उड़नतश्तरी अनंत अंतरिक्ष में विलीन हो गई, किंतु बीटा पिक्टोरिस बी से आती रेडियो तरंगें अब भी फैल रही थीं—मानो ब्रह्मांड कह रहा हो— “प्रकृति का प्रत्येक संकेत संदेश नहीं होता, पर प्रत्येक संकेत से कुछ सीखा जा सकता है। विज्ञान तुम्हें ब्रह्मांड की शक्तियों का ज्ञान देता है; विवेक बताता है कि उस ज्ञान और अपनी सभ्यता का उपयोग कैसे करना है।”