BHAVISHY : KATHANSH !
(कल्पनाओं पर आधारित कथांश!)
रविवार, 30 अगस्त 2026
वीरता का असली उत्तराधिकार?
वीरता का असली उत्तराधिकार
जंगल के बीच एक प्राचीन खंडहर था। कभी वहाँ किसी राजा का विशाल दुर्ग रहा होगा, पर सन 2075 में उसकी टूटी दीवारों पर पीपल की जड़ें फैल चुकी थीं। आसपास अनेक बुजुर्ग गोल घेरा बनाकर बैठे थे। उनके बीच धरती, मनुष्य और भविष्य पर चर्चा चल रही थी।
एक बालिका ने दूर से आते हुए बालक को पुकारा—
“अब्दुल, इधर आना!”
अब्दुल उसके पास आकर बैठ गया।
“क्या बात है, रश्मि?”
रश्मि ने धीरे से कहा—
“अभी इन्हें सुनो। ये ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ का अर्थ बता रहे हैं।”
घेरे के बीच बैठे बुजुर्ग विश्वमित्र अलखेंद्र ने प्रश्न किया—
“हम कहते आए हैं—‘वीर भोग्या वसुंधरा’, अर्थात धरती वीरों द्वारा भोगी जाती है। लेकिन हमें धरती को भोगने की आवश्यकता ही क्यों है? क्या मनुष्य धरती का मालिक है?”
कुछ देर तक खामोशी रही।
एक बुजुर्ग बोले—
“शायद इसका अर्थ है कि जो शक्तिशाली होगा, वही भूमि, धन और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार करेगा।”
विश्वमित्र मुस्कराए—
“मनुष्य ने सदियों तक इसका यही अर्थ निकाला। उसने वीरता को विजय, कब्जे और संग्रह से जोड़ दिया। जंगल काटना विकास कहलाया, पर्वतों को खोदना पुरुषार्थ और नदियों को बाँधना उपलब्धि। अंततः धरती ऐसी ‘भोगी’ गई कि अगली पीढ़ी के लिए साँस लेने योग्य हवा और पीने योग्य पानी तक संकट में पड़ गया।”
अब्दुल ने खंडहर की टूटी छत की ओर देखते हुए पूछा—
“क्या यह दुर्ग भी किसी ऐसे ही वीर राजा का था?”
“हाँ,” एक वृद्धा ने उत्तर दिया, “उस राजा ने अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिए अनेक युद्ध किए थे। उसके खजाने में सोना था, पर प्रजा के कुएँ सूख रहे थे। उसने अपने नाम के स्मारक बनवाए, लेकिन जंगल और खेत उजाड़ दिए। उसे विश्वास था कि वह धरती का स्वामी है। आज उसका नाम किसी को याद नहीं; केवल यह खंडहर बचा है।”
रश्मि बोली—
“तो क्या ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ का कथन गलत है?”
विश्वमित्र ने कहा—
“कथन से अधिक महत्त्वपूर्ण उसकी व्याख्या है। संस्कृत में ‘भोग’ केवल उपभोग या विनाश नहीं है; इसका एक अर्थ किसी वस्तु को प्राप्त करके उसका अनुभव करना और उसके प्रति उत्तरदायित्व निभाना भी हो सकता है। इसलिए इसका नया अर्थ होना चाहिए—धरती का सच्चा आनंद वही वीर प्राप्त कर सकता है, जो उसकी रक्षा करने का साहस रखता हो।”
उन्होंने मिट्टी की एक मुट्ठी उठाई और आगे कहा—
“धरती कायर उपभोक्ता की वस्तु नहीं, वीर संरक्षक की जिम्मेदारी है। कायर वह है जो अपने थोड़े-से लाभ के लिए नदी को प्रदूषित कर दे, जंगल कटवा दे और भविष्य की पीढ़ियों का हिस्सा भी आज ही खर्च कर डाले। वीर वह है जो लोभ का सामना करे, अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध बोले और अपने हिस्से के सुख को भी जीव-जगत के साथ बाँटे।”
एक अन्य बुजुर्ग ने संत राबिया का स्मरण करते हुए कहा—
“संत राबिया जैसी सूफी साधिका सांसारिक संपत्ति के प्रति विरक्ति का संदेश देती थीं। भाव यह था—यदि मेरे हिस्से की दुनियावी संपत्ति मेरे विरोधी को भी मिल जाए तो कोई दुख नहीं, क्योंकि आत्मिक संपदा किसी से छीनी नहीं जा सकती।”
अब्दुल ने पूछा—
“लेकिन यदि हम अपना सब कुछ छोड़ दें, तो जीवन कैसे चलेगा?”
“त्याग का अर्थ जिम्मेदारी छोड़ देना नहीं,” बुजुर्ग ने समझाया, “विरक्ति का अर्थ है—वस्तु का उपयोग करो, पर उसे अपनी पहचान मत बनाओ। घर हो, पर घर के लिए किसी को बेघर मत करो। भोजन लो, पर धरती की उर्वरता नष्ट मत करो। जल लो, पर नदी का जीवन मत छीनो। आवश्यकता पूरी करो, लोभ नहीं।”
रश्मि ने कहा—
“अशोक सर भी कहते थे कि अपनेपन के अहसास में जीने का अर्थ सब पर अधिकार जमाना नहीं है।”
“बिल्कुल,” विश्वमित्र बोले, “अपनेपन के दो रूप होते हैं। एक बच्चा खिलौने को पकड़कर कहता है—‘यह केवल मेरा है।’ यह स्वामित्व का अपनापन है। दूसरा व्यक्ति वृक्ष को देखकर कहता है—‘यह अपना है, इसलिए इसे बचाना मेरा कर्तव्य है।’ यह चेतना का अपनापन है।”
तभी तेज हवा चली। खंडहर की दीवार से मिट्टी का एक हिस्सा गिर पड़ा। वृद्धा ने बच्चों की ओर देखकर कहा—
“यह खंडहर हमें बता रहा है कि अधिकार पर बना प्रत्येक साम्राज्य एक दिन टूट जाता है। केवल संरक्षण और सद्भाव पर बनी संस्कृति जीवित रहती है।”
अब्दुल ने जमीन से एक बीज उठाया और रश्मि से बोला—
“तो आज से ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ का अर्थ होगा—धरती वीरों को अपना सौंदर्य और आनंद देती है, लेकिन वीर वही है जो उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखे।”
रश्मि ने पास की नम मिट्टी में वह बीज दबा दिया।
विश्वमित्र ने प्रसन्न होकर कहा—
“हाँ! धरती पर कब्जा करना वीरता नहीं। अपने लोभ पर विजय पाना वीरता है। भूमि को जीतना नहीं, उसके घाव भरना वीरता है। वसुंधरा हमारी संपत्ति नहीं—हमारी साझा माता, कर्मभूमि और भावी पीढ़ियों की धरोहर है।”
सूर्य खंडहर के पीछे उतरने लगा था। सभी बुजुर्गों ने बच्चों द्वारा लगाए गए बीज को देखा। उस छोटे-से बीज में उन्हें एक ऐसे भविष्य की संभावना दिखाई दी, जहाँ मनुष्य धरती का भोगकर्ता नहीं, उसका सजग सहयात्री और संरक्षक होगा।
संदेश:
“वीर भोग्या वसुंधरा” का श्रेष्ठ अर्थ धरती पर बलपूर्वक अधिकार करना नहीं, बल्कि साहस, संयम और उत्तरदायित्व के साथ उसके वरदानों का उपयोग करना है। सच्चा वीर धरती को जीतता नहीं—अपने लोभ को जीतकर धरती की रक्षा करता है।
स्वाभिमान की असली परीक्षा
स्वाभिमान की असली परीक्षा
विद्यालय की छुट्टी के बाद बरामदे में कुछ शिक्षक और विद्यार्थी बैठे थे। बाहर वर्षा हो रही थी। डॉ. रजनीश गंगवार की एक सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा का विषय बनी हुई थी।
अशोक सर ने गंभीर स्वर में कहा—
“लगभग अस्सी वर्षों में सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन अनेक लोगों ने व्यवस्था के सामने अपना स्वाभिमान गिरवी रख दिया है। अब अन्याय देखकर भी आदमी सोचता है—मुझे क्या लेना-देना?”
शिक्षक ब्रजेश यादव बोले—
“आज मनुष्य के लिए सुविधा और शांतिपूर्वक जीवन बिताना इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि कभी-कभी वह घर-परिवार की प्रतिष्ठा पर हमला होने पर भी चुप रह जाता है।”
गौरव सिंह ने उत्तेजित होकर कहा—
“हम तो अपमान सहने के बजाय मरना या मारना बेहतर समझेंगे!”
अशोक सर ने तुरंत उसे रोका—
“नहीं गौरव! स्वाभिमान का अर्थ मरना या मारना नहीं है। हिंसा कभी-कभी परिस्थिति को और भी भयानक बना देती है। असली स्वाभिमान है—अन्याय के सामने विवेक, साहस और संगठन के साथ खड़ा होना।”
इसके बाद अशोक सर ने एक पुरानी कथा सुनाई।
युद्ध के दिनों में सैनिकों का एक दल एक गाँव में घुस आया। उन्होंने गाँव की महिलाओं पर अत्याचार किया। उनमें से एक स्त्री ने साहसपूर्वक प्रतिरोध किया और स्वयं को बचाने में सफल रही।
सैनिकों के चले जाने के बाद गाँव की स्त्रियाँ बाहर निकलीं। वे भयभीत, घायल और गहरे सदमे में थीं। प्रतिरोध करने वाली स्त्री भी उनके बीच खड़ी थी।
उसने कहा—
“हमारे साथ जो हुआ, उसका दोष हमारा नहीं है। अपराध केवल अत्याचारियों का है। हमें एक-दूसरे का सहारा बनकर न्याय माँगना चाहिए।”
लेकिन कुछ स्त्रियों के मन में भय पैदा हो गया। उन्हें लगा कि जब परिवार के लोग लौटेंगे, तब प्रतिरोध करने वाली स्त्री का उदाहरण देकर उनसे सवाल किए जाएँगे। भय और सामाजिक बदनामी ने उनकी बुद्धि को ढक लिया। वे उसी साहसी स्त्री को दोष देने लगीं।
तभी गाँव की वृद्धा माता हरप्रीत आगे आईं। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा—
“रुको! तुम अपने अपराधियों को छोड़कर अपनी ही बहन को दोष दे रही हो। जिसने अत्याचार सहा, उसकी गरिमा नष्ट नहीं होती। लज्जा पीड़ित की नहीं, अपराधी की होती है। और जिसने प्रतिरोध किया, वह दूसरों से श्रेष्ठ नहीं हो जाती—क्योंकि संकट में हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग होती है।”
वृद्धा ने सभी महिलाओं को गले लगाया और कहा—
“यदि हम भय के कारण साहस की आवाज दबा देंगे, तो अत्याचारियों को दूसरी विजय मिल जाएगी। पहली विजय उन्होंने बल से प्राप्त की थी; दूसरी विजय उन्हें हमारी आपसी फूट से मिलेगी।”
अगले दिन गाँव की पंचायत बैठी। पहले वहाँ प्रायः कमजोर लोगों को ही दोषी ठहराया जाता था, पर इस बार महिलाओं ने एकजुट होकर कहा—
“हम किसी पीड़ित को अपमानित नहीं होने देंगे। हम अपराधियों के विरुद्ध प्रमाण जुटाएँगे, प्रशासन से न्याय माँगेंगे और भविष्य में गाँव की सुरक्षा के लिए सामूहिक व्यवस्था बनाएँगे।”
उनकी एकता ने गाँव की दिशा बदल दी। अब साहस किसी एक महिला का बोझ नहीं था; वह पूरे समुदाय का चरित्र बन गया था।
कथा समाप्त हुई तो बरामदे में कुछ देर मौन छाया रहा।
सिख विद्यार्थी आकाशदीप बोला—
“सर, हम अपना स्वाभिमान कभी गिरवी नहीं रखेंगे।”
अशोक सर मुस्कराए—
“यही बात ठीक है, लेकिन याद रखना—जान दे देना ही स्वाभिमान नहीं होता। कभी-कभी जीवित रहकर सत्य बोलना, कानून का सहारा लेना, पीड़ित के साथ खड़ा होना और लंबे समय तक भ्रष्ट व्यवस्था से संघर्ष करना अधिक बड़ा साहस होता है।”
ब्रजेश यादव ने पूछा—
“इस कथा का आज के भ्रष्ट समाज से क्या संबंध है?”
अशोक सर ने उत्तर दिया—
“भ्रष्ट व्यवस्था भी ऐसा ही करती है। पहले वह ईमानदार व्यक्ति को अकेला करती है। फिर उसका मजाक उड़ाती है, उसके चरित्र पर प्रश्न उठाती है और बाकी लोगों को डराती है—क्योंकि एक ईमानदार व्यक्ति की उपस्थिति अनेक लोगों की बेईमानी का आईना बन जाती है।”
“इसलिए भ्रष्ट लोग आईना तोड़ना चाहते हैं, अपना चेहरा सुधारना नहीं।”
आकाशदीप ने कहा—
“तब समाधान क्या है?”
अशोक सर बोले—
“ईमानदार व्यक्ति को अकेला मत छोड़ो। प्रमाण के साथ सत्य बोलो, शांतिपूर्ण संगठन बनाओ, संवैधानिक उपाय अपनाओ और पीड़ित को दोषी मत बनाओ। स्वाभिमान अहंकार नहीं है; वह अपने और दूसरों के मानवीय अधिकारों की रक्षा करने का साहस है।”
वर्षा थम चुकी थी। सब लोग बाहर निकले। आकाश में बादल अभी थे, पर उनके बीच से प्रकाश की एक किरण धरती पर उतर रही थी—मानो कह रही हो कि अँधेरा तभी टिकता है, जब दीपक अलग-अलग और अकेले रहते हैं।
कथा का संदेश:
जब समाज ईमानदार व्यक्ति को इसलिए मिटाना चाहता है कि उसकी उपस्थिति भ्रष्ट लोगों को लज्जित करती है, तब वह वास्तव में अपने ही सम्मान की हत्या करता है। समाधान हिंसक प्रतिशोध नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, एकता और विवेकपूर्ण प्रतिरोध है।
पुस्तक "मॉय ड्रीम :अमिताभ बच्चन "से...?!
अशोक सर अपने किशोरावस्था में बी आर चौपड़ा के टीवी सीरियल महाभारत में मुकेश खन्ना अभिनीत भीष्म चरित्र व अमिताभ बच्चन अभिनीत शहंशाह, खुदा गबाह फ़िल्म से काफी प्रभावित थे।
सन 2147 ई०!
भारत में ब्रिटिश सत्ता-हस्तांतरण के दो सौ वर्ष पूरे हो चुके थे। सरकारी अभिलेखों में 1947 को स्वतंत्रता का वर्ष लिखा था, किंतु अनेक विचारक उसे अधूरी स्वतंत्रता मानते थे। उनका प्रश्न था—यदि आर्थिक नीतियाँ, मुद्रा-व्यवस्था और व्यापार आज भी विदेशी प्रभाव से मुक्त नहीं हैं, तो क्या केवल शासकों के बदल जाने को पूर्ण आजादी कहा जा सकता है?
इतिहासकारों का दूसरा वर्ग सावधान करता था कि राष्ट्रमंडल की सदस्यता स्वेच्छा पर आधारित है और भारतीय रिज़र्व बैंक भी स्वतंत्र भारत की वैधानिक संस्था है। इसलिए इतिहास को प्रमाणों के साथ समझना चाहिए। फिर भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस, आज़ाद हिंद सरकार, आज़ाद हिंद फौज और आज़ाद हिंद बैंक से संबंधित अनेक प्रश्न लोगों के मन में जीवित थे।
लेकिन अब इन बहसों से बहुत आगे का समय आ चुका था।
सन 2147 में पृथ्वी का तापमान काफी बढ़ चुका था। समुद्र का जलस्तर ऊपर उठने, अनियंत्रित भूमि-निर्माण, तटीय क्षरण और बार-बार आने वाले तूफानों ने मुंबई का भूगोल बदल दिया था। पुराने महानगर का बड़ा भाग समुद्र में समा चुका था। कहीं ऊँची इमारतों के टूटे शिखर पानी से बाहर झाँकते थे, तो कहीं पुराने पुल समुद्री जीवों के बसेरे बन चुके थे।
उसी डूबी हुई मुंबई के ऊपर एक चमकीली उड़नतश्तरी मंडरा रही थी।
उसके पारदर्शी कक्ष में तीन नेत्रों वाला वृद्ध सजाकदक्फक्फ बैठा था। उसके साथ उसी ग्रह की युवा शोधार्थी तिराश्मिका पृथ्वी के प्राचीन अभिलेख देख रही थी। उसका तीसरा नेत्र किसी अद्भुत यंत्र की तरह समुद्र के नीचे छिपी संरचनाओं का चित्र सामने ला रहा था।
“गुरुदेव!” तिराश्मिका ने पूछा, “क्या यह नगर आरम्भ से ही इतना विशाल था?”
सजाकदक्फक्फ ने समुद्र की ओर संकेत किया। सामने एक त्रिआयामी मानचित्र उभर आया। उसमें सात छोटे-छोटे द्वीप दिखाई दे रहे थे—माहिम, वर्ली, परेल, मझगांव, बॉम्बे द्वीप, कुलाबा और लिटिल कुलाबा।
“नहीं,” वृद्ध ने उत्तर दिया, “मुंबई कभी सात द्वीपों का समूह थी। बाद में भूमि-पुनर्निर्माण, बाँधों और कॉज़वे के माध्यम से समुद्र के कुछ हिस्सों को भरकर इन द्वीपों को जोड़ा गया। इसी से विशाल महानगर का निर्माण हुआ।”
“यदि इन्हें नहीं जोड़ा जाता तो?”
“तब संभवतः प्रत्येक द्वीप का अपना छोटा नगर होता। उनके बीच नावें, जल-रेल और समुद्री पुल चलते। जनसंख्या का दबाव शायद सीमित रहता। मैंग्रोव और ज्वारीय क्षेत्र अधिक सुरक्षित होते। किंतु जीवन आसान ही होता, यह निश्चित नहीं—तूफानों, आवागमन और आवास की अपनी समस्याएँ भी होतीं।”
कुछ पल बाद तिराश्मिका ने अभिलेख में एक पुराना नाम पढ़ा—अशोक कुमार वर्मा ‘बिंदु’।
“ये कौन थे?”
सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया, “बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी के संधिकाल में रहने वाले एक लेखक। उनके लेखन में इतिहास, भविष्य, प्रकृति और ब्रह्मांडीय चेतना आपस में मिलते थे। बताया जाता है कि सन 1990 के आसपास से वे मुंबई के समुद्र में डूबने जैसे स्वप्न देखते थे। उन्होंने अपने कुछ लेखों और पुस्तकों में इसकी आशंका व्यक्त की थी।”
“क्या उनकी भविष्यवाणी वैज्ञानिक थी?”
वृद्ध मुस्कराया, “स्वप्न वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होते, तिराश्मिका। किसी भविष्यवाणी को सत्य सिद्ध करने के लिए तिथि, मूल प्रकाशन और स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक होते हैं। लेकिन कभी-कभी किसी संवेदनशील व्यक्ति की आशंका समाज के लिए चेतावनी बन सकती है। उसका मूल्य अंधविश्वास में नहीं, बल्कि उस प्रश्न में होता है जिसे वह हमारे सामने रखती है।”
स्क्रीन पर अशोक सर के जीवन के कुछ दृश्य उभरने लगे। एक छोटे-से कमरे में किताबों की पांडुलिपियाँ बिखरी थीं। वे बार-बार उन्हें क्रम से लगाते और सोचते—
“देह का समय सीमित है। जो विचार लिखे जा चुके हैं, वे पाठकों तक पहुँचने चाहिए।”
उन्हें सन 2023 तक समाज से बड़ी आशाएँ थीं। वे चाहते थे कि लोग राजनीतिक दलों और नेताओं के नामों से आगे बढ़कर व्यवस्था, इतिहास और प्रकृति पर प्रश्न करें। लेकिन जब उनकी अनेक पांडुलिपियाँ अप्रकाशित रह गईं, तो वे बेचैन हो उठे। उन्होंने अधिक से अधिक पुस्तकों को अपने जीवनकाल में प्रकाशित करने का संकल्प लिया।
एक सभा में उन्होंने कहा था—
“मैं निश्चित भविष्य बताने वाला ज्योतिषी नहीं हूँ। मैं केवल चेतावनी देता हूँ—यदि समुद्र के स्वाभाविक क्षेत्र पर लगातार कब्जा होगा, मैंग्रोव काटे जाएँगे, प्रदूषण और तापवृद्धि नहीं रुकेगी, तो सन 2100 से पहले ही मुंबई के अनेक तटीय हिस्सों पर गंभीर संकट आ सकता है। इसे भविष्यवाणी नहीं, सावधानी की पुकार समझो!”
तिराश्मिका ने पूछा, “फिर लोगों ने क्या किया?”
वृद्ध की तीनों आँखों में उदासी उतर आई।
“कुछ लोगों ने चेतावनी को सनसनी बना दिया। कुछ ने उसका उपहास किया। कुछ राजनीति में उलझे रहे। वे बहस करते रहे कि किस दल ने अधिक विकास किया, लेकिन बहुत कम लोगों ने पूछा कि विकास किसकी कीमत पर हुआ। समुद्र को पीछे धकेलकर बनाए गए नगर में समुद्र के अधिकार को लगभग भुला दिया गया।”
उड़नतश्तरी धीरे-धीरे नीचे उतरी। समुद्र के भीतर पुराने सात द्वीपों की रूपरेखा प्रकाशमान होने लगी। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति मनुष्य द्वारा मिटाई गई सीमाओं को फिर से उकेर रही हो।
सजाकदक्फक्फ बोला—
“मनुष्य ने द्वीपों को जोड़ दिया, पर अपने हृदयों को नहीं जोड़ पाया। उसने समुद्र को बाँटने का प्रयत्न किया, जबकि स्वयं जाति, मजहब, दल और स्वार्थ में बँटा रहा। यही उसके विकास की सबसे बड़ी विडम्बना थी।”
“तो क्या प्रकृति मनुष्य से बदला लेती है?” युवती ने पूछा।
“नहीं। प्रकृति बदला नहीं लेती; वह अपने नियमों के अनुसार संतुलन बनाती है। जल को मार्ग चाहिए। नदी को तट चाहिए। समुद्र को ज्वारीय क्षेत्र और धरती को वन चाहिए। जब मनुष्य इन सीमाओं की उपेक्षा करता है, तो परिणाम दंड जैसे दिखाई देते हैं।”
उड़नतश्तरी की स्क्रीन पर अंतिम संदेश चमका—
आजादी केवल सत्ता बदलने का नाम नहीं।
आजादी इतिहास को प्रमाण सहित समझने, आर्थिक निर्णय स्वयं लेने और प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करने की सामूहिक क्षमता है।
तिराश्मिका ने डूबी हुई मुंबई की ओर देखा। समुद्र के बीच सात हरित द्वीपों की काल्पनिक छवि उभर रही थी—जहाँ छोटी बस्तियाँ थीं, जलमार्गों पर स्वच्छ नौकाएँ चल रही थीं और मैंग्रोव नगरों की रक्षा कर रहे थे।
वह बोली, “यदि मुंबई सात द्वीपों में ही रहती, तो शायद उसका जीवन धीमा और कठिन होता—लेकिन संभव है कि समुद्र के साथ उसका रिश्ता अधिक जीवित रहता।”
सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया—
“इतिहास को बदला नहीं जा सकता, लेकिन उससे भविष्य के लिए विवेक पाया जा सकता है। अशोक सर की बेचैनी भी शायद इसी बात के लिए थी—उनकी पुस्तकें केवल उनका नाम बचाने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सामने प्रश्न बचाए रखने के लिए प्रकाशित हों।”
उड़नतश्तरी ऊपर उठने लगी। नीचे समुद्र की लहरें मानो कह रही थीं—
नगर मनुष्य का हो सकता है, पर भूमि, जल और आकाश पर केवल मनुष्य का अधिकार नहीं। विकास वही है, जिसमें आने वाली पीढ़ियों और पूरी प्रकृति के लिए भी स्थान शेष रहे।
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