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शनिवार, 22 अगस्त 2026

सन 2075 ई० की एक कथ!

https://amzn.in/d/0dpw0Glq पुस्तक :: क्रांति क्यों? कैसे? लेखक ::Ashok Kumar Verma Bindu
सन 2075 ई० की एक कथा समय सन 2075 ई० का रहा होगा। धरती पर बहुत कुछ बदल चुका था। सन 2029 के बाद जिन परिवर्तनों की शुरुआत हुई थी, उनके परिणाम अब नगरों, जंगलों और मनुष्य के व्यवहार तक में दिखाई दे रहे थे। पुराने नगरों के अनेक हिस्से खंडहर बन चुके थे और जंगल फिर से धरती पर अपना विस्तार करने लगे थे। ऐसे ही एक घने जंगल के बीच किसी प्राचीन किले का खंडहर था। उसके खुले प्रांगण में बालक-बालिकाएँ प्रशिक्षण ले रहे थे। कुछ तीरंदाजी का अभ्यास कर रहे थे, कुछ आत्मरक्षा सीख रहे थे और कुछ घायल व्यक्ति की सहायता करने का प्रशिक्षण ले रहे थे। उनके गुरु उन्हें बार-बार समझा रहे थे— “शस्त्र हाथ की शक्ति है, लेकिन विवेक मनुष्य की असली शक्ति। विवेक के बिना उठाया गया शस्त्र स्वयं अन्याय बन जाता है।” खंडहर के एक कोने में पत्थरों से बना ऊँचा तख्त था। उस पर एक युवती बैठी थी। उसका नाम अनंता था। उसके हाथों में पुरानी और पीली पड़ चुकी पुस्तक थी— “क्रांति क्यों? कैसे..?!” लेखक—अशोक कुमार वर्मा ‘बिंदु’ उसके पास एक वृद्ध व्यक्ति शांत भाव से बैठा था। उसकी आँखों की रोशनी जा चुकी थी, पर स्मृतियाँ आज भी जीवित थीं। लोग उसे बुजुर्ग राज कहते थे। तख्त पर एक दूसरी पुस्तक भी रखी थी—“लंका में विभीषण?!” अनंता पुस्तक से पढ़ने लगी— “हर क्रांति के पीछे तत्कालीन कारण होते हैं। कोई भी क्रांति अचानक पैदा नहीं होती। प्रत्येक कालखंड और प्रत्येक पल का अपना विशेष महत्त्व होता है।” कुछ दूर बैठे लोगों ने यह सुनकर आपस में चर्चा शुरू कर दी। एक युवक बोला, “यदि अन्याय हमेशा से था, तो क्रांति किसी विशेष समय में ही क्यों होती है?” एक बुजुर्ग महिला ने उत्तर दिया, “क्योंकि सूखी लकड़ियाँ वर्षों तक पड़ी रह सकती हैं, लेकिन आग तभी लगती है जब कोई तत्कालीन चिनगारी उन्हें छूती है।” सबकी निगाह राज की ओर गई, मगर वह खामोश था। वह उस दिन जंगल के खंडहर में नहीं, अपनी स्मृतियों के किसी पुराने कक्ष में बैठा था। अशोक सर की स्मृति राज को अपनी किशोरावस्था याद आने लगी। वह पहली बार अशोक सर की कक्षा में बैठा था। शरीर से वे उस समय जवान दिखाई देते थे, पर उनकी आँखों में लंबे संघर्ष की थकान छिपी रहती थी। जीविका के लिए वे निजी विद्यालयों में बहुत कम वेतन पर पढ़ाते थे। धन का अभाव था, स्वास्थ्य भी हमेशा साथ नहीं देता था और पारिवारिक सम्पत्ति को लेकर भी उन्हें अनेक परेशानियों से जूझना पड़ता था। फिर भी वे विद्यार्थियों के सामने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा का प्रदर्शन नहीं करते थे। एक दिन उन्होंने बोर्ड पर लिखा था— “क्रांति का अर्थ केवल सत्ता बदलना नहीं; मनुष्य की सोच और व्यवस्था का चरित्र बदलना है।” राज ने पूछा था, “सर, क्या हर क्रांति में संघर्ष और हिंसा आवश्यक होती है?” अशोक सर मुस्कराए थे। “नहीं, राज। हिंसा क्रांति की पहचान नहीं, कई बार उसकी असफलता का प्रमाण होती है। सच्ची क्रांति शिक्षा, सत्य, संगठन, संवेदना और न्यायपूर्ण व्यवस्था से शुरू होती है। यदि सत्ता बदल जाए, पर शोषण करने की मानसिकता न बदले, तो वह क्रांति नहीं—सिर्फ कुर्सियों का परिवर्तन है।” वे अपने लेखों में “अहिंसक नक्सलवाद” जैसे विचार का उल्लेख करते थे। उनका आशय किसी हिंसक गतिविधि से नहीं था। वे समझाते थे कि यदि नक्सल शब्द को अन्याय और शोषण के विरुद्ध पैदा हुए असंतोष से जोड़कर देखा जाए, तो उसका अहिंसक रूप लोकतांत्रिक प्रश्न, वैचारिक प्रतिरोध, गरीबों की शिक्षा और वंचितों के अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष हो सकता है। उनकी कुछ कहानियाँ ब्लॉग पर प्रकाशित थीं। वे सामाजिक संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से भी अपने विचार रखते तथा अधिकारियों और संस्थाओं को पत्र लिखते थे। उनकी भाषा कभी-कभी तीखी थी, मगर उद्देश्य व्यवस्था को सावधान करना था—मनुष्य को नुकसान पहुँचाना नहीं। राज ने सुना था कि कुछ संस्थाओं ने उनकी गोपनीय जाँच भी करवाई थी। पर जाँच में किसी हिंसक अथवा संदिग्ध गतिविधि का प्रमाण नहीं मिला। सामने केवल एक संघर्षशील शिक्षक, लेखक और विचारक का जीवन था, जो सीमित साधनों में व्यवस्था से प्रश्न पूछ रहा था। उम्मीद का कटोरा अनंता ने पुस्तक का अगला अंश पढ़ा— “सन 2011 से 2025 ई० तक का काल संक्रमण का समय था। वह एक दिव्य अवसर भी था, क्योंकि उसमें अनंत की ओर जाने की अनेक सम्भावनाएँ थीं। सन 2011-14 एक विशेष उम्मीद बनकर आया, लेकिन सन 2026-29 तक आते-आते उस उम्मीद का कटोरा भी बदल गया।” यह वाक्य सुनते ही राज स्मृतियों से बाहर आया। उसने पूछा, “तुम जानते हो—उम्मीद का कटोरा बदलने का क्या अर्थ है?” एक बालिका ने कहा, “शायद लोगों की आशाएँ समाप्त हो गई थीं?” राज बोला, “आशा समाप्त नहीं हुई थी; उसका पात्र बदल गया था। लोग पहले किसी नेता, दल या संस्था से परिवर्तन की आशा करते थे। जब उन्हें निराशा मिली, तो वही आशा असंतोष का रूप लेने लगी। कुछ लोग हिंसा की ओर मुड़े, कुछ निराश होकर चुप हो गए और कुछ ने अपने भीतर परिवर्तन शुरू किया।” अनंता ने पूछा, “तो सन 2029 के बाद जो हुआ, उसका कारण केवल तत्कालीन सरकारें थीं?” “नहीं,” राज ने गंभीरता से उत्तर दिया, “किसी एक व्यक्ति या सरकार को पूरे इतिहास का दोषी घोषित कर देना भी अधूरा सत्य है। क्रांति के दो प्रकार के कारण होते हैं—दीर्घकालीन और तत्कालीन।” उसने भूमि पर लकड़ी से दो वृत्त बनाए। “गरीबी, असमान शिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन और न्याय मिलने में देरी—ये दीर्घकालीन कारण थे। लेकिन किसी विशेष घटना, कठोर निर्णय, अन्यायपूर्ण कार्रवाई या जनता की उपेक्षा ने चिनगारी का काम किया—वह तत्कालीन कारण बना।” एक युवक ने पूछा, “फिर जिम्मेदार कौन था?” राज ने कहा— “वह सत्ता, जो सुन नहीं रही थी; वह समाज, जो दूसरों का दुःख नहीं देख रहा था; वह नागरिक, जो अपने अधिकार तो चाहता था पर कर्तव्य भूल गया था; और वह विद्रोही भी, जिसने न्याय की लड़ाई में मानवता छोड़ दी थी। इतिहास में जिम्मेदारी प्रायः एक ओर नहीं होती।” सबसे बड़ी क्रांति तभी प्रशिक्षण कर रहे एक बालक के हाथ से लकड़ी का अभ्यास-धनुष छूट गया। वह झुँझलाकर उसे तोड़ने वाला था, पर प्रशिक्षक ने उसका हाथ रोक दिया। राज ने यह देखकर कहा, “यही क्रांति की पहली परीक्षा है।” सबने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। “जिस मनुष्य को अपने क्रोध पर अधिकार नहीं, वह व्यवस्था बदलने निकलेगा तो नई व्यवस्था में भी पुराने अत्याचार पैदा कर देगा। इसीलिए अशोक सर कहा करते थे—पहली क्रांति अपने भीतर करनी होगी।” उसने बच्चों को अपने पास बुलाकर कहा— “तुम्हें यह प्रशिक्षण किसी से घृणा करने के लिए नहीं दिया जा रहा। तुम्हें कमजोर की रक्षा, संकट में सहायता और अपने समुदाय की सुरक्षा सीखनी है। हमारा प्रथम मार्ग संवाद, न्याय और अहिंसा होगा। शक्ति का उपयोग केवल जीवन की रक्षा के लिए और अंतिम आवश्यकता में होना चाहिए।” अनंता ने तख्त पर रखी दूसरी पुस्तक “लंका में विभीषण?!” उठाई और पूछा, “इस पुस्तक का यहाँ क्या अर्थ है?” राज ने उत्तर दिया— “विभीषण हमें बताता है कि अपने परिवार, दल अथवा समुदाय का साथ देना ही धर्म नहीं होता। जब अपना पक्ष अन्याय पर उतर आए, तब सत्य का साथ देना चाहिए। लेकिन सत्य का साथ देने वाले को पहले अपने स्वार्थ और अहंकार की भी जाँच करनी चाहिए।” अब राज के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। “यदि अशोक सर आज जीवित होंगे, तो सौ वर्ष की आयु पार कर चुके होंगे। पता नहीं वे कहाँ हैं। किंतु शिक्षक का वास्तविक जीवन उसके शरीर में नहीं, विद्यार्थियों के विवेक में चलता रहता है।” अनंता ने पुस्तक बंद कर दी। दूर क्षितिज पर सूर्य ढल रहा था। प्रशिक्षण समाप्त हुआ और बच्चों ने अपने अभ्यास-शस्त्र एक ओर रख दिए। फिर सभी ने मिलकर खंडहर के पास पौधे लगाए और रात की पाठशाला की तैयारी शुरू कर दी। राज ने कहा— “क्रांति तब पूर्ण नहीं होती जब पुराना भवन गिर जाए। वह तब पूर्ण होती है जब उसके स्थान पर न्यायपूर्ण समाज खड़ा हो। तोड़ना क्षण भर का काम है; निर्माण कई पीढ़ियों की साधना है।” उस रात खंडहर में किसी युद्ध की योजना नहीं बनी। वहाँ शिक्षा, जल-संरक्षण, समान अवसर, ग्रामसभा और शांतिपूर्ण न्याय-व्यवस्था की रूपरेखा तैयार हुई। अशोक सर वहाँ शरीर से उपस्थित नहीं थे, लेकिन उनके विचार हर प्रश्न के बीच जीवित थे। कथा का संदेश: क्रांति किसी एक घटना से अचानक जन्मी दिखाई दे सकती है, पर उसके पीछे लंबे समय से जमा समस्याएँ होती हैं। तत्कालीन घटना केवल चिनगारी बनती है। वास्तविक परिवर्तन हिंसा, प्रतिशोध अथवा सत्ता-परिवर्तन से नहीं, बल्कि आत्म-सुधार, शिक्षा, न्याय, संवेदना और उत्तरदायी व्यवस्था के निर्माण से आता है।