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गुरुवार, 18 जून 2026

त्वचा से प्रकाशिय भोजन?!

किशोर अशोक की आँखों में हमेशा कुछ अलग चमक होती थी। वह साधारण गाँव-शहर का एक लड़का था, लेकिन उसके भीतर जैसे कोई असाधारण संसार पल रहा था। कक्षा आठ में ही उसने लिखना शुरू कर दिया था—कविताएँ, छोटे-छोटे विचार, और कभी-कभी ऐसे सपनों का वर्णन जो किसी और के लिए कल्पना मात्र होते। एक रात, जब आकाश में तारे कुछ ज्यादा ही स्पष्ट दिखाई दे रहे थे, अशोक ने एक अजीब स्वप्न देखा। वह खुद को अंतरिक्ष में तैरता हुआ पाता है—पृथ्वी से करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर। वहाँ एक विचित्र ग्रह था—“हा हा हूस!” उस ग्रह की धरती पर विशालकाय जीव विचरण कर रहे थे, जो पृथ्वी के डायनासोर जैसे लगते थे, पर उनसे भी अधिक विकसित। लेकिन असली आश्चर्य वहाँ के वैज्ञानिक थे—कुछ मानव जैसे, कुछ बिल्कुल अलग—एलियन्स। वे मिलकर एक अद्भुत प्रयोग कर रहे थे।
उनका लक्ष्य था—मानव त्वचा को ऐसा बनाना कि वह सीधे सूर्य की रोशनी से भोजन बना सके! अशोक ने देखा—एक मनुष्य को एक कक्ष में रखा गया है। उसकी त्वचा में सूक्ष्म परिवर्तन किए जा रहे हैं। धीरे-धीरे उसकी त्वचा हरी-सी चमकने लगती है, जैसे पत्तियाँ। एलियन वैज्ञानिक मुस्कुरा रहे थे—“अब मानव भूख से मुक्त होगा… वह प्रकृति के और करीब होगा…” अचानक एक आवाज़ गूँजी— “अशोक! यह केवल विज्ञान नहीं, यह भविष्य का संकेत है…” और उसी क्षण उसकी नींद खुल गई। सन 1989 देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी। समाज और राजनीति में उथल-पुथल थी, लेकिन अशोक के भीतर एक अलग ही हलचल थी। वह कक्षा 11 में था। एक दिन शाम के समय, अपने मित्र जसकरण सिंह के साथ वह “विज्ञान प्रगति” पत्रिका पढ़ रहा था। “देखो ये—‘हम सुझाएँ, आप बनाएं!’” जसकरण ने उत्साह से कहा। दोनों ने मिलकर योजना बनाई—कुछ नया करेंगे, कुछ प्रयोग करेंगे। उनका दिमाग विज्ञान के नए-नए विचारों से भरा रहता था। अशोक ने हिचकते हुए कहा— “अगर इंसान की त्वचा भी पेड़-पौधों की तरह हो जाए तो…?” जसकरण हँस पड़ा—“तू भी ना, अशोक! ये तो फिल्मी बात है।” लेकिन अशोक चुप रहा। उसे अपने स्वप्न की हर बात याद थी। समय बीतता गया। इंटर के बाद जब विषय चुनने का समय आया, तो जीवन ने एक मोड़ लिया। अशोक ने विज्ञान छोड़कर कला वर्ग चुन लिया। सबको आश्चर्य हुआ— “इतना साइंस में रुचि, और अब आर्ट्स?” लेकिन अशोक के भीतर कुछ बदल चुका था। अब वह केवल प्रयोग नहीं, अनुभव भी समझना चाहता था। वह ध्यान (मेडिटेशन) करने लगा। उसके स्वप्न और भी गहरे होने लगे। कभी वह खुद को तारों के बीच पाता, कभी किसी अनजान भाषा को समझने लगता, कभी ऐसा महसूस करता जैसे कोई उसे भीतर से मार्ग दिखा रहा हो। एक दिन ध्यान में उसे फिर वही ग्रह दिखा—“हा हा हूस!” इस बार एलियन्स ने उससे सीधे संवाद किया— “तुम्हारी पृथ्वी अभी तैयार नहीं है… लेकिन तुम्हारे जैसे कुछ लोग हैं जो पुल बनेंगे—विज्ञान और चेतना के बीच…” अशोक ने पूछा— “क्या सच में ऐसा संभव है कि मानव धूप से जी सके?” उत्तर आया— “जब वह प्रकृति से अलग नहीं, उसका हिस्सा बन जाएगा—तब सब संभव है।” धीरे-धीरे अशोक को विश्वास हो गया— कि ब्रह्मांड में हम अकेले नहीं हैं। और जो स्वप्न वह देखता है, वे केवल कल्पना नहीं, किसी गहरे सत्य की झलक हैं। उसने लिखना शुरू किया— अपने स्वप्न, अपने अनुभव, अपने प्रश्न… लोगों ने उसे कभी पागल कहा, कभी दार्शनिक, कभी स्वप्नद्रष्टा। लेकिन अशोक जानता था— उसकी यात्रा अभी शुरू हुई है। क्योंकि कहीं न कहीं, करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर, “हा हा हूस!” पर वह प्रयोग अभी भी जारी था… और शायद एक दिन— मानव सच में प्रकाश से जीवन जीना सीख जाएगा।

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