Powered By Blogger

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

दंड देने वाला कौन था?!

दंड देने वाला कौन था?! सन 10050 ईस्वी! अंतरिक्ष के असीम विस्तार में एक उड़नतश्तरी पृथ्वी के पुराने सौरमंडल की ओर बढ़ रही थी। उसके पारदर्शी कक्ष में तीन नेत्रधारी बुजुर्ग सफहेफज्जफ़्स बैठा था। उसके सामने तारों, ग्रहों और नष्ट हो चुकी सभ्यताओं का विशाल मानचित्र चमक रहा था। उसके पास बैठी तीन नेत्रधारी युवती कग्वफ्फग उस स्थान को देख रही थी, जहाँ कभी नीली पृथ्वी हुआ करती थी। अब वहाँ धूल, चट्टानों और कृत्रिम धातुओं का विशाल मलबा सूर्य की परिक्रमा कर रहा था। सफहेफज्जफ़्स ने पृथ्वी के प्राचीन अभिलेख खोलते हुए कहा— “सन 1990 ईस्वी के आते-आते कुछ लोग मनुष्यों को सचेत करने लगे थे कि भविष्य कैसा होने वाला है। वे जंगलों के विनाश, जल और वायु के प्रदूषण, तापमान-वृद्धि, परमाणु अस्त्रों तथा असीमित उपभोग के खतरे बता रहे थे। लेकिन न जनता ने पर्याप्त ध्यान दिया, न सत्ता ने।” कग्वफ्फग ने पूछा— “तो इस पृथु-मही की प्रकृति और मनुष्य-सभ्यता को नष्ट करने के लिए स्वयं मनुष्य ही जिम्मेदार था?” “हाँ।” “वह कैसे? क्या इतने मूर्ख थे मनुष्य?” सफहेफज्जफ़्स ने कहा— “वे ज्ञानहीन नहीं थे। उनके पास विज्ञान था, विश्वविद्यालय थे, धर्मग्रंथ थे और भविष्य का अनुमान लगाने वाले उपकरण भी थे। उनकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे जानते कुछ थे, कहते कुछ थे और करते कुछ और थे।” “क्या प्रत्येक मनुष्य समस्या बन चुका था?” “प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से दोषी नहीं था। किसी का अपराध बहुत बड़ा था, किसी की भागीदारी छोटी थी और कोई विरोध भी कर रहा था। फिर भी अधिकांश मनुष्य जिस व्यवस्था में जी रहे थे, उसे अपने आचरण से चलाते भी थे। जो समाधान रखते थे, उन्हें महत्व नहीं दिया जाता था। कई बार उनका मजाक तक उड़ाया जाता था।” “और?” सफहेफज्जफ़्स कुछ क्षण रुका। उसने पृथ्वी के अतीत का एक दृश्य खोल दिया। “और क्या? सुनो…” सन 1990 ईस्वी—नदी किनारे की सभा एक छोटे नगर से होकर जीवना नदी बहती थी। कभी उसका पानी इतना स्वच्छ था कि लोग उसमें अपना प्रतिबिंब देख लेते थे। लेकिन अब नदी के किनारे एक विशाल कारखाना लग चुका था। नगर की नालियाँ भी उसी में गिरती थीं। नदी के तट पर उस दिन एक जनसभा आयोजित हुई। सभा में पर्यावरणविद् ऋषिराज, वैज्ञानिक डॉ. माधवी, कारखाने का मालिक धनवर्धन, मंत्री लोकपाल सिंह और नगर के सैकड़ों लोग उपस्थित थे। ऋषिराज ने नदी का काला पड़ चुका पानी एक पात्र में भरकर सबके सामने रखा और कहा— “यह केवल नदी का रंग नहीं बदला है। यह हमारे भविष्य का रंग है। आज हम जो नदी को दे रहे हैं, कल वही हमारे शरीर में लौटकर आएगा।” सभा में बैठे कुछ लोग हँस पड़े। एक व्यक्ति बोला— “यह बूढ़ा हमेशा विनाश की बातें करता है!” दूसरे ने कहा— “कारखाना बंद हो गया तो हमें नौकरी कौन देगा?” मंत्री लोकपाल सिंह ने मंच से घोषणा की— “विकास के रास्ते में बाधा डालने वालों से सावधान रहिए। यह कारखाना हमारे नगर की प्रगति का प्रतीक है।” ऋषिराज ने पूछा— “जो प्रगति नदी को मार दे, खेतों को विषैला कर दे और बच्चों को बीमार बना दे, उसे प्रगति कहेंगे या भविष्य से लिया गया कर्ज?” कारखाने के मालिक धनवर्धन ने उत्तर दिया— “हम सभी सरकारी नियमों का पालन कर रहे हैं।” डॉ. माधवी ने कुछ कागज उठाए— “नियम इतने कमजोर हैं कि उनका पालन करने के बाद भी विष नदी में पहुँच रहा है। यदि अभी व्यवस्था नहीं बदली गई तो इसका कुप्रभाव आने वाली कई पीढ़ियाँ सहेंगी।” एक पत्रकार ने पूछा— “क्या आप कह रही हैं कि प्रकृति मनुष्य को दंड देगी?” ऋषिराज ने उत्तर दिया— “प्रकृति किसी न्यायाधीश की तरह क्रोधित होकर दंड देने नहीं बैठती। कर्म के कुप्रभाव का सामने आना ही दंड है। विष नदी में डालोगे तो वही विष जल, अन्न, वनस्पति और शरीर से होकर लौटेगा। यह बदला नहीं, प्रतिक्रिया है।” मंत्री ने उपहास करते हुए कहा— “तो क्या नदी मुकदमा दर्ज कराएगी?” सभा ठहाकों से भर गई। ऋषिराज खामोश हो गया। उसने पात्र का काला पानी वापस नदी में उड़ेलते हुए कहा— “नदी मुकदमा दर्ज नहीं कराएगी। उसका मौन ही भविष्य का निर्णय लिख रहा है।” कग्वफ्फग ने पूछा— “क्या उनकी चेतावनी सच हुई?” सफहेफज्जफ़्स ने अगला दृश्य खोल दिया। सन 2025 ईस्वी जीवना नदी के आसपास रहने वाले लोगों में गंभीर बीमारियाँ बढ़ चुकी थीं। खेतों की उपज घट रही थी। भूजल में जहरीले रसायन मिल गए थे। उपचार के लिए बड़े अस्पताल खुल गए थे। नगर की नई पीढ़ी शिकायत कर रही थी— “हमें यह दंड क्यों मिला? हमने तो नदी को प्रदूषित नहीं किया था!” एक वृद्ध किसान ने उत्तर दिया— “तुमने प्रदूषण शुरू नहीं किया, लेकिन अब तुम उसके कुप्रभाव के बीच जन्मे हो। पुराने कर्म का प्रभाव कभी-कभी कर्ता से आगे बढ़कर उसकी संतानों तक पहुँचता है।” तभी एक युवती ने पूछा— “फिर न्याय कहाँ है? अपराध किसी ने किया और कष्ट किसी दूसरे को मिला!” वृद्ध किसान ने कहा— “प्राकृतिक प्रतिक्रिया मनुष्य के न्यायालय जैसी नहीं होती। एक पीढ़ी जंगल काटती है, अगली पीढ़ी सूखे का सामना करती है। एक देश वातावरण को प्रदूषित करता है, लेकिन उसका प्रभाव समुद्र के किसी छोटे द्वीप पर रहने वालों को भी झेलना पड़ सकता है। इसीलिए सामूहिक कर्मों में जिम्मेदारी की समझ बहुत आवश्यक है।” दृश्य समाप्त हो गया। कग्वफ्फग ने पूछा— “तो दंड का वास्तविक अर्थ क्या था?” सफहेफज्जफ़्स ने समझाया— “दंड केवल किसी राजा, न्यायालय अथवा ईश्वर द्वारा दी गई पीड़ा नहीं है। प्रत्येक कर्म किसी न किसी दिशा में प्रभाव उत्पन्न करता है। हितकारी प्रभाव फल बनता है और हानिकारक प्रभाव दंड बनकर सामने आता है।” “क्या हर कुप्रभाव तुरंत लौटता है?” “नहीं। कोई प्रभाव तुरंत दिखाई देता है, कोई वर्षों बाद और कोई कई पीढ़ियों के बाद। आग को छुओ तो दंड तुरंत मिलता है। जंगलों को नष्ट करो तो परिणाम दशकों बाद वर्षा, तापमान और जलचक्र में दिखाई दे सकता है।” “लेकिन यदि प्रभाव देर से आता है तो मनुष्य उसे अपने कर्म से जोड़ नहीं पाता होगा?” “यही सबसे बड़ी समस्या थी। मनुष्य तत्काल घटना को तो समझता था, पर दीर्घकालीन कारण और परिणाम की शृंखला को नहीं। वह कहता था—‘हमने आज पेड़ काटा, आज तो कुछ नहीं हुआ।’ उसे यह दिखाई नहीं देता था कि उसका कर्म भविष्य के सूखे में जुड़ रहा है।” कग्वफ्फग ने पूछा— “मनुष्य द्वारा मनुष्य के साथ किए गए कर्मों की भी ऐसी ही प्रतिक्रिया होती थी?” “अवश्य। किसी मनुष्य का अपमान करो तो उसके भीतर पीड़ा, भय या प्रतिशोध उत्पन्न हो सकता है। किसी समुदाय का लगातार शोषण करो तो एक दिन असंतोष विद्रोह बन सकता है। बच्चों को हिंसा और स्वार्थ का वातावरण दो तो वही संस्कार आगे समाज के व्यवहार में प्रकट होंगे।” “अर्थात कर्म केवल बाहर की वस्तुओं पर नहीं, चेतना पर भी प्रभाव डालता है?” “हाँ। मनुष्य के कर्म वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, जल, भूमि और दूसरे मनुष्यों के शरीर पर ही नहीं, उनकी चेतना पर भी प्रभाव डालते हैं। भय का वातावरण भयभीत चेतना बनाता है; करुणा का व्यवहार करुणामय चेतना को जन्म देता है।” सन 2075 ईस्वी—पृथ्वी न्यायसभा सफहेफज्जफ़्स ने एक और अभिलेख खोला। धरती पर संकट अत्यंत गंभीर हो चुका था। समुद्र का स्तर बढ़ रहा था, जंगल जल रहे थे और कई क्षेत्रों में पीने योग्य जल समाप्त हो रहा था। विश्व के प्रतिनिधियों ने एक विशाल सभा बुलाई थी। उस सभा का नाम रखा गया—पृथ्वी न्यायसभा। सभा के बीच एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित न्यायमंच स्थापित था। उसने प्रश्न किया— “पृथ्वी की वर्तमान दशा के लिए दोषी कौन है?” एक प्रतिनिधि बोला— “उद्योगपति दोषी हैं।” उद्योगपतियों ने कहा— “हमने वही वस्तुएँ बनाईं जिनकी जनता ने माँग की।” जनता के प्रतिनिधि बोले— “सरकारों ने हमें ऐसे जीवन के लिए प्रेरित किया।” सरकारों ने कहा— “हमें सत्ता में बने रहने के लिए जनता की इच्छाएँ पूरी करनी पड़ीं।” वैज्ञानिकों ने कहा— “हमने चेतावनी दी थी, लेकिन हमारी नहीं सुनी गई।” कुछ वैज्ञानिकों से प्रश्न किया गया— “फिर तुमने विनाशकारी हथियार और प्रदूषण फैलाने वाली तकनीकें क्यों बनाईं?” उन्होंने उत्तर दिया— “हम ज्ञान की खोज कर रहे थे। उसके उपयोग का निर्णय सत्ता और बाजार ने किया।” सत्ता ने बाजार को दोष दिया। बाजार ने उपभोक्ता को और उपभोक्ता ने अपनी परिस्थितियों को। अंततः सभा में एक बालक खड़ा हुआ। उसने पूछा— “यदि सभी केवल परिस्थितियों के शिकार थे, तो इन परिस्थितियों को बनाया किसने?” सभा में सन्नाटा छा गया। तभी वृद्ध ऋषिराज की वर्षों पुरानी रिकॉर्डिंग चलाई गई— “एक व्यवस्था किसी अदृश्य आकाश से नहीं उतरती। उसे मनुष्य अपने चुनाव, उपभोग, मौन, भय और स्वार्थ से प्रतिदिन बनाता है।” कृत्रिम न्यायमंच ने कहा— “सभी मनुष्य समान रूप से अपराधी नहीं हैं। जिसने जंगल कटवाए और जिसने उनका विरोध किया, दोनों को समान दोष नहीं दिया जा सकता। जिसने अरबों का लाभ कमाकर प्रदूषण फैलाया और जिसके पास जीवन-निर्वाह का दूसरा साधन नहीं था, उनकी जिम्मेदारी भी समान नहीं हो सकती।” सभा में उपस्थित लोगों ने राहत की साँस ली। लेकिन न्यायमंच ने आगे कहा— “फिर भी यह कहकर कोई पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकता कि वह अकेला क्या कर सकता था। जिसने सत्य जानकर भी सुविधा के कारण मौन धारण किया, वह भी परिणाम की शृंखला का एक अंश बना। जिम्मेदारी का भार सब पर समान नहीं है, लेकिन जिम्मेदारी से पूर्ण मुक्ति भी सबको नहीं दी जा सकती।” एक प्रतिनिधि ने पूछा— “तो दंड किसे दिया जाए?” न्यायमंच ने उत्तर दिया— “दंड आरम्भ हो चुका है।” “किसने दिया?” “किसी राजा ने नहीं। तुम्हारे अपने कर्मों ने।” स्क्रीन पर सूखे खेत, जलते जंगल, बीमार बच्चे और समुद्र में डूबते नगर दिखाई देने लगे। “यह किसी क्रोधित देवता का बदला नहीं। यह कारणों का परिणाम है। तुमने प्रकृति के संतुलन को चोट पहुँचाई; असंतुलन तुम्हारे जीवन में लौट आया। तुमने समाज में असमानता बोई; अविश्वास और संघर्ष की फसल उगी। तुमने जीवों को वस्तु समझा; अंततः मनुष्य भी बाजार की वस्तु बन गया।” एक व्यक्ति चिल्लाया— “लेकिन हमने तो केवल सुख चाहा था!” न्यायमंच ने उत्तर दिया— “तुमने सुख नहीं, असीमित उपभोग चाहा था। सुख संबंधों, संतुलन और चेतना में था; तुमने उसे वस्तुओं में खोजा। वस्तुओं की भूख बढ़ती गई और पृथ्वी छोटी पड़ती गई।” अंतरिक्षयान में बैठी कग्वफ्फग की तीनों आँखें नम हो गईं। उसने पूछा— “तो क्या पूरी जनता मुजरिम थी? क्या सारा सिस्टम मुजरिम था?” सफहेफज्जफ़्स ने कहा— “‘सभी मुजरिम हैं’ कहना उतना ही अधूरा है जितना यह कहना कि ‘कोई दोषी नहीं है।’ न्याय के लिए हमें तीन बातें देखनी पड़ती हैं—किसके पास कितनी शक्ति थी, उसे परिणामों का कितना ज्ञान था और उसने उपलब्ध विकल्पों में से क्या चुना।” “तो अधिक शक्तिशाली व्यक्ति की जिम्मेदारी अधिक थी?” “हाँ। जिसके निर्णय से करोड़ों लोगों और विशाल जंगलों का भविष्य प्रभावित होता था, उसकी जिम्मेदारी सामान्य व्यक्ति से अधिक थी। पर सामान्य व्यक्ति भी अपने छोटे क्षेत्र में पूरी तरह उत्तरदायित्व-विहीन नहीं था।” “और जिन लोगों ने विरोध किया?” “वे सामूहिक दोष में समान भागीदार नहीं थे। उन्होंने मानवता की चेतना को जीवित रखने का प्रयास किया। किंतु उनकी संख्या कम थी और उनकी आवाज लाभ, प्रचार तथा सुविधा के शोर में दबती गई।” “फिर मनुष्य-सभ्यता को बचाने का अंतिम उपाय क्या था?” “दंड से डरना नहीं, कर्म के प्रभाव को समझना। यदि उन्हें मालूम हो जाता कि हर कर्म लौटता है, तो वे प्रकृति के साथ अपने व्यवहार को बदल सकते थे। दंड का श्रेष्ठ रूप प्रतिशोध नहीं, सुधार होता है।” उसी समय उड़नतश्तरी पृथ्वी के अवशेषों के निकट पहुँची। मलबे में घूमता हुआ एक प्राचीन यंत्र सक्रिय हो गया। उसमें मानवता का अंतिम संदेश सुरक्षित था— “हम न्यायालयों में पूछते रहे कि अपराधी कौन है। प्रकृति हमारे सामने परिणाम रखती रही। हम दंड देने वाले को खोजते रहे, जबकि दंड हमारे कर्मों से ही जन्म ले चुका था।” कग्वफ्फग ने धीरे से पूछा— “क्या कर्म ही न्यायाधीश था?” सफहेफज्जफ़्स ने उत्तर दिया— “कर्म न्यायाधीश नहीं था; कर्म कारण था और दंड उसका कुप्रभाव। प्रकृति ने कोई मुकदमा नहीं चलाया। उसने केवल वही लौटाया, जो मानव-सभ्यता ने उसके भीतर छोड़ दिया था।” “क्या हमारी सभ्यता भी ऐसा कर सकती है?” “यदि हमने पृथ्वी की कथा को केवल कहानी समझा, तो अवश्य। किंतु यदि हमने इसे दर्पण माना, तो शायद बच जाएँ।” सफहेफज्जफ़्स ने अपना तीसरा नेत्र बंद कर लिया। उड़नतश्तरी पृथ्वी के मलबे से आगे बढ़ने लगी। पीछे से मानवता का अंतिम संदेश अब भी गूँज रहा था— “दंड कहीं बाहर बैठी हुई क्रूर शक्ति नहीं है। हमारे अहितकारी कर्म जब मनुष्य, समाज, जीव-जंतु, वनस्पति और प्रकृति को घायल करके हमारे पास लौटते हैं, वही दंड है। उसका आगमन शीघ्र हो या देर से—कर्म का प्रभाव मिटता नहीं, केवल समय की परतों में छिप जाता है।”

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें