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मंगलवार, 29 सितंबर 2026

दंड देने वाला कौन था?!

दंड देने वाला कौन था?! सन 10050 ईस्वी! अंतरिक्ष के असीम विस्तार में एक उड़नतश्तरी पृथ्वी के पुराने सौरमंडल की ओर बढ़ रही थी। उसके पारदर्शी कक्ष में तीन नेत्रधारी बुजुर्ग सफहेफज्जफ़्स बैठा था। उसके सामने तारों, ग्रहों और नष्ट हो चुकी सभ्यताओं का विशाल मानचित्र चमक रहा था। उसके पास बैठी तीन नेत्रधारी युवती कग्वफ्फग उस स्थान को देख रही थी, जहाँ कभी नीली पृथ्वी हुआ करती थी। अब वहाँ धूल, चट्टानों और कृत्रिम धातुओं का विशाल मलबा सूर्य की परिक्रमा कर रहा था।
सफहेफज्जफ़्स ने पृथ्वी के प्राचीन अभिलेख खोलते हुए कहा— “सन 1990 ईस्वी के आते-आते कुछ लोग मनुष्यों को सचेत करने लगे थे कि भविष्य कैसा होने वाला है। वे जंगलों के विनाश, जल और वायु के प्रदूषण, तापमान-वृद्धि, परमाणु अस्त्रों तथा असीमित उपभोग के खतरे बता रहे थे। लेकिन न जनता ने पर्याप्त ध्यान दिया, न सत्ता ने।” कग्वफ्फग ने पूछा— “तो इस पृथु-मही की प्रकृति और मनुष्य-सभ्यता को नष्ट करने के लिए स्वयं मनुष्य ही जिम्मेदार था?” “हाँ।” “वह कैसे? क्या इतने मूर्ख थे मनुष्य?” सफहेफज्जफ़्स ने कहा— “वे ज्ञानहीन नहीं थे। उनके पास विज्ञान था, विश्वविद्यालय थे, धर्मग्रंथ थे और भविष्य का अनुमान लगाने वाले उपकरण भी थे। उनकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे जानते कुछ थे, कहते कुछ थे और करते कुछ और थे।” “क्या प्रत्येक मनुष्य समस्या बन चुका था?” “प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से दोषी नहीं था। किसी का अपराध बहुत बड़ा था, किसी की भागीदारी छोटी थी और कोई विरोध भी कर रहा था। फिर भी अधिकांश मनुष्य जिस व्यवस्था में जी रहे थे, उसे अपने आचरण से चलाते भी थे। जो समाधान रखते थे, उन्हें महत्व नहीं दिया जाता था। कई बार उनका मजाक तक उड़ाया जाता था।” “और?” सफहेफज्जफ़्स कुछ क्षण रुका। उसने पृथ्वी के अतीत का एक दृश्य खोल दिया। “और क्या? सुनो…” सन 1990 ईस्वी—नदी किनारे की सभा एक छोटे नगर से होकर जीवना नदी बहती थी। कभी उसका पानी इतना स्वच्छ था कि लोग उसमें अपना प्रतिबिंब देख लेते थे। लेकिन अब नदी के किनारे एक विशाल कारखाना लग चुका था। नगर की नालियाँ भी उसी में गिरती थीं। नदी के तट पर उस दिन एक जनसभा आयोजित हुई। सभा में पर्यावरणविद् ऋषिराज, वैज्ञानिक डॉ. माधवी, कारखाने का मालिक धनवर्धन, मंत्री लोकपाल सिंह और नगर के सैकड़ों लोग उपस्थित थे। ऋषिराज ने नदी का काला पड़ चुका पानी एक पात्र में भरकर सबके सामने रखा और कहा— “यह केवल नदी का रंग नहीं बदला है। यह हमारे भविष्य का रंग है। आज हम जो नदी को दे रहे हैं, कल वही हमारे शरीर में लौटकर आएगा।” सभा में बैठे कुछ लोग हँस पड़े। एक व्यक्ति बोला— “यह बूढ़ा हमेशा विनाश की बातें करता है!” दूसरे ने कहा— “कारखाना बंद हो गया तो हमें नौकरी कौन देगा?” मंत्री लोकपाल सिंह ने मंच से घोषणा की— “विकास के रास्ते में बाधा डालने वालों से सावधान रहिए। यह कारखाना हमारे नगर की प्रगति का प्रतीक है।” ऋषिराज ने पूछा— “जो प्रगति नदी को मार दे, खेतों को विषैला कर दे और बच्चों को बीमार बना दे, उसे प्रगति कहेंगे या भविष्य से लिया गया कर्ज?” कारखाने के मालिक धनवर्धन ने उत्तर दिया— “हम सभी सरकारी नियमों का पालन कर रहे हैं।” डॉ. माधवी ने कुछ कागज उठाए— “नियम इतने कमजोर हैं कि उनका पालन करने के बाद भी विष नदी में पहुँच रहा है। यदि अभी व्यवस्था नहीं बदली गई तो इसका कुप्रभाव आने वाली कई पीढ़ियाँ सहेंगी।” एक पत्रकार ने पूछा— “क्या आप कह रही हैं कि प्रकृति मनुष्य को दंड देगी?” ऋषिराज ने उत्तर दिया— “प्रकृति किसी न्यायाधीश की तरह क्रोधित होकर दंड देने नहीं बैठती। कर्म के कुप्रभाव का सामने आना ही दंड है। विष नदी में डालोगे तो वही विष जल, अन्न, वनस्पति और शरीर से होकर लौटेगा। यह बदला नहीं, प्रतिक्रिया है।” मंत्री ने उपहास करते हुए कहा— “तो क्या नदी मुकदमा दर्ज कराएगी?” सभा ठहाकों से भर गई। ऋषिराज खामोश हो गया। उसने पात्र का काला पानी वापस नदी में उड़ेलते हुए कहा— “नदी मुकदमा दर्ज नहीं कराएगी। उसका मौन ही भविष्य का निर्णय लिख रहा है।” कग्वफ्फग ने पूछा— “क्या उनकी चेतावनी सच हुई?” सफहेफज्जफ़्स ने अगला दृश्य खोल दिया। सन 2025 ईस्वी जीवना नदी के आसपास रहने वाले लोगों में गंभीर बीमारियाँ बढ़ चुकी थीं। खेतों की उपज घट रही थी। भूजल में जहरीले रसायन मिल गए थे। उपचार के लिए बड़े अस्पताल खुल गए थे। नगर की नई पीढ़ी शिकायत कर रही थी— “हमें यह दंड क्यों मिला? हमने तो नदी को प्रदूषित नहीं किया था!” एक वृद्ध किसान ने उत्तर दिया— “तुमने प्रदूषण शुरू नहीं किया, लेकिन अब तुम उसके कुप्रभाव के बीच जन्मे हो। पुराने कर्म का प्रभाव कभी-कभी कर्ता से आगे बढ़कर उसकी संतानों तक पहुँचता है।” तभी एक युवती ने पूछा— “फिर न्याय कहाँ है? अपराध किसी ने किया और कष्ट किसी दूसरे को मिला!” वृद्ध किसान ने कहा— “प्राकृतिक प्रतिक्रिया मनुष्य के न्यायालय जैसी नहीं होती। एक पीढ़ी जंगल काटती है, अगली पीढ़ी सूखे का सामना करती है। एक देश वातावरण को प्रदूषित करता है, लेकिन उसका प्रभाव समुद्र के किसी छोटे द्वीप पर रहने वालों को भी झेलना पड़ सकता है। इसीलिए सामूहिक कर्मों में जिम्मेदारी की समझ बहुत आवश्यक है।” दृश्य समाप्त हो गया। कग्वफ्फग ने पूछा— “तो दंड का वास्तविक अर्थ क्या था?” सफहेफज्जफ़्स ने समझाया— “दंड केवल किसी राजा, न्यायालय अथवा ईश्वर द्वारा दी गई पीड़ा नहीं है। प्रत्येक कर्म किसी न किसी दिशा में प्रभाव उत्पन्न करता है। हितकारी प्रभाव फल बनता है और हानिकारक प्रभाव दंड बनकर सामने आता है।” “क्या हर कुप्रभाव तुरंत लौटता है?” “नहीं। कोई प्रभाव तुरंत दिखाई देता है, कोई वर्षों बाद और कोई कई पीढ़ियों के बाद। आग को छुओ तो दंड तुरंत मिलता है। जंगलों को नष्ट करो तो परिणाम दशकों बाद वर्षा, तापमान और जलचक्र में दिखाई दे सकता है।” “लेकिन यदि प्रभाव देर से आता है तो मनुष्य उसे अपने कर्म से जोड़ नहीं पाता होगा?” “यही सबसे बड़ी समस्या थी। मनुष्य तत्काल घटना को तो समझता था, पर दीर्घकालीन कारण और परिणाम की शृंखला को नहीं। वह कहता था—‘हमने आज पेड़ काटा, आज तो कुछ नहीं हुआ।’ उसे यह दिखाई नहीं देता था कि उसका कर्म भविष्य के सूखे में जुड़ रहा है।” कग्वफ्फग ने पूछा— “मनुष्य द्वारा मनुष्य के साथ किए गए कर्मों की भी ऐसी ही प्रतिक्रिया होती थी?” “अवश्य। किसी मनुष्य का अपमान करो तो उसके भीतर पीड़ा, भय या प्रतिशोध उत्पन्न हो सकता है। किसी समुदाय का लगातार शोषण करो तो एक दिन असंतोष विद्रोह बन सकता है। बच्चों को हिंसा और स्वार्थ का वातावरण दो तो वही संस्कार आगे समाज के व्यवहार में प्रकट होंगे।” “अर्थात कर्म केवल बाहर की वस्तुओं पर नहीं, चेतना पर भी प्रभाव डालता है?” “हाँ। मनुष्य के कर्म वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, जल, भूमि और दूसरे मनुष्यों के शरीर पर ही नहीं, उनकी चेतना पर भी प्रभाव डालते हैं। भय का वातावरण भयभीत चेतना बनाता है; करुणा का व्यवहार करुणामय चेतना को जन्म देता है।” सन 2075 ईस्वी—पृथ्वी न्यायसभा सफहेफज्जफ़्स ने एक और अभिलेख खोला। धरती पर संकट अत्यंत गंभीर हो चुका था। समुद्र का स्तर बढ़ रहा था, जंगल जल रहे थे और कई क्षेत्रों में पीने योग्य जल समाप्त हो रहा था। विश्व के प्रतिनिधियों ने एक विशाल सभा बुलाई थी। उस सभा का नाम रखा गया—पृथ्वी न्यायसभा। सभा के बीच एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित न्यायमंच स्थापित था। उसने प्रश्न किया— “पृथ्वी की वर्तमान दशा के लिए दोषी कौन है?” एक प्रतिनिधि बोला— “उद्योगपति दोषी हैं।” उद्योगपतियों ने कहा— “हमने वही वस्तुएँ बनाईं जिनकी जनता ने माँग की।” जनता के प्रतिनिधि बोले— “सरकारों ने हमें ऐसे जीवन के लिए प्रेरित किया।” सरकारों ने कहा— “हमें सत्ता में बने रहने के लिए जनता की इच्छाएँ पूरी करनी पड़ीं।” वैज्ञानिकों ने कहा— “हमने चेतावनी दी थी, लेकिन हमारी नहीं सुनी गई।” कुछ वैज्ञानिकों से प्रश्न किया गया— “फिर तुमने विनाशकारी हथियार और प्रदूषण फैलाने वाली तकनीकें क्यों बनाईं?” उन्होंने उत्तर दिया— “हम ज्ञान की खोज कर रहे थे। उसके उपयोग का निर्णय सत्ता और बाजार ने किया।” सत्ता ने बाजार को दोष दिया। बाजार ने उपभोक्ता को और उपभोक्ता ने अपनी परिस्थितियों को। अंततः सभा में एक बालक खड़ा हुआ। उसने पूछा— “यदि सभी केवल परिस्थितियों के शिकार थे, तो इन परिस्थितियों को बनाया किसने?” सभा में सन्नाटा छा गया। तभी वृद्ध ऋषिराज की वर्षों पुरानी रिकॉर्डिंग चलाई गई— “एक व्यवस्था किसी अदृश्य आकाश से नहीं उतरती। उसे मनुष्य अपने चुनाव, उपभोग, मौन, भय और स्वार्थ से प्रतिदिन बनाता है।” कृत्रिम न्यायमंच ने कहा— “सभी मनुष्य समान रूप से अपराधी नहीं हैं। जिसने जंगल कटवाए और जिसने उनका विरोध किया, दोनों को समान दोष नहीं दिया जा सकता। जिसने अरबों का लाभ कमाकर प्रदूषण फैलाया और जिसके पास जीवन-निर्वाह का दूसरा साधन नहीं था, उनकी जिम्मेदारी भी समान नहीं हो सकती।” सभा में उपस्थित लोगों ने राहत की साँस ली। लेकिन न्यायमंच ने आगे कहा— “फिर भी यह कहकर कोई पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकता कि वह अकेला क्या कर सकता था। जिसने सत्य जानकर भी सुविधा के कारण मौन धारण किया, वह भी परिणाम की शृंखला का एक अंश बना। जिम्मेदारी का भार सब पर समान नहीं है, लेकिन जिम्मेदारी से पूर्ण मुक्ति भी सबको नहीं दी जा सकती।” एक प्रतिनिधि ने पूछा— “तो दंड किसे दिया जाए?” न्यायमंच ने उत्तर दिया— “दंड आरम्भ हो चुका है।” “किसने दिया?” “किसी राजा ने नहीं। तुम्हारे अपने कर्मों ने।” स्क्रीन पर सूखे खेत, जलते जंगल, बीमार बच्चे और समुद्र में डूबते नगर दिखाई देने लगे। “यह किसी क्रोधित देवता का बदला नहीं। यह कारणों का परिणाम है। तुमने प्रकृति के संतुलन को चोट पहुँचाई; असंतुलन तुम्हारे जीवन में लौट आया। तुमने समाज में असमानता बोई; अविश्वास और संघर्ष की फसल उगी। तुमने जीवों को वस्तु समझा; अंततः मनुष्य भी बाजार की वस्तु बन गया।” एक व्यक्ति चिल्लाया— “लेकिन हमने तो केवल सुख चाहा था!” न्यायमंच ने उत्तर दिया— “तुमने सुख नहीं, असीमित उपभोग चाहा था। सुख संबंधों, संतुलन और चेतना में था; तुमने उसे वस्तुओं में खोजा। वस्तुओं की भूख बढ़ती गई और पृथ्वी छोटी पड़ती गई।” अंतरिक्षयान में बैठी कग्वफ्फग की तीनों आँखें नम हो गईं। उसने पूछा— “तो क्या पूरी जनता मुजरिम थी? क्या सारा सिस्टम मुजरिम था?” सफहेफज्जफ़्स ने कहा— “‘सभी मुजरिम हैं’ कहना उतना ही अधूरा है जितना यह कहना कि ‘कोई दोषी नहीं है।’ न्याय के लिए हमें तीन बातें देखनी पड़ती हैं—किसके पास कितनी शक्ति थी, उसे परिणामों का कितना ज्ञान था और उसने उपलब्ध विकल्पों में से क्या चुना।” “तो अधिक शक्तिशाली व्यक्ति की जिम्मेदारी अधिक थी?” “हाँ। जिसके निर्णय से करोड़ों लोगों और विशाल जंगलों का भविष्य प्रभावित होता था, उसकी जिम्मेदारी सामान्य व्यक्ति से अधिक थी। पर सामान्य व्यक्ति भी अपने छोटे क्षेत्र में पूरी तरह उत्तरदायित्व-विहीन नहीं था।” “और जिन लोगों ने विरोध किया?” “वे सामूहिक दोष में समान भागीदार नहीं थे। उन्होंने मानवता की चेतना को जीवित रखने का प्रयास किया। किंतु उनकी संख्या कम थी और उनकी आवाज लाभ, प्रचार तथा सुविधा के शोर में दबती गई।” “फिर मनुष्य-सभ्यता को बचाने का अंतिम उपाय क्या था?” “दंड से डरना नहीं, कर्म के प्रभाव को समझना। यदि उन्हें मालूम हो जाता कि हर कर्म लौटता है, तो वे प्रकृति के साथ अपने व्यवहार को बदल सकते थे। दंड का श्रेष्ठ रूप प्रतिशोध नहीं, सुधार होता है।” उसी समय उड़नतश्तरी पृथ्वी के अवशेषों के निकट पहुँची। मलबे में घूमता हुआ एक प्राचीन यंत्र सक्रिय हो गया। उसमें मानवता का अंतिम संदेश सुरक्षित था— “हम न्यायालयों में पूछते रहे कि अपराधी कौन है। प्रकृति हमारे सामने परिणाम रखती रही। हम दंड देने वाले को खोजते रहे, जबकि दंड हमारे कर्मों से ही जन्म ले चुका था।” कग्वफ्फग ने धीरे से पूछा— “क्या कर्म ही न्यायाधीश था?” सफहेफज्जफ़्स ने उत्तर दिया— “कर्म न्यायाधीश नहीं था; कर्म कारण था और दंड उसका कुप्रभाव। प्रकृति ने कोई मुकदमा नहीं चलाया। उसने केवल वही लौटाया, जो मानव-सभ्यता ने उसके भीतर छोड़ दिया था।” “क्या हमारी सभ्यता भी ऐसा कर सकती है?” “यदि हमने पृथ्वी की कथा को केवल कहानी समझा, तो अवश्य। किंतु यदि हमने इसे दर्पण माना, तो शायद बच जाएँ।” सफहेफज्जफ़्स ने अपना तीसरा नेत्र बंद कर लिया। उड़नतश्तरी पृथ्वी के मलबे से आगे बढ़ने लगी। पीछे से मानवता का अंतिम संदेश अब भी गूँज रहा था— “दंड कहीं बाहर बैठी हुई क्रूर शक्ति नहीं है। हमारे अहितकारी कर्म जब मनुष्य, समाज, जीव-जंतु, वनस्पति और प्रकृति को घायल करके हमारे पास लौटते हैं, वही दंड है। उसका आगमन शीघ्र हो या देर से—कर्म का प्रभाव मिटता नहीं, केवल समय की परतों में छिप जाता है।”

जब समाधान भी व्यवस्था का भोजन बन गया?!

जब समाधान भी व्यवस्था का भोजन बन गया?!
सन 10050 ईस्वी! अनंत अंतरिक्ष में एक उड़नतश्तरी पृथ्वी के पुराने सौरमंडल की ओर बढ़ रही थी। उसके भीतर तीन नेत्रधारी बुजुर्ग सफहेफज्जफ़्स एक पारदर्शी आसन पर बैठा था। उसके सामने ब्रह्मांड का विशाल मानचित्र चमक रहा था। पास बैठी तीन नेत्रधारी युवती कग्वफ्फग उस स्थान को देख रही थी, जहाँ कभी नीली पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती थी। अब वहाँ धूल, चट्टानों और मानव-निर्मित धातुओं का एक विशाल मलबा घूम रहा था। कग्वफ्फग ने पूछा— “क्या इस पृथु-मही की प्रकृति और मनुष्य-सभ्यता को नष्ट करने के लिए स्वयं मनुष्य ही जिम्मेदार था?” सफहेफज्जफ़्स ने गंभीर स्वर में कहा— “हाँ! यद्यपि सभी मनुष्य समान रूप से दोषी नहीं थे, फिर भी उनकी सामूहिक जीवन-व्यवस्था ऐसी बन चुकी थी कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति जाने-अनजाने संकट को बढ़ा रहा था।” “लेकिन वे इतने मूर्ख कैसे हो सकते थे?” “मूर्खता हमेशा ज्ञान का अभाव नहीं होती, कग्वफ्फग! कभी-कभी मनुष्य सब कुछ जानता है, फिर भी अपनी सुविधा और स्वार्थ के कारण कुछ बदलना नहीं चाहता।” “क्या उन्हें भविष्य के संकट का पता नहीं था?” “पता था। सन 1990 ईस्वी के आते-आते कुछ लोग उन्हें सचेत करने लगे थे कि भविष्य कैसा हो सकता है। वे पर्यावरण-विनाश, जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई, जल-संकट, प्रदूषण, परमाणु अस्त्रों और अनियंत्रित तकनीक के खतरे बता रहे थे।” “फिर जनता और सत्ता ने उनकी बात क्यों नहीं मानी?” सफहेफज्जफ़्स कुछ देर खामोश रहा। फिर उसने अपने सामने पृथ्वी के पुराने अभिलेख खोल दिए। सन 1990 ईस्वी—पृथ्वी का एक छोटा नगर नगर के पुराने विद्यालय में उस दिन एक सभा बुलाई गई थी। सभा में एक वृद्ध पर्यावरणविद् अनंतदास, एक वैज्ञानिक डॉ. नीलिमा, स्थानीय उद्योगपति धनपाल, विधायक वीरेन्द्र प्रताप और नगर के अनेक नागरिक उपस्थित थे। मंच पर खड़े अनंतदास ने कहा— “धरती हमें संकेत दे रही है। नदियों का जल घट रहा है, हवा दूषित हो रही है और जंगल तेजी से काटे जा रहे हैं। यदि विकास की यही दिशा बनी रही तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वायु, जल और भोजन भी कठिनाई से मिलेगा।” सभा में बैठे कुछ लोग हँसने लगे। धनपाल ने कहा— “बाबा जी, आप हर नई फैक्ट्री का विरोध करते हैं। यदि कारखाने नहीं लगेंगे तो रोजगार कहाँ से आएगा?” अनंतदास ने शांत स्वर में उत्तर दिया— “मैं उत्पादन का विरोध नहीं कर रहा। मैं उस उत्पादन का विरोध कर रहा हूँ जो रोजगार देने के नाम पर नदी को मार दे, धरती को जहरीला बना दे और कुछ वर्षों बाद मनुष्य को ही बीमार कर दे।” विधायक वीरेन्द्र प्रताप ने कहा— “भविष्य की बातें छोड़िए। जनता को अभी सड़क, बिजली और नौकरी चाहिए। पचास वर्ष बाद क्या होगा, उसकी चिंता पचास वर्ष बाद की सरकार करेगी।” तभी डॉ. नीलिमा खड़ी हुईं— “लेकिन कुछ संकट ऐसे होते हैं जिन्हें पचास वर्ष बाद ठीक नहीं किया जा सकता। आज लगाया गया प्रदूषण का बीज भविष्य में ऐसी फसल देगा जिसे काटने का कोई उपाय नहीं होगा।” सभा में पीछे बैठे एक व्यक्ति ने व्यंग्य किया— “इन वैज्ञानिकों को तो हर जगह खतरा ही दिखाई देता है!” दूसरे ने कहा— “जब संकट आएगा, तब विज्ञान कोई मशीन बना देगा।” अनंतदास मुस्कराए— “विज्ञान मशीन बना सकता है, लेकिन मनुष्य का लालच समाप्त करने वाली मशीन कौन बनाएगा?” पूरा सभागार कुछ क्षण के लिए शांत हो गया। फिर धनपाल ने जोर से तालियाँ बजाते हुए कहा— “ये सब भावुक बातें हैं! विकास को रोका नहीं जा सकता।” तालियों के शोर में अनंतदास की चेतावनी दब गई। अंतरिक्षयान में बैठी कग्वफ्फग ने पूछा— “क्या उस समय समाधान उपस्थित था?” “हाँ,” सफहेफज्जफ़्स ने कहा, “समाधान उपस्थित था—पर वह लाभदायक व्यापार नहीं था। प्रकृति की सीमा में रहना, स्थानीय संसाधनों की रक्षा करना, उत्पादन को आवश्यकता से जोड़ना, गाँवों को स्वावलंबी बनाना और उपभोग कम करना—ये उपाय संभव थे।” “फिर लोगों ने उन्हें क्यों नहीं अपनाया?” “क्योंकि मनुष्य समाधान चाहता था, किंतु अपनी आदतों को बचाए रखते हुए। वह प्रदूषण से मुक्ति चाहता था, पर अनावश्यक उपभोग नहीं छोड़ना चाहता था। वह स्वच्छ नदी चाहता था, पर अपने घर, उद्योग और नगर का कचरा उसी नदी में डालता था।” “क्या सत्ता कुछ नहीं कर सकती थी?” “सत्ता कर सकती थी, पर सत्ता को अगला चुनाव दिखाई देता था; आने वाली शताब्दी नहीं। उद्योगपति को अगली तिमाही का लाभ दिखाई देता था; धरती की अगली पीढ़ी नहीं। जनता को तत्काल सुविधा दिखाई देती थी; उस सुविधा की दीर्घकालीन कीमत नहीं।” कग्वफ्फग ने पूछा— “पर कुछ लोग ऐसा क्यों मानने लगे थे कि मानव-सभ्यता उलझ चुकी है और अब आसानी से सुलझने वाली नहीं है?” सफहेफज्जफ़्स ने पृथ्वी का एक और दृश्य दिखाया। एक विशाल कारखाना नगर के लोगों को रोजगार देता था, लेकिन वही कारखाना नदी को प्रदूषित करता था। नदी के दूषित जल से लोग बीमार होते थे। बीमारियों के इलाज के लिए बड़े अस्पताल खुले। अस्पतालों ने रोजगार दिया। औषधियों के कारखाने खुले। उनमें भी उत्पादन और लाभ बढ़ा। बुजुर्ग ने कहा— “देखो, यही उलझाव था। जिस व्यवस्था ने बीमारी पैदा की, उसी ने बीमारी के उपचार को भी बाजार बना दिया। यदि बीमारी समाप्त हो जाती तो उपचार का बाजार घट जाता। इस प्रकार समस्या और समाधान दोनों एक ही आर्थिक जाल के अंग बन गए थे।” दृश्य बदल गया। महानगरों में वाहन बढ़ रहे थे। वाहनों के कारण प्रदूषण और यातायात की समस्या बढ़ी। समाधान के नाम पर और चौड़ी सड़कें बनाई गईं। सड़कें चौड़ी हुईं तो वाहन और बढ़ गए। उनके लिए जंगल काटे गए और नगर दूर तक फैलते गए। सफहेफज्जफ़्स ने कहा— “हर समाधान पुरानी समस्या को घटाने के साथ एक नई समस्या उत्पन्न करने लगा था। मनुष्य समस्या की जड़—अपने लालच, असमानता और असीमित उपभोग—को छूना ही नहीं चाहता था।” “तो वह केवल समस्याओं का स्थान बदल रहा था?” “हाँ। वह कचरा घर से निकालकर नगर के बाहर फेंक देता और समझता कि सफाई हो गई। उद्योग अपना प्रदूषण गरीब क्षेत्रों में भेज देते और कहते कि विकसित नगर स्वच्छ हो गया। शक्तिशाली देश अपने पुराने जहरीले उपकरण दूसरे देशों को बेचकर स्वयं को पर्यावरण-रक्षक घोषित कर देते थे।” “और हर मनुष्य समस्या कैसे बन गया था?” “हर मनुष्य नहीं, बल्कि मनुष्य की आदतों का विशाल जाल समस्या बन गया था। एक व्यक्ति सस्ता सामान चाहता था। उसे बनाने वाला उद्योग मजदूर और प्रकृति का शोषण करता था। उपभोक्ता वस्तु खरीदकर प्रसन्न होता, उद्योगपति लाभ कमाता और सरकार उत्पादन बढ़ने के आँकड़े दिखाती। उस वस्तु के पीछे छिपी पीड़ा किसी को दिखाई नहीं देती थी।” सफहेफज्जफ़्स ने आगे कहा— “कुछ लोग जानते थे कि व्यवस्था गलत दिशा में जा रही है, लेकिन वे कहते थे—‘पहले दूसरे बदलें, तब हम बदलेंगे।’ प्रत्येक व्यक्ति अपने छोटे-से योगदान को महत्वहीन समझता रहा। लेकिन अरबों छोटे योगदान मिलकर ही तो महाविनाश बने थे।” “जो समाधान रखते थे, उनका क्या हुआ?” “कुछ की उपेक्षा हुई। कुछ का मजाक उड़ाया गया। कुछ को व्यवस्था-विरोधी कहा गया। और कुछ समाधानों को बाजार ने सुंदर वस्तुओं में बदलकर बेच दिया।” “समाधान भी बेच दिए गए?” “हाँ। ध्यान को आत्मपरिवर्तन के स्थान पर तनाव घटाने की तकनीक बना दिया गया, ताकि मनुष्य उसी तनावपूर्ण व्यवस्था में अधिक देर तक काम कर सके। योग को जीवन-संतुलन से हटाकर शरीर-प्रदर्शन बना दिया गया। प्रकृति-प्रेम को महँगे पर्यटन में बदल दिया गया और क्रांति को नारों तथा वस्त्रों पर छपे चिह्नों तक सीमित कर दिया गया।” “अर्थात व्यवस्था विरोध को भी अपने भोजन में बदल लेती थी?” “ठीक समझी। जो विचार मनुष्य को बदल सकता था, उसे मनोरंजन बना दिया जाता था। जो प्रश्न सत्ता को असहज कर सकता था, उसे चर्चा और प्रचार की भीड़ में दबा दिया जाता था।” सफहेफज्जफ़्स ने पृथ्वी के अभिलेख में सन 2050 ईस्वी का दृश्य खोला। उसी नगर में अब अनंतदास का पोता अंश लोगों को संबोधित कर रहा था— “साठ वर्ष पहले मेरे दादा ने इस संकट की चेतावनी दी थी। तब लोगों ने कहा था कि संकट बहुत दूर है। आज संकट हमारे घर के द्वार पर खड़ा है।” एक व्यक्ति बोला— “लेकिन अब हम क्या करें? कारखाने बंद हुए तो रोजगार चला जाएगा।” दूसरे ने कहा— “वाहन बंद हुए तो हमारा जीवन रुक जाएगा।” तीसरे ने कहा— “रासायनिक खेती छोड़ी तो उत्पादन घट जाएगा।” चौथे ने कहा— “नगर छोड़कर गाँव कौन जाएगा?” अंश ने कहा— “इसी को मेरे दादा उलझाव कहते थे। हमने अपनी आवश्यकताओं, रोजगार, भोजन और यातायात को ऐसी व्यवस्था से बाँध दिया है, जिसका चलते रहना भी विनाश है और अचानक रुकना भी संकट।” सभा में सन्नाटा छा गया। एक बालिका ने पूछा— “तो क्या अब कोई रास्ता नहीं है?” अंश ने कहा— “रास्ता अब भी है, लेकिन अब वह सरल नहीं है। हमें धीरे-धीरे जीवन की दिशा बदलनी होगी। स्थानीय उत्पादन, सहकारी व्यवस्था, प्राकृतिक खेती, सीमित उपभोग और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण अपनाना होगा। सबसे पहले हमें यह भ्रम छोड़ना होगा कि अधिक वस्तुएँ होने का अर्थ अधिक सुख है।” पीछे से किसी ने फिर हँसकर कहा— “इन आदर्शवादी बातों से दुनिया नहीं चलती!” अंश ने उसकी ओर देखकर उत्तर दिया— “और जिस यथार्थवादी व्यवस्था को तुम चला रहे हो, उससे दुनिया बचेगी नहीं।” दृश्य समाप्त हो गया। कग्वफ्फग ने उदास स्वर में पूछा— “क्या मानव-सभ्यता का अंत उसी दिन निश्चित हो गया था?” “नहीं,” बुजुर्ग ने उत्तर दिया, “किसी एक दिन उसका अंत निश्चित नहीं हुआ। प्रत्येक पीढ़ी के सामने कुछ अवसर आए। प्रत्येक अवसर पर कुछ लोगों ने त्याग के स्थान पर सुविधा, सत्य के स्थान पर प्रचार और भविष्य के स्थान पर तत्काल लाभ चुना। विनाश किसी एक बड़े निर्णय का परिणाम नहीं था; वह करोड़ों छोटे गलत निर्णयों का संचय था।” “तो क्या सचेत करने वाले लोग निराशावादी थे?” “नहीं। वास्तविक चेतावनी निराशा नहीं होती। वह भविष्य बदलने का अंतिम आग्रह होती है। चिकित्सक जब रोग बताता है तो वह मृत्यु की कामना नहीं करता; वह उपचार का अवसर देता है।” “फिर मनुष्यों ने चेतावनी देने वालों को अपना शत्रु क्यों माना?” “क्योंकि चेतावनी उनके आरामदायक भ्रम को तोड़ती थी। जो व्यक्ति कहता था—‘तुम्हें स्वयं बदलना होगा’, वह उन्हें कठोर लगता था। जो कहता था—‘कुछ मत बदलो, कोई नई मशीन तुम्हें बचा लेगी’, वह लोकप्रिय हो जाता था।” उड़नतश्तरी अब पृथ्वी के अवशेषों के बहुत पास पहुँच चुकी थी। वहाँ एक टूटा हुआ कृत्रिम उपग्रह घूम रहा था। उसके भीतर संरक्षित अंतिम संदेश अचानक यान के उपकरण पर सुनाई दिया— “हमने सोचा था कि पृथ्वी हमारी संपत्ति है। बहुत देर बाद समझे कि हम पृथ्वी की अस्थायी संतान थे।” कग्वफ्फग की तीनों आँखों में आँसू आ गए। उसने पूछा— “यदि पृथ्वीवासी समय रहते केवल एक सत्य समझ लेते, तो वह कौन-सा सत्य होता?” सफहेफज्जफ़्स ने उत्तर दिया— “यही कि मनुष्य व्यवस्था से अलग नहीं है। वह जिन वस्तुओं को खरीदता है, जिन लोगों को सत्ता देता है, जिस अन्याय पर मौन रहता है और जिस सुविधा के लिए प्रकृति को नुकसान पहुँचाता है—इन सबके माध्यम से प्रतिदिन व्यवस्था का निर्माण करता है।” “तो समाधान कहाँ था?” “समाधान केवल संसदों, प्रयोगशालाओं अथवा आश्रमों में नहीं था। वह प्रत्येक मनुष्य की चेतना और आचरण के बीच छिपा था। यदि मनुष्य के विचार और कर्म में अंतर बना रहे, तो सर्वोत्तम समाधान भी केवल पुस्तक में बंद शब्द रह जाता है।” उड़नतश्तरी आगे बढ़ने लगी। कग्वफ्फग ने पृथ्वी के मलबे को अंतिम बार देखा और कहा— “उनके पास ज्ञान था, विज्ञान था और चेतावनी भी थी—फिर भी वे बच न सके।” सफहेफज्जफ़्स ने अपना तीसरा नेत्र बंद करते हुए कहा— “क्योंकि सभ्यताएँ ज्ञान की कमी से ही नष्ट नहीं होतीं। वे तब भी नष्ट होती हैं, जब सत्य सबको मालूम हो, पर उसे स्वीकार करने और उसके अनुसार जीने का साहस किसी में न हो।” अंतरिक्ष में पृथ्वी का अंतिम संदेश गूँज रहा था— “जिस व्यवस्था को हम प्रतिदिन अपने आचरण से मजबूत करते हैं, उसे केवल भाषणों में दोष देकर नहीं बदला जा सकता। जब प्रत्येक व्यक्ति समस्या का छोटा-सा हिस्सा बन जाता है, तब समाधान की शुरुआत भी प्रत्येक व्यक्ति के भीतर से ही करनी पड़ती है।”

संकेत, जिसे पृथ्वीवासी सुन न सके?!

संकेत, जिसे पृथ्वीवासी सुन न सके?!
सन 10050 ईस्वी! अंतरिक्ष के अथाह अँधेरे में एक चाँदी-सी उड़नतश्तरी निस्तब्ध गति से आगे बढ़ रही थी। उसके चारों ओर तारों का प्रकाश ऐसे बिखरा था, मानो ब्रह्मांड की किसी प्राचीन पुस्तक के असंख्य अक्षर चमक रहे हों। उड़नतश्तरी के पारदर्शी कक्ष में तीन नेत्रों वाला एक बुजुर्ग बैठा था। उसका नाम था—सफहेफज्जफ़्स। उसके सामने उसी प्रजाति की एक युवती बैठी थी—कग्वफ्फग। बुजुर्ग के पहले दो नेत्र बाहर के अंतरिक्ष को देख रहे थे, जबकि तीसरा नेत्र बंद था। उनकी सभ्यता में तीसरा नेत्र अंतर्दृष्टि का प्रतीक माना जाता था—वह दृष्टि, जो घटना के पीछे छिपे कारण को देखती थी। उनके सामने एक विशाल त्रिआयामी मानचित्र खुला हुआ था। उसमें एक युवा तारे के पास घूमता हुआ विशाल ग्रह चमक रहा था। कग्वफ्फग ने उत्सुकता से पूछा— “क्या यही वह ग्रह है, जहाँ से प्राचीन पृथ्वी के वैज्ञानिकों को रहस्यमयी रेडियो तरंगें मिली थीं?” सफहेफज्जफ़्स ने उत्तर दिया— “हाँ। पृथ्वीवासियों ने इसे ‘बीटा पिक्टोरिस बी’ कहा था। यह उनकी पृथ्वी से लगभग तिरसठ प्रकाश वर्ष दूर था। इसका द्रव्यमान उनके बृहस्पति से लगभग ग्यारह गुना अधिक बताया गया था। यह अपने तारे की एक परिक्रमा लगभग तेईस दशमलव छह पृथ्वी-वर्ष में करता था और अपनी धुरी पर इतनी तेजी से घूमता था कि वहाँ का एक दिन केवल आठ से नौ घंटे के बराबर था।” “तो क्या वे रेडियो संकेत किसी विकसित सभ्यता ने भेजे थे?” बुजुर्ग मुस्कराया— “नहीं। उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार वे किसी एलियन सभ्यता के संदेश नहीं थे। ग्रह के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र और आवेशित कणों की परस्पर क्रिया से वैसी रेडियो तरंगें उत्पन्न हो सकती थीं—जैसे पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्रों में अरोरा बनते थे। पृथ्वी के वैज्ञानिकों के लिए यह खोज इसलिए महत्त्वपूर्ण थी कि उन्हें अपने सौरमंडल से बाहर किसी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र को समझने का नया साधन मिला था।” कग्वफ्फग कुछ क्षण उस ग्रह को देखती रही। फिर उसने मानचित्र पर एक दूसरे स्थान की ओर संकेत किया। वहाँ कभी पृथ्वी नाम का नीला ग्रह हुआ करता था। अब उस स्थान पर धूल, चट्टानों और कृत्रिम मलबे की एक विस्तृत पट्टी घूम रही थी। उसने गंभीर स्वर में पूछा— “क्या इस पृथु-मही की प्रकृति और मनुष्य-सभ्यता को नष्ट करने के लिए स्वयं मनुष्य ही जिम्मेदार था?” सफहेफज्जफ़्स का तीसरा नेत्र धीरे-धीरे खुल गया। “हाँ।” “वह कैसे? क्या इतने मूर्ख थे मनुष्य?” “मूर्खता केवल ज्ञान की कमी नहीं होती, कग्वफ्फग! ज्ञान होने के बाद भी उसके अनुसार आचरण न करना उससे बड़ी मूर्खता है। पृथ्वीवासियों के पास विज्ञान था, आँकड़े थे, चेतावनियाँ थीं और समाधान भी थे—फिर भी उनका सामूहिक आचरण विनाश की ओर बढ़ता रहा।” “लेकिन हर मनुष्य कैसे समस्या बन गया था?” “हर व्यक्ति समान रूप से दोषी नहीं था,” बुजुर्ग ने समझाया, “पर उनकी जीवन-व्यवस्था ऐसी बन चुकी थी कि अधिकांश लोग अनजाने या जानबूझकर समस्या को बढ़ाते थे। कोई आवश्यकता से अधिक उपभोग करता था, कोई जंगल काटता था, कोई नदियों को प्रदूषित करता था, कोई युद्ध के अस्त्र बनाता था और कोई इन सबको ‘विकास’ कहकर उचित ठहराता था।” “और जो ऐसा नहीं करते थे?” “उनमें से बहुत-से लोग खामोश रहते थे।” “तो क्या खामोश रहना भी दोष था?” “जब अन्याय और विनाश सामने दिखाई दें, तब मौन कभी-कभी अपराध को शक्ति देता है। कुछ लोग कहते थे—‘मैं अकेला क्या कर सकता हूँ?’ किंतु वे भूल जाते थे कि पूरी मानव-सभ्यता भी ऐसे ही असंख्य ‘अकेले’ मनुष्यों से बनी थी।” कग्वफ्फग ने पूछा— “क्या किसी ने उन्हें बचाने का उपाय नहीं बताया?” सफहेफज्जफ़्स ने सामने एक प्राचीन अभिलेख खोल दिया। उसमें पृथ्वी के गाँव, जंगल, नदियाँ, विद्यालय, कारखाने और विशाल नगर दिखाई देने लगे। “समाधान रखने वाले लोग थे। वे कहते थे कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका सहयोगी है। वे ग्राम-आधारित जीवन, सीमित उपभोग, स्थानीय उत्पादन, जल और जंगलों की रक्षा तथा मानवीय सहकार की बात करते थे। कुछ मनुष्य अपनी चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ने की साधना सिखाते थे। उनका कहना था कि बाहर की व्यवस्था तब तक नहीं बदलेगी, जब तक मनुष्य के भीतर का लालच, भय और अहंकार नहीं बदलेगा।” “फिर उन लोगों की बात क्यों नहीं मानी गई?” “क्योंकि समाधान त्याग माँगते थे, जबकि भ्रम सुविधाएँ देता था। समाधान कहता था—अपनी आदत बदलो। व्यवस्था कहती थी—कुछ खरीद लो और स्वयं को सफल समझो। समाधान कहता था—प्रकृति के साथ चलो। बाजार कहता था—प्रकृति पर विजय प्राप्त करो।” बुजुर्ग कुछ देर खामोश रहा। फिर बोला— “जो लोग खतरे की चेतावनी देते थे, उन्हें कभी पिछड़ा, कभी पागल और कभी विकास-विरोधी कहा गया। उनके विचारों पर चर्चा करने के स्थान पर उनका मजाक उड़ाया गया।” “और वैज्ञानिक?” “वैज्ञानिक पृथ्वी से तिरसठ प्रकाश वर्ष दूर ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र खोज रहे थे। यह उनकी अद्भुत उपलब्धि थी। उन्होंने आकाश के सूक्ष्म संकेत तक पकड़ लिए थे, लेकिन मानव-समाज अपनी धरती की कराह नहीं सुन पाया।” कग्वफ्फग ने विस्मय से कहा— “अर्थात मनुष्य दूर के ग्रह से आने वाली रेडियो तरंगें तो सुन सकता था, पर अपने जंगल, नदी और भूख से पीड़ित मनुष्य की आवाज नहीं?” “यही उनकी सभ्यता की सबसे बड़ी विडम्बना थी,” सफहेफज्जफ़्स ने उत्तर दिया। “उनकी मशीनें अत्यंत संवेदनशील होती गईं, पर उनका हृदय असंवेदनशील होता गया। दूरबीनें दूर तक देखने लगीं, पर मनुष्य परिणामों को देखने में असमर्थ होता गया।” अचानक उनके यान के उपकरण पर वही प्राचीन रेडियो-तरंग पुनः उभरी। ध्वनि में नियमित उतार-चढ़ाव था। कग्वफ्फग ने पूछा— “यदि वह किसी जीव का संदेश नहीं था, तो हम उसे क्या मानें?” सफहेफज्जफ़्स ने कहा— “प्रकृति का संदेश। प्रकृति शब्दों में नहीं बोलती। तारे प्रकाश से बोलते हैं, ग्रह चुंबकीय तरंगों से, नदियाँ अपने प्रवाह से और जंगल अपनी निस्तब्धता से। समस्या यह नहीं कि ब्रह्मांड संकेत नहीं देता; समस्या यह है कि चेतना उन्हें किस अर्थ में ग्रहण करती है।” “तब पृथ्वी का अंतिम संदेश क्या था?” बुजुर्ग ने पृथ्वी के अंतिम दिनों का दृश्य दिखाया। समुद्र नगरों में प्रवेश कर रहे थे। लोग दूषित हवा में कृत्रिम श्वास-यंत्र लगाए घूम रहे थे। कहीं युद्ध था, कहीं जल के लिए संघर्ष और कहीं भोजन पर अधिकार पाने की होड़। फिर भी एक निर्जन स्थान पर कुछ बच्चे पौधे लगा रहे थे। एक वृद्ध उन्हें समझा रहा था— “पेड़ लगाने का अर्थ केवल पेड़ बचाना नहीं है। इसका अर्थ अपने भीतर उस मनुष्य को बचाना है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सोच सकता है।” दृश्य समाप्त हो गया। सफहेफज्जफ़्स बोला— “पृथ्वी का अंतिम संदेश विनाश नहीं था। उसका संदेश था—समाधान जान लेना पर्याप्त नहीं; समाधान बनना आवश्यक है।” “फिर पृथ्वी बची क्यों नहीं?” “क्योंकि समाधान की प्रशंसा करने वाले बहुत थे, पर उसे अपने जीवन में उतारने वाले बहुत कम। लोग परिवर्तन चाहते थे, किंतु स्वयं बदलना नहीं चाहते थे। प्रत्येक व्यक्ति व्यवस्था को दोष देता रहा, जबकि अपने छोटे-छोटे स्वार्थों से उसी व्यवस्था को पोषण देता रहा।” कग्वफ्फग की आँखों में नमी उतर आई। “यदि हमें कभी पृथ्वी जैसी परिस्थिति दिखाई दे, तो हमें क्या करना चाहिए?” बुजुर्ग ने उसके कंधे पर हाथ रखा— “किसी महाविनाश की प्रतीक्षा मत करना। तुम्हारी सभ्यता का प्रत्येक नागरिक स्वयं से तीन प्रश्न पूछे— मैं प्रकृति से कितना ले रहा हूँ? मैं उसे क्या लौटा रहा हूँ? और जिस सत्य को जानता हूँ, उसके लिए क्या कर रहा हूँ?” उड़नतश्तरी पृथ्वी के अवशेषों से आगे बढ़ने लगी। पीछे रह गई धूल के बीच सूर्य का प्रकाश पड़ रहा था। वह मलबा कुछ क्षणों के लिए एक चमकते हुए दर्पण जैसा दिखाई दिया। कग्वफ्फग ने अंतिम बार पीछे देखकर कहा— “तो पृथ्वी नष्ट होकर भी दर्पण बन गई?” सफहेफज्जफ़्स ने अपना तीसरा नेत्र बंद करते हुए उत्तर दिया— “हाँ। कुछ सभ्यताएँ जीवित रहकर शिक्षा देती हैं और कुछ अपने विनाश के बाद। पृथ्वी का दर्पण ब्रह्मांड की हर सभ्यता से पूछता रहेगा— तुम अंतरिक्ष के संकेत तो सुन रहे हो, लेकिन क्या अपने भीतर से आती चेतावनी भी सुन रहे हो?” उड़नतश्तरी अनंत अंतरिक्ष में विलीन हो गई, किंतु बीटा पिक्टोरिस बी से आती रेडियो तरंगें अब भी फैल रही थीं—मानो ब्रह्मांड कह रहा हो— “प्रकृति का प्रत्येक संकेत संदेश नहीं होता, पर प्रत्येक संकेत से कुछ सीखा जा सकता है। विज्ञान तुम्हें ब्रह्मांड की शक्तियों का ज्ञान देता है; विवेक बताता है कि उस ज्ञान और अपनी सभ्यता का उपयोग कैसे करना है।”

सोमवार, 28 सितंबर 2026

वो धर्म दंड कहां है?!

वो धर्मदंड कहाँ है?!
सन 2075 ईस्वी। नगर के बीच एक प्राचीन पुस्तकालय का खंडहर खड़ा था। कभी उसके विशाल द्वार पर स्वर्णाक्षरों में लिखा था— “उत्तिष्ठत! जाग्रत! प्राप्य वरान्निबोधत!” उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करो। अब आधे अक्षर मिट चुके थे। पुस्तकालय के भीतर धर्मग्रंथों पर धूल जमी थी और बाहर अनेक राजनीतिक दलों के झंडे हवा में फड़फड़ा रहे थे। वृद्ध शिक्षक अनुराग कुछ विद्यार्थियों को लेकर भीतर पहुँचे। उनके हाथ में अशोक सर द्वारा लिखी गई पुरानी पुस्तक ‘जय संहिता?!’ थी। एक विद्यार्थी ने पुस्तक के आवरण को देखते हुए पूछा— “सर! क्या महाभारत का प्रारम्भिक नाम ‘जय’ था?” “परम्परा यही कहती है,” अनुराग बोले, “लेकिन महाभारत केवल पुराने राजवंशों की कथा नहीं है। वह हर उस युग की कथा है जिसमें राजदंड तो दिखाई देता है, पर धर्मदंड गायब हो जाता है।” पीछे चल रहे एक विद्यार्थी ने तुरन्त पूछा— “लेकिन वह धर्मदंड कहाँ है?!” खंडहर का बंद कक्ष पुस्तकालय के अंतिम भाग में एक बंद कक्ष था। उसके द्वार पर तीन शब्द लिखे थे— राजदंड — धर्मदंड — आत्मदंड अनुराग ने जंग लगा ताला खोला। भीतर दो दंड रखे थे। एक स्वर्ण से बना भारी राजदंड था और दूसरा पलाश की लकड़ी का साधारण-सा दंड। राजदंड चमक रहा था, लेकिन धर्मदंड धूल में दबा था। एक छात्र बोला— “राजदंड इतना भव्य और धर्मदंड इतना साधारण क्यों है?” अनुराग ने कहा— “क्योंकि राजदंड को सत्ता की बाहरी शक्ति चाहिए—सेना, कानून, कारागार और प्रशासन। धर्मदंड को केवल सत्य चाहिए। राजदंड से राजा जनता को दंड देता है, लेकिन धर्मदंड राजा को याद दिलाता है कि वह भी सर्वोच्च नहीं है।” एक छात्रा ने पूछा— “क्या वैदिक काल में सचमुच राजा को धर्मदंड दिया जाता था?” शिक्षक ने उत्तर दिया— “प्राचीन भारतीय राजधर्म में यह मूल भावना स्पष्ट थी कि राजा स्वयं भी धर्म के अधीन है। बाद की प्रचलित राज्याभिषेक-व्याख्याओं में एक प्रतीकात्मक प्रसंग मिलता है—राजा स्वयं को दंड से ऊपर समझे, तो पुरोहित अथवा धर्मसभा उसे पलाश-दंड से स्पर्श करके स्मरण कराए—‘धर्मदण्ड्योऽसि’, अर्थात तुम भी धर्म द्वारा दंडित किए जा सकते हो। इसे प्रत्येक वैदिक राज्य का एक-जैसा ऐतिहासिक अनुष्ठान मानना सावधानी की माँग करता है; लेकिन इसका दार्शनिक संदेश अत्यन्त स्पष्ट है—राजा धर्म से बड़ा नहीं होता।” राजा या दार्शनिक? कक्ष की दीवार पर एक प्रश्न उभरा— “राज वही हो जो दार्शनिक हो—या ईश्वर का दूत हो?” एक युवक बोला— “यदि कोई स्वयं को ईश्वर का दूत घोषित कर दे तो क्या वह आदर्श राजा बन जाएगा?” “नहीं,” अनुराग बोले, “घोषणा किसी को ईश्वर का दूत नहीं बनाती। राजा के लिए दार्शनिक होने का अर्थ बड़ी-बड़ी बातें करना भी नहीं है। उसे जीवन, न्याय, प्रकृति, मानव-गरिमा और अपने निर्णयों के परिणामों को समझना होगा।” उन्होंने राजदंड उठाकर कहा— “जो केवल शासन करना जानता है, वह शासक हो सकता है; लेकिन जो स्वयं को भी मर्यादा में रखना जानता है, वही राजर्षि बनने योग्य है।” एक विद्यार्थी ने पूछा— “राजर्षि का अर्थ क्या है?” “जिसमें राजा की कार्यक्षमता और ऋषि की दृष्टि मिल जाए। जिसके पास व्यवस्था चलाने की शक्ति हो, लेकिन शक्ति उसके विवेक को न निगल जाए।” ऋषि कौन थे? अब सबकी दृष्टि मिट्टी की सात प्रतिमाओं पर गई। उनमें कोई मुकुटधारी नहीं था। कोई जंगल में बैठा था, कोई आकाश देख रहा था, कोई औषधियों का अध्ययन कर रहा था और कोई राजा के सामने निर्भय खड़ा था। एक छात्रा ने पूछा— “क्या ऋषि केवल जंगल में रहने वाले संन्यासी थे?” “नहीं,” अनुराग ने कहा, “ऋषि होना वेशभूषा नहीं, दृष्टि की अवस्था थी। निरुक्त की प्रसिद्ध व्याख्या है—‘ऋषिर्दर्शनात्’, अर्थात ऋषि वह है जो देखता है; जो केवल आँखों से दृश्य नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे सत्य को भी पहचानता है। वैदिक परम्परा में ऋषियों को मंत्रों का ‘द्रष्टा’ कहा गया—अर्थात जिन्होंने सत्य का अनुभव किया। �” avatsara.wordpress.com +1 “तो क्या पढ़ा-लिखा विद्वान ही ऋषि है?” “नहीं। विद्वान के पास सूचना हो सकती है, लेकिन ऋषि के पास दृष्टि, तप, सत्यनिष्ठा और लोकमंगल की चेतना होती है। जो राजा की प्रशंसा पाने के लिए सत्य बदल दे, वह राजदरबार का विद्वान तो हो सकता है, ऋषि नहीं।” “क्या ऋषि राजा से ऊपर था?” “व्यक्ति के रूप में नहीं, पर उसके द्वारा व्यक्त धर्म-मर्यादा राजा से ऊपर मानी जाती थी। वह राजा को आदेश देने के लिए नहीं, उसे उसके कर्तव्य का बोध कराने के लिए खड़ा होता था।” वसु और वसुपति एक प्रतिमा के नीचे लिखा था—वसु। दूसरी के नीचे—वसुपति। विद्यार्थी ने पूछा— “क्या ऋषि अपनी किसी विशेष अवस्था में वसु और बाद में वसुपति कहलाते थे?” अनुराग बोले— “ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं था कि हर ऋषि पहले वसु और फिर वसुपति बनता था। इन शब्दों के अपने कई वैदिक और संस्कृत अर्थ हैं।” उन्होंने भूमि से थोड़ी मिट्टी उठाई। “‘वसु’ का अर्थ शुभ, मूल्यवान वस्तु, संपदा अथवा धन भी होता है। वैदिक-पौराणिक परम्परा में ‘वसु’ आठ देवशक्तियों—अष्टवसुओं—के लिए भी प्रयुक्त हुआ। वे प्रकृति में व्याप्त प्रकाश, ऊर्जा और जीवनाधार शक्तियों से जुड़े माने गए।” “और वसुपति?” “वसुपति का सीधा भाव है—वसुओं अथवा संपदाओं का स्वामी, संरक्षक या अधिपति। वैदिक प्रयोगों में यह अग्नि, इन्द्र आदि देवताओं की उपाधि के रूप में भी मिलता है। इसलिए प्रत्येक ऋषि को ऐतिहासिक पदक्रम के अनुसार ‘वसु’ या ‘वसुपति’ कहना उचित नहीं। हाँ, दार्शनिक रूपक में हम कह सकते हैं—जो प्रकृति की संपदा को भोग की वस्तु नहीं, लोककल्याण की धरोहर समझे, वही सच्चे अर्थ में वसु का संरक्षक है। संस्कृत कोश भी ‘वसु’ और ‘वसुपति’ के अनेक संदर्भगत अर्थ बताते हैं। �” Universität zu Köln +1 एक छात्र ने कहा— “तो आज का वसुपति वह नहीं जो सबसे अधिक संपत्ति का मालिक हो?” “नहीं,” शिक्षक मुस्कराए, “वह तो केवल धनपति हो सकता है। वसुपति वह होगा जो जल, जंगल, जमीन, ज्ञान और सार्वजनिक संसाधनों की रक्षा करे। जो आने वाली पीढ़ियों की संपदा को आज के बाजार में बेच दे, वह वसुपति नहीं—वसु का अपहर्ता है।” राजा ग्रहण करने योग्य है क्या? कक्ष के मध्य एक सिंहासन रखा था। उसके सामने धर्मदंड था। एक छात्र सिंहासन पर बैठ गया। दूसरे ने धर्मदंड उसके हाथ में देना चाहा, लेकिन दंड जमीन पर गिर पड़ा। अनुराग बोले— “धर्मदंड केवल देने वाला योग्य हो, इतना पर्याप्त नहीं। राजा भी उसे ग्रहण करने योग्य होना चाहिए।” “यदि राजा ग्रहण ही न करे तो?” “तब धर्मदंड केवल अनुष्ठान बन जाता है। जिस राजा के भीतर विनम्रता, आत्मनिरीक्षण और आलोचना सुनने का साहस नहीं, उसके हाथ में धर्मदंड देना ऐसा है जैसे बंद मुट्ठी में बीज रख देना—वह अंकुरित नहीं होगा।” “और यदि धर्मदंड देने वाला समूह ही राजा से लाभ लेने लगे?” “तब सबसे बड़ा संकट पैदा होता है। धर्मसभा दरबार की प्रशंसक बन जाती है, ऋषि पद और पुरस्कार माँगने लगते हैं और पुरोहित धर्मदंड छोड़कर राजदंड की छाया में बैठ जाता है।” धर्मदंड देने वाला समूह कहाँ है? दीवार पर आधुनिक संसद, न्यायालय, मीडिया संस्थान, विश्वविद्यालय और धार्मिक मंचों के चित्र दिखाई दिए। अनुराग ने पूछा— “आज राजा कौन है?” एक छात्र बोला—“प्रधानमंत्री?” दूसरा बोला—“मुख्यमंत्री?” तीसरा बोला—“उद्योगपति?” चौथा बोला—“मीडिया?” अनुराग ने कहा— “आज सत्ता किसी एक राजा में सीमित नहीं है। वह सरकार, प्रशासन, न्याय-व्यवस्था, बाजार, मीडिया, तकनीकी कंपनियों और संगठित जनमत में बाँटी हुई है। इसलिए आज धर्मदंड भी किसी एक ऋषि के हाथ में नहीं रह सकता।” “तो किसके हाथ में होगा?” “स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष पत्रकारिता, जागरूक नागरिक, उत्तरदायी संसद, निर्भीक शिक्षक, सत्यनिष्ठ वैज्ञानिक और लोकमंगल के लिए खड़े आध्यात्मिक चिंतक—ये सब मिलकर आधुनिक धर्मसभा बन सकते हैं।” एक विद्यार्थी ने पूछा— “लेकिन यदि ये सभी सत्ता से सुविधा लेने लगें?” “तब राजदंड निरंकुश हो जाता है और धर्मदंड संग्रहालय में पड़ी लकड़ी बन जाता है।” तीन दंड अनुराग विद्यार्थियों को तीनों शब्दों के सामने ले गए— राजदंड — धर्मदंड — आत्मदंड उन्होंने समझाया— “राजदंड बाहरी अपराध रोकता है। धर्मदंड सत्ता को मर्यादा में रखता है। लेकिन इन दोनों की जड़ आत्मदंड है।” “आत्मदंड क्या है?” “स्वयं को देखने का साहस। अपनी इच्छाओं, लालच, क्रोध और अहंकार पर संयम। जो अपने मन पर शासन नहीं कर सकता, वह राज्य पर न्यायपूर्ण शासन कैसे करेगा?” एक छात्रा ने कहा— “तो राजा बनने से पहले मनुष्य को अपने भीतर का राजा बनना होगा?” “हाँ। आत्मनियंत्रण के बिना राजदंड अत्याचार बनता है। आत्मबोध के बिना धर्मदंड अभिनय बनता है।” जय संहिता का खाली पृष्ठ अनुराग ने ‘जय संहिता?!’ खोली। उसके अंतिम पृष्ठ पर कुछ भी नहीं लिखा था। एक विद्यार्थी ने पूछा— “यह पृष्ठ खाली क्यों है?” तभी पीछे से अशोक सर की रिकॉर्ड की हुई आवाज सुनाई दी— “क्योंकि आने वाले युग का धर्मदंड अभी लिखा जाना बाकी है।” सभी चौंककर चारों ओर देखने लगे। आवाज फिर आई— “कभी एक राजा होता था, इसलिए एक ऋषि उसके सामने खड़ा हो सकता था। आज सत्ता हजारों अदृश्य हाथों में है। कोई खाद्य पदार्थ में मिलावट करता है, कोई नशे का व्यापार करता है, कोई जंगल काटता है, कोई झूठी सूचना फैलाता है, कोई तकनीक से मनुष्य की चेतना नियंत्रित करता है—फिर भी प्रत्येक कहता है कि दोष किसी और का है।” अनुराग ने कहा— “आज केवल राजा को धर्मदंड देना पर्याप्त नहीं। नागरिक, उपभोक्ता, व्यापारी, शिक्षक, अधिकारी, धर्मगुरु और तकनीक बनाने वाला—सब धर्म के प्रति उत्तरदायी हैं।” धर्मदंड की परीक्षा अचानक कक्ष का फर्श काँपने लगा। सामने एक विशाल डिजिटल राजा प्रकट हुआ। उसका चेहरा लगातार बदल रहा था—कभी नेता, कभी उद्योगपति, कभी धर्मगुरु, कभी मीडिया संचालक और कभी मोबाइल स्क्रीन। उसने गर्जना की— “मुझे कौन दंड दे सकता है? मैं बाजार हूँ, मैं राज्य हूँ, मैं सूचना हूँ, मैं तुम्हारी आवश्यकता हूँ!” विद्यार्थी भयभीत होकर पीछे हट गए। अनुराग ने धूल में पड़े धर्मदंड की ओर संकेत किया— “इसे कौन उठाएगा?” एक छात्र ने अकेले उठाने की कोशिश की, लेकिन दंड भारी हो चुका था। फिर सभी विद्यार्थियों ने मिलकर उसे उठाया। उन्होंने एक स्वर में कहा— “सत्ता किसी भी रूप में हो, वह सत्य, न्याय, मानवता और प्रकृति से बड़ी नहीं हो सकती!” डिजिटल राजा का आकार छोटा होने लगा। अनुराग बोले— “देखा? आज का धर्मदंड किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं उठेगा। उसे जागरूक समाज को सामूहिक रूप से उठाना होगा।” धर्मदंड कहाँ है? सूर्योदय हो चुका था। पुस्तकालय से बाहर निकलते समय विद्यार्थियों ने देखा कि विभिन्न दलों के झंडों के बीच एक खाली डंडा खड़ा था। उस पर कोई ध्वज नहीं था। एक विद्यार्थी ने पूछा— “क्या यही धर्मदंड है?” अनुराग ने उत्तर दिया— “धर्मदंड किसी दल का झंडा नहीं बन सकता। जिस दिन वह किसी एक दल, जाति अथवा सम्प्रदाय की निजी वस्तु बन गया, उसी दिन वह धर्मदंड नहीं रहेगा।” “फिर वह कहाँ है?” वृद्ध शिक्षक ने प्रत्येक विद्यार्थी के हृदय की ओर संकेत किया— “उसका पहला स्थान यहाँ है। लेकिन केवल हृदय में भाव रख लेना पर्याप्त नहीं। जब वह भाव न्यायपूर्ण व्यवस्था, निर्भीक वाणी, संयमित जीवन और लोकहितकारी कर्म बनता है—तभी धर्मदंड दिखाई देता है।” उन्होंने पुस्तकालय के द्वार पर मिटे अक्षर फिर से लिख दिए— उठो—क्योंकि राजदंड जाग रहा है। जागो—क्योंकि धर्मदंड सो रहा है। श्रेष्ठ बनो—क्योंकि अयोग्य समाज से योग्य राजा उत्पन्न नहीं होता। विद्यार्थियों ने पीछे मुड़कर उस पुराने सिंहासन को देखा। वह अब खाली था, लेकिन उसके ऊपर एक नई पंक्ति चमक रही थी— “हमें केवल ऐसा राजा नहीं चाहिए जो धर्मदंड ग्रहण करे; हमें ऐसा समाज भी चाहिए जो बिना भय और बिना स्वार्थ के धर्मदंड दे सके।” अनुराग ने ‘जय संहिता?!’ बंद करते हुए कहा— “प्रश्न यह नहीं कि पुराना धर्मदंड कहाँ खो गया। असली प्रश्न यह है—क्या आज हम स्वयं इतने सत्यनिष्ठ हैं कि नया धर्मदंड उठा सकें?” इस प्रश्न का किसी के पास तत्काल उत्तर नहीं था। लेकिन उस दिन पहली बार विद्यार्थियों को समझ आया कि धर्मदंड किसी संग्रहालय में खोजी जाने वाली छड़ी नहीं है। वह जाग्रत विवेक, निर्भीक सत्य, सामूहिक उत्तरदायित्व और स्वयं को भी न्याय के अधीन मानने की चेतना है। और जिस दिन राजा तथा जनता—दोनों अपने को धर्म से ऊपर समझने लगें, उसी दिन राजदंड तो बचा रहता है, पर राष्ट्र की आत्मा से धर्मदंड गायब हो जाता है।

महाभारत अभी बाकी है?!

अभी महाभारत बाकी है…
सन 2075 ईस्वी। कभी संसद भवन कहलाने वाली एक विशाल इमारत अब “मानवता अध्ययन केंद्र” में बदल चुकी थी। उसके पुराने गलियारों में अनेक राजनीतिक दलों के फटे हुए झंडे काँच के बक्सों में रखे थे। झंडों के रंग अलग-अलग थे, पर समय की धूल ने लगभग सभी को एक ही रंग का बना दिया था। उस दिन विद्यार्थियों का एक समूह इतिहास के अध्यापक अनुराग के साथ वहाँ पहुँचा। सबसे बड़े कक्ष के मध्य महाभारतकालीन राजसभा का चित्र लगा था। चित्र में द्रौपदी न्याय की पुकार कर रही थीं और सभा के अधिकांश लोग मौन बैठे थे। एक विद्यार्थी ने पूछा— “सर, उस सभा में धर्म किसके साथ था?” अनुराग ने उत्तर देने से पहले चित्र को देर तक देखा। “धर्म किसी सिंहासन, सेना अथवा राजवंश की निजी संपत्ति नहीं था। उस समय धर्म की वाणी वेदव्यास के चिंतन में थी, विदुर की नीति में थी और विकर्ण जैसे उस कौरव के साहस में थी, जिसने द्रौपदी के अपमान का विरोध किया था। लेकिन देखो विडम्बना—जिनके पास धर्म की दृष्टि थी, उनके पास राज्य की निर्णायक शक्ति नहीं थी; और जिनके हाथ में राज्य था, उन्होंने धर्म की आवाज को अनसुना कर दिया।” एक छात्रा बोली— “लेकिन पांडव तो धर्म के पक्ष में थे?” “पांडव धर्म के निकट अवश्य दिखाई देते हैं,” अनुराग ने कहा, “पर वे भी राजनीति और राज्य के प्रश्न से अलग नहीं थे। उन्हें भी अपना अधिकार और राज्य चाहिए था। युधिष्ठिर पांडवों में ज्येष्ठ और राज्य के उत्तराधिकारी थे, जबकि अभिमन्यु अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र थे। उधर दुर्योधन धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र था और उसका पुत्र लक्ष्मण कुमार भी था, जो युद्ध में मारा गया। इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि दुर्योधन का राजकुमार गायब था। हाँ, इतिहास की लोकप्रिय कथा में उसका उल्लेख अभिमन्यु जितना प्रमुख नहीं हुआ।” दूसरे विद्यार्थी ने पूछा— “फिर उस समय राजा कौन था?” “हस्तिनापुर के सिंहासन पर धृतराष्ट्र थे। पांडु का निधन हो चुका था। इसलिए विवाद केवल दो भाइयों के पुत्रों का नहीं था; वह उत्तराधिकार, सत्ता, न्याय और अहंकार—सभी का संघर्ष था।” अध्यापक विद्यार्थियों को अगले कक्ष में ले गए। वहाँ एक तराजू रखा था। उसके एक पलड़े पर मुकुट, सेना, राजकोष और शस्त्रों की प्रतिकृतियाँ थीं। दूसरे पलड़े पर कृष्ण की छोटी-सी मूर्ति थी। अनुराग बोले— “सभी राजकीय संसाधन प्रारम्भ में कौरव सत्ता के पास थे। पांडवों के पास सीमित शक्ति थी, लेकिन उनके साथ कृष्ण की नीति, दृष्टि और मार्गदर्शन था। फिर भी यह समझना उचित नहीं कि कृष्ण केवल एक रिश्तेदार होने के कारण पांडवों के पक्ष में खड़े हुए। वे अर्जुन के सखा और सुभद्रा के भाई अवश्य थे, पर उनका वास्तविक संबंध उस पक्ष से था जहाँ उन्हें धर्म-स्थापना की सम्भावना दिखाई दी।” “तो क्या वेदव्यास और विदुर भी पांडवों के राजनीतिक साथी थे?” एक विद्यार्थी ने पूछा। “वे पांडवों के अंधसमर्थक नहीं थे,” अनुराग ने समझाया। “वे सत्य, नीति और वंश की रक्षा चाहते थे। उन्होंने कौरवों को भी समझाया और पांडवों को भी दिशा दी। उनका संबंध किसी दल से कम और धर्म से अधिक था। यही कारण है कि सत्ता की राजनीति में उनकी आवाज सम्मानित तो थी, पर हमेशा स्वीकार नहीं की गई।” वे तीसरे कक्ष में पहुँचे। वहाँ आज के लोकतंत्र का एक विशाल चित्र था—अनेक दल, अनेक चुनाव-चिह्न और असंख्य झंडे। चित्र के नीचे लिखा था— “संख्या में अनेक, व्यवस्था में एक सौ पाँच?” एक छात्र मुस्कराया— “इसका क्या अर्थ है?” अनुराग बोले— “महाभारत में पाँच पांडव और सौ कौरव मिलकर एक सौ पाँच भाई कहे जाते थे। उनके बीच संघर्ष था, फिर भी वे एक ही राजवंश और सत्ता-संरचना के अंग थे। आज दल अनेक हैं, पर यदि वे जनता के सामने लड़ते हुए भी सत्ता के बंद कमरों में एक ही व्यवस्था, एक ही स्वार्थ और एक ही सुविधाओं की रक्षा करने लगें, तो प्रतीकात्मक रूप से वे फिर ‘एक सौ पाँच’ हो जाते हैं।” एक छात्रा ने पूछा— “लेकिन आज कृष्ण कहाँ हैं?” अनुराग कुछ क्षण मौन रहे। “आज की सबसे बड़ी उलझन यही है। हम कृष्ण को किसी एक व्यक्ति, नेता अथवा अवतार के रूप में खोज रहे हैं। संभव है आज का कृष्ण एक व्यक्ति न होकर जाग्रत विवेक हो। वह किसी किसान की सत्यनिष्ठा में, किसी शिक्षक के साहस में, किसी वैज्ञानिक की जिम्मेदारी में, किसी विदुर की निर्भीक सलाह में और किसी विकर्ण के विरोध में प्रकट हो। लेकिन हम उसे तभी पहचानेंगे, जब वह हमारे दल, जाति और निजी स्वार्थ से बाहर खड़ा दिखाई देने पर भी हमें स्वीकार्य हो।” अगले कक्ष में बच्चों के चित्र लगे थे। किसी बच्चे के हाथ में मोबाइल था, किसी के सामने नशीला पदार्थ, कहीं प्रदूषित नदी थी, कहीं बेरोजगार युवकों की पंक्ति। एक चित्र में भोजन की थाली पर लिखा था—“मिलावट”; दूसरे में धरती मास्क लगाए खड़ी थी। सबसे नीचे भारत तिवारी नामक एक युवक की तस्वीर के साथ प्रश्न लिखा था— “जब भविष्य मारा जाता है, तब व्यवस्था किसके साथ खड़ी होती है?” अनुराग बोले— “महाभारत के अन्त में अश्वत्थामा ने सोते हुए उपपांडवों—द्रौपदी के पाँच पुत्रों—की हत्या कर दी थी। वह समाचार सुनकर मृत्युशय्या पर पड़े दुर्योधन ने भी उस कृत्य को गौरवपूर्ण विजय नहीं माना। लेकिन आज हमारा भविष्य धीरे-धीरे मारा जा रहा है—नशे, हिंसा, मिलावट, प्रदूषण, बेरोजगारी, डिजिटल लत, प्रकृति-विनाश और अनैतिक तकनीकी प्रयोगों से। प्रश्न यह है कि इस सामूहिक बाल-वध पर कौन दुःखी है?” “क्या AI भी अश्वत्थामा है?” एक बच्चे ने पूछा। “तकनीक स्वयं अश्वत्थामा नहीं होती,” अध्यापक ने कहा। “उसे किस उद्देश्य से प्रयोग किया जाता है, यह निर्णायक है। वही AI ज्ञान दे सकती है और वही भ्रम, बेरोजगारी, निगरानी तथा छल का साधन भी बन सकती है। शस्त्र से अधिक महत्त्व उस चेतना का है, जिसके हाथ में शस्त्र है।” अन्तिम कक्ष अँधेरा था। उसके मध्य एक खाली आसन रखा था। ऊपर लिखा था— “कल्कि की प्रतीक्षा।” एक विद्यार्थी बोला— “क्या इस आसन पर भविष्य में कल्कि बैठेंगे?” अनुराग ने कहा— “यदि हम कल्कि की प्रतीक्षा करते हुए अपने वर्तमान कर्तव्यों से भाग रहे हैं, तो यह आसन आशा का नहीं, निष्क्रियता का प्रतीक है। जब सब कुछ कलि के प्रभाव में हो, तब कल्कि की प्रतीक्षा का अर्थ हाथ पर हाथ रखकर बैठना नहीं हो सकता। उसका अर्थ अपने भीतर कलि—लोभ, झूठ, हिंसा, घृणा और अन्याय—के विरुद्ध संघर्ष शुरू करना है।” दीवार पर कंस की जेल का चित्र उभरा। देवकी और वसुदेव बंदी थे और नवजात कृष्ण को टोकरी में रखकर यमुना पार ले जाया जा रहा था। एक छात्र ने कहा— “कंस ने देवकी और वसुदेव को एक ही कारागार में रखकर कृष्ण के जन्म का अवसर क्यों दिया? वह उन्हें अलग भी तो कर सकता था!” अनुराग मुस्कराए— “यही कथा का गहरा संकेत है। अत्याचारी व्यवस्था स्वयं को सर्वज्ञ और अजेय समझती है, लेकिन उसकी अपनी भूलों, अहंकार और नियंत्रण की सीमाओं के भीतर परिवर्तन का बीज जन्म ले लेता है। कंस भविष्यवाणी से भयभीत था, पर वह चेतना के जन्म को रोक नहीं सका। यह रहस्य केवल जैविक जन्म का नहीं—आशा, प्रतिरोध और नई चेतना के जन्म का भी है।” “तो क्या कल्कि का जन्म भी किसी जेल में होगा?” “यह कोई निश्चित रूप से नहीं कह सकता,” अनुराग ने उत्तर दिया। “लेकिन जब भी अन्याय अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, उसके भीतर ही प्रतिरोध की सम्भावना जन्म लेने लगती है। संभव है कि जिस व्यवस्था को लगता हो कि उसने भविष्य को कैद कर लिया है, उसी के भीतर से भविष्य का कृष्ण या कल्कि प्रकट हो जाए।” वे सभी बाहर निकलने लगे। द्वार के पास एक पुरानी छड़ी रखी थी, जिस पर लिखा था— “धर्मदंड।” विद्यार्थियों ने पूछा— “इसे उठाएगा कौन?” अनुराग बोले— “पहले धर्मदंड राजा को उसकी मर्यादा याद दिलाता था। आज राजा किसी एक व्यक्ति में नहीं है—राज्य संस्थाओं, दलों, बाजार, मीडिया, तकनीक और नागरिकों में बँटा हुआ है। इसलिए धर्मदंड भी किसी एक गुरु या पुरोहित के हाथ में नहीं रह सकता। वह जागरूक जनमत, निष्पक्ष न्याय, सत्य बोलने वाले नागरिक और उत्तरदायी संस्थाओं के सामूहिक हाथ में होना चाहिए।” तभी एक छात्र ने धर्मदंड उठाने की कोशिश की, पर वह बहुत भारी था। अनुराग ने कहा— “इसे कोई अकेला नहीं उठा पाएगा।” सभी बच्चों ने मिलकर उसे उठाया। उसी क्षण कक्ष में प्रकाश फैल गया। मुख्य द्वार पर अंतिम वाक्य चमक रहा था— “महाभारत इसलिए अधूरा है क्योंकि धर्म और अधर्म का संघर्ष केवल कुरुक्षेत्र में समाप्त नहीं हुआ। आज का कुरुक्षेत्र हमारे राज्य, समाज, तकनीक, बाजार और मन—सभी के भीतर है। आज कृष्ण को खोजने से पहले हमें अर्जुन बनने की तैयारी करनी होगी, विदुर की बात सुननी होगी और विकर्ण जैसा विरोध करने का साहस जगाना होगा।” अनुराग ने पीछे मुड़कर झंडों की ओर देखा और धीरे से कहा— “जब जनता केवल किसी अवतार की प्रतीक्षा करती है, तब कलि का शासन लंबा होता जाता है। लेकिन जब जनता स्वयं सत्य, न्याय और प्रकृति की रक्षा के लिए खड़ी होती है—तभी कृष्ण की वाणी सुनाई देने लगती है।” और शायद उसी क्षण दूर कहीं किसी नए महाभारत का शंख बज चुका था— युद्ध के लिए नहीं, मनुष्य की चेतना जगाने के लिए।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

IN SUNAASIR!!अंदर सुनासिर /अंडर सुनासिर /अंतर सुनासिर?!

अंदर सुनासिर?!इन सुनासिर?!
सन 2043ई का समय!! आजाद हिन्द सरकार की 100वीं वर्षगांठ!! जनपद सुनासिर नाथ, बंडा में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन होने जा रहा था। एक मंच का निर्माण हो चुका था और पंडाल आदि की व्यवस्था हो रही थी। एक बुजुर्ग व्यक्ति के हाथ में एक पुस्तक थी.. "अंदर सुनासिर?! " एक युवती उसे पढ़ने लगी थी.... मुख्य पात्र, उसका दुःख और आध्यात्मिक प्रश्न मुख्य पात्र ::अशोक जो एक अधेड़ व्यक्ति!! उसका दुःख... अंतर मन मिलने वाले संदेशों, किताबों से प्राप्त संदेशों के आधार पर चलने, जीविका चलाने, जिनके साथ रहना, काम करना आदि में असंतुलन। आध्यात्मिक प्रश्न ::हम अपनी इच्छाओं के गुलाम हैं, जो हमारे जीवन में बाधक है। हम अपनी इच्छाओं की अपेक्षा उन दिव्य संदेशों के हिसाब से सिर्फ कोशिश ही कर पा रहे हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि हम कुछ ऐसा महसूस करते हैं जिससे पता चलता है कि हमारे साथ दिव्य शक्तियां है हम उनका सहयोग ले आगे बढ़ सकते हैं। हम ये भी महसूस कर चुके हैं कि हनुमान जी वास्तव में भक्तों के रक्षक हैं। गुरु अथवा संत से भेंट! जुलाई 1997ई में पुवायां रहने की शुरआत के साथ अशोक ने अपने साथ तीन बुजुर्गों संतों को अनेक बार महसूस किया है जो उसे मार्गदर्शन देते रहे हैं। पुवायां में रह कर निरंकारी समाज के साधकों से जुड़ना व सहज मार्ग का साहित्य पढना। खुटार के पास एक गांव मोहनापुर में फूफा जी के खेत में बनी कोठरी में ध्यान के दौरान शरीर में काफी हल्का पन व आनंद महसूस करना। 25दिसंबर 2014को सहज़ मार्ग में पहली सिटिंग ब्रह्माधार मिश्रा के कटरा स्थित मकान में प्रशिक्षक रविंद्र सिन्हा के द्वारा। जिससे पहले लाला जी महाराज, फतेहगढ़ के दर्शन करना। जो उन तीन बुजुर्गों में से एक। विश्व संविधान विश्व सरकार व श्री विश्व सरकार गुरु ग्रंथ साहब की धारणा मन में आना। एक दिन बाबूजी महाराज का दिखना जो कह रहे थे कि अपना काम शुरू करो। अशोक ने दाजी जी को देख कर कहा कि दाजी हैं तो पटेल जी हैं तो? बाबू जी बोले.. आप अपना काम करो। सेवा, ध्यान और जीवन-संघर्ष अंतर्मन में संदेश.. अपनी प्रतिभा से किसी को समझौता नहीं करना चाहिए। अशोक के आँखों में आंसू आ गये। वह सोंचने लगा कि.. वह कटरा में 01जुलाई 2004ई को आया था।एक माह के अंदर ही वह वापस बरेली जाने का मन बनाने लगा था। इससे पहले वह बरेली के मखानी इंटर कालेज, मुड़िया अहमदनगर में शिक्षण कार्य कर रहा था। कटरा में उसे उसके साथ पढ़ाने वाले एक शिक्षक अनिरुद्ध सिंह यादव रोके रहे। एक साल बाद जिनकी नियुक्ति राजकीय इंटर कालेज के लिए हो गयी थी। कटरा में डेढ़ साल बीतते बीतते उसके मन की यही पुकार थी कि अब वह भी कटरा छोड़ दे लेकिन वह इसके लिए हिम्मत न जुटा पाया। सन 2007ई के आते आते उसने महसूस किया कि कोई संत उसे चित्रकूट में बुला रहे हैं। लेकिन अनुरूद्द सिंह यादव ने उससे कहा था कि यहीं रुके रहना। यदि सरकारी नौकरी लग जाये तो अलग बात। और फिर... कटरा आने से पहले वह स्वप्न में जो स्थान देखता था वह उसने कटरा में ही देखा था। सूक्ष्म दशा को महसूस की सामर्थ्य में कुछ वृद्धि यहीं हुई थी। बड़ा संकट एवं चेतना-परिवर्तन पैतृक गांव यहां से काफी दूर। अशोक के पिता जिस नगर में रह रहे थे वह -बीसलपुर। सन 2007 ई के आते आते उसकी उसके पितृ कुल से उम्मीदें खत्म हो चुकी थीं। वह अपना आध्यात्मिक व साहित्यिक जीवन जी तो रहा था लेकिन इस सबके साथ वह अपना गृहस्थ जीवन भी जीना चाहता था लेकिन उसे शादी के लिए ऐसी कोई युवती नहीं मिल रही थी जो कि उसके आध्यात्मिक व साहित्यिक जीवन में सहयोगी हो। अशोक की दोनों बहिने व एक भाई उससे छोटा ही था लेकिन उनकी पहले ही शादी हो चुकी थी। वह अपने परिवार में में भी अपने को बचपन से ही अलग थलग महसूस करता था। चेतना परिवर्तन की ओर की उसकी यात्रा में अब इसके साथ काफी तेजी से बदलाव शुरू हो चुके थे। उसके स्वप्न अब चेतना की स्थिति में जाकर महसूस होने की ओर अग्रसर हो ही चुके थे. इसके साथ ही अब वह ऐसा भी देखने लगा था जो आगे चल सत्य घटित होने लगा था। अब उसकी चेतना विश्व स्तर पर महसूस करने लगी थी। उन दिनों की बात है जब अशोक बीसलपुर में रह रहा था और स्नातक अंतिम वर्ष का विद्यार्थी था। पड़ोस के एक मकान में जो गांव खमरिया के एक कुनबी व्यापारी था, जहां एक संत आये हुए थे। उन्होंने महसूस किया था जो वहाँ कहा कि यहां कोई दिव्य शक्ति व दिव्य व्यक्ति रह रहा है लेकिन वह अपने पूर्व संस्कारों के कारण विषम परिस्थितियों में फंसा हुआ है और उसके कुनबा के लोग भी उसके सहायक नहीं हैं। एक दिन एक युवा सन्यासी ऐसे आये थे जो सिर्फ अशोक से मिल कर चले गये थे। वे नगर व मोहल्ले में अन्य किसी से नहीं मिले थे। जो कि हनुमान भक्त थे और वे अशोक का हाथ देखना चाहते थे लेकिन अशोक ने नहीं दिखाया था।
समाधान तथा मानवता, प्रकृति और विश्व-शांति का संदेश!! अशोक सन 1989-90ई से ऐसे अनेक सपनें देखने लगा था जिसमें दिल्ली व दिल्ली के पश्चिम का पूरा क्षेत्र पाकिस्तान तक, मुंबई, कलकत्ता आदि को नष्ट होते देख रहा था। गलेशियर आदि को पिघलते। वह मुंबई को समुद्र में डूबते भी देखता था और श्री लंका में जाने वाली एक सुरंग को देखता जिसमें समुद्र का पानी भरा हुआ दिखाई दे। जब वह कक्षा दो में पीलीभीत -बीसलपुर मार्ग पर स्थित बाला जी की मड़ी में सरस्वती शिशु मंदिर, बीसलपुर में पढ़ता था तो उसे वहाँ आँख बंद कर ब्रह्म नाद करने की प्रेरणा मिली थी। जहां अनेक सन्यासी भी रहते थे और कुछ सन्यासियों की समाधियां भी बनी हुई थीं। रास्ते में एक ईसाइयों का क़ब्रस्तान पड़ता था। उसे आँख बंद कर ध्यान करने की प्रेरणा मिल चुकी थी। "उसके साथ के बच्चे कहते तू तो सहमा सहमा रहता है लेकिन समाधियों व कब्रों से नहीं डरता? " तब अशोक कहता था कि.." हमें इंसानों से डर ज्यादा लगता है। " अशोक ने एक दिन महसूस किया कि हमारे पास समाधान है लेकिन उसके लिए हमें अपनी आत्मा से जुड़ना होगा। किसी ने महसूस करवाया कि हनुमान भक्तों के रक्षक हैं। उन्हें चाहे पुकारो या न पुकारो। मोहल्ले में एक मुस्लिम लड़का आकर बजरी,मोरम आदि बेंचने लगा था। अशोक उसकी झोपड़ी में जाकर कभी कभी तख्त पर बैठ जाता था। "हनुमान हम मुसलमानों के थोड़ी हैं?" अशोक खामोश.. लेकिन उसने मन ही मन सोंचा कि हनुमान शक्ति के रूप में सबके हैं, बस जो छबि दिखाई देती है वह हिन्दुओं की नजर में है। अनंत यात्रा में वे सबके हैं जो शक्ल सूरत, देह से परे हैं। समाधान तथा मानवता, प्रकृति और विश्व-शांति का संदेश?! "हमारा समाधान वर्तमान मानव व्यवस्था, सिस्टम, नेताओं, दलों, पुरोहितों, धर्मों, धर्म स्थलों आदि के पास नहीं है। समाधान हमारे अंदर है। समस्या व समाधान जीवन प्रवाह के दो किनारे हैं। लेकिन इसमें बाधा अब मानव है। जो हनुमान के भक्त भी दिखते हैं वे किस लिए है? वे भी उस सिस्टम के हिस्सा हो सकते हैं जो कि मानव शांति, मानवता, प्रकृति अभियान, ब्राह्मड चेतना आदि के लिए बाधा हैं। अध्यात्म ही समाधान है। मानवता भी समस्याओं से दूरी का माध्यम है। जीवन प्रवाह में बस जीते रहो। अपनी चेतना को ब्रह्माण्ड चेतना से जोड़ने के अभ्यास में लगे रहो। सब कुछ प्रसाद समझो। सन 2025ई की 10जून!! अब अशोक अधेड़ अवस्था के चरमोत्कर्ष पर!! उसका सूक्ष्म शरीर उत्तराखंड व मानसरोवर के बीच क्षेत्र व अरुणाचल व चीन के बीच क्षेत्र में!! जहां अनेक साधु संतों के साथ वह।अरुणाचल व चीन के बीच क्षेत्र में वह साधु संतों के साथ आजाद हिन्द सरकार के अधिकारियों के साथ जहाँ कुछ दूरी पर नेता जी सुभाष चंद्र बोस का भी सूक्ष्म शरीर। वह वैष्णोदेवी देवी पर्वत से किसी देवी शक्ति को कहीं दूर जाते देखता है। एक सन्देश कि.. प्रकृति व ब्राह्मड में मानव अब एक बाधा बन चुका है। ऐसे में सबके सूक्ष्म शरीर को जगाने की जरूरत है। देह धारी जो सूक्ष्म शरीर हैं उनको रात्रि में ही हस्तक्षेप करना ठीक है। दिन में जागते वक़्त तो वे तर्क -कुतर्क करने लगते हैं और दुनियाबी आकर्षण से मुक्त होने तक सोंच नहीं आती। सन 2026ई के आते आते अशोक ने देखा कि नंदा देवी चोटी नष्ट हो रही है। ऐसे में अंदर सुनासिर?!इन सुनासिर?! बंडा से तीन किलोमीटर दूर एक तीर्थ.. सुनासिर नाथ!! जून 2026को वह वहां अनेक स्थानों पर आँख बंद कर बैठा और काफी कुछ महसूस किया। उसके साथ उसका एक चचेरा भाई अनुमोद उर्फ कल्लू उपस्थित था जो कि मोबाइल से फोटोग्राफ़ी व वीडियोग्राफ़ी कर रहा था।

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

खंडहर में खुलता विचारों का द्वार?!

सन 2075 ई०! घने जंगल के बीच एक पुराना खंडहर खड़ा था। उसकी दीवारों पर समय की दरारें थीं और छत के कई हिस्सों से आकाश दिखाई देता था। फिर भी उसका लंबा बरामदा सुरक्षित था। उसी बरामदे में कुछ बुजुर्ग बैठे बातचीत कर रहे थे। एक पुराने तख्त पर धूल से ढकी कुछ पुस्तकें रखी थीं। उनमें रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता, गुरु गोविन्द सिंह के जीवन-संघर्ष और कर्बला के इतिहास से संबंधित पुस्तकें भी थीं। खंडहर से कुछ दूरी पर एक पहाड़ी दिखाई देती थी। उसका आकार ऐसा लगता था, मानो प्रकृति ने स्वयं वहाँ श्री अर्द्धनारीश्वर की विशाल मूर्ति गढ़ दी हो। पहाड़ी के एक भाग पर सुनहरी घास और दूसरे भाग पर हरी झाड़ियाँ उगी थीं। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि शिव और शक्ति, ज्ञान और कर्म, करुणा और साहस—सब एक-दूसरे के पूरक हैं। बुजुर्ग अनुराग ने तख्त पर रखी एक पुरानी डायरी उठाई। उसके पन्ने पीले पड़ चुके थे। उसने पढ़ना शुरू किया— “देह का अंत एक दिन निश्चित है। इसलिए जीवन का मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि हम कितने वर्ष जीवित रहे, बल्कि इससे होता है कि हमने जीवित रहते हुए सत्य, न्याय और मानवता के लिए क्या किया।” राज ‘अराजक’ ने गहरी साँस लेते हुए कहा— “सर जी कभी-कभी कहा करते थे—यदि अन्याय का विरोध करते हुए मेरे सामने संकट भी आ जाए, तो मैं अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटूँगा।” सामने बैठे अब्दुल ने तुरंत कहा— “लेकिन उनके कथन का अर्थ मृत्यु की इच्छा करना नहीं था। वे तो जीवन को बहुत मूल्यवान मानते थे।” “बिलकुल,” अनुराग बोला, “उनका आशय था कि भय के कारण मनुष्य अपने विवेक को न बेच दे। संघर्ष का उद्देश्य स्वयं को संकट में डालना नहीं, बल्कि बुद्धि, कानून, अहिंसा और सामूहिक प्रयास से अन्याय को रोकना होना चाहिए।” राज ने पहाड़ी की ओर देखते हुए पूछा— “तब सर जी जटायु का उदाहरण बार-बार क्यों देते थे?” अनुराग ने डायरी का अगला पन्ना खोला। उसमें एक पुरानी घटना लिखी थी। मखानी इंटर कॉलेज की वह संध्या सन 2003 ई०, जनवरी! मखानी इंटर कॉलेज, मुड़िया अहमदनगर, बरेली। सर्दियों की एक शांत संध्या थी। सूर्य धीरे-धीरे खेतों के पीछे उतर रहा था। कॉलेज के मुख्य द्वार पर ताला लग चुका था, फिर भी गेटकीपर अरविंद वाल्मीकि अपनी पुरानी बेंच डालकर वहीं बैठा था। उसका घर पास में ही था, इसलिए विद्यालय बंद होने के बाद भी वह कुछ देर वहाँ बैठा रहता था। अशोक सर भी उसके पास उपस्थित थे। तभी असलम नाम का एक मुस्लिम लड़का वहाँ आ पहुँचा। वह कभी-कभी अशोक सर के कमरे पर जाकर उन्हें कुरआन की प्रारम्भिक आयतों का अर्थ समझाया करता था। असलम ने अभिवादन करके पूछा— “सर जी, विद्यालय बंद हो चुका है। आप दोनों अभी तक यहाँ क्यों बैठे हैं?” अशोक सर ने बंद द्वार की ओर देखा और मुस्कराकर बोले— “विद्यालय का द्वार बंद हो सकता है, असलम, लेकिन सीखने और विचार करने का द्वार कभी बंद नहीं होना चाहिए।” असलम भी बेंच के पास बैठ गया। कुछ समय तक तीनों सड़क पर आते-जाते लोगों को देखते रहे। तभी अरविंद ने पूछा— “सर जी, आप कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को अन्याय का विरोध करना चाहिए। लेकिन यदि अन्यायी बहुत शक्तिशाली हो और हम उसके सामने बहुत कमजोर हों, तब क्या किया जाए?” अशोक सर कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने पूछा— “क्या तुमने जटायु का प्रसंग सुना है?” “हाँ,” अरविंद ने उत्तर दिया, “जटायु वृद्ध थे। फिर भी उन्होंने माता सीता की रक्षा के लिए रावण को रोकने का प्रयास किया था।” अशोक सर बोले— “जटायु जानते थे कि वे रावण से अधिक शक्तिशाली नहीं हैं। फिर भी उन्होंने यह सोचकर मुँह नहीं फेर लिया कि यह संघर्ष किसी दूसरे का है। उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार अन्याय का प्रतिरोध किया। यही उनका सबसे बड़ा संदेश है।” असलम ने पूछा— “लेकिन यदि विरोध करने से जीवन पर संकट आ जाए तो?” अशोक सर ने गंभीरता से समझाया— “साहस का अर्थ संकट को आमंत्रित करना या बिना सोचे-समझे टकरा जाना नहीं है। सच्चा साहस है—परिस्थिति को समझना, पीड़ित की सहायता करना और उचित साधनों से अन्याय को रोकना। कभी स्वयं सहायता करनी चाहिए, कभी समाज को जगाना चाहिए और कभी प्रशासन तथा कानून की मदद लेनी चाहिए।” उन्होंने आगे कहा— “जटायु की प्रेरणा यह नहीं कि हर व्यक्ति अकेले शक्तिशाली अपराधी से भिड़ जाए। उनकी प्रेरणा यह है कि किसी असहाय को संकट में देखकर हम उदासीन न रहें। सहायता बुलाना, प्रमाण सुरक्षित करना, पीड़ित को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाना और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना भी साहस है।” अरविंद ने पूछा— “तब सच्चा ब्राह्मण और सच्चा क्षत्रिय कौन है?” अशोक सर बोले— “इन शब्दों को केवल जन्म और जाति में सीमित मत करो। जो ज्ञान, विवेक और सदाचार को अपने व्यवहार में उतारता है, उसमें ब्राह्मण का गुण है। जो निर्बल की रक्षा करता है, न्याय का साथ देता है और अपने बल का दुरुपयोग नहीं करता, उसमें क्षत्रिय का गुण है। ये श्रेष्ठता के पद नहीं, उत्तरदायित्व के प्रतीक हैं।” असलम ने धीरे से कहा— “जैसे हज़रत इमाम हुसैन ने अन्याय के सामने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया?” “हाँ,” अशोक सर बोले, “कर्बला हमें सत्य, न्याय, त्याग और नैतिक दृढ़ता की प्रेरणा देता है। इसी प्रकार गुरु गोविन्द सिंह जी और उनके परिवार का इतिहास हमें बताता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धार्मिक स्वतंत्रता और मानव-मर्यादा की रक्षा की जा सकती है।” फिर उन्होंने सावधान करते हुए कहा— “लेकिन इन महापुरुषों के बलिदानों को किसी समुदाय के प्रति घृणा फैलाने के लिए प्रयोग करना उनके संदेश का अपमान होगा। उनसे प्रेरणा लेने का अर्थ है—अन्याय का विरोध करो, पर मनुष्य से घृणा मत करो; अत्याचार रोकने का प्रयास करो, पर स्वयं अत्याचारी मत बनो।” अरविंद ने पूछा— “क्या केवल बड़े संघर्ष में उतरना ही मिशन कहलाता है?” अशोक सर मुस्कराए— “नहीं। मिशन परिस्थितियों और सामर्थ्य के अनुसार होता है। कोई बच्चों को ईमानदारी से पढ़ाता है, कोई भूखे को भोजन देता है, कोई पेड़ लगाता है, कोई भेदभाव के विरुद्ध बोलता है और कोई परिवार में सत्य तथा सदाचार की शुरुआत करता है। प्रत्यक्ष कर्म भी मिशन है और पर्दे के पीछे किया गया सहयोग भी।” यह कहते हुए उन्होंने जमीन पर पड़ी कागज की एक पुड़िया उठाई और पास के कूड़ेदान में डाल दी। “देखो,” उन्होंने कहा, “मिशन केवल भाषण नहीं होता। अपने सामने पड़ी छोटी-सी जिम्मेदारी को निभाना भी मिशन है।” अँधेरा बढ़ने लगा था। असलम ने बंद विद्यालय की ओर देखते हुए कहा— “आज समझ आया कि जटायु हमें केवल शक्तिशाली बनने की नहीं, जिम्मेदार बनने की प्रेरणा देते हैं।” अरविंद ने अपनी बेंच उठाते हुए कहा— “और साहस का अर्थ केवल लड़ना नहीं है। सही समय पर सही उपाय से किसी की रक्षा करना भी साहस है।” अशोक सर बोले— “हर मनुष्य किसी न किसी धुन में जीवन बिताता है—कोई धन की धुन में, कोई पद की, कोई प्रसिद्धि की और कोई स्वार्थ की। लेकिन जिसकी धुन में सत्य, मानवता, न्याय और लोककल्याण जुड़ जाता है, उसका साधारण जीवन भी असाधारण बन जाता है।” तीनों वहाँ से चल पड़े। कॉलेज के द्वार पर ताला लगा रहा, लेकिन उनके भीतर विचार का एक नया द्वार खुल चुका था। अनुराग ने डायरी बंद कर दी। खंडहर के बरामदे में कुछ क्षण मौन छा गया। राज ‘अराजक’ ने सामने की अर्द्धनारीश्वर जैसी पहाड़ी को देखते हुए कहा— “अब समझ आया कि ज्ञान और साहस अलग-अलग नहीं हैं। ज्ञान बताएगा कि क्या उचित है और साहस उस उचित कार्य को करने की शक्ति देगा।” अब्दुल बोला— “और जटायु, हज़रत इमाम हुसैन तथा गुरु गोविन्द सिंह जी के परिवार से मिलने वाली प्रेरणा का सार यही है कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य, न्याय और मानव-मर्यादा के उद्देश्य को नहीं छोड़ना चाहिए।” अनुराग ने कहा— “हाँ। प्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़कर कार्य करना हो अथवा अप्रत्यक्ष रूप से किसी सच्चे प्रयास का सहयोग—प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर मानवता के मिशन में भागीदार हो सकता है।” उसी समय बादलों के बीच से सूर्य की अंतिम किरण निकली और पहाड़ी पर पड़ी। घास से ढकी वह आकृति कुछ क्षणों के लिए चमक उठी। मानो प्रकृति स्वयं कह रही हो— देह नश्वर है, इसलिए उसे संकट में झोंकना नहीं, बल्कि उसके प्रत्येक क्षण को सार्थक बनाना चाहिए। जटायु की तरह अपनी शक्ति छोटी देखकर कर्तव्य से मुँह मत मोड़ो। विवेक, करुणा, अहिंसा और साहस के साथ अन्याय का विरोध करो तथा मानवता के मिशन में निरंतर सक्रिय रहो।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

सिस्टम जब भस्मासुर?!

सन 2075 ईस्वी। पुराने नगर का अधिकांश भाग खंडहर बन चुका था। एक विद्यालय की टूटी हुई इमारत में कुछ युवक और बुजुर्ग शरण लिए हुए थे। दीवार पर लगा उपस्थिति-पट्ट अब भी बचा था। उस पर धुँधले अक्षरों में लिखा था— “प्रत्येक विद्यार्थी की नियमित उपस्थिति अनिवार्य है।”
बुजुर्ग अनुराग ने उस पट्ट को देखते हुए कहा— “अशोक सर कहा करते थे कि जब कोई व्यवस्था अपने उद्देश्य को भूलकर केवल आँकड़ों, कागजों और आदेशों में उलझ जाती है, तब वह स्वयं अपने ही लोगों को फँसाने लगती है।” एक युवक ने पूछा— “सिस्टम अपने ही लोगों को कैसे फँसा सकता है?” अनुराग ने विद्यालय के पुराने दिनों की एक घटना सुनानी शुरू की। उपस्थिति का जाल एक विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही थी। कई बच्चे पारिवारिक कठिनाइयों, कामकाज, बीमारी अथवा पढ़ाई में रुचि न होने के कारण विद्यालय नहीं आते थे। लेकिन अधिकारियों की ओर से निर्देश था कि उपस्थिति कम नहीं होनी चाहिए। प्रधानाचार्य ने शिक्षकों से कहा— “यदि बच्चों की उपस्थिति कम दिखाई गई, तो विद्यालय पर प्रश्न उठेंगे। अनुदान घट सकता है और शिक्षकों के विरुद्ध कार्रवाई भी हो सकती है।” एक शिक्षक ने पूछा— “लेकिन जो विद्यार्थी आया ही नहीं, उसे उपस्थित कैसे दिखाएँ?” प्रधानाचार्य ने धीमे स्वर में कहा— “मैं गलत उपस्थिति लगाने को नहीं कह रहा, लेकिन आँकड़े अच्छे होने चाहिए।” यह ऐसा आदेश था जिसमें बात स्पष्ट भी थी और अस्पष्ट भी। शिक्षक वास्तविक उपस्थिति लिखते, तो उनसे खराब परिणाम का उत्तर माँगा जाता। अनुपस्थित विद्यार्थियों को उपस्थित दिखाते, तो वे गलत अभिलेख तैयार करने के दोषी बनते। कुछ दिनों बाद एक विद्यार्थी विद्यालय के समय बाहर किसी विवाद में पकड़ा गया। अभिलेख में वह उस दिन विद्यालय में उपस्थित था। जाँच अधिकारी ने शिक्षक से पूछा— “यदि यह विद्यार्थी विद्यालय में उपस्थित था, तो बाहर कैसे मिला?” शिक्षक के पास कोई उत्तर नहीं था। जिस झूठे आँकड़े ने कुछ समय तक विद्यालय की छवि बचाई थी, वही अब शिक्षक के विरुद्ध प्रमाण बन गया। अशोक सर ने यह घटना सुनकर कहा था— “यही वह स्थिति है जिसमें सिस्टम अपने को बचाने के लिए झूठ माँगता है और फिर उसी झूठ के आधार पर अपने कर्मचारी को दंडित करता है।” थाने का सिपाही उसी नगर के थाने में एक सिपाही कार्यरत था। उसका वेतन सीमित था, काम के घंटे निश्चित नहीं थे और ऊपर से अनेक प्रकार के अनौपचारिक दबाव आते थे। यदि वह रिश्वत लेता, तो कानून और नैतिकता दोनों की दृष्टि से गलत था। यदि रिश्वत लेने से इनकार करता, तो कुछ प्रभावशाली लोग उससे नाराज हो जाते। यदि वह नियम के अनुसार कार्रवाई करता, तो फोन आने लगते— “उसे छोड़ दो, वह अपने लोगों में से है।” यदि वह दबाव में किसी को छोड़ देता, तो बाद में वही अधिकारी पूछते— “तुमने कानून का पालन क्यों नहीं किया?” एक दिन सिपाही ने अशोक सर से कहा— “सर, नौकरी का अर्थ अब कर्तव्य निभाना नहीं, परस्पर विरोधी आदेशों के बीच स्वयं को बचाना हो गया है। रिश्वत लूँ तो अपराधी, न लूँ तो व्यवस्था का विरोधी!” अशोक सर ने उत्तर दिया— “रिश्वत कभी उचित नहीं हो सकती। लेकिन केवल नीचे के कर्मचारी को दोष देकर समस्या समाप्त नहीं होती। यह भी देखना होगा कि उसके ऊपर कौन-से दबाव हैं, आदेश कैसे दिए जाते हैं और ईमानदार कर्मचारी को संस्था कितना संरक्षण देती है।” बसों का हिसाब नगर से जयपुर जाने वाली बसों के कुछ ठेकेदार यात्रियों की संख्या के आधार पर एक अनौपचारिक रकम अलग रखते थे। लोगों में चर्चा थी कि उसका एक भाग किसी प्रभावशाली जनप्रतिनिधि तक पहुँचता है। वह प्रतिनिधि सार्वजनिक मंचों पर परिवहन सुधारने की बातें करता था, लेकिन भीतर चल रही व्यवस्था पर मौन रहता था। उसकी बिरादरी के कुछ लोग कहते— “विधायक जी अपने आदमी हैं। उनकी आलोचना मत करो।” एक यात्री ने पूछा— “यदि गलत काम करने वाला अपनी जाति या बिरादरी का हो, तो क्या उसका गलत काम सही हो जाता है?” दूसरे व्यक्ति ने उत्तर दिया— “लोग प्रतिनिधि को जनता का सेवक नहीं, अपनी बिरादरी की शक्ति मानने लगते हैं। इसलिए वे सार्वजनिक हित से पहले सामुदायिक निष्ठा को रखते हैं।” जब बसों में निर्धारित संख्या से अधिक यात्रियों को बैठाया जाता, किराया मनमाने ढंग से बढ़ता और शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती, तब उसका बोझ सामान्य यात्रियों को सहना पड़ता। ठेकेदार सोचता था कि हिस्सा देकर उसने सुरक्षा खरीद ली है। अधिकारी सोचता था कि ऊपर से संरक्षण है। नेता सोचता था कि बिरादरी उसका साथ देगी। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति व्यवस्था का “खास” बनने का प्रयत्न कर रहा था—और यही विशेष संबंध पूरी व्यवस्था के लिए उलझन बन रहा था। भस्मासुर का रूपक अनुराग ने युवकों से पूछा— “भस्मासुर की कथा जानते हो?” एक युवक ने कहा— “उसे ऐसी शक्ति मिली थी कि जिसके सिर पर हाथ रखे, वह भस्म हो जाए। बाद में वह उसी शक्ति के कारण स्वयं संकट में पड़ गया।” अनुराग ने कहा— “सिस्टम भी भस्मासुर तब बनता है, जब उसे दी गई शक्ति नियंत्रण और सेवा के स्थान पर भय, पक्षपात तथा निजी लाभ के लिए प्रयोग होने लगे। वह पहले सामान्य नागरिक को परेशान करता है, फिर अपने कर्मचारियों को और अंत में स्वयं अपनी विश्वसनीयता को नष्ट कर देता है।” विद्यालय में झूठी उपस्थिति, थाने में अनैतिक दबाव और परिवहन में कथित कमीशन—तीनों घटनाएँ अलग दिखाई देती थीं, पर उनकी जड़ एक थी: नियमों और वास्तविक परिस्थितियों के बीच दूरी। अशोक सर की सभा एक नागरिक सभा में अशोक सर ने कहा— “किसी भी व्यवस्था का उद्देश्य मनुष्य की समस्या का समाधान होना चाहिए। लेकिन जब उसका ध्यान वास्तविक परिणाम से हटकर केवल आँकड़े, लक्ष्य, कमीशन, जातीय समर्थन और अधिकारियों को प्रसन्न करने पर टिक जाता है, तब साधन ही उद्देश्य बन जाते हैं।” उन्होंने श्यामपट्ट पर लिखा— अस्पष्ट आदेश → झूठे आँकड़े → दबाव → दोषारोपण → अविश्वास फिर बोले— “व्यवस्था को बचाने के लिए सत्य छिपाया जाता है। बाद में उसी छिपे हुए सत्य के कारण बड़ा संकट उत्पन्न होता है। तब ऊपर वाला नीचे वाले को दोष देता है और नीचे वाला परिस्थितियों को। उत्तरदायित्व कहीं निश्चित नहीं होता।” सभा में बैठे एक शिक्षक ने पूछा— “फिर समाधान क्या है?” अशोक सर ने उत्तर दिया— “विद्यार्थी अनुपस्थित है तो उसकी वास्तविक अनुपस्थिति दर्ज हो। साथ ही यह खोजा जाए कि वह विद्यालय क्यों नहीं आ रहा। सिपाही को ईमानदार कार्रवाई के लिए संस्थागत सुरक्षा मिले। ठेके, यात्रियों की संख्या, किराया और भुगतान सार्वजनिक हों। जनप्रतिनिधि को जाति का संरक्षक नहीं, पूरी जनता का उत्तरदायी सेवक माना जाए। शिकायत करने वाले व्यक्ति को शत्रु न समझा जाए।” अंतिम प्रश्न कथा समाप्त करते हुए बुजुर्ग अनुराग ने कहा— “सिस्टम कोई आकाश से उतरी हुई वस्तु नहीं है। वह नियमों, संस्थाओं और मनुष्यों से मिलकर बनता है। इसलिए यह कहना अधूरा है कि केवल सिस्टम खराब है। प्रश्न यह भी है कि उसके भीतर बैठे लोग किस मूल्य के साथ काम कर रहे हैं और नागरिक किस आधार पर उनका समर्थन कर रहे हैं।” बाहर सुबह का प्रकाश फैलने लगा था। टूटी हुई दीवार पर लिखा उपस्थिति का नियम अब साफ दिखाई दे रहा था। अनुराग ने अंतिम बात कही— “जिस व्यवस्था में सच बोलने वाला दंडित हो, झूठे आँकड़े देने वाला पुरस्कृत हो और प्रभावशाली व्यक्ति नियमों से ऊपर हो जाए, वह भस्मासुर बनने लगती है। फिर वह केवल जनता को नहीं, अपने शिक्षक, सिपाही, अधिकारी और नेताओं को भी उलझाती है।” सिस्टम का सुधार तब आरम्भ होगा, जब कागजी सफलता के स्थान पर वास्तविक समस्या का समाधान, निजी संरक्षण के स्थान पर समान नियम और जातीय निष्ठा के स्थान पर सार्वजनिक उत्तरदायित्व को महत्त्व मिलेगा।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

अंतर्मन का दीपक.?!❤️❤️

अंतर्मन का दीपक
सन 2075 ईस्वी। जंगल के बीच बने एक पुराने आश्रम के चारों ओर गहरी निस्तब्धता थी। कभी वहाँ एक विद्यालय हुआ करता था, पर अब उसकी दीवारों पर लताएँ फैल चुकी थीं। टूटी खिड़कियों से हवा आती तो पुराने कमरों में ऐसा स्वर गूँजता, मानो बीते समय के विद्यार्थी आज भी अपने शिक्षक से प्रश्न पूछ रहे हों। उसी आश्रम के बरामदे में बुजुर्ग अनुराग बैठे थे। उनके बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे, किंतु आँखों में आज भी विद्यार्थी जैसी जिज्ञासा थी। उनके हाथों में अशोक सर की कुछ पुरानी पुस्तकें थीं—शिक्षा, शिक्षा का असल, क्रांति : क्यों? कैसे?, लंका में विभीषण?! और कुछ अन्य पुस्तकें, जिनके पन्ने समय के साथ पीले पड़ चुके थे।
आश्रम में रहने वाले कुछ बच्चे उनके चारों ओर बैठ गए। उनमें अब्दुल, रश्मि, दीया और कबीर भी थे। नई सभ्यता के इन बच्चों ने पुराने विद्यालय कभी नहीं देखे थे। उनके लिए जंगल ही पाठशाला था और जीवन की कठिनाइयाँ ही पाठ्यपुस्तक। कबीर ने अनुराग के हाथों की पुस्तकों की ओर देखते हुए पूछा— “बाबा, इनमें किसका ज्ञान लिखा है?” अनुराग ने पुस्तकों पर हाथ फेरते हुए कहा— “इनमें अशोक सर के विचार हैं। वे मेरे शिक्षक थे।” रश्मि ने उत्सुकता से पूछा— “क्या वे आपको केवल इतिहास, भूगोल और भाषा पढ़ाते थे?” अनुराग कुछ क्षण शांत रहे। फिर सामने खड़े विशाल वृक्ष की ओर देखते हुए बोले— “उन्होंने हमें विषय भी पढ़ाए, लेकिन उनकी वास्तविक शिक्षा पुस्तकों से कहीं बड़ी थी। उन्होंने हमें यह नहीं बताया कि क्या सोचना है; उन्होंने हमें सिखाया कि सोचना कैसे है।” अब्दुल ने पूछा— “तो वास्तविक शिक्षक कौन होता है?” अनुराग ने शिक्षा का असल पुस्तक खोली और बोले— “शिक्षक केवल वह व्यक्ति नहीं होता जो पाठ्यक्रम पूरा करे, उपस्थिति दर्ज करे और महीने के अंत में वेतन पाए। ये उसके कार्य का एक भाग हो सकते हैं। वास्तविक शिक्षक वह है जो विद्यार्थी के भीतर छिपी जिज्ञासा, विवेक, साहस और मानवीय चेतना को जाग्रत कर दे।” उन्होंने बच्चों के सामने जंगल की मिट्टी से एक छोटा-सा दीपक बनाया और उसमें तेल डालकर बाती जला दी। “देखो, शिक्षक विद्यार्थी के मस्तिष्क को किसी खाली बर्तन की तरह भरने वाला व्यक्ति नहीं है। विद्यार्थी के भीतर प्रकाश पहले से मौजूद होता है। शिक्षक केवल उस प्रकाश की बाती को जगा देता है।” दीया ने पूछा— “लेकिन लोग तो कहते हैं कि शिक्षक भी एक कर्मचारी होता है।” अनुराग मुस्कराए— “शिक्षक किसी संस्था में कर्मचारी हो सकता है, पर उसकी संपूर्ण पहचान कर्मचारी की नहीं होती। कर्मचारी को एक निर्धारित काम दिया जाता है और वह उसे पूरा करता है। शिक्षक का काम केवल निर्धारित अध्याय समाप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज का भविष्य बनाना है।” उन्होंने थोड़ा रुककर कहा— “इसका अर्थ यह भी नहीं कि शिक्षक नियमों से ऊपर है। वास्तविक शिक्षक उत्तरदायी होता है। वह उचित नियमों का सम्मान करता है, लेकिन यदि कोई आदेश विद्यार्थी, सत्य या न्याय के विरुद्ध हो तो वह अपने विवेक का उपयोग करता है।” रश्मि ने उनके हाथ से क्रांति : क्यों? कैसे? पुस्तक उठाई। “बाबा, इसमें क्रांति क्यों लिखी है? क्या शिक्षक कोई क्रांतिकारी होता है?” अनुराग ने उत्तर दिया— “हाँ, लेकिन अशोक सर जिस क्रांति की बात करते थे, वह हिंसा और विनाश की क्रांति नहीं थी। वह अज्ञान से ज्ञान, भय से साहस, संकीर्णता से विश्व-बंधुत्व और निष्क्रियता से उत्तरदायित्व की ओर बढ़ने वाली क्रांति थी।” उन्होंने बच्चों से पूछा— “यदि कोई विद्यार्थी अपने शिक्षक की प्रत्येक बात आँख बंद करके मानता रहे, तो क्या वह शिक्षित कहलाएगा?” बच्चे चुप रहे। अनुराग स्वयं बोले— “नहीं। वास्तविक शिक्षक अपनी नकल तैयार नहीं करता। वह ऐसे विद्यार्थी तैयार करता है जो उससे प्रश्न कर सकें, उसके विचारों की जाँच कर सकें और आवश्यकता पड़ने पर उससे आगे निकल सकें।” तभी दीया ने पूछा— “लेकिन शिक्षक और विद्यार्थी के बीच तीसरे का कोई महत्व नहीं होता—इसका क्या अर्थ है?” अनुराग ने पास बहती छोटी जलधारा की ओर संकेत किया। “देखो, बादल वर्षा करता है और धरती उस जल को ग्रहण करती है। यदि दोनों के बीच कोई दीवार खड़ी कर दी जाए, तो जल धरती तक नहीं पहुँचेगा। इसी प्रकार शिक्षा का मूल संबंध शिक्षक और विद्यार्थी के बीच का जीवंत मानसिक संबंध है। उसमें विश्वास, संवाद और आत्मीयता आवश्यक है।” “परिवार, विद्यालय और समाज सहयोगी हो सकते हैं। उनका सहयोग आवश्यक भी है। लेकिन जब कोई तीसरा व्यक्ति राजनीति, भय, स्वार्थ या सत्ता के आधार पर यह तय करने लगे कि शिक्षक क्या प्रश्न पूछे, विद्यार्थी क्या सोचे और कौन-सा सत्य स्वीकार करे, तब शिक्षा की स्वतंत्रता बाधित होने लगती है।” अब्दुल ने पूछा— “क्या अशोक सर के साथ भी कभी ऐसा हुआ था?” अनुराग की दृष्टि दूर अतीत में चली गई। “हाँ। एक बार विद्यालय के कुछ प्रभावशाली लोगों ने उनसे कहा था कि वे विद्यार्थियों को केवल परीक्षा में आने वाले प्रश्न पढ़ाएँ। जीवन, समाज, प्रकृति और अन्याय से संबंधित प्रश्नों पर चर्चा न करें।” “अशोक सर ने पूछा था—‘यदि विद्यार्थी परीक्षा उत्तीर्ण कर ले, लेकिन सत्य और असत्य का अंतर न समझ पाए, तो क्या मेरी शिक्षा पूरी मानी जाएगी?’” “लोगों ने उत्तर दिया—‘आपको वही करना चाहिए जिसका निर्देश मिला है।’” “अशोक सर ने शांत स्वर में कहा था—‘मैं व्यवस्था का विरोधी नहीं हूँ, लेकिन शिक्षक होने के कारण प्रत्येक निर्देश को ज्ञान, न्याय और विद्यार्थी-हित की कसौटी पर परखना मेरा उत्तरदायित्व है। शिक्षा आज्ञापालन की मशीन नहीं बनाती; वह विवेकवान मनुष्य बनाती है।’” बच्चे ध्यान से सुनते रहे। कबीर ने पूछा— “फिर शिक्षक दिवस पर अशोक सर को क्या चाहिए होता था? फूल, माला या उपहार?” अनुराग की आँखों में चमक आ गई। “एक शिक्षक दिवस पर हम भी उनके लिए फूल लेकर गए थे। उन्होंने फूल स्वीकार किए, लेकिन कहा—‘यदि वास्तव में मेरा सम्मान करना चाहते हो तो आज एक संकल्प लो। प्रश्न पूछना कभी मत छोड़ना। ज्ञान को केवल उत्तर-पुस्तिका में मत लिखना, उसे अपने व्यवहार में उतारना। जाति, मजहब, भाषा और धन के आधार पर किसी मनुष्य को छोटा मत समझना। प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मत मानना और अन्याय के सामने अपने विवेक को मौन मत होने देना।’” अनुराग ने अपने सामने बैठे बच्चों की ओर देखा। “उस समय हम उनके कथन का पूरा अर्थ नहीं समझ सके थे। हमें लगता था कि चरण-स्पर्श, फूल और प्रशंसा ही शिक्षक का सम्मान हैं। लेकिन वर्षों बाद समझ में आया कि शिक्षक का सबसे बड़ा सम्मान विद्यार्थी का जाग्रत विवेक है।” उन्होंने अशोक सर की पुस्तकों को बच्चों के बीच रख दिया। “आज ये पुस्तकें मेरे हाथ में अवश्य हैं, लेकिन अशोक सर की शिक्षा केवल इनके पन्नों में नहीं है। जब कोई विद्यार्थी प्रश्न पूछने का साहस करता है, जब वह ज्ञान को आचरण में बदलता है, जब वह दूसरे मनुष्य की गरिमा और प्रकृति की रक्षा करता है—तब शिक्षक उसके भीतर जीवित हो उठता है।” रश्मि ने पूछा— “तो क्या विद्यार्थी भी कभी शिक्षक बन सकता है?” अनुराग ने जलते दीपक से दूसरा दीपक जला दिया। “यही तो शिक्षा का उद्देश्य है। वास्तविक शिक्षक विद्यार्थी को जीवन भर अपना अनुयायी नहीं बनाए रखता। वह उसे इतना सक्षम बनाता है कि वह स्वयं प्रकाश बने और दूसरों के भीतर भी प्रकाश जगा सके।” धीरे-धीरे प्रत्येक बच्चे ने उसी दीपक से अपना छोटा दीपक जला लिया। बरामदे का अँधेरा कम होने लगा। जंगल की निस्तब्धता के बीच अनेक दीपक चमक रहे थे। अनुराग ने लंका में विभीषण?! पुस्तक उठाते हुए कहा— “सच्चा शिक्षक कभी-कभी विभीषण की तरह अपने ही वातावरण के अनुचित आचरण पर प्रश्न उठाता है। लोग उसे विद्रोही समझ सकते हैं, लेकिन यदि उसका आधार सत्य, विवेक और लोकमंगल है, तो उसका प्रश्न ही परिवर्तन का आरंभ बन सकता है।” “पर याद रखना—क्रांतिकारी होने का अर्थ मनमानी करना नहीं है। वास्तविक शिक्षक स्वयं भी सीखता है, अपनी भूल स्वीकार करता है और अपनी बात की समीक्षा से नहीं डरता। वह व्यक्ति नहीं, सत्य को बड़ा मानता है।” संध्या अब रात में बदल रही थी। अनुराग ने आकाश की ओर देखा और धीमे स्वर में कहा— “अशोक सर कहते थे—शिक्षक पाठ नहीं भरता, वह अंतर्मन में प्रकाश जगाता है। उसे अपने सम्मान में फूलों से अधिक जाग्रत मनुष्य चाहिए।” उस रात जंगल का पुराना विद्यालय फिर से जीवित हो उठा। वहाँ घंटी नहीं बजी, उपस्थिति नहीं ली गई और कोई परीक्षा भी नहीं हुई। फिर भी शिक्षा आरंभ हो चुकी थी—क्योंकि बच्चों के भीतर प्रश्न जाग चुके थे। और जहाँ प्रश्न, विवेक, संवेदना तथा सत्य की खोज जाग जाए, वहीं वास्तविक शिक्षक उपस्थित होता है।