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रविवार, 30 अगस्त 2026

पुस्तक "मॉय ड्रीम :अमिताभ बच्चन "से...?!

अशोक सर अपने किशोरावस्था में बी आर चौपड़ा के टीवी सीरियल महाभारत में मुकेश खन्ना अभिनीत भीष्म चरित्र व अमिताभ बच्चन अभिनीत शहंशाह, खुदा गबाह फ़िल्म से काफी प्रभावित थे।
सन 2147 ई०! भारत में ब्रिटिश सत्ता-हस्तांतरण के दो सौ वर्ष पूरे हो चुके थे। सरकारी अभिलेखों में 1947 को स्वतंत्रता का वर्ष लिखा था, किंतु अनेक विचारक उसे अधूरी स्वतंत्रता मानते थे। उनका प्रश्न था—यदि आर्थिक नीतियाँ, मुद्रा-व्यवस्था और व्यापार आज भी विदेशी प्रभाव से मुक्त नहीं हैं, तो क्या केवल शासकों के बदल जाने को पूर्ण आजादी कहा जा सकता है? इतिहासकारों का दूसरा वर्ग सावधान करता था कि राष्ट्रमंडल की सदस्यता स्वेच्छा पर आधारित है और भारतीय रिज़र्व बैंक भी स्वतंत्र भारत की वैधानिक संस्था है। इसलिए इतिहास को प्रमाणों के साथ समझना चाहिए। फिर भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस, आज़ाद हिंद सरकार, आज़ाद हिंद फौज और आज़ाद हिंद बैंक से संबंधित अनेक प्रश्न लोगों के मन में जीवित थे। लेकिन अब इन बहसों से बहुत आगे का समय आ चुका था। सन 2147 में पृथ्वी का तापमान काफी बढ़ चुका था। समुद्र का जलस्तर ऊपर उठने, अनियंत्रित भूमि-निर्माण, तटीय क्षरण और बार-बार आने वाले तूफानों ने मुंबई का भूगोल बदल दिया था। पुराने महानगर का बड़ा भाग समुद्र में समा चुका था। कहीं ऊँची इमारतों के टूटे शिखर पानी से बाहर झाँकते थे, तो कहीं पुराने पुल समुद्री जीवों के बसेरे बन चुके थे। उसी डूबी हुई मुंबई के ऊपर एक चमकीली उड़नतश्तरी मंडरा रही थी। उसके पारदर्शी कक्ष में तीन नेत्रों वाला वृद्ध सजाकदक्फक्फ बैठा था। उसके साथ उसी ग्रह की युवा शोधार्थी तिराश्मिका पृथ्वी के प्राचीन अभिलेख देख रही थी। उसका तीसरा नेत्र किसी अद्भुत यंत्र की तरह समुद्र के नीचे छिपी संरचनाओं का चित्र सामने ला रहा था। “गुरुदेव!” तिराश्मिका ने पूछा, “क्या यह नगर आरम्भ से ही इतना विशाल था?” सजाकदक्फक्फ ने समुद्र की ओर संकेत किया। सामने एक त्रिआयामी मानचित्र उभर आया। उसमें सात छोटे-छोटे द्वीप दिखाई दे रहे थे—माहिम, वर्ली, परेल, मझगांव, बॉम्बे द्वीप, कुलाबा और लिटिल कुलाबा। “नहीं,” वृद्ध ने उत्तर दिया, “मुंबई कभी सात द्वीपों का समूह थी। बाद में भूमि-पुनर्निर्माण, बाँधों और कॉज़वे के माध्यम से समुद्र के कुछ हिस्सों को भरकर इन द्वीपों को जोड़ा गया। इसी से विशाल महानगर का निर्माण हुआ।” “यदि इन्हें नहीं जोड़ा जाता तो?” “तब संभवतः प्रत्येक द्वीप का अपना छोटा नगर होता। उनके बीच नावें, जल-रेल और समुद्री पुल चलते। जनसंख्या का दबाव शायद सीमित रहता। मैंग्रोव और ज्वारीय क्षेत्र अधिक सुरक्षित होते। किंतु जीवन आसान ही होता, यह निश्चित नहीं—तूफानों, आवागमन और आवास की अपनी समस्याएँ भी होतीं।” कुछ पल बाद तिराश्मिका ने अभिलेख में एक पुराना नाम पढ़ा—अशोक कुमार वर्मा ‘बिंदु’। “ये कौन थे?” सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया, “बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी के संधिकाल में रहने वाले एक लेखक। उनके लेखन में इतिहास, भविष्य, प्रकृति और ब्रह्मांडीय चेतना आपस में मिलते थे। बताया जाता है कि सन 1990 के आसपास से वे मुंबई के समुद्र में डूबने जैसे स्वप्न देखते थे। उन्होंने अपने कुछ लेखों और पुस्तकों में इसकी आशंका व्यक्त की थी।” “क्या उनकी भविष्यवाणी वैज्ञानिक थी?” वृद्ध मुस्कराया, “स्वप्न वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होते, तिराश्मिका। किसी भविष्यवाणी को सत्य सिद्ध करने के लिए तिथि, मूल प्रकाशन और स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक होते हैं। लेकिन कभी-कभी किसी संवेदनशील व्यक्ति की आशंका समाज के लिए चेतावनी बन सकती है। उसका मूल्य अंधविश्वास में नहीं, बल्कि उस प्रश्न में होता है जिसे वह हमारे सामने रखती है।” स्क्रीन पर अशोक सर के जीवन के कुछ दृश्य उभरने लगे। एक छोटे-से कमरे में किताबों की पांडुलिपियाँ बिखरी थीं। वे बार-बार उन्हें क्रम से लगाते और सोचते— “देह का समय सीमित है। जो विचार लिखे जा चुके हैं, वे पाठकों तक पहुँचने चाहिए।” उन्हें सन 2023 तक समाज से बड़ी आशाएँ थीं। वे चाहते थे कि लोग राजनीतिक दलों और नेताओं के नामों से आगे बढ़कर व्यवस्था, इतिहास और प्रकृति पर प्रश्न करें। लेकिन जब उनकी अनेक पांडुलिपियाँ अप्रकाशित रह गईं, तो वे बेचैन हो उठे। उन्होंने अधिक से अधिक पुस्तकों को अपने जीवनकाल में प्रकाशित करने का संकल्प लिया। एक सभा में उन्होंने कहा था— “मैं निश्चित भविष्य बताने वाला ज्योतिषी नहीं हूँ। मैं केवल चेतावनी देता हूँ—यदि समुद्र के स्वाभाविक क्षेत्र पर लगातार कब्जा होगा, मैंग्रोव काटे जाएँगे, प्रदूषण और तापवृद्धि नहीं रुकेगी, तो सन 2100 से पहले ही मुंबई के अनेक तटीय हिस्सों पर गंभीर संकट आ सकता है। इसे भविष्यवाणी नहीं, सावधानी की पुकार समझो!” तिराश्मिका ने पूछा, “फिर लोगों ने क्या किया?” वृद्ध की तीनों आँखों में उदासी उतर आई। “कुछ लोगों ने चेतावनी को सनसनी बना दिया। कुछ ने उसका उपहास किया। कुछ राजनीति में उलझे रहे। वे बहस करते रहे कि किस दल ने अधिक विकास किया, लेकिन बहुत कम लोगों ने पूछा कि विकास किसकी कीमत पर हुआ। समुद्र को पीछे धकेलकर बनाए गए नगर में समुद्र के अधिकार को लगभग भुला दिया गया।” उड़नतश्तरी धीरे-धीरे नीचे उतरी। समुद्र के भीतर पुराने सात द्वीपों की रूपरेखा प्रकाशमान होने लगी। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति मनुष्य द्वारा मिटाई गई सीमाओं को फिर से उकेर रही हो। सजाकदक्फक्फ बोला— “मनुष्य ने द्वीपों को जोड़ दिया, पर अपने हृदयों को नहीं जोड़ पाया। उसने समुद्र को बाँटने का प्रयत्न किया, जबकि स्वयं जाति, मजहब, दल और स्वार्थ में बँटा रहा। यही उसके विकास की सबसे बड़ी विडम्बना थी।” “तो क्या प्रकृति मनुष्य से बदला लेती है?” युवती ने पूछा। “नहीं। प्रकृति बदला नहीं लेती; वह अपने नियमों के अनुसार संतुलन बनाती है। जल को मार्ग चाहिए। नदी को तट चाहिए। समुद्र को ज्वारीय क्षेत्र और धरती को वन चाहिए। जब मनुष्य इन सीमाओं की उपेक्षा करता है, तो परिणाम दंड जैसे दिखाई देते हैं।” उड़नतश्तरी की स्क्रीन पर अंतिम संदेश चमका— आजादी केवल सत्ता बदलने का नाम नहीं। आजादी इतिहास को प्रमाण सहित समझने, आर्थिक निर्णय स्वयं लेने और प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करने की सामूहिक क्षमता है। तिराश्मिका ने डूबी हुई मुंबई की ओर देखा। समुद्र के बीच सात हरित द्वीपों की काल्पनिक छवि उभर रही थी—जहाँ छोटी बस्तियाँ थीं, जलमार्गों पर स्वच्छ नौकाएँ चल रही थीं और मैंग्रोव नगरों की रक्षा कर रहे थे। वह बोली, “यदि मुंबई सात द्वीपों में ही रहती, तो शायद उसका जीवन धीमा और कठिन होता—लेकिन संभव है कि समुद्र के साथ उसका रिश्ता अधिक जीवित रहता।” सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया— “इतिहास को बदला नहीं जा सकता, लेकिन उससे भविष्य के लिए विवेक पाया जा सकता है। अशोक सर की बेचैनी भी शायद इसी बात के लिए थी—उनकी पुस्तकें केवल उनका नाम बचाने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सामने प्रश्न बचाए रखने के लिए प्रकाशित हों।” उड़नतश्तरी ऊपर उठने लगी। नीचे समुद्र की लहरें मानो कह रही थीं— नगर मनुष्य का हो सकता है, पर भूमि, जल और आकाश पर केवल मनुष्य का अधिकार नहीं। विकास वही है, जिसमें आने वाली पीढ़ियों और पूरी प्रकृति के लिए भी स्थान शेष रहे।

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