रविवार, 30 अगस्त 2026
स्वाभिमान की असली परीक्षा
स्वाभिमान की असली परीक्षा
विद्यालय की छुट्टी के बाद बरामदे में कुछ शिक्षक और विद्यार्थी बैठे थे। बाहर वर्षा हो रही थी। डॉ. रजनीश गंगवार की एक सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा का विषय बनी हुई थी।
अशोक सर ने गंभीर स्वर में कहा—
“लगभग अस्सी वर्षों में सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन अनेक लोगों ने व्यवस्था के सामने अपना स्वाभिमान गिरवी रख दिया है। अब अन्याय देखकर भी आदमी सोचता है—मुझे क्या लेना-देना?”
शिक्षक ब्रजेश यादव बोले—
“आज मनुष्य के लिए सुविधा और शांतिपूर्वक जीवन बिताना इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि कभी-कभी वह घर-परिवार की प्रतिष्ठा पर हमला होने पर भी चुप रह जाता है।”
गौरव सिंह ने उत्तेजित होकर कहा—
“हम तो अपमान सहने के बजाय मरना या मारना बेहतर समझेंगे!”
अशोक सर ने तुरंत उसे रोका—
“नहीं गौरव! स्वाभिमान का अर्थ मरना या मारना नहीं है। हिंसा कभी-कभी परिस्थिति को और भी भयानक बना देती है। असली स्वाभिमान है—अन्याय के सामने विवेक, साहस और संगठन के साथ खड़ा होना।”
इसके बाद अशोक सर ने एक पुरानी कथा सुनाई।
युद्ध के दिनों में सैनिकों का एक दल एक गाँव में घुस आया। उन्होंने गाँव की महिलाओं पर अत्याचार किया। उनमें से एक स्त्री ने साहसपूर्वक प्रतिरोध किया और स्वयं को बचाने में सफल रही।
सैनिकों के चले जाने के बाद गाँव की स्त्रियाँ बाहर निकलीं। वे भयभीत, घायल और गहरे सदमे में थीं। प्रतिरोध करने वाली स्त्री भी उनके बीच खड़ी थी।
उसने कहा—
“हमारे साथ जो हुआ, उसका दोष हमारा नहीं है। अपराध केवल अत्याचारियों का है। हमें एक-दूसरे का सहारा बनकर न्याय माँगना चाहिए।”
लेकिन कुछ स्त्रियों के मन में भय पैदा हो गया। उन्हें लगा कि जब परिवार के लोग लौटेंगे, तब प्रतिरोध करने वाली स्त्री का उदाहरण देकर उनसे सवाल किए जाएँगे। भय और सामाजिक बदनामी ने उनकी बुद्धि को ढक लिया। वे उसी साहसी स्त्री को दोष देने लगीं।
तभी गाँव की वृद्धा माता हरप्रीत आगे आईं। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा—
“रुको! तुम अपने अपराधियों को छोड़कर अपनी ही बहन को दोष दे रही हो। जिसने अत्याचार सहा, उसकी गरिमा नष्ट नहीं होती। लज्जा पीड़ित की नहीं, अपराधी की होती है। और जिसने प्रतिरोध किया, वह दूसरों से श्रेष्ठ नहीं हो जाती—क्योंकि संकट में हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग होती है।”
वृद्धा ने सभी महिलाओं को गले लगाया और कहा—
“यदि हम भय के कारण साहस की आवाज दबा देंगे, तो अत्याचारियों को दूसरी विजय मिल जाएगी। पहली विजय उन्होंने बल से प्राप्त की थी; दूसरी विजय उन्हें हमारी आपसी फूट से मिलेगी।”
अगले दिन गाँव की पंचायत बैठी। पहले वहाँ प्रायः कमजोर लोगों को ही दोषी ठहराया जाता था, पर इस बार महिलाओं ने एकजुट होकर कहा—
“हम किसी पीड़ित को अपमानित नहीं होने देंगे। हम अपराधियों के विरुद्ध प्रमाण जुटाएँगे, प्रशासन से न्याय माँगेंगे और भविष्य में गाँव की सुरक्षा के लिए सामूहिक व्यवस्था बनाएँगे।”
उनकी एकता ने गाँव की दिशा बदल दी। अब साहस किसी एक महिला का बोझ नहीं था; वह पूरे समुदाय का चरित्र बन गया था।
कथा समाप्त हुई तो बरामदे में कुछ देर मौन छाया रहा।
सिख विद्यार्थी आकाशदीप बोला—
“सर, हम अपना स्वाभिमान कभी गिरवी नहीं रखेंगे।”
अशोक सर मुस्कराए—
“यही बात ठीक है, लेकिन याद रखना—जान दे देना ही स्वाभिमान नहीं होता। कभी-कभी जीवित रहकर सत्य बोलना, कानून का सहारा लेना, पीड़ित के साथ खड़ा होना और लंबे समय तक भ्रष्ट व्यवस्था से संघर्ष करना अधिक बड़ा साहस होता है।”
ब्रजेश यादव ने पूछा—
“इस कथा का आज के भ्रष्ट समाज से क्या संबंध है?”
अशोक सर ने उत्तर दिया—
“भ्रष्ट व्यवस्था भी ऐसा ही करती है। पहले वह ईमानदार व्यक्ति को अकेला करती है। फिर उसका मजाक उड़ाती है, उसके चरित्र पर प्रश्न उठाती है और बाकी लोगों को डराती है—क्योंकि एक ईमानदार व्यक्ति की उपस्थिति अनेक लोगों की बेईमानी का आईना बन जाती है।”
“इसलिए भ्रष्ट लोग आईना तोड़ना चाहते हैं, अपना चेहरा सुधारना नहीं।”
आकाशदीप ने कहा—
“तब समाधान क्या है?”
अशोक सर बोले—
“ईमानदार व्यक्ति को अकेला मत छोड़ो। प्रमाण के साथ सत्य बोलो, शांतिपूर्ण संगठन बनाओ, संवैधानिक उपाय अपनाओ और पीड़ित को दोषी मत बनाओ। स्वाभिमान अहंकार नहीं है; वह अपने और दूसरों के मानवीय अधिकारों की रक्षा करने का साहस है।”
वर्षा थम चुकी थी। सब लोग बाहर निकले। आकाश में बादल अभी थे, पर उनके बीच से प्रकाश की एक किरण धरती पर उतर रही थी—मानो कह रही हो कि अँधेरा तभी टिकता है, जब दीपक अलग-अलग और अकेले रहते हैं।
कथा का संदेश:
जब समाज ईमानदार व्यक्ति को इसलिए मिटाना चाहता है कि उसकी उपस्थिति भ्रष्ट लोगों को लज्जित करती है, तब वह वास्तव में अपने ही सम्मान की हत्या करता है। समाधान हिंसक प्रतिशोध नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, एकता और विवेकपूर्ण प्रतिरोध है।
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