शनिवार, 15 अगस्त 2026
अभी महाभारत बाकी है!!
अभी महाभारत बाकी है!
सन 2075 ईस्वी।
मीरानपुर कटरा अब पहले जैसा नहीं रहा था। कस्बे के बाहर कभी हरे दिखाई देने वाले खेतों के बीच जंग लगी मशीनों के अवशेष पड़े थे। पुराने बाजार की अनेक दुकानें खंडहर बन चुकी थीं। फिर भी एक प्राचीन पीपल के नीचे प्रत्येक पूर्णिमा को कुछ वृद्ध, युवक और साधक एकत्र होते थे।
उस शाम तेज हवा चल रही थी। पीपल के पत्तों से उठती ध्वनि के बीच राज ने पूछा—
“क्या यह सच है कि कल्कि महाराज का अवतार हो चुका है?”
सामने बैठे निशांत सर ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। कुछ समय बाद बोले—
“किसी के जन्म की अप्रमाणित घोषणा करना सरल है, राज! लेकिन कल्कि-तत्त्व को पहचानना कठिन है। संभव है कि ‘कल्कि’ किसी एक देह का नाम हो; यह भी संभव है कि वह मनुष्य और व्यवस्था के भीतर फैले अधर्म के विरुद्ध जागती हुई सामूहिक चेतना का प्रतीक हो।”
राज को अशोक सर की बातें याद आने लगीं। वे कहा करते थे—
“मीरानपुर कटरा छोटा कस्बा अवश्य है, लेकिन ब्रह्माण्ड चेतना के मानचित्र पर कोई स्थान छोटा नहीं होता। यहाँ भी कुछ मनुष्य ऐसे हो सकते हैं जिनका स्थूल शरीर सामान्य जीवन जीता दिखाई देता है, जबकि उनका सूक्ष्म शरीर सत्य, मानवता और प्रकृति की रक्षा के संकल्प में लगा रहता है।”
लोग निशांत सर का नाम भी उन्हीं साधकों में लेते थे। पर निशांत सर स्वयं कभी ऐसा दावा नहीं करते। वे बच्चों को पढ़ाते, पौधे लगाते, परेशान लोगों की सहायता करते और प्रतिदिन मौन साधना करते थे। उनका कहना था—
“यदि सूक्ष्म साधना तुम्हें अधिक विनम्र, न्यायप्रिय और सेवाभावी नहीं बनाती, तो वह केवल कल्पना भी हो सकती है।”
राज ने फिर पूछा—
“लेकिन अशोक सर युग-परिवर्तनकारी घटनाएँ अनुभव करते थे। वे कहते थे—‘अभी महाभारत बाकी है!’ इसका क्या अर्थ था?”
निशांत सर ने पास रखी महाभारत की प्रति उठाई।
“इसका अर्थ यह आवश्यक नहीं कि फिर वही अस्त्र-शस्त्र वाला युद्ध होगा। आज का कुरुक्षेत्र मनुष्य की चेतना, समाज और व्यवस्था के भीतर है। एक ओर लोभ, हिंसा, अन्याय, प्रकृति का दोहन और मनुष्य को मशीन बनाने वाली व्यवस्था है; दूसरी ओर विवेक, करुणा, सत्य और सह-अस्तित्व।”
“और वेदव्यास?” राज ने पूछा।
“वेदव्यास पर चिंतन हमें यह समझा सकता है कि महाभारत केवल बीती हुई घटना नहीं, बल्कि बार-बार उपस्थित होने वाला नैतिक संकट भी है। जब सत्ता धर्म से बड़ी हो जाए, सभा अन्याय देखकर मौन रहे और मनुष्य लाभ के लिए प्रकृति को नष्ट करने लगे—तब महाभारत की परिस्थितियाँ लौट आती हैं।”
तभी एक वृद्ध साधक ने जगन्नाथ की ओर संकेत करती छोटी-सी प्रतिमा के सामने दीपक रख दिया। उसने कहा—
“जगन्नाथ का अर्थ है—जगत का नाथ। उनके विशाल नेत्र मानो चेतावनी देते हैं कि कोई कर्म व्यापक चेतना की दृष्टि से छिपा नहीं रहता। लेकिन उनके संदेशों के नाम पर भविष्य की निश्चित घोषणा करने के बजाय हमें उन्हें नैतिक संकेत की तरह समझना चाहिए।”
राज ने अगला प्रश्न किया—
“भविष्य में रूस की बड़ी भूमिका होने की बात क्यों कही जाती है?”
अशोक सर के पुराने हस्तलिखित पन्ने पढ़ रहे एक बुजुर्ग ने उत्तर दिया—
“कुछ लोककथाओं में कहा जाता है कि महाभारत के समय उत्तर दिशा का कोई राजा श्रीकृष्ण की शरण में आया था और श्रीकृष्ण ने उसे भविष्य के लिए लौट जाने को कहा। किंतु इसे प्रमाणित इतिहास नहीं माना जा सकता। ‘रूस’ जैसे आधुनिक राष्ट्र को सीधे महाभारतकाल से जोड़ना भी ऐतिहासिक सावधानी की माँग करता है।”
उन्होंने पन्ना बंद करते हुए आगे कहा—
“फिर भी इस कथा का प्रतीकात्मक अर्थ महत्वपूर्ण है। उत्तर की सुरक्षित रखी गई शक्ति शायद उस सामर्थ्य का संकेत है जिसकी आवश्यकता किसी भावी विश्व-संकट में पड़ेगी। रूस हो, भारत हो या कोई अन्य देश—उसकी भूमिका तभी कल्याणकारी होगी, जब उसकी शक्ति विनाश नहीं, विश्व-संतुलन और शांति की रक्षा करे।”
अचानक दूर बादल गरजे। राज ने धीमे स्वर में पूछा—
“और अश्वत्थामा? क्या वे सचमुच कल्कि के लिए लड़ेंगे?”
निशांत सर बोले—
“धार्मिक परम्पराओं में अश्वत्थामा को चिरंजीवी माना गया है। भविष्य में उनकी भूमिका की कथाएँ आस्था का विषय हैं, प्रमाणित वर्तमान समाचार नहीं। कथा के स्तर पर अश्वत्थामा उस शक्ति का प्रतीक हैं जो ज्ञान और सामर्थ्य रखते हुए भी क्रोध के कारण भटक गई थी। कल्कि के लिए उनका संघर्ष तभी सार्थक होगा, जब वह बाहरी शत्रुओं से पहले अपने क्रोध, प्रतिशोध और अपराधबोध पर विजय पाएँ।”
राज ने कल्पना की—एक थका हुआ अश्वत्थामा युगों की यात्रा करके किसी रणभूमि में नहीं, बल्कि शांत नदी के किनारे खड़ा है। उसके हाथ में अस्त्र है, पर कल्कि की वाणी सुनाई देती है—
“इस युग का महान योद्धा वह नहीं जो अधिक लोगों को पराजित करे। वह है जो अपनी शक्ति को निर्दोषों की रक्षा, प्रकृति के संरक्षण और अन्याय को रोकने में लगाए।”
“द्रौपदी के चीरहरण के समय कौरव राज्य छोड़ने वालों की क्या भूमिका होगी?” राज ने पूछा।
एक वृद्धा ने उत्तर दिया—
“महाभारत के सभी प्रसंगों के विषय में अनेक लोकपरम्पराएँ प्रचलित हैं। संभव है यह भी ऐसी ही एक कथा हो। लेकिन उसका संदेश स्पष्ट है—अन्यायपूर्ण सत्ता का साथ छोड़ देना आवश्यक पहला कदम है, पर पर्याप्त नहीं। यदि कोई सभा छोड़कर चला गया, किंतु पीड़ित की रक्षा के लिए कुछ नहीं किया, तो उसका धर्म अधूरा रह गया।”
“तो भविष्य में उनकी भूमिका क्या होगी?”
“वे उन लोगों के प्रतीक बनेंगे जो सत्ता की सुविधा त्यागकर सत्य के पक्ष में आते हैं। इस बार उन्हें केवल सभा छोड़नी नहीं होगी; उन्हें अन्याय के विरुद्ध अहिंसक साहस, सेवा और सत्य के साथ खड़ा होना होगा।”
रात गहरी होने लगी। बिजली चली गई, पर पीपल के नीचे रखा दीपक जलता रहा।
निशांत सर उठे और बोले—
“यदि कल्कि आ चुके हैं, तो उनकी पहचान चमत्कारों से नहीं, उनके प्रभाव से होगी। क्या मनुष्यों में करुणा बढ़ रही है? क्या कमजोर को न्याय मिल रहा है? क्या जल, जंगल और जमीन बच रहे हैं? क्या धर्म भय और घृणा से मुक्त होकर मानवता की रक्षा कर रहा है? यही कसौटियाँ हैं।”
राज ने पूछा—
“तब मीरानपुर कटरा के साधकों का कार्य क्या है?”
“किसी अदृश्य युद्ध की कल्पना में खो जाना नहीं,” निशांत सर ने उत्तर दिया, “बल्कि अपने भीतर और आसपास धर्म की भूमि तैयार करना—ध्यान द्वारा चेतना को निर्मल करना, शिक्षा द्वारा अज्ञान घटाना, सेवा द्वारा पीड़ा कम करना और सत्य बोलते हुए भी हिंसा से बचना। यही सूक्ष्म शरीर का स्थूल संसार में प्रमाण होगा।”
प्रातःकाल होने लगा। क्षितिज पर प्रकाश की पहली रेखा दिखाई दी। राज ने समझा कि “अभी महाभारत बाकी है” किसी युद्ध का आह्वान नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—
हर युग में दुर्योधन बाहर पैदा होने से पहले मनुष्य के भीतर जन्म लेता है।
हर युग में द्रौपदी का अपमान तब होता है जब समाज अन्याय देखकर मौन रहता है।
हर युग में अश्वत्थामा की शक्ति को विवेक की आवश्यकता होती है।
और हर युग में कल्कि का मार्ग उन्हीं लोगों से बनता है जो अपने भीतर के छल, भय, लोभ और हिंसा को पराजित करके मानवता तथा प्रकृति की रक्षा में खड़े होते हैं।
पीपल के नीचे दीपक अब भी जल रहा था। अशोक सर की पुरानी डायरी के अंतिम पृष्ठ पर लिखा था—
“महाभारत बाकी है, पर उसका कुरुक्षेत्र तुम्हारे भीतर है। कल्कि की प्रतीक्षा मत करो—अपने कर्मों से उनके योग्य संसार तैयार करो।”
यह कथा धार्मिक विश्वासों, लोककथाओं और प्रतीकों की साहित्यिक व्याख्या है; रूस, अश्वत्थामा अथवा कल्कि से संबंधित उक्त बातों को प्रमाणित ऐतिहासिक या समकालीन तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
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