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शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

अंतर्मन का दीपक.?!❤️❤️

अंतर्मन का दीपक
सन 2075 ईस्वी। जंगल के बीच बने एक पुराने आश्रम के चारों ओर गहरी निस्तब्धता थी। कभी वहाँ एक विद्यालय हुआ करता था, पर अब उसकी दीवारों पर लताएँ फैल चुकी थीं। टूटी खिड़कियों से हवा आती तो पुराने कमरों में ऐसा स्वर गूँजता, मानो बीते समय के विद्यार्थी आज भी अपने शिक्षक से प्रश्न पूछ रहे हों। उसी आश्रम के बरामदे में बुजुर्ग अनुराग बैठे थे। उनके बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे, किंतु आँखों में आज भी विद्यार्थी जैसी जिज्ञासा थी। उनके हाथों में अशोक सर की कुछ पुरानी पुस्तकें थीं—शिक्षा, शिक्षा का असल, क्रांति : क्यों? कैसे?, लंका में विभीषण?! और कुछ अन्य पुस्तकें, जिनके पन्ने समय के साथ पीले पड़ चुके थे।
आश्रम में रहने वाले कुछ बच्चे उनके चारों ओर बैठ गए। उनमें अब्दुल, रश्मि, दीया और कबीर भी थे। नई सभ्यता के इन बच्चों ने पुराने विद्यालय कभी नहीं देखे थे। उनके लिए जंगल ही पाठशाला था और जीवन की कठिनाइयाँ ही पाठ्यपुस्तक। कबीर ने अनुराग के हाथों की पुस्तकों की ओर देखते हुए पूछा— “बाबा, इनमें किसका ज्ञान लिखा है?” अनुराग ने पुस्तकों पर हाथ फेरते हुए कहा— “इनमें अशोक सर के विचार हैं। वे मेरे शिक्षक थे।” रश्मि ने उत्सुकता से पूछा— “क्या वे आपको केवल इतिहास, भूगोल और भाषा पढ़ाते थे?” अनुराग कुछ क्षण शांत रहे। फिर सामने खड़े विशाल वृक्ष की ओर देखते हुए बोले— “उन्होंने हमें विषय भी पढ़ाए, लेकिन उनकी वास्तविक शिक्षा पुस्तकों से कहीं बड़ी थी। उन्होंने हमें यह नहीं बताया कि क्या सोचना है; उन्होंने हमें सिखाया कि सोचना कैसे है।” अब्दुल ने पूछा— “तो वास्तविक शिक्षक कौन होता है?” अनुराग ने शिक्षा का असल पुस्तक खोली और बोले— “शिक्षक केवल वह व्यक्ति नहीं होता जो पाठ्यक्रम पूरा करे, उपस्थिति दर्ज करे और महीने के अंत में वेतन पाए। ये उसके कार्य का एक भाग हो सकते हैं। वास्तविक शिक्षक वह है जो विद्यार्थी के भीतर छिपी जिज्ञासा, विवेक, साहस और मानवीय चेतना को जाग्रत कर दे।” उन्होंने बच्चों के सामने जंगल की मिट्टी से एक छोटा-सा दीपक बनाया और उसमें तेल डालकर बाती जला दी। “देखो, शिक्षक विद्यार्थी के मस्तिष्क को किसी खाली बर्तन की तरह भरने वाला व्यक्ति नहीं है। विद्यार्थी के भीतर प्रकाश पहले से मौजूद होता है। शिक्षक केवल उस प्रकाश की बाती को जगा देता है।” दीया ने पूछा— “लेकिन लोग तो कहते हैं कि शिक्षक भी एक कर्मचारी होता है।” अनुराग मुस्कराए— “शिक्षक किसी संस्था में कर्मचारी हो सकता है, पर उसकी संपूर्ण पहचान कर्मचारी की नहीं होती। कर्मचारी को एक निर्धारित काम दिया जाता है और वह उसे पूरा करता है। शिक्षक का काम केवल निर्धारित अध्याय समाप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज का भविष्य बनाना है।” उन्होंने थोड़ा रुककर कहा— “इसका अर्थ यह भी नहीं कि शिक्षक नियमों से ऊपर है। वास्तविक शिक्षक उत्तरदायी होता है। वह उचित नियमों का सम्मान करता है, लेकिन यदि कोई आदेश विद्यार्थी, सत्य या न्याय के विरुद्ध हो तो वह अपने विवेक का उपयोग करता है।” रश्मि ने उनके हाथ से क्रांति : क्यों? कैसे? पुस्तक उठाई। “बाबा, इसमें क्रांति क्यों लिखी है? क्या शिक्षक कोई क्रांतिकारी होता है?” अनुराग ने उत्तर दिया— “हाँ, लेकिन अशोक सर जिस क्रांति की बात करते थे, वह हिंसा और विनाश की क्रांति नहीं थी। वह अज्ञान से ज्ञान, भय से साहस, संकीर्णता से विश्व-बंधुत्व और निष्क्रियता से उत्तरदायित्व की ओर बढ़ने वाली क्रांति थी।” उन्होंने बच्चों से पूछा— “यदि कोई विद्यार्थी अपने शिक्षक की प्रत्येक बात आँख बंद करके मानता रहे, तो क्या वह शिक्षित कहलाएगा?” बच्चे चुप रहे। अनुराग स्वयं बोले— “नहीं। वास्तविक शिक्षक अपनी नकल तैयार नहीं करता। वह ऐसे विद्यार्थी तैयार करता है जो उससे प्रश्न कर सकें, उसके विचारों की जाँच कर सकें और आवश्यकता पड़ने पर उससे आगे निकल सकें।” तभी दीया ने पूछा— “लेकिन शिक्षक और विद्यार्थी के बीच तीसरे का कोई महत्व नहीं होता—इसका क्या अर्थ है?” अनुराग ने पास बहती छोटी जलधारा की ओर संकेत किया। “देखो, बादल वर्षा करता है और धरती उस जल को ग्रहण करती है। यदि दोनों के बीच कोई दीवार खड़ी कर दी जाए, तो जल धरती तक नहीं पहुँचेगा। इसी प्रकार शिक्षा का मूल संबंध शिक्षक और विद्यार्थी के बीच का जीवंत मानसिक संबंध है। उसमें विश्वास, संवाद और आत्मीयता आवश्यक है।” “परिवार, विद्यालय और समाज सहयोगी हो सकते हैं। उनका सहयोग आवश्यक भी है। लेकिन जब कोई तीसरा व्यक्ति राजनीति, भय, स्वार्थ या सत्ता के आधार पर यह तय करने लगे कि शिक्षक क्या प्रश्न पूछे, विद्यार्थी क्या सोचे और कौन-सा सत्य स्वीकार करे, तब शिक्षा की स्वतंत्रता बाधित होने लगती है।” अब्दुल ने पूछा— “क्या अशोक सर के साथ भी कभी ऐसा हुआ था?” अनुराग की दृष्टि दूर अतीत में चली गई। “हाँ। एक बार विद्यालय के कुछ प्रभावशाली लोगों ने उनसे कहा था कि वे विद्यार्थियों को केवल परीक्षा में आने वाले प्रश्न पढ़ाएँ। जीवन, समाज, प्रकृति और अन्याय से संबंधित प्रश्नों पर चर्चा न करें।” “अशोक सर ने पूछा था—‘यदि विद्यार्थी परीक्षा उत्तीर्ण कर ले, लेकिन सत्य और असत्य का अंतर न समझ पाए, तो क्या मेरी शिक्षा पूरी मानी जाएगी?’” “लोगों ने उत्तर दिया—‘आपको वही करना चाहिए जिसका निर्देश मिला है।’” “अशोक सर ने शांत स्वर में कहा था—‘मैं व्यवस्था का विरोधी नहीं हूँ, लेकिन शिक्षक होने के कारण प्रत्येक निर्देश को ज्ञान, न्याय और विद्यार्थी-हित की कसौटी पर परखना मेरा उत्तरदायित्व है। शिक्षा आज्ञापालन की मशीन नहीं बनाती; वह विवेकवान मनुष्य बनाती है।’” बच्चे ध्यान से सुनते रहे। कबीर ने पूछा— “फिर शिक्षक दिवस पर अशोक सर को क्या चाहिए होता था? फूल, माला या उपहार?” अनुराग की आँखों में चमक आ गई। “एक शिक्षक दिवस पर हम भी उनके लिए फूल लेकर गए थे। उन्होंने फूल स्वीकार किए, लेकिन कहा—‘यदि वास्तव में मेरा सम्मान करना चाहते हो तो आज एक संकल्प लो। प्रश्न पूछना कभी मत छोड़ना। ज्ञान को केवल उत्तर-पुस्तिका में मत लिखना, उसे अपने व्यवहार में उतारना। जाति, मजहब, भाषा और धन के आधार पर किसी मनुष्य को छोटा मत समझना। प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मत मानना और अन्याय के सामने अपने विवेक को मौन मत होने देना।’” अनुराग ने अपने सामने बैठे बच्चों की ओर देखा। “उस समय हम उनके कथन का पूरा अर्थ नहीं समझ सके थे। हमें लगता था कि चरण-स्पर्श, फूल और प्रशंसा ही शिक्षक का सम्मान हैं। लेकिन वर्षों बाद समझ में आया कि शिक्षक का सबसे बड़ा सम्मान विद्यार्थी का जाग्रत विवेक है।” उन्होंने अशोक सर की पुस्तकों को बच्चों के बीच रख दिया। “आज ये पुस्तकें मेरे हाथ में अवश्य हैं, लेकिन अशोक सर की शिक्षा केवल इनके पन्नों में नहीं है। जब कोई विद्यार्थी प्रश्न पूछने का साहस करता है, जब वह ज्ञान को आचरण में बदलता है, जब वह दूसरे मनुष्य की गरिमा और प्रकृति की रक्षा करता है—तब शिक्षक उसके भीतर जीवित हो उठता है।” रश्मि ने पूछा— “तो क्या विद्यार्थी भी कभी शिक्षक बन सकता है?” अनुराग ने जलते दीपक से दूसरा दीपक जला दिया। “यही तो शिक्षा का उद्देश्य है। वास्तविक शिक्षक विद्यार्थी को जीवन भर अपना अनुयायी नहीं बनाए रखता। वह उसे इतना सक्षम बनाता है कि वह स्वयं प्रकाश बने और दूसरों के भीतर भी प्रकाश जगा सके।” धीरे-धीरे प्रत्येक बच्चे ने उसी दीपक से अपना छोटा दीपक जला लिया। बरामदे का अँधेरा कम होने लगा। जंगल की निस्तब्धता के बीच अनेक दीपक चमक रहे थे। अनुराग ने लंका में विभीषण?! पुस्तक उठाते हुए कहा— “सच्चा शिक्षक कभी-कभी विभीषण की तरह अपने ही वातावरण के अनुचित आचरण पर प्रश्न उठाता है। लोग उसे विद्रोही समझ सकते हैं, लेकिन यदि उसका आधार सत्य, विवेक और लोकमंगल है, तो उसका प्रश्न ही परिवर्तन का आरंभ बन सकता है।” “पर याद रखना—क्रांतिकारी होने का अर्थ मनमानी करना नहीं है। वास्तविक शिक्षक स्वयं भी सीखता है, अपनी भूल स्वीकार करता है और अपनी बात की समीक्षा से नहीं डरता। वह व्यक्ति नहीं, सत्य को बड़ा मानता है।” संध्या अब रात में बदल रही थी। अनुराग ने आकाश की ओर देखा और धीमे स्वर में कहा— “अशोक सर कहते थे—शिक्षक पाठ नहीं भरता, वह अंतर्मन में प्रकाश जगाता है। उसे अपने सम्मान में फूलों से अधिक जाग्रत मनुष्य चाहिए।” उस रात जंगल का पुराना विद्यालय फिर से जीवित हो उठा। वहाँ घंटी नहीं बजी, उपस्थिति नहीं ली गई और कोई परीक्षा भी नहीं हुई। फिर भी शिक्षा आरंभ हो चुकी थी—क्योंकि बच्चों के भीतर प्रश्न जाग चुके थे। और जहाँ प्रश्न, विवेक, संवेदना तथा सत्य की खोज जाग जाए, वहीं वास्तविक शिक्षक उपस्थित होता है।

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