सोमवार, 31 अगस्त 2026
खंडहरों में बची हुई पुस्तकें?!
खंडहरों में बची हुई पुस्तक
सन 2164 ई० की एक सर्द संध्या।
घने जंगल के बीच एक प्राचीन किले का खंडहर था। कभी उस किले को बेकार पत्थरों का ढेर समझा गया था, लेकिन अब उसकी मोटी दीवारें तूफानों, गर्म हवाओं और हिंसक संघर्षों से लोगों की रक्षा कर रही थीं। नीचे वर्षा का पानी जमा करने के कुंड बनाए गए थे। आसपास वनस्पतियाँ उगाई जा रही थीं।
उसी खंडहर में कुछ बुजुर्ग आग के चारों ओर बैठे थे। उनके बीच एक पुरानी पुस्तक रखी थी—
“एक और भविष्य कथांश?!”
लेखक—अशोक कुमार वर्मा ‘बिंदु’
पुस्तक के पृष्ठ पीले पड़ चुके थे, मगर उसके प्रश्न अभी जीवित थे।
बुजुर्ग राज ने पुस्तक उठाते हुए कहा—
“कभी लोगों की निगाह इस पुस्तक पर थी। कुछ इसे चेतावनी मानते थे, कुछ कल्पना और कुछ अशोक सर की निराशा।”
एक महिला ने पूछा, “इसमें ऐसा क्या लिखा था?”
राज ने पहला पृष्ठ खोला और पढ़ना प्रारम्भ किया।
कलि कोई बाहर बैठा राक्षस नहीं था
पृथु महि पर कुछ प्रभावशाली समूहों ने धन, सूचना, तकनीक और प्राकृतिक संसाधनों पर बड़ा नियंत्रण स्थापित कर लिया था। जनता भौतिक सुविधाओं में उलझी हुई थी। दल और नेता भी उन्हीं व्यवस्थाओं से लाभ पाते थे। लोग नेताओं के नाम पर लड़ते रहे, लेकिन व्यवस्था की दिशा पर प्रश्न कम करते थे।
प्राकृतिक आपदाओं, युद्धों और हिंसा के कारण बहुत से लोग विस्थापित हो चुके थे। हिमालय, उत्तराखंड, बिहार और पूर्वोत्तर के अनेक क्षेत्रों में जीवन कठिन होता जा रहा था।
सन 2016–17 से अशोक सर कहते थे—
“संहारक शक्तियों की गति बढ़ रही है। राक्षस कलि मनुष्यों के दिमाग पर बैठ चुका है।”
खंडहर में बैठा एक युवक बीच में बोल पड़ा—
“क्या वे सचमुच किसी राक्षस की बात करते थे?”
बुजुर्ग राज ने समझाया—
“उनकी भाषा प्रतीकात्मक थी। ‘कलि’ मनुष्य के भीतर का लोभ, भय, घृणा, अहंकार और संवेदनहीनता था। जब अधिकांश लोग इन्हीं प्रवृत्तियों से संचालित होने लगें, तो ऐसा लगता है जैसे कोई अदृश्य शक्ति पूरी सभ्यता को नियंत्रित कर रही हो।”
“और शून्य योग?”
“शून्य योग का आशय अपनी चेतना को कुछ समय जाति, मजहब, दल, कर्मकांड और निजी स्वार्थ के शोर से खाली करना था। अशोक सर और निशांत सर चाहते थे कि मनुष्य पहले अपने भीतर उठते विकारों को देखे।”
लेकिन उस दौर में पढ़े-लिखे लोग भी उनका उपहास करते थे।
कोई कहता, “ध्यान करने से पहाड़ बचेंगे क्या?”
निशांत सर उत्तर देते—
“ध्यान अपने आप पहाड़ नहीं बचाता। लेकिन यदि मनुष्य का लोभ नियंत्रित नहीं हुआ, तो वह विज्ञान और तकनीक का प्रयोग भी विनाशकारी ढंग से करेगा। आंतरिक विवेक और बाहरी विज्ञान—दोनों की आवश्यकता है।”
सन 2147 ई०—डूबी मुंबई के ऊपर
खंडहर में बैठे बुजुर्गों के सामने एक पुराना दृश्य-यंत्र चालू किया गया।
समुद्र में डूबी मुंबई के ऊपर एक उड़नतश्तरी उड़ रही थी। उसके भीतर तीन नेत्रधारी वृद्ध सजाकदक्फक्फ और युवा शोधार्थी तिराश्मिका पृथु महि का इतिहास देख रहे थे।
तिराश्मिका ने पूछा—
“क्या अशोक सर सन 1990 में मुंबई के डूबने के स्वप्न देखने लगे थे?”
सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया—
“उनकी पुस्तकों में ऐसी आशंकाओं का उल्लेख मिलता है। लेकिन स्वप्न को वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता। वह उनके मन में उठी चेतावनी या प्रतीकात्मक अनुभूति हो सकती थी।”
“फिर उन्होंने सन 2100 से पहले मुंबई के डूबने की घोषणा क्यों की?”
“क्योंकि वे समुद्र के बढ़ते स्तर, तटीय अतिक्रमण, अत्यधिक निर्माण और जलवायु-संकट से चिंतित थे। उनकी बात का सार यह था कि कोई भी नगर प्रकृति की सीमा से बड़ा नहीं हो सकता।”
युवती ने समुद्र के नीचे स्कैन किया। सात प्राचीन द्वीपों की रूपरेखा दिखाई दी। कभी उन्हें भूमि-पुनर्निर्माण, बाँधों और कॉज़वे से जोड़कर विशाल मुंबई बनाई गई थी।
“यदि वे सातों द्वीप अलग रहते तो क्या मुंबई बच जाती?” उसने पूछा।
वृद्ध ने कहा—
“यह निश्चित नहीं। समुद्र-स्तर बढ़ने और तूफानों से उन्हें भी खतरा रहता। पर जनसंख्या, निर्माण और तटीय पारिस्थितिकी का स्वरूप अलग हो सकता था। मूल प्रश्न द्वीप जोड़ने का नहीं, विकास की सीमा भूल जाने का था।”
तिराश्मिका ने अभिलेख में अशोक सर को पांडुलिपियों के बीच बैठे देखा।
“वे इतने बेचैन क्यों थे?”
“उन्हें लगता था कि शरीर का समय कम है और लिखे हुए विचार अभी जनता तक नहीं पहुँचे। वे अधिक से अधिक पुस्तकें प्रकाशित करना चाहते थे। वे अपना नाम ही नहीं, अपने प्रश्न भविष्य के लिए बचाना चाहते थे।”
अतीत की मूर्तियों पर हँसती पीढ़ी
पृथु महि के दूसरे भाग में बचे हुए लोग जंगलों, किलों और खंडहरों में आश्रय ले चुके थे। पुरानी सभ्यता के भव्य नगर असुरक्षित हो गए थे, जबकि कभी उपेक्षित दुर्गम क्षेत्र जीवन बचाने के साधन बने।
कुछ बच्चे एक टूटी हुई मूर्ति के सामने खड़े थे।
एक बालक बोला—
“अतीत के लोग अपनी मूर्तियाँ बनाते रहे, लेकिन नदियाँ, वन और पहाड़ नहीं बचा सके!”
दूसरा हँसने लगा।
पास खड़ी बुजुर्ग अनंता ने उन्हें रोक दिया।
“मूर्ति का उपहास मत करो। पत्थर ने प्रकृति का विनाश नहीं किया। मनुष्य के गलत निर्णयों ने किया। अतीत में भी सभी लोग दोषी नहीं थे। अनेक वैज्ञानिक, किसान, आदिवासी, साधक और लेखक लगातार चेतावनी दे रहे थे।”
“फिर उनकी बात क्यों नहीं सुनी गई?”
“क्योंकि तत्काल लाभ की आवाज भविष्य की धीमी चेतावनी से अधिक आकर्षक लगती थी।”
राज ने कहा—
“अतीत को दोष देना आसान है। कठिन यह पूछना है कि यदि वही लोभ आज हमारे भीतर आ गया, तो क्या हम भी वही भूल नहीं दोहराएँगे?”
खंडहर में मौन छा गया।
पुस्तक का भयानक अध्याय
राज ने पुस्तक का अगला अध्याय खोला। शीर्षक था—
“फरवरी 2165 ई०—क्या पृथु महि चटक जाएगी?”
पुस्तक में एक भयावह कल्पना लिखी थी—24 फरवरी को एक तीव्र भूकम्प से सूरत, हरिद्वार, उत्तरकाशी, मानसरोवर और चीन से होते हुए कोरियाई क्षेत्र तक भूमि चटक गई। बाँध टूटे, बाढ़ आई और अरब सागर से प्रशांत महासागर तक एक नया समुद्री मार्ग बन गया। भारतीय भूभाग पूर्व की ओर खिसक गया तथा म्यांमार और वियतनाम विनाश के साक्षी बने।
पढ़ते-पढ़ते राज रुक गया।
एक बुजुर्ग ने भयभीत होकर पूछा—
“आज सन 2164 है। पुस्तक में तो यह घटना लगभग एक वर्ष बाद लिखी है! क्या यह सच होने वाली है?”
राज ने पुस्तक बंद कर दी।
“नहीं। हमें किसी कथा को निश्चित वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं मानना चाहिए। पृथ्वी की विशाल भू-पट्टियाँ चलती अवश्य हैं, पर सामान्यतः उनकी गति प्रतिवर्ष कुछ सेंटीमीटर होती है। इतने लंबे भूभाग का एक ही दिन में चटककर नया महासागर बन जाना कथा की अतिरंजित कल्पना है।”
“तो लेखक ने ऐसा क्यों लिखा?”
“क्योंकि कभी-कभी साहित्य आने वाली आपदा का सही नक्शा नहीं, बल्कि वर्तमान लापरवाही का बड़ा दर्पण बनाता है। यह अध्याय कहता है—यदि मनुष्य प्रकृति का अंधविदोहन करता रहा, तो परिणाम उसकी कल्पना से भी बड़े हो सकते हैं।”
एक अन्य बुजुर्ग बोला—
“और भूकम्पों के लिए मनुष्य को दोषी मानना?”
राज ने उत्तर दिया—
“प्रमुख भूकम्प विवर्तनिक प्लेटों की प्राकृतिक गति से आते हैं। मनुष्य उनका मूल कारण नहीं है। लेकिन खनन, बड़े जलाशय, भूमिगत द्रव निकालने या भरने जैसी गतिविधियाँ कुछ क्षेत्रों में छोटे अथवा प्रेरित भूकम्पों का जोखिम प्रभावित कर सकती हैं। सबसे बड़ी मानवीय भूल असुरक्षित निर्माण और संवेदनशील भूभाग की उपेक्षा है, जिससे प्राकृतिक घटना महाविपत्ति बन जाती है।”
कुशक्तियों को क्या मिला?
पुस्तक की कथा में कुछ लोग मानते थे कि दुनिया को विभाजित करने वाली “कुशक्तियों” ने भूगर्भीय संकट का लाभ उठाया था। उन्होंने भय के बीच शासन, संसाधनों और जनसंख्या पर अधिक नियंत्रण स्थापित कर लिया।
लेकिन विनाश के बाद उनके पास भी क्या बचा?
बाजार थे, पर ग्राहक नहीं।
महल थे, पर सुरक्षित भूमि नहीं।
मुद्रा थी, पर स्वच्छ जल नहीं।
तकनीक थी, पर विश्वास नहीं।
निशांत सर की पुरानी आवाज अभिलेख से सुनाई दी—
“जो शक्ति जीवन की रक्षा नहीं कर सकती, वह अंततः शक्तिहीनता है। दूसरों को जकड़ने वाला व्यक्ति स्वयं भी उसी जाल में फँस जाता है।”
खंडहर में बैठी महिला ने कहा—
“इसलिए प्रश्न यह नहीं कि कुशक्तियाँ जीतीं या हारीं। प्रश्न यह है कि उनके संघर्ष में जन, धन और प्रकृति नष्ट हुई।”
सुनामी—प्रकृति या षड्यंत्र?
पुस्तक में 2004 की सुनामी का उल्लेख भी था। कुछ पात्र संदेह करते थे कि वह किसी गुप्त शक्ति की हरकत थी।
इस पर बुजुर्ग राज ने स्पष्ट किया—
“26 दिसम्बर 2004 की हिंद महासागर सुनामी समुद्र के नीचे आए अत्यंत शक्तिशाली भूकम्प के कारण उत्पन्न प्राकृतिक घटना थी। किसी कृत्रिम षड्यंत्र का विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला। बड़ी त्रासदी के बाद अफवाहें इसलिए फैलती हैं क्योंकि मनुष्य असाधारण घटना के लिए किसी दिखाई देने वाले अपराधी को खोजता है।”
“लेकिन प्रकृति का अंधविदोहन?”
“वह वास्तविक चिंता है। अंधाधुंध तटीय निर्माण, मैंग्रोव विनाश और कमजोर आपदा-तैयारी सुनामी या चक्रवात के प्रभाव को गंभीर बना सकते हैं। प्राकृतिक घटना और मानवीय असावधानी को अलग-अलग समझना आवश्यक है।”
सन 1947 और एलियन्स का प्रश्न
पुस्तक के अंतिम भाग में लिखा था कि सन 1947 में कुछ शक्तियों ने एलियन्स से संपर्क किया और फिर पृथ्वी तथा अंतरिक्ष में साजिशें रचने लगीं।
तिराश्मिका ने उड़नतश्तरी में सजाकदक्फक्फ से यही प्रश्न पूछा था—
“क्या सन 1947 में मनुष्यों और एलियन्स के बीच कोई समझौता हुआ था?”
वृद्ध ने कहा—
“ऐसी कथाएँ पृथु महि की लोककल्पनाओं में प्रचलित थीं, पर उनका प्रमाणित ऐतिहासिक या वैज्ञानिक आधार नहीं मिला। अज्ञात उड़ती वस्तु देखने का अर्थ अपने आप बाहरी ग्रह का अंतरिक्षयान नहीं होता।”
“तो अशोक सर ने एलियन्स को क्यों जोड़ा?”
“शायद वे मनुष्य के अहंकार को ब्रह्मांड के विशाल परिप्रेक्ष्य में रखना चाहते थे। एलियन उनकी कथा में कभी बाहरी जीव था, कभी बाहरी नियंत्रण का प्रतीक और कभी मनुष्य से अधिक दूरदर्शी सभ्यता की कल्पना।”
“और हमारे तीन नेत्र?”
सजाकदक्फक्फ ने उत्तर दिया—
“तीसरा नेत्र केवल शरीर पर उपस्थित अंग नहीं—वह परिणाम देखने वाली दृष्टि है। पृथु महि का मनुष्य बुद्धिमान था, लेकिन उसने अक्सर दूरदृष्टि का उपयोग नहीं किया।”
फरवरी 2165 का आगमन
समय बीतता गया। पुस्तक में लिखी तारीख निकट आ गई।
24 फरवरी 2165 की सुबह खंडहर के सभी लोग सतर्क थे। उन्होंने भय फैलाने के बजाय जल, भोजन, औषधि, संचार और सुरक्षित स्थानों की तैयारी की। भूवैज्ञानिक उपकरणों से प्राप्त सूचनाएँ सुनी गईं। बच्चों को अफवाह और प्रमाण का अंतर समझाया गया।
दिन बीता।
पुस्तक में वर्णित महाविभाजन नहीं हुआ।
एक बालक बोला—
“तो भविष्यवाणी गलत थी?”
राज मुस्कराया—
“घटना सच नहीं हुई, लेकिन चेतावनी व्यर्थ भी नहीं हुई। उसके कारण हमने तैयारी की, भूगोल समझा और अपने लालच पर प्रश्न उठाया। कथा का उद्देश्य भय में जीना नहीं, जागरूक होकर वर्तमान को सुधारना है।”
अनंता ने पुस्तक के अंतिम खाली पृष्ठ पर लिखा—
भविष्य पहले से लिखा हुआ दंड नहीं है।
वह वर्तमान के ज्ञान, कर्म और सामूहिक चुनाव से बनती हुई संभावना है।
खंडहर के बाहर नए पौधे उग रहे थे। किले की दीवारों पर सौर उपकरण लगे थे। वर्षाजल कुंड भरे हुए थे। जंगल को काटे बिना छोटी बस्ती विकसित की जा रही थी।
दूर आकाश में उड़नतश्तरी एक चमकते बिंदु की तरह दिखाई दी।
सजाकदक्फक्फ ने तिराश्मिका से कहा—
“पृथु महि का मनुष्य तब जागेगा, जब वह हर अज्ञात घटना को षड्यंत्र और हर आपदा को दैवी दंड कहना छोड़कर प्रमाण, आत्मचिंतन और उत्तरदायित्व—तीनों को साथ रखेगा।”
तिराश्मिका ने नीचे नई बस्ती देखी।
“तो अशोक सर की पुस्तक भविष्य का नक्शा नहीं थी?”
वृद्ध बोला—
“नहीं। वह भविष्य के द्वार पर लगाया गया एक प्रश्नचिह्न थी।”
और खंडहर में बैठे बुजुर्गों को पहली बार पुस्तक के शीर्षक का अर्थ समझ आया—
“एक और भविष्य कथांश?!” में विस्मयादिबोधक से अधिक महत्वपूर्ण वह प्रश्नचिह्न था, जो पूछ रहा था—
क्या मनुष्य अपने भीतर बैठे कलि को पहचानकर विनाश की दिशा बदल सकता है?
उत्तर किसी एलियन, नेता अथवा अदृश्य शक्ति के पास नहीं था।
उत्तर पृथु महि के प्रत्येक जागरूक मनुष्य के वर्तमान कर्म में छिपा था।
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