शुक्रवार, 11 सितंबर 2026
सिस्टम जब भस्मासुर?!
सन 2075 ईस्वी।
पुराने नगर का अधिकांश भाग खंडहर बन चुका था। एक विद्यालय की टूटी हुई इमारत में कुछ युवक और बुजुर्ग शरण लिए हुए थे। दीवार पर लगा उपस्थिति-पट्ट अब भी बचा था। उस पर धुँधले अक्षरों में लिखा था—
“प्रत्येक विद्यार्थी की नियमित उपस्थिति अनिवार्य है।”
बुजुर्ग अनुराग ने उस पट्ट को देखते हुए कहा—
“अशोक सर कहा करते थे कि जब कोई व्यवस्था अपने उद्देश्य को भूलकर केवल आँकड़ों, कागजों और आदेशों में उलझ जाती है, तब वह स्वयं अपने ही लोगों को फँसाने लगती है।”
एक युवक ने पूछा—
“सिस्टम अपने ही लोगों को कैसे फँसा सकता है?”
अनुराग ने विद्यालय के पुराने दिनों की एक घटना सुनानी शुरू की।
उपस्थिति का जाल
एक विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही थी। कई बच्चे पारिवारिक कठिनाइयों, कामकाज, बीमारी अथवा पढ़ाई में रुचि न होने के कारण विद्यालय नहीं आते थे। लेकिन अधिकारियों की ओर से निर्देश था कि उपस्थिति कम नहीं होनी चाहिए।
प्रधानाचार्य ने शिक्षकों से कहा—
“यदि बच्चों की उपस्थिति कम दिखाई गई, तो विद्यालय पर प्रश्न उठेंगे। अनुदान घट सकता है और शिक्षकों के विरुद्ध कार्रवाई भी हो सकती है।”
एक शिक्षक ने पूछा—
“लेकिन जो विद्यार्थी आया ही नहीं, उसे उपस्थित कैसे दिखाएँ?”
प्रधानाचार्य ने धीमे स्वर में कहा—
“मैं गलत उपस्थिति लगाने को नहीं कह रहा, लेकिन आँकड़े अच्छे होने चाहिए।”
यह ऐसा आदेश था जिसमें बात स्पष्ट भी थी और अस्पष्ट भी। शिक्षक वास्तविक उपस्थिति लिखते, तो उनसे खराब परिणाम का उत्तर माँगा जाता। अनुपस्थित विद्यार्थियों को उपस्थित दिखाते, तो वे गलत अभिलेख तैयार करने के दोषी बनते।
कुछ दिनों बाद एक विद्यार्थी विद्यालय के समय बाहर किसी विवाद में पकड़ा गया। अभिलेख में वह उस दिन विद्यालय में उपस्थित था। जाँच अधिकारी ने शिक्षक से पूछा—
“यदि यह विद्यार्थी विद्यालय में उपस्थित था, तो बाहर कैसे मिला?”
शिक्षक के पास कोई उत्तर नहीं था। जिस झूठे आँकड़े ने कुछ समय तक विद्यालय की छवि बचाई थी, वही अब शिक्षक के विरुद्ध प्रमाण बन गया।
अशोक सर ने यह घटना सुनकर कहा था—
“यही वह स्थिति है जिसमें सिस्टम अपने को बचाने के लिए झूठ माँगता है और फिर उसी झूठ के आधार पर अपने कर्मचारी को दंडित करता है।”
थाने का सिपाही
उसी नगर के थाने में एक सिपाही कार्यरत था। उसका वेतन सीमित था, काम के घंटे निश्चित नहीं थे और ऊपर से अनेक प्रकार के अनौपचारिक दबाव आते थे।
यदि वह रिश्वत लेता, तो कानून और नैतिकता दोनों की दृष्टि से गलत था। यदि रिश्वत लेने से इनकार करता, तो कुछ प्रभावशाली लोग उससे नाराज हो जाते। यदि वह नियम के अनुसार कार्रवाई करता, तो फोन आने लगते—
“उसे छोड़ दो, वह अपने लोगों में से है।”
यदि वह दबाव में किसी को छोड़ देता, तो बाद में वही अधिकारी पूछते—
“तुमने कानून का पालन क्यों नहीं किया?”
एक दिन सिपाही ने अशोक सर से कहा—
“सर, नौकरी का अर्थ अब कर्तव्य निभाना नहीं, परस्पर विरोधी आदेशों के बीच स्वयं को बचाना हो गया है। रिश्वत लूँ तो अपराधी, न लूँ तो व्यवस्था का विरोधी!”
अशोक सर ने उत्तर दिया—
“रिश्वत कभी उचित नहीं हो सकती। लेकिन केवल नीचे के कर्मचारी को दोष देकर समस्या समाप्त नहीं होती। यह भी देखना होगा कि उसके ऊपर कौन-से दबाव हैं, आदेश कैसे दिए जाते हैं और ईमानदार कर्मचारी को संस्था कितना संरक्षण देती है।”
बसों का हिसाब
नगर से जयपुर जाने वाली बसों के कुछ ठेकेदार यात्रियों की संख्या के आधार पर एक अनौपचारिक रकम अलग रखते थे। लोगों में चर्चा थी कि उसका एक भाग किसी प्रभावशाली जनप्रतिनिधि तक पहुँचता है। वह प्रतिनिधि सार्वजनिक मंचों पर परिवहन सुधारने की बातें करता था, लेकिन भीतर चल रही व्यवस्था पर मौन रहता था।
उसकी बिरादरी के कुछ लोग कहते—
“विधायक जी अपने आदमी हैं। उनकी आलोचना मत करो।”
एक यात्री ने पूछा—
“यदि गलत काम करने वाला अपनी जाति या बिरादरी का हो, तो क्या उसका गलत काम सही हो जाता है?”
दूसरे व्यक्ति ने उत्तर दिया—
“लोग प्रतिनिधि को जनता का सेवक नहीं, अपनी बिरादरी की शक्ति मानने लगते हैं। इसलिए वे सार्वजनिक हित से पहले सामुदायिक निष्ठा को रखते हैं।”
जब बसों में निर्धारित संख्या से अधिक यात्रियों को बैठाया जाता, किराया मनमाने ढंग से बढ़ता और शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती, तब उसका बोझ सामान्य यात्रियों को सहना पड़ता। ठेकेदार सोचता था कि हिस्सा देकर उसने सुरक्षा खरीद ली है। अधिकारी सोचता था कि ऊपर से संरक्षण है। नेता सोचता था कि बिरादरी उसका साथ देगी। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति व्यवस्था का “खास” बनने का प्रयत्न कर रहा था—और यही विशेष संबंध पूरी व्यवस्था के लिए उलझन बन रहा था।
भस्मासुर का रूपक
अनुराग ने युवकों से पूछा—
“भस्मासुर की कथा जानते हो?”
एक युवक ने कहा—
“उसे ऐसी शक्ति मिली थी कि जिसके सिर पर हाथ रखे, वह भस्म हो जाए। बाद में वह उसी शक्ति के कारण स्वयं संकट में पड़ गया।”
अनुराग ने कहा—
“सिस्टम भी भस्मासुर तब बनता है, जब उसे दी गई शक्ति नियंत्रण और सेवा के स्थान पर भय, पक्षपात तथा निजी लाभ के लिए प्रयोग होने लगे। वह पहले सामान्य नागरिक को परेशान करता है, फिर अपने कर्मचारियों को और अंत में स्वयं अपनी विश्वसनीयता को नष्ट कर देता है।”
विद्यालय में झूठी उपस्थिति, थाने में अनैतिक दबाव और परिवहन में कथित कमीशन—तीनों घटनाएँ अलग दिखाई देती थीं, पर उनकी जड़ एक थी: नियमों और वास्तविक परिस्थितियों के बीच दूरी।
अशोक सर की सभा
एक नागरिक सभा में अशोक सर ने कहा—
“किसी भी व्यवस्था का उद्देश्य मनुष्य की समस्या का समाधान होना चाहिए। लेकिन जब उसका ध्यान वास्तविक परिणाम से हटकर केवल आँकड़े, लक्ष्य, कमीशन, जातीय समर्थन और अधिकारियों को प्रसन्न करने पर टिक जाता है, तब साधन ही उद्देश्य बन जाते हैं।”
उन्होंने श्यामपट्ट पर लिखा—
अस्पष्ट आदेश → झूठे आँकड़े → दबाव → दोषारोपण → अविश्वास
फिर बोले—
“व्यवस्था को बचाने के लिए सत्य छिपाया जाता है। बाद में उसी छिपे हुए सत्य के कारण बड़ा संकट उत्पन्न होता है। तब ऊपर वाला नीचे वाले को दोष देता है और नीचे वाला परिस्थितियों को। उत्तरदायित्व कहीं निश्चित नहीं होता।”
सभा में बैठे एक शिक्षक ने पूछा—
“फिर समाधान क्या है?”
अशोक सर ने उत्तर दिया—
“विद्यार्थी अनुपस्थित है तो उसकी वास्तविक अनुपस्थिति दर्ज हो। साथ ही यह खोजा जाए कि वह विद्यालय क्यों नहीं आ रहा। सिपाही को ईमानदार कार्रवाई के लिए संस्थागत सुरक्षा मिले। ठेके, यात्रियों की संख्या, किराया और भुगतान सार्वजनिक हों। जनप्रतिनिधि को जाति का संरक्षक नहीं, पूरी जनता का उत्तरदायी सेवक माना जाए। शिकायत करने वाले व्यक्ति को शत्रु न समझा जाए।”
अंतिम प्रश्न
कथा समाप्त करते हुए बुजुर्ग अनुराग ने कहा—
“सिस्टम कोई आकाश से उतरी हुई वस्तु नहीं है। वह नियमों, संस्थाओं और मनुष्यों से मिलकर बनता है। इसलिए यह कहना अधूरा है कि केवल सिस्टम खराब है। प्रश्न यह भी है कि उसके भीतर बैठे लोग किस मूल्य के साथ काम कर रहे हैं और नागरिक किस आधार पर उनका समर्थन कर रहे हैं।”
बाहर सुबह का प्रकाश फैलने लगा था। टूटी हुई दीवार पर लिखा उपस्थिति का नियम अब साफ दिखाई दे रहा था।
अनुराग ने अंतिम बात कही—
“जिस व्यवस्था में सच बोलने वाला दंडित हो, झूठे आँकड़े देने वाला पुरस्कृत हो और प्रभावशाली व्यक्ति नियमों से ऊपर हो जाए, वह भस्मासुर बनने लगती है। फिर वह केवल जनता को नहीं, अपने शिक्षक, सिपाही, अधिकारी और नेताओं को भी उलझाती है।”
सिस्टम का सुधार तब आरम्भ होगा, जब कागजी सफलता के स्थान पर वास्तविक समस्या का समाधान, निजी संरक्षण के स्थान पर समान नियम और जातीय निष्ठा के स्थान पर सार्वजनिक उत्तरदायित्व को महत्त्व मिलेगा।
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