गुरुवार, 24 सितंबर 2026
खंडहर में खुलता विचारों का द्वार?!
सन 2075 ई०!
घने जंगल के बीच एक पुराना खंडहर खड़ा था। उसकी दीवारों पर समय की दरारें थीं और छत के कई हिस्सों से आकाश दिखाई देता था। फिर भी उसका लंबा बरामदा सुरक्षित था। उसी बरामदे में कुछ बुजुर्ग बैठे बातचीत कर रहे थे।
एक पुराने तख्त पर धूल से ढकी कुछ पुस्तकें रखी थीं। उनमें रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता, गुरु गोविन्द सिंह के जीवन-संघर्ष और कर्बला के इतिहास से संबंधित पुस्तकें भी थीं।
खंडहर से कुछ दूरी पर एक पहाड़ी दिखाई देती थी। उसका आकार ऐसा लगता था, मानो प्रकृति ने स्वयं वहाँ श्री अर्द्धनारीश्वर की विशाल मूर्ति गढ़ दी हो। पहाड़ी के एक भाग पर सुनहरी घास और दूसरे भाग पर हरी झाड़ियाँ उगी थीं। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि शिव और शक्ति, ज्ञान और कर्म, करुणा और साहस—सब एक-दूसरे के पूरक हैं।
बुजुर्ग अनुराग ने तख्त पर रखी एक पुरानी डायरी उठाई। उसके पन्ने पीले पड़ चुके थे। उसने पढ़ना शुरू किया—
“देह का अंत एक दिन निश्चित है। इसलिए जीवन का मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि हम कितने वर्ष जीवित रहे, बल्कि इससे होता है कि हमने जीवित रहते हुए सत्य, न्याय और मानवता के लिए क्या किया।”
राज ‘अराजक’ ने गहरी साँस लेते हुए कहा—
“सर जी कभी-कभी कहा करते थे—यदि अन्याय का विरोध करते हुए मेरे सामने संकट भी आ जाए, तो मैं अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटूँगा।”
सामने बैठे अब्दुल ने तुरंत कहा—
“लेकिन उनके कथन का अर्थ मृत्यु की इच्छा करना नहीं था। वे तो जीवन को बहुत मूल्यवान मानते थे।”
“बिलकुल,” अनुराग बोला, “उनका आशय था कि भय के कारण मनुष्य अपने विवेक को न बेच दे। संघर्ष का उद्देश्य स्वयं को संकट में डालना नहीं, बल्कि बुद्धि, कानून, अहिंसा और सामूहिक प्रयास से अन्याय को रोकना होना चाहिए।”
राज ने पहाड़ी की ओर देखते हुए पूछा—
“तब सर जी जटायु का उदाहरण बार-बार क्यों देते थे?”
अनुराग ने डायरी का अगला पन्ना खोला। उसमें एक पुरानी घटना लिखी थी।
मखानी इंटर कॉलेज की वह संध्या
सन 2003 ई०, जनवरी!
मखानी इंटर कॉलेज, मुड़िया अहमदनगर, बरेली।
सर्दियों की एक शांत संध्या थी। सूर्य धीरे-धीरे खेतों के पीछे उतर रहा था। कॉलेज के मुख्य द्वार पर ताला लग चुका था, फिर भी गेटकीपर अरविंद वाल्मीकि अपनी पुरानी बेंच डालकर वहीं बैठा था। उसका घर पास में ही था, इसलिए विद्यालय बंद होने के बाद भी वह कुछ देर वहाँ बैठा रहता था।
अशोक सर भी उसके पास उपस्थित थे।
तभी असलम नाम का एक मुस्लिम लड़का वहाँ आ पहुँचा। वह कभी-कभी अशोक सर के कमरे पर जाकर उन्हें कुरआन की प्रारम्भिक आयतों का अर्थ समझाया करता था।
असलम ने अभिवादन करके पूछा—
“सर जी, विद्यालय बंद हो चुका है। आप दोनों अभी तक यहाँ क्यों बैठे हैं?”
अशोक सर ने बंद द्वार की ओर देखा और मुस्कराकर बोले—
“विद्यालय का द्वार बंद हो सकता है, असलम, लेकिन सीखने और विचार करने का द्वार कभी बंद नहीं होना चाहिए।”
असलम भी बेंच के पास बैठ गया। कुछ समय तक तीनों सड़क पर आते-जाते लोगों को देखते रहे। तभी अरविंद ने पूछा—
“सर जी, आप कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को अन्याय का विरोध करना चाहिए। लेकिन यदि अन्यायी बहुत शक्तिशाली हो और हम उसके सामने बहुत कमजोर हों, तब क्या किया जाए?”
अशोक सर कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने पूछा—
“क्या तुमने जटायु का प्रसंग सुना है?”
“हाँ,” अरविंद ने उत्तर दिया, “जटायु वृद्ध थे। फिर भी उन्होंने माता सीता की रक्षा के लिए रावण को रोकने का प्रयास किया था।”
अशोक सर बोले—
“जटायु जानते थे कि वे रावण से अधिक शक्तिशाली नहीं हैं। फिर भी उन्होंने यह सोचकर मुँह नहीं फेर लिया कि यह संघर्ष किसी दूसरे का है। उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार अन्याय का प्रतिरोध किया। यही उनका सबसे बड़ा संदेश है।”
असलम ने पूछा—
“लेकिन यदि विरोध करने से जीवन पर संकट आ जाए तो?”
अशोक सर ने गंभीरता से समझाया—
“साहस का अर्थ संकट को आमंत्रित करना या बिना सोचे-समझे टकरा जाना नहीं है। सच्चा साहस है—परिस्थिति को समझना, पीड़ित की सहायता करना और उचित साधनों से अन्याय को रोकना। कभी स्वयं सहायता करनी चाहिए, कभी समाज को जगाना चाहिए और कभी प्रशासन तथा कानून की मदद लेनी चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा—
“जटायु की प्रेरणा यह नहीं कि हर व्यक्ति अकेले शक्तिशाली अपराधी से भिड़ जाए। उनकी प्रेरणा यह है कि किसी असहाय को संकट में देखकर हम उदासीन न रहें। सहायता बुलाना, प्रमाण सुरक्षित करना, पीड़ित को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाना और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना भी साहस है।”
अरविंद ने पूछा—
“तब सच्चा ब्राह्मण और सच्चा क्षत्रिय कौन है?”
अशोक सर बोले—
“इन शब्दों को केवल जन्म और जाति में सीमित मत करो। जो ज्ञान, विवेक और सदाचार को अपने व्यवहार में उतारता है, उसमें ब्राह्मण का गुण है। जो निर्बल की रक्षा करता है, न्याय का साथ देता है और अपने बल का दुरुपयोग नहीं करता, उसमें क्षत्रिय का गुण है। ये श्रेष्ठता के पद नहीं, उत्तरदायित्व के प्रतीक हैं।”
असलम ने धीरे से कहा—
“जैसे हज़रत इमाम हुसैन ने अन्याय के सामने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया?”
“हाँ,” अशोक सर बोले, “कर्बला हमें सत्य, न्याय, त्याग और नैतिक दृढ़ता की प्रेरणा देता है। इसी प्रकार गुरु गोविन्द सिंह जी और उनके परिवार का इतिहास हमें बताता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धार्मिक स्वतंत्रता और मानव-मर्यादा की रक्षा की जा सकती है।”
फिर उन्होंने सावधान करते हुए कहा—
“लेकिन इन महापुरुषों के बलिदानों को किसी समुदाय के प्रति घृणा फैलाने के लिए प्रयोग करना उनके संदेश का अपमान होगा। उनसे प्रेरणा लेने का अर्थ है—अन्याय का विरोध करो, पर मनुष्य से घृणा मत करो; अत्याचार रोकने का प्रयास करो, पर स्वयं अत्याचारी मत बनो।”
अरविंद ने पूछा—
“क्या केवल बड़े संघर्ष में उतरना ही मिशन कहलाता है?”
अशोक सर मुस्कराए—
“नहीं। मिशन परिस्थितियों और सामर्थ्य के अनुसार होता है। कोई बच्चों को ईमानदारी से पढ़ाता है, कोई भूखे को भोजन देता है, कोई पेड़ लगाता है, कोई भेदभाव के विरुद्ध बोलता है और कोई परिवार में सत्य तथा सदाचार की शुरुआत करता है। प्रत्यक्ष कर्म भी मिशन है और पर्दे के पीछे किया गया सहयोग भी।”
यह कहते हुए उन्होंने जमीन पर पड़ी कागज की एक पुड़िया उठाई और पास के कूड़ेदान में डाल दी।
“देखो,” उन्होंने कहा, “मिशन केवल भाषण नहीं होता। अपने सामने पड़ी छोटी-सी जिम्मेदारी को निभाना भी मिशन है।”
अँधेरा बढ़ने लगा था। असलम ने बंद विद्यालय की ओर देखते हुए कहा—
“आज समझ आया कि जटायु हमें केवल शक्तिशाली बनने की नहीं, जिम्मेदार बनने की प्रेरणा देते हैं।”
अरविंद ने अपनी बेंच उठाते हुए कहा—
“और साहस का अर्थ केवल लड़ना नहीं है। सही समय पर सही उपाय से किसी की रक्षा करना भी साहस है।”
अशोक सर बोले—
“हर मनुष्य किसी न किसी धुन में जीवन बिताता है—कोई धन की धुन में, कोई पद की, कोई प्रसिद्धि की और कोई स्वार्थ की। लेकिन जिसकी धुन में सत्य, मानवता, न्याय और लोककल्याण जुड़ जाता है, उसका साधारण जीवन भी असाधारण बन जाता है।”
तीनों वहाँ से चल पड़े। कॉलेज के द्वार पर ताला लगा रहा, लेकिन उनके भीतर विचार का एक नया द्वार खुल चुका था।
अनुराग ने डायरी बंद कर दी। खंडहर के बरामदे में कुछ क्षण मौन छा गया।
राज ‘अराजक’ ने सामने की अर्द्धनारीश्वर जैसी पहाड़ी को देखते हुए कहा—
“अब समझ आया कि ज्ञान और साहस अलग-अलग नहीं हैं। ज्ञान बताएगा कि क्या उचित है और साहस उस उचित कार्य को करने की शक्ति देगा।”
अब्दुल बोला—
“और जटायु, हज़रत इमाम हुसैन तथा गुरु गोविन्द सिंह जी के परिवार से मिलने वाली प्रेरणा का सार यही है कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य, न्याय और मानव-मर्यादा के उद्देश्य को नहीं छोड़ना चाहिए।”
अनुराग ने कहा—
“हाँ। प्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़कर कार्य करना हो अथवा अप्रत्यक्ष रूप से किसी सच्चे प्रयास का सहयोग—प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर मानवता के मिशन में भागीदार हो सकता है।”
उसी समय बादलों के बीच से सूर्य की अंतिम किरण निकली और पहाड़ी पर पड़ी। घास से ढकी वह आकृति कुछ क्षणों के लिए चमक उठी। मानो प्रकृति स्वयं कह रही हो—
देह नश्वर है, इसलिए उसे संकट में झोंकना नहीं, बल्कि उसके प्रत्येक क्षण को सार्थक बनाना चाहिए। जटायु की तरह अपनी शक्ति छोटी देखकर कर्तव्य से मुँह मत मोड़ो। विवेक, करुणा, अहिंसा और साहस के साथ अन्याय का विरोध करो तथा मानवता के मिशन में निरंतर सक्रिय रहो।
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