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शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

समुद्र के उस पार…?!

एलीना क्यूबा : समुद्र के उस पार…?! सन 2036 ईस्वी!
मुंबई में समुद्र किनारे, एक मंदिर परिसर के समीप बने पार्क में एलीना क्यूबा बैठी हुई थी। मंदिर से आती घंटियों की आवाज कभी लहरों में डूब जाती, कभी हवा के साथ उसके पास लौट आती। उसके हाथ में एक पुस्तक थी—“गोडसे का अफ़सोस”। पृष्ठ आठ पर उसकी उँगली ठहर गई— “बड़ी पावर के साथ रावण फिर ज़िंदा हो रहा है। भीष्म पितामह फिर जीवित हो रहे हैं।” एलीना ने सिर उठाया। सामने समुद्र था। पीछे ऊँची इमारतें थीं, जिनकी खिड़कियों पर ढलते सूर्य की चमक पड़ रही थी। “रावण फिर ज़िंदा हो रहा है… और भीष्म भी?” वह कुछ देर उन शब्दों को देखती रही। फिर उसे सर जी की सुनाई एक कथा याद आई— “यह मुंबई…! कभी रावण अपने पुष्पक विमान से यहाँ उतरा था। उस समय समुद्र यहाँ से काफी दूर था। सात बड़े-बड़े तालाब थे, पहाड़ियाँ थीं और घने वन थे। दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण भारत के बीच समुद्र का विस्तार आज जैसा नहीं था… समुद्र के उस पार…!” सर जी उस दिन आगे कुछ कहते, उससे पहले ही किसी ने उन्हें पुकार लिया था। वह अधूरी बात एलीना के भीतर रह गई थी। उसने अपनी डायरी निकाली। पुराने नोट के नीचे सर जी की ही लिखवाई एक पंक्ति थी— “इसे मेरी कल्पना-कथा की तरह पढ़ना, एलीना। प्राचीन भूगोल की पुष्टि के लिए प्रमाण खोजने होंगे।” वह मुस्कराई। सर जी कहानी के बीच भी प्रश्न करने की जगह छोड़ देते थे। लेकिन आज उसे भूगोल से अधिक उस विमान में बैठे रावण की चिंता थी। यदि वह इस समय यहाँ उतरता तो क्या देखता? क्या समुद्र किनारे खड़ी इन इमारतों को देखकर प्रसन्न होता? क्या अपने दस सिरों के लिए दस कार्यालय खोलता? या उसे दस सिरों की भी जरूरत नहीं पड़ती—एक ही जगह बैठकर इतने लोगों के जीवन पर प्रभाव डालने की शक्ति जो उपलब्ध थी! पास ही एक बच्चा रेत में घर बना रहा था। उसकी माँ थोड़ी दूर बैठी फोन देख रही थी। बच्चा बार-बार उसे बुलाता, फिर स्वयं ही अपने घर की दीवार ठीक करने लगता। एलीना ने पुस्तक दोबारा खोली। पृष्ठ के हाशिये पर किसी पाठक ने पेंसिल से लिखा था— “रावण को पहचान लेना पर्याप्त नहीं। यह भी देखो कि उसके दरबार में तुम्हारा स्थान कहाँ है।” उसके चेहरे की मुस्कान चली गई। उसे अपना कार्यालय याद आया। कुछ महीने पहले समुद्र किनारे एक निर्माण परियोजना की रिपोर्ट उसके सामने आई थी। नक्शे में जिस जगह को खाली भूमि दिखाया गया था, वहाँ वह स्वयं मछुआरों की झोपड़ियाँ देख चुकी थी। उसने अधिकारी से पूछा भी था। उत्तर मिला था— “वह हिस्सा तुम्हारे काम का नहीं है। तुम्हें केवल आँकड़े जाँचने हैं।” उसने आँकड़े जाँचे और दस्तखत कर दिए। अब वही दस्तखत उसे पृष्ठ आठ पर दिखाई देने लगे। “तो भीष्म…?” उसने धीरे से कहा। सर जी के साथ हुई एक और बातचीत याद आई। “भीष्म का प्रसंग तुम्हें सबसे अधिक कहाँ बेचैन करता है?” उन्होंने पूछा था। “उनकी विवशता पर।” “और उस विवशता से कष्ट किसे हुआ?” तब एलीना उत्तर नहीं दे पाई थी। आज सामने लहरों के बीच उसे उस प्रश्न का अर्थ कुछ साफ दिखाई दे रहा था। किसी की प्रतिज्ञा, किसी की नौकरी, किसी का पद—इन सबकी कीमत कई बार कोई दूसरा चुका रहा होता है। “मैं अकेली क्या कर सकती थी?” उसने अपने बचाव में सोचा। अगले ही क्षण भीतर से प्रश्न आया— “जो पूछ सकती थीं, क्या उतना भी पूछा?” हवा तेज हुई। पुस्तक के पन्ने फड़फड़ाने लगे। उसने दोनों हाथों से उसे सँभाल लिया। पास बैठा बच्चा अचानक रो पड़ा। एक लहर उसके बनाए घर का आधा हिस्सा बहा ले गई थी। उसकी माँ ने फोन रख दिया और उसके पास आकर बैठ गई। “फिर बनाएँ?” उसने पूछा। बच्चे ने समुद्र की ओर नाराज होकर देखा। “यह फिर तोड़ देगा।” माँ कुछ देर चुप रही। फिर बोली— “थोड़ा पीछे बनाते हैं। पहले देख लेते हैं कि पानी कहाँ तक आता है।” एलीना उन्हें देखती रही। उसे अपनी रिपोर्ट का वह नक्शा याद आया, जिसमें न समुद्र की पहुँच ठीक दर्ज थी, न वहाँ बसे लोगों का जीवन। उसने फोन निकाला। परियोजना से जुड़ी पुरानी फाइल खोजी। फिर कार्यालय के संबंधित विभाग को लिखना शुरू किया— “मेरे द्वारा जाँची गई रिपोर्ट में स्थल पर मौजूद बस्ती का उल्लेख नहीं है। इस अंतर की जाँच आवश्यक है। मैं अपने निरीक्षण संबंधी विवरण प्रस्तुत करना चाहती हूँ।” लिखने के बाद उसका हाथ ठहर गया। इस संदेश के बाद प्रश्न होंगे। अधिकारी नाराज हो सकते हैं। उसके अपने दस्तखत भी सामने आएँगे। उसने संदेश एक बार और पढ़ा, फिर भेज दिया। समुद्र पहले की तरह गरज रहा था। मंदिर में संध्या आरती शुरू हो चुकी थी। शहर की खिड़कियाँ एक-एक करके जगमगाने लगी थीं। कुछ भी अचानक नहीं बदला था। फिर भी अब वह उस बेंच पर पहले जैसी नहीं बैठी थी। उसने डायरी में लिखा— “आज पृष्ठ आठ पढ़ते हुए मैं रावण को शहर में खोज रही थी। भीष्म मेरे अपने दस्तखतों के पास मिल गए।” फिर उसकी दृष्टि दूर क्षितिज पर चली गई। समुद्र के उस पार क्या था—कोई भूला हुआ वन, कोई प्राचीन तट, किसी दूसरी सभ्यता के अवशेष? सर जी की अधूरी कथा अब भी उसे बुला रही थी। वह उसके बारे में पढ़ेगी, प्रमाण खोजेगी, उनसे प्रश्न करेगी। पर इस पार भी एक अधूरा काम था। एलीना ने पुस्तक बंद की और उठ खड़ी हुई। रेत में बच्चा अब नया घर बना रहा था। इस बार उसकी माँ भी उसके साथ थी।

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