मंगलवार, 3 नवंबर 2026
खंडहर में बची हुई ज्योति?!
खंडहर में बची हुई ज्योति
सन 2075 ईस्वी।
जंगल के बीच खड़े उस खंडहर की दीवारों पर पीपल की जड़ें उतर आई थीं। किसी समय यहाँ एक विशाल सभागार रहा होगा। अब छत का एक हिस्सा खुला था, जहाँ से आकाश दिखाई देता था।
वहाँ अधिकतर बुज़ुर्ग रहते थे। कुछ अपने परिवार खो चुके थे, कुछ नगर छोड़ आए थे और कुछ ने आसपास के बच्चों को पढ़ाने के लिए वहीं ठहरना स्वीकार किया था।
एक टूटी मेहराब के नीचे किशोर अब्दुल पुस्तक लिए बैठा था—“लंका में विभीषण!”
उसके समीप बैठी रश्मि पुराने कागज़ों पर लिखे वाक्य पढ़ रही थी। एक पन्ने पर उसकी उँगली ठहर गई।
“भविष्यवाणियाँ क्या टल सकती हैं?”
उसने सामने बैठे वृद्ध से पूछा—
“बाबा, अशोक सर यह प्रश्न बार-बार क्यों उठाते थे?”
वृद्ध ने अपनी छड़ी दीवार से टिका दी।
“क्योंकि लोग भविष्य सुनते ही अक्सर वर्तमान का काम छोड़ देते थे। कोई डरकर बैठ जाता था, कोई अपने बच निकलने का उपाय खोजता था। सर पूछते थे—जिस दिशा में चलने से संकट आने वाला है, क्या उस दिशा को बदला जा सकता है?”
अब्दुल ने पुस्तक बंद कर दी।
“लेकिन यदि कोई घटना पहले ही दिखाई दे जाए, तो वह होकर ही रहेगी?”
बाबा कुछ देर खुले आकाश को देखते रहे।
“पहले यह समझना होगा कि देखने वाले ने क्या देखा है, कितना देखा है और उसके देखने की सीमा क्या है।”
पास बैठी एक वृद्धा ने अपनी टोकरी से बीज निकालते हुए कहा—
“बरसात के पहले मैं इन्हें ऊँची जगह रख देती हूँ। बादलों को देखकर पानी आने की आशंका होती है। अब मैं बीज वहीं भीगने छोड़ दूँ और बाद में कहूँ कि यही भाग्य था, तो मेरी समझ किस काम आई?”
रश्मि मुस्कराई, लेकिन अब्दुल अभी गंभीर था।
“अशोक सर तो इससे भी भीतर की किसी दशा की बात करते थे।”
“हाँ,” बाबा बोले, “उनके लिए वेद का अर्थ केवल सामने रखी पुस्तक तक सीमित नहीं था। वे प्रकृति और अस्तित्व के उस व्यापक सत्य की बात करते थे, जिसे ऋषि अपनी साधना में अनुभव करने का प्रयत्न करते हैं। यह उनकी आध्यात्मिक समझ थी।”
“और ज्योतिष?” रश्मि ने पूछा।
“वे ‘ज्योति के संकेत’ कहकर समझाते थे। इसे उनकी भावपूर्ण व्याख्या समझना; शब्द की प्रमाणित व्युत्पत्ति समझकर मत दोहराना। उनका प्रश्न था—मन इतना स्वच्छ कब होता है कि वह अपनी इच्छाओं और आशंकाओं के पार कुछ देख सके?”
अब्दुल ने धीरे से पूछा—
“जो हमें भीतर महसूस हो, वह सच भी तो हो सकता है?”
“हो सकता है। पर अपना भय भी कभी संकेत जैसा लगता है और अपनी इच्छा भी। इसलिए किसी अनुभूति को तुरंत सबके भविष्य का आदेश बना देना कठिनाई पैदा करता है।”
खंडहर में थोड़ी देर शांति रही।
दूर कहीं लकड़ी चटकने की आवाज़ आई। दो बच्चे रसोई के लिए सूखी टहनियाँ चुनकर ला रहे थे।
रश्मि ने पन्ने की अगली पंक्ति पढ़ी—
“सिर्फ अहसास होना ही महत्वपूर्ण नहीं है; इससे आगे भी अनंत दशाएँ हैं।”
“इसका क्या अर्थ हुआ?”
बाबा ने पूछा—
“तुमने कभी किसी से क्रोध में कुछ कहने के लिए मुँह खोला है, फिर चुप रह गई हो?”
“कई बार।”
“उस क्षण तुम्हारे सामने एक परिणाम लगभग तैयार था। तुम बोलतीं, वह उत्तर देता, झगड़ा बढ़ता। लेकिन तुम ठहरीं। फिर तुम्हें उसकी परेशानी याद आई। तुम्हारे अगले शब्द बदल गए।”
रश्मि ने सिर हिलाया।
“तो भविष्य बदल गया?”
“कम से कम उस संबंध का अगला क्षण बदल गया। और उसी क्षण से आगे की बहुत-सी संभावनाएँ भी।”
अब्दुल की दृष्टि अपनी पुस्तक पर लौट गई।
“इसीलिए विभीषण?”
वृद्ध ने उसकी ओर देखा।
“क्या समझे तुम?”
“कि लंका में रहते हुए भी किसी को कहना पड़ेगा—हम जिस ओर जा रहे हैं, वह ठीक नहीं है। चाहे बाकी लोग उसे अपना विरोध समझें।”
“और यह काम अपने भीतर भी करना पड़ेगा,” वृद्धा बोलीं। “अपने लोभ को पहचानना, अपने क्रोध के विरुद्ध खड़ा होना—यह भी आसान नहीं।”
अब्दुल ने पुस्तक अपनी गोद में सीधी रख ली।
“लेकिन दस प्रतिशत मनुष्य ध्यान करने लगें, तो क्या पूरी धरती का भविष्य बदल जाएगा?”
बाबा ने उत्तर देने से पहले पास रखे पानी के पात्र से एक घूँट लिया।
“इस संख्या को निश्चित चमत्कारी नियम मानने का आधार हमारे पास नहीं है। सर के आह्वान में मैं इतनी बात समझता हूँ कि सबकी प्रतीक्षा किए बिना कुछ लोग साफ दिल से शुरुआत करें। फिर देखना होगा कि उनका अभ्यास जीवन में क्या उतारता है।”
“कैसे?”
“जो ध्यान से उठकर फिर पानी पर कब्ज़ा करे, कमज़ोर को अपमानित करे, अपने लाभ के लिए जंगल काटे—उसकी साधना से दूसरे को क्या मिला? लेकिन जो अपने हिस्से का पानी बचाए, न्याय करते समय अपना पक्ष भी जाँचे और किसी भूखे के लिए अन्न रखे, उसके आसपास का जीवन बदलने लगेगा।”
वृद्धा ने बीजों की छोटी पोटली बाँध दी।
“हम यहाँ बीज बचाते हैं। इससे वर्षा हमारे कहने से नहीं होती। फिर भी जब वर्षा होती है, तो बोने के लिए हमारे पास कुछ होता है।”
रश्मि देर तक उस पोटली को देखती रही।
फिर उसने पूछा—
“सब कुछ उस दशा पर छोड़ देने का क्या अर्थ है? हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना?”
बाबा उठे और उन्हें खंडहर के पीछे ले गए।
वहाँ मिट्टी की एक छोटी मेड़ बनी थी। उसके एक ओर बरसात का बचा हुआ पानी था, दूसरी ओर सब्ज़ियों की क्यारियाँ।
“यह मेड़ हमने बनाई है। मिट्टी कब तक नमी सँभालेगी, अगली वर्षा कब होगी, बीजों में से कितने उगेंगे—सब हमारे हाथ में नहीं है। फिर भी जो काम हमारे हाथ में था, वह हमने किया।”
उन्होंने झुककर मेड़ की दरार में मिट्टी दबाई।
“समर्पण में अपने कर्म की जिम्मेदारी बनी रहती है। साथ ही यह आग्रह धीरे-धीरे ढीला पड़ता है कि परिणाम मेरी इच्छा के अनुसार ही आए।”
उसी समय छोटी नूर दौड़ती हुई आई।
“बाबा! नाले में पानी बहुत बढ़ रहा है। नीचे वाले डेरे में अभी लोग हैं!”
सबके चेहरे बदल गए।
अब्दुल के हाथ में वही पन्ना था—भविष्यवाणियाँ क्या टल सकती हैं?
एक क्षण के लिए उसने बाबा की ओर देखा।
बाबा ने कहा—
“रस्सी उठाओ। रश्मि, तुम ऊँचे रास्ते से जाकर उन्हें खबर दो। हम पीछे से आते हैं।”
अब्दुल दौड़ पड़ा।
नाले की आवाज़ पास आते-आते भारी हो गई थी। नीचे के डेरे में दो बुज़ुर्ग, एक स्त्री और तीन बच्चे थे। पानी उनके बर्तनों तक पहुँच चुका था। रश्मि ने बच्चों को ऊपर के रास्ते की ओर भेजा। अब्दुल और दो युवकों ने रस्सी बाँधी। एक बुज़ुर्ग को चलने में कठिनाई थी; उन्हें सहारा देकर लाना पड़ा।
साँझ तक सब खंडहर में पहुँच गए।
कुछ बर्तन बह गए थे। अन्न की एक बोरी भीग गई थी। पर कोई पीछे नहीं छूटा था।
रात को आग के पास बैठे अब्दुल ने पूछा—
“बाबा, अगर नूर खबर न देती तो?”
बाबा ने आग में एक सूखी टहनी रखी।
“तब शायद बहुत देर हो जाती।”
“और अगर हम सिर्फ प्रार्थना करते रहते?”
वृद्ध ने उसकी ओर देखा। अब्दुल ने स्वयं ही नज़र झुका ली।
कुछ देर बाद बाबा बोले—
“प्रार्थना ने यदि हमें दूसरे की पुकार सुनने योग्य बनाया है, तो उसके बाद उठने वाले कदम भी उसी प्रार्थना का हिस्सा होंगे।”
रश्मि ने अपना पन्ना खोला। दिन भर की भागदौड़ में उसके किनारे भीग गए थे।
“तो हर भविष्यवाणी टल सकती है?”
“यह हम नहीं कह सकते,” बाबा बोले। “कुछ हानियाँ वापस नहीं आतीं। कुछ घटनाएँ हमारे सामर्थ्य से बाहर होती हैं। और कई भविष्यवाणियाँ गलत भी निकलती हैं। इसलिए हर परिणाम को अपनी साधना का प्रमाण और हर विपत्ति को किसी की साधना की कमी मत मानना।”
अब्दुल ने आज बचाकर लाए गए बच्चों को देखा। वे एक ही चादर ओढ़े सो रहे थे।
“फिर भी आज कुछ बदल गया।”
“हाँ,” बाबा ने कहा, “आज तुम दोनों ने बदलने योग्य हिस्से को पहचाना।”
रात गहरी हो चुकी थी।
सभा में सबने कुछ देर आँखें बंद कीं। अब्दुल के मन में पहले नाले की गर्जना आई, फिर रस्सी पकड़े हुए उस बुज़ुर्ग का काँपता हाथ। उसने अनुभव किया कि दिन भर जिसका जीवन उसे अपरिचित लगता था, अब उसकी चिंता अपने जैसी लग रही थी।
ध्यान के बाद रश्मि ने पुस्तक के पास रखे कागज़ पर लिखा—
“कल सुबह नीचे वाले डेरे के लिए ऊँची जगह तैयार करनी है।”
अब्दुल ने उसके नीचे जोड़ दिया—
“और नाले पर चेतावनी का निशान लगाना है।”
फिर दोनों ने ऊपर देखा।
टूटी हुई छत से आकाश अब भी दिखाई दे रहा था। उसी के नीचे बुज़ुर्ग सो रहे थे, भीगे कपड़े सूख रहे थे और अगले दिन के काम की सूची पुस्तक के पहले पन्ने में रखी जा चुकी थी।
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