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सोमवार, 31 अगस्त 2026

पृथु-मही के ऊपर उड़ती तश्तरी?!

पृथु-मही के ऊपर उड़ती तश्तरी सन 2100 ईस्वी।
अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसी दिखाई देने वाली एक नई दुनिया चमक रही थी। वहाँ के निवासियों ने उसका नाम “पृथु-मही” रखा था। उसके नीले वातावरण के ऊपर एक उड़नतश्तरी शांत गति से चक्कर लगा रही थी। तश्तरी के पारदर्शी कक्ष में दो त्रिनेत्री यात्री बैठे थे—वृद्ध सनड्रेक्सन और उसकी शिष्या अनंता। उनके तीन नेत्र केवल शारीरिक अंग नहीं थे। पहला नेत्र दृश्य जगत को, दूसरा इतिहास को और तीसरा किसी निर्णय के दूरगामी परिणाम को देखने का प्रतीक था। अनंता ने नीचे फैली बस्तियों को देखते हुए पूछा— “क्या यह सच है कि पृथ्वी को संकट में डालने वाले कुछ शक्तिशाली लोग ही सन 2027 तक दूसरी दुनिया में बसने की योजनाएँ बनाने लगे थे?” सनड्रेक्सन ने उत्तर दिया— “अंतरिक्ष में बसने की वैज्ञानिक योजनाएँ वास्तव में बनने लगी थीं, लेकिन उस समय ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ के नाम से अनेक राजनीतिक आशंकाएँ और विवादित धारणाएँ भी फैली हुई थीं। राजीव दीक्षित, देवेंद्र बल्हारा और अनेक व्यवस्था-विरोधी चिंतकों के विचारों को लोग अपने-अपने ढंग से समझते थे। कुछ इसे वैश्विक केंद्रीकरण की चेतावनी मानते थे, जबकि कुछ इसे अप्रमाणित षड्यंत्र-कथा कहते थे।” उसने सामने का विशाल इतिहास-पटल खोल दिया। उस पर इक्कीसवीं शताब्दी की पृथ्वी दिखाई देने लगी—ऊँची इमारतें, विशाल कारखाने, सूखती नदियाँ, जंगलों की कटाई और झुग्गियों में रहते श्रमिक। “समस्या केवल जनसंख्या थी?” अनंता ने पूछा। “नहीं,” वृद्ध बोला, “जनसंख्या दबाव एक वास्तविक चुनौती थी, पर समस्या का पूरा कारण मनुष्यों की संख्या नहीं था। असमान उपभोग, संसाधनों पर कुछ लोगों का नियंत्रण, प्रकृति का अनियंत्रित दोहन और अवसरों का असमान वितरण भी उतने ही बड़े कारण थे।” पटल पर अशोक सर की एक पुरानी सभा उभर आई। वे लोगों से कह रहे थे— “यदि जनसंख्या सात गुनी भी हो जाए, तब भी मनुष्य बुद्धि, श्रम, विज्ञान और न्यायपूर्ण वितरण से अनेक कठिनाइयाँ संभाल सकता है। मगर इसके लिए हर व्यक्ति और हर परिवार को व्यवस्था का सक्रिय भाग बनाना होगा। किसी को केवल उपभोक्ता, वोट या सस्ता मजदूर समझना बंद करना होगा।” सभा में बैठे एक युवक ने पूछा— “लेकिन प्रत्येक परिवार को सिस्टम से जोड़ने का मतलब क्या है?” अशोक सर ने समझाया— “इसका अर्थ है—हर परिवार को शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, आजीविका और निर्णय-प्रक्रिया तक वास्तविक पहुँच। श्रम करने वाले को सम्मान और उत्पादन में उचित भागीदारी मिले। गाँव, वार्ड और नगर केवल आदेश पाने वाली इकाइयाँ न रहें; वे अपने संसाधनों और आवश्यकताओं पर जिम्मेदारी से निर्णय भी लें।” एक महिला मजदूर खड़ी हुई— “फिर पूँजी का क्या होगा?” अशोक सर मुस्कराए— “पूँजी स्वयं शत्रु नहीं है। वह संगृहीत श्रम और साधन है। समस्या तब होती है, जब पूँजी मनुष्य और शासन दोनों की मालिक बन जाए। इसी तरह सत्ता व्यवस्था के लिए आवश्यक हो सकती है, लेकिन सत्तावाद तब जन्म लेता है जब प्रश्न पूछना अपराध बना दिया जाए।” उन्होंने भूमि पर छह वृत्त बनाए और उनमें लिखा— पूँजीवाद का एकाधिकार, सामंतवाद, सत्तावाद, जातिवाद, जन्मजात उच्चता और जन्मजात हीनता। फिर बोले— “ये अलग-अलग दिखाई देते हैं, पर इनकी जड़ एक ही है—कुछ मनुष्यों को जन्म, धन या पद के कारण अधिक मनुष्य और दूसरों को कम मनुष्य मान लेना।” दृश्य बदल गया। सन 2031 तक बेरोजगारी, महँगाई, पर्यावरणीय संकट और असमानता के विरुद्ध अनेक स्थानों पर जन-आंदोलन होने लगे थे। उनमें शांतिपूर्ण सभाएँ भी थीं और कुछ जगह क्रोध से उपजी अव्यवस्था भी। शासन ने कई वास्तविक शिकायतों को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या समझा। कहीं संवाद हुआ, कहीं दमन। अशोक सर हर सभा में सावधान करते— “क्रांति का अर्थ हिंसा नहीं है। हिंसा अक्सर पुरानी सत्ता की जगह नई कठोर सत्ता बैठा देती है। वास्तविक क्रांति मनुष्य, संस्थाओं और संसाधनों के संबंध बदलती है। आंदोलन अनुशासित, तथ्यपूर्ण और मानवीय होगा, तभी वह न्यायपूर्ण व्यवस्था बना पाएगा।” उनकी पुस्तक “क्रांति क्यों? कैसे?” में भी यही प्रश्न उठाया गया था— व्यवस्था क्यों बदलनी चाहिए और परिवर्तन के बाद उसके स्थान पर क्या स्थापित होगा? पुस्तक में लिखा था कि केवल विरोध पर्याप्त नहीं। यदि आंदोलन के पास पारदर्शी प्रशासन, समान अवसर, विकेंद्रीकरण, पर्यावरण-संरक्षण और उत्तरदायी नागरिकता की स्पष्ट रूपरेखा नहीं होगी, तो क्रांति केवल सत्ता के चेहरे बदल देगी। सन 2036 आते-आते पुस्तक विश्वविद्यालयों, श्रमिक सभाओं, ग्राम परिषदों और युवा समूहों में चर्चा का विषय बन चुकी थी। किसी ने उसे क्रांतिकारी ग्रंथ कहा, किसी ने आदर्शवादी कल्पना और किसी ने व्यवस्था के लिए चुनौती। पर उसके प्रश्नों को अनसुना करना कठिन हो गया था। उसी वर्ष एक विशाल जनसभा में अशोक सर ने कहा— “मुट्ठी भर शक्तिशाली लोगों को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। अन्यायपूर्ण व्यवस्था इसलिए भी टिकती है क्योंकि बहुत से लोग सुविधा, भय, जाति और निजी लाभ के कारण मौन रहते हैं। परिवर्तन ऊपर बैठे लोगों से ही नहीं, नीचे खड़े नागरिकों के चरित्र से भी शुरू होगा।” पृथु-मही के ऊपर उड़ती तश्तरी में इतिहास-पटल बंद हो गया। अनंता कुछ देर मौन रही। फिर बोली— “तो पृथ्वी की लड़ाई जनसंख्या और संसाधनों के बीच नहीं, बल्कि स्वार्थपूर्ण अधिकार और जिम्मेदार सहभागिता के बीच थी?” सनड्रेक्सन ने उत्तर दिया— “हाँ। पृथ्वी पर सबके लिए पर्याप्त संभावनाएँ थीं, पर असीम लालच के लिए कोई पृथ्वी पर्याप्त नहीं थी।” “और तीसरे नेत्र का वास्तविक अर्थ?” वृद्ध ने नीचे पृथु-मही की बस्तियों की ओर संकेत किया— “पहले नेत्र से मनुष्य समस्या देखता है। दूसरे से उसका इतिहास समझता है। लेकिन तीसरा नेत्र तब खुलता है, जब वह अपने निर्णय का भविष्य भी देखने लगता है।” अनंता ने देखा—पृथु-मही पर प्रत्येक बस्ती के बीच खेत, जलाशय, विद्यालय, वन और सामुदायिक सभागृह थे। वहाँ कोई काम छोटा नहीं माना जाता था और जन्म के आधार पर किसी की प्रतिष्ठा निर्धारित नहीं होती थी। वृद्ध ने अंतिम बात कही— “नई धरती खोज लेना मनुष्यता की विजय नहीं है। विजय तब है जब मनुष्य पुरानी धरती को नष्ट करने वाली अपनी प्रवृत्तियों को नई धरती पर न ले जाए। अन्यथा ग्रह बदल जाएगा, पर इतिहास नहीं।” उड़नतश्तरी आगे बढ़ गई। पीछे पृथु-मही चमक रही थी—एक दूसरी पृथ्वी के रूप में नहीं, बल्कि पृथ्वी की भूलों से सीखे गए एक नए सामाजिक संकल्प के रूप में।

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