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सोमवार, 31 अगस्त 2026

समुद्र के ऊपर उड़ता इतिहास?!

समुद्र के ऊपर उड़ता इतिहास अब सन 2147 था।
एक चमकीली उड़नतश्तरी उस स्थान के ऊपर उड़ रही थी जहाँ कभी मुंबई का विशाल महानगर था। नीचे समुद्र का अथाह विस्तार था। कहीं-कहीं पुरानी ऊँची इमारतों के अवशेष जल से बाहर झाँक रहे थे। शेष नगर समुद्र, गाद और नई समुद्री वनस्पतियों के नीचे छिप चुका था। उड़नतश्तरी के भीतर तीन नेत्रों वाला वृद्ध इतिहासवेत्ता सजाकदक्फक्फ बैठा था। उसके सामने तीन नेत्रधारी युवती तिराश्मिका पृथु महि के पुराने अभिलेख पढ़ रही थी। उसने पूछा— “क्या अशोक सर ने सन 1990 में ही मुंबई के डूबने का सपना देखा था?” वृद्ध ने उत्तर दिया— “उनकी कुछ पुस्तकों में ऐसे स्वप्न और आशंकाओं का उल्लेख मिलता है। लेकिन स्वप्न वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होता। उसे भविष्य की निश्चित घोषणा के बजाय किसी संवेदनशील मन की चेतावनी समझना अधिक उचित है।” “फिर उन्होंने सन 2100 से पहले मुंबई के डूबने की बात क्यों कही?” “क्योंकि वे समुद्र के बढ़ते स्तर, तटीय अतिक्रमण, जलवायु परिवर्तन और मनुष्य की विकास-दृष्टि को लेकर चिंतित थे। उनकी भाषा भविष्यवाणी जैसी थी, पर उसके भीतर एक प्रश्न छिपा था—क्या मनुष्य प्रकृति को जीतने के भ्रम में अपने ही नगरों को असुरक्षित कर रहा है?” तिराश्मिका ने अगला अभिलेख खोला। उसमें एक छोटा-सा कमरा दिखाई दिया। चारों ओर पांडुलिपियों के ढेर रखे थे और अशोक सर बेचैनी से उन्हें सँभाल रहे थे। “उन्हें सन 2023 तक समाज से काफी उम्मीदें थीं,” वृद्ध ने बताया, “लेकिन जब लोगों ने विचारों की अपेक्षा प्रचार और मनोरंजन को अधिक महत्व दिया, तो वे निराश हुए। वे गुप्त रूप से लिखते रहे। उनकी बेचैनी यह थी कि देहांत से पहले अधिक से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो जाएँ।” “क्या वे अपना नाम बचाना चाहते थे?” “शायद नाम से अधिक प्रश्नों को बचाना चाहते थे। लेखक जानता है कि उसका शरीर समाप्त होगा, पर लिखे हुए प्रश्न दूसरी पीढ़ी के विवेक को जगा सकते हैं।” समुद्र के नीचे सात द्वीप सजाकदक्फक्फ ने एक उपकरण सक्रिय किया। समुद्र के नीचे छिपी धरती का त्रिआयामी मानचित्र सामने आ गया। सात अलग-अलग भूभाग चमक उठे— माहिम, वर्ली, परेल, मझगांव, बॉम्बे द्वीप, कुलाबा और लिटिल कुलाबा। तिराश्मिका आश्चर्य से बोली— “तो मुंबई वास्तव में सात द्वीपों का समूह थी?” “हाँ। भूमि-पुनर्निर्माण, बाँधों और कॉज़वे द्वारा इन्हें धीरे-धीरे जोड़कर एक महानगर बनाया गया। यह मनुष्य के निर्माण-कौशल का उदाहरण था, लेकिन साथ ही समुद्र के स्वाभाविक क्षेत्र में बड़े हस्तक्षेप की कहानी भी।” “यदि इन्हें कभी जोड़ा ही न गया होता तो?” वृद्ध ने एक काल्पनिक दृश्य उत्पन्न किया। सातों द्वीपों पर अलग-अलग छोटी बस्तियाँ थीं। उनके बीच जल-बसें और नौकाएँ चल रही थीं। मैंग्रोव की चौड़ी पट्टियाँ तूफानी लहरों को कमजोर कर रही थीं। हर द्वीप की आबादी और भवनों की ऊँचाई सीमित थी। वृद्ध बोला— “तब जीवन संभवतः ऐसा होता— द्वीपों के बीच नावें, जलमार्ग और सीमित पुल प्रमुख साधन होते। भूमि कम होने के कारण जनसंख्या और उद्योगों पर नियंत्रण आवश्यक होता। बंदरगाहों का विकास अलग ढंग से होता। मैंग्रोव और ज्वारीय क्षेत्र अधिक सुरक्षित रह सकते थे। आवागमन कठिन और महँगा भी हो सकता था। तूफानों के समय प्रत्येक द्वीप के लिए स्वतंत्र सुरक्षा-व्यवस्था चाहिए होती।” “तो क्या सात द्वीपों वाला मुंबई पूरी तरह सुरक्षित रहता?” “नहीं। प्रकृति में पूर्ण सुरक्षा नहीं होती। लेकिन यदि विकास समुद्र के स्वभाव को समझकर किया जाता, तो नुकसान कम किया जा सकता था। समस्या केवल द्वीपों को जोड़ना नहीं थी; समस्या यह थी कि बाद की पीढ़ियों ने निर्माण की सीमा पहचानना छोड़ दिया।” मूर्तियों से प्रश्न करती नई पीढ़ी उधर पृथु महि पर बचे हुए लोग किलों, खंडहरों, गुफाओं और जंगलों के दुर्गम क्षेत्रों में छोटी-छोटी बस्तियाँ बना चुके थे। जिन स्थानों को पुरानी सभ्यता पिछड़ेपन का प्रतीक मानती थी, वही अब आश्रय बने हुए थे। एक पुराने किले में बच्चों का समूह अतीत की मूर्तियाँ देख रहा था। किसी मूर्ति के हाथ में तलवार थी, किसी के सिर पर मुकुट और किसी के नीचे लिखा था—“महान विकास-पुरुष।” एक किशोर हँसते हुए बोला— “इन लोगों ने अपनी इतनी विशाल मूर्तियाँ बनवाईं, लेकिन नदियों और जंगलों को क्यों नहीं बचाया?” दूसरी बालिका ने कहा— “जिन्होंने पृथ्वी को संकट में डाला, उन्हें महान क्यों कहा गया?” पास बैठे बुजुर्ग राज ने दोनों को रोक दिया। “मूर्तियों का उपहास करके तुम अतीत की भूल नहीं सुधार सकते। पत्थर न दोषी है, न महान। प्रश्न उन विचारों और कर्मों का है जिनका वह प्रतीक बनाया गया।” “तो हम अतीत के मनुष्य को दोष न दें?” बालिका ने पूछा। राज ने कहा— “उससे प्रश्न अवश्य करो, पर याद रखो—उस समय भी चेतावनी देने वाले लोग मौजूद थे। वैज्ञानिक, पर्यावरणविद्, किसान, आदिवासी, लेखक और साधक लगातार कहते रहे कि प्रकृति साधन मात्र नहीं है। गलती पूरी प्रजाति की नहीं, उस सामूहिक चुनाव की थी जिसमें सुविधा को उत्तरदायित्व से ऊपर रखा गया।” एक बच्चे ने पूछा— “क्या राक्षस कलि ने सबको नियंत्रित कर लिया था?” राज मुस्कराया— “राक्षस कलि मनुष्य के बाहर बैठा कोई राजा नहीं था। वह भीतर की वह अवस्था थी जिसमें सत्य मालूम होने के बाद भी मनुष्य सुविधा के कारण गलत व्यवस्था का साथ देता है। जब लोभ सामूहिक हो जाए तो वह व्यवस्था बन जाता है; जब करुणा सामूहिक हो जाए तो वही नई सभ्यता बन सकती है।” तीसरे नेत्र का वास्तविक अर्थ उड़नतश्तरी में तिराश्मिका ने अपना तीसरा नेत्र बंद किया और पूछा— “क्या हम तीन नेत्रधारी इसलिए बच गए क्योंकि हमारी जाति अधिक विकसित थी?” सजाकदक्फक्फ ने कहा— “तीसरा नेत्र शरीर का अतिरिक्त अंग मात्र नहीं। उसका वास्तविक अर्थ दूरदृष्टि है—कर्म के तत्काल लाभ के साथ उसके दूरगामी परिणाम देखना। पृथु महि के पुराने मनुष्यों के दो नेत्र खुले थे, पर दूरदृष्टि अक्सर बंद थी।” नीचे समुद्र की लहरें उन सात द्वीपों की पुरानी सीमाओं पर घूम रही थीं। ऐसा लगता था जैसे प्रकृति मनुष्य द्वारा मिटाया गया अपना मानचित्र फिर बना रही हो। वृद्ध ने अंतिम अभिलेख खोला। उसमें अशोक सर की आवाज सुनाई दी— “शून्य होना मिट जाना नहीं है। शून्य होना अपने अहंकार, लोभ और पूर्वाग्रह को कुछ समय शांत करना है। इसी शून्य में मनुष्य को पृथ्वी की आवाज सुनाई दे सकती है।” तिराश्मिका ने पूछा— “क्या पृथु महि का मनुष्य असफल हो गया था?” सजाकदक्फक्फ ने किले और जंगलों में बसते नए समुदायों की ओर देखा। “पूरी तरह नहीं। जब तक कोई बच्चा अतीत से प्रश्न करता है, कोई मनुष्य वृक्ष लगाता है, कोई समुदाय जल बचाता है और कोई साधक अपने भीतर के कलि को पहचानता है—तब तक सुधार की संभावना जीवित रहती है।” उड़नतश्तरी समुद्र से ऊपर उठने लगी। नीचे डूबी मुंबई थी, दूर सुरक्षित खंडहरों में नई बस्तियाँ थीं और उनके बीच इतिहास का एक गंभीर संदेश गूँज रहा था— सभ्यता मूर्तियों, इमारतों और बाजारों से महान नहीं बनती। वह इस बात से महान बनती है कि उसके बीच सबसे कमजोर मनुष्य, जीव-जंतु, नदी, जंगल और आने वाली पीढ़ी कितनी सुरक्षित है। और शायद सात द्वीप भी यही कह रहे थे— “मनुष्य ने हमें जोड़कर एक नगर बनाया, लेकिन स्वयं विभाजित रहा। नई सभ्यता तभी बचेगी, जब वह धरती को जीतने के बजाय उसके साथ जीना सीखेगी।”

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