सोमवार, 28 सितंबर 2026
महाभारत अभी बाकी है?!
अभी महाभारत बाकी है…
सन 2075 ईस्वी।
कभी संसद भवन कहलाने वाली एक विशाल इमारत अब “मानवता अध्ययन केंद्र” में बदल चुकी थी। उसके पुराने गलियारों में अनेक राजनीतिक दलों के फटे हुए झंडे काँच के बक्सों में रखे थे। झंडों के रंग अलग-अलग थे, पर समय की धूल ने लगभग सभी को एक ही रंग का बना दिया था।
उस दिन विद्यार्थियों का एक समूह इतिहास के अध्यापक अनुराग के साथ वहाँ पहुँचा। सबसे बड़े कक्ष के मध्य महाभारतकालीन राजसभा का चित्र लगा था। चित्र में द्रौपदी न्याय की पुकार कर रही थीं और सभा के अधिकांश लोग मौन बैठे थे।
एक विद्यार्थी ने पूछा—
“सर, उस सभा में धर्म किसके साथ था?”
अनुराग ने उत्तर देने से पहले चित्र को देर तक देखा।
“धर्म किसी सिंहासन, सेना अथवा राजवंश की निजी संपत्ति नहीं था। उस समय धर्म की वाणी वेदव्यास के चिंतन में थी, विदुर की नीति में थी और विकर्ण जैसे उस कौरव के साहस में थी, जिसने द्रौपदी के अपमान का विरोध किया था। लेकिन देखो विडम्बना—जिनके पास धर्म की दृष्टि थी, उनके पास राज्य की निर्णायक शक्ति नहीं थी; और जिनके हाथ में राज्य था, उन्होंने धर्म की आवाज को अनसुना कर दिया।”
एक छात्रा बोली—
“लेकिन पांडव तो धर्म के पक्ष में थे?”
“पांडव धर्म के निकट अवश्य दिखाई देते हैं,” अनुराग ने कहा, “पर वे भी राजनीति और राज्य के प्रश्न से अलग नहीं थे। उन्हें भी अपना अधिकार और राज्य चाहिए था। युधिष्ठिर पांडवों में ज्येष्ठ और राज्य के उत्तराधिकारी थे, जबकि अभिमन्यु अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र थे। उधर दुर्योधन धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र था और उसका पुत्र लक्ष्मण कुमार भी था, जो युद्ध में मारा गया। इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि दुर्योधन का राजकुमार गायब था। हाँ, इतिहास की लोकप्रिय कथा में उसका उल्लेख अभिमन्यु जितना प्रमुख नहीं हुआ।”
दूसरे विद्यार्थी ने पूछा—
“फिर उस समय राजा कौन था?”
“हस्तिनापुर के सिंहासन पर धृतराष्ट्र थे। पांडु का निधन हो चुका था। इसलिए विवाद केवल दो भाइयों के पुत्रों का नहीं था; वह उत्तराधिकार, सत्ता, न्याय और अहंकार—सभी का संघर्ष था।”
अध्यापक विद्यार्थियों को अगले कक्ष में ले गए। वहाँ एक तराजू रखा था। उसके एक पलड़े पर मुकुट, सेना, राजकोष और शस्त्रों की प्रतिकृतियाँ थीं। दूसरे पलड़े पर कृष्ण की छोटी-सी मूर्ति थी।
अनुराग बोले—
“सभी राजकीय संसाधन प्रारम्भ में कौरव सत्ता के पास थे। पांडवों के पास सीमित शक्ति थी, लेकिन उनके साथ कृष्ण की नीति, दृष्टि और मार्गदर्शन था। फिर भी यह समझना उचित नहीं कि कृष्ण केवल एक रिश्तेदार होने के कारण पांडवों के पक्ष में खड़े हुए। वे अर्जुन के सखा और सुभद्रा के भाई अवश्य थे, पर उनका वास्तविक संबंध उस पक्ष से था जहाँ उन्हें धर्म-स्थापना की सम्भावना दिखाई दी।”
“तो क्या वेदव्यास और विदुर भी पांडवों के राजनीतिक साथी थे?” एक विद्यार्थी ने पूछा।
“वे पांडवों के अंधसमर्थक नहीं थे,” अनुराग ने समझाया। “वे सत्य, नीति और वंश की रक्षा चाहते थे। उन्होंने कौरवों को भी समझाया और पांडवों को भी दिशा दी। उनका संबंध किसी दल से कम और धर्म से अधिक था। यही कारण है कि सत्ता की राजनीति में उनकी आवाज सम्मानित तो थी, पर हमेशा स्वीकार नहीं की गई।”
वे तीसरे कक्ष में पहुँचे। वहाँ आज के लोकतंत्र का एक विशाल चित्र था—अनेक दल, अनेक चुनाव-चिह्न और असंख्य झंडे।
चित्र के नीचे लिखा था—
“संख्या में अनेक, व्यवस्था में एक सौ पाँच?”
एक छात्र मुस्कराया—
“इसका क्या अर्थ है?”
अनुराग बोले—
“महाभारत में पाँच पांडव और सौ कौरव मिलकर एक सौ पाँच भाई कहे जाते थे। उनके बीच संघर्ष था, फिर भी वे एक ही राजवंश और सत्ता-संरचना के अंग थे। आज दल अनेक हैं, पर यदि वे जनता के सामने लड़ते हुए भी सत्ता के बंद कमरों में एक ही व्यवस्था, एक ही स्वार्थ और एक ही सुविधाओं की रक्षा करने लगें, तो प्रतीकात्मक रूप से वे फिर ‘एक सौ पाँच’ हो जाते हैं।”
एक छात्रा ने पूछा—
“लेकिन आज कृष्ण कहाँ हैं?”
अनुराग कुछ क्षण मौन रहे।
“आज की सबसे बड़ी उलझन यही है। हम कृष्ण को किसी एक व्यक्ति, नेता अथवा अवतार के रूप में खोज रहे हैं। संभव है आज का कृष्ण एक व्यक्ति न होकर जाग्रत विवेक हो। वह किसी किसान की सत्यनिष्ठा में, किसी शिक्षक के साहस में, किसी वैज्ञानिक की जिम्मेदारी में, किसी विदुर की निर्भीक सलाह में और किसी विकर्ण के विरोध में प्रकट हो। लेकिन हम उसे तभी पहचानेंगे, जब वह हमारे दल, जाति और निजी स्वार्थ से बाहर खड़ा दिखाई देने पर भी हमें स्वीकार्य हो।”
अगले कक्ष में बच्चों के चित्र लगे थे। किसी बच्चे के हाथ में मोबाइल था, किसी के सामने नशीला पदार्थ, कहीं प्रदूषित नदी थी, कहीं बेरोजगार युवकों की पंक्ति। एक चित्र में भोजन की थाली पर लिखा था—“मिलावट”; दूसरे में धरती मास्क लगाए खड़ी थी।
सबसे नीचे भारत तिवारी नामक एक युवक की तस्वीर के साथ प्रश्न लिखा था—
“जब भविष्य मारा जाता है, तब व्यवस्था किसके साथ खड़ी होती है?”
अनुराग बोले—
“महाभारत के अन्त में अश्वत्थामा ने सोते हुए उपपांडवों—द्रौपदी के पाँच पुत्रों—की हत्या कर दी थी। वह समाचार सुनकर मृत्युशय्या पर पड़े दुर्योधन ने भी उस कृत्य को गौरवपूर्ण विजय नहीं माना। लेकिन आज हमारा भविष्य धीरे-धीरे मारा जा रहा है—नशे, हिंसा, मिलावट, प्रदूषण, बेरोजगारी, डिजिटल लत, प्रकृति-विनाश और अनैतिक तकनीकी प्रयोगों से। प्रश्न यह है कि इस सामूहिक बाल-वध पर कौन दुःखी है?”
“क्या AI भी अश्वत्थामा है?” एक बच्चे ने पूछा।
“तकनीक स्वयं अश्वत्थामा नहीं होती,” अध्यापक ने कहा। “उसे किस उद्देश्य से प्रयोग किया जाता है, यह निर्णायक है। वही AI ज्ञान दे सकती है और वही भ्रम, बेरोजगारी, निगरानी तथा छल का साधन भी बन सकती है। शस्त्र से अधिक महत्त्व उस चेतना का है, जिसके हाथ में शस्त्र है।”
अन्तिम कक्ष अँधेरा था। उसके मध्य एक खाली आसन रखा था। ऊपर लिखा था—
“कल्कि की प्रतीक्षा।”
एक विद्यार्थी बोला—
“क्या इस आसन पर भविष्य में कल्कि बैठेंगे?”
अनुराग ने कहा—
“यदि हम कल्कि की प्रतीक्षा करते हुए अपने वर्तमान कर्तव्यों से भाग रहे हैं, तो यह आसन आशा का नहीं, निष्क्रियता का प्रतीक है। जब सब कुछ कलि के प्रभाव में हो, तब कल्कि की प्रतीक्षा का अर्थ हाथ पर हाथ रखकर बैठना नहीं हो सकता। उसका अर्थ अपने भीतर कलि—लोभ, झूठ, हिंसा, घृणा और अन्याय—के विरुद्ध संघर्ष शुरू करना है।”
दीवार पर कंस की जेल का चित्र उभरा। देवकी और वसुदेव बंदी थे और नवजात कृष्ण को टोकरी में रखकर यमुना पार ले जाया जा रहा था।
एक छात्र ने कहा—
“कंस ने देवकी और वसुदेव को एक ही कारागार में रखकर कृष्ण के जन्म का अवसर क्यों दिया? वह उन्हें अलग भी तो कर सकता था!”
अनुराग मुस्कराए—
“यही कथा का गहरा संकेत है। अत्याचारी व्यवस्था स्वयं को सर्वज्ञ और अजेय समझती है, लेकिन उसकी अपनी भूलों, अहंकार और नियंत्रण की सीमाओं के भीतर परिवर्तन का बीज जन्म ले लेता है। कंस भविष्यवाणी से भयभीत था, पर वह चेतना के जन्म को रोक नहीं सका। यह रहस्य केवल जैविक जन्म का नहीं—आशा, प्रतिरोध और नई चेतना के जन्म का भी है।”
“तो क्या कल्कि का जन्म भी किसी जेल में होगा?”
“यह कोई निश्चित रूप से नहीं कह सकता,” अनुराग ने उत्तर दिया। “लेकिन जब भी अन्याय अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, उसके भीतर ही प्रतिरोध की सम्भावना जन्म लेने लगती है। संभव है कि जिस व्यवस्था को लगता हो कि उसने भविष्य को कैद कर लिया है, उसी के भीतर से भविष्य का कृष्ण या कल्कि प्रकट हो जाए।”
वे सभी बाहर निकलने लगे। द्वार के पास एक पुरानी छड़ी रखी थी, जिस पर लिखा था—
“धर्मदंड।”
विद्यार्थियों ने पूछा—
“इसे उठाएगा कौन?”
अनुराग बोले—
“पहले धर्मदंड राजा को उसकी मर्यादा याद दिलाता था। आज राजा किसी एक व्यक्ति में नहीं है—राज्य संस्थाओं, दलों, बाजार, मीडिया, तकनीक और नागरिकों में बँटा हुआ है। इसलिए धर्मदंड भी किसी एक गुरु या पुरोहित के हाथ में नहीं रह सकता। वह जागरूक जनमत, निष्पक्ष न्याय, सत्य बोलने वाले नागरिक और उत्तरदायी संस्थाओं के सामूहिक हाथ में होना चाहिए।”
तभी एक छात्र ने धर्मदंड उठाने की कोशिश की, पर वह बहुत भारी था।
अनुराग ने कहा—
“इसे कोई अकेला नहीं उठा पाएगा।”
सभी बच्चों ने मिलकर उसे उठाया। उसी क्षण कक्ष में प्रकाश फैल गया।
मुख्य द्वार पर अंतिम वाक्य चमक रहा था—
“महाभारत इसलिए अधूरा है क्योंकि धर्म और अधर्म का संघर्ष केवल कुरुक्षेत्र में समाप्त नहीं हुआ। आज का कुरुक्षेत्र हमारे राज्य, समाज, तकनीक, बाजार और मन—सभी के भीतर है। आज कृष्ण को खोजने से पहले हमें अर्जुन बनने की तैयारी करनी होगी, विदुर की बात सुननी होगी और विकर्ण जैसा विरोध करने का साहस जगाना होगा।”
अनुराग ने पीछे मुड़कर झंडों की ओर देखा और धीरे से कहा—
“जब जनता केवल किसी अवतार की प्रतीक्षा करती है, तब कलि का शासन लंबा होता जाता है। लेकिन जब जनता स्वयं सत्य, न्याय और प्रकृति की रक्षा के लिए खड़ी होती है—तभी कृष्ण की वाणी सुनाई देने लगती है।”
और शायद उसी क्षण दूर कहीं किसी नए महाभारत का शंख बज चुका था—
युद्ध के लिए नहीं, मनुष्य की चेतना जगाने के लिए।
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