Powered By Blogger

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

भविष्य अतीत के याद में...?!सन 2075ई 0😭😭😭

समय रहा होगा सन 2075ई 0 का, काफ़ी कुछ बदल गया था सन 2029का जो अब धरती पर था। एक बुजुर्ग के हाथ में एक पुस्तक थी- “क्रांति क्यों? कैसे..?!” जंगल के बीच एक खंडहर जहाँ अनेक बच्चे, बालक बालिकाएँ शस्त्र चलना सीख रहे थे। एक युवती एक तख्त पर बैठी यही पुस्तक पढ़ रही थी। जिसे एक अंधा बुजुर्ग सुन रहा था। तख्त पर एक ओर पुस्तक रखी थी- “लंका में विभीषण?!”
वह पढ़ रही थी…… पुस्तक ::क्रांति क्यों? कैसे? लेखक ::अशोक कुमार वर्मा 'बिंदु ' 😭तत्कालीन कारण!!😭 हर क्रांति के पीछे तत्कालीन कारण होते हैँ। कोई क्रांति रही हो, उसके तत्कालीन कारण थे, तत्कालीन कारण होंगे। हर काल खंड, पल का अपना विशेष कुछ अहम होता है। सन 2011-2025 ई0 का अपना एक महत्व था -संक्रमण काल के रूप में, वह भी एक दिव्य अवसर भी था. उसमें भी अनंत की ओर जाने की अनंत सम्भावनाएं थीं। सन 2011-14 ई 0एक खास उम्मीद बन कर आया था सबके लिए लेकिन सन 2026-29 के आते आते सब बदला है उस उम्मीद का कटोरा भी?! और…….. सन 1945 ई 0में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से सहज मार्ग के माध्यम से मानव शांति व विश्व शांति का आगाज? उसके आलावा हमें जो विश्व शांति के माध्यम से नेता हरकत में दिखाई दे रहे हैं, उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है? उनमें से कौन वास्तव में मानव शांति, मानवता, हर एक जन के हित की बात करना चाहता है जनतंत्र की चर्चा के बाबजूद?! 16वीं सदी से विश्व जिस विकास के चंगुल में फंसा उसमें ब्रिटेन, फ्रांस, रूस की बड़ी भूमिका रही है। मनुष्य की प्रकृति के बाहर जाकर कल्पना नहीं कि जा सकती लेकिन 16 वीं सदी से जो विकास चला उसने मनुष्य को प्रकृति के बाहर ला खड़ा किया। सन 1935 ई0 के आते आते मनुष्यों को जो कानून मिले उसमें कुछ लोगों के षड्यंत्रों का अहसास नजर आने लगा था लेकिन उसकी दिखावी स्वतंत्रता इतनी होशियार व चालाक थी कि भूख प्यास, काम बसनाओं, सिर्फ जीवन यापन में लगी जीवन शैली उसे जान न सकी।मूल निवासी, वन्य समाज, आदिवासी, किसान, पशु पालक, चरवाहों आदि को जिसकी मार झेलनी पड़ी। धरती भर का मनुष्य ही नहीं वरन प्रकृति ,भूमि, विभिन्न संसाधन जो हर एक व्यक्ति के लिए उपलब्ध थे वे मुट्ठी भर कुछ लोगों के पकड़ में आने लगे। ऐसे में एक आम आदमी, एक साधारण परिवार,किसान, पशुपालकों, वन्य समाज, शिल्पकारों, विभिन्न प्रतिभावानों आदि के अवसर पर कुठाराघात हुआ और स्वतंत्रता की बात बेईमानी हो गया। ऐसे में 1926 -45 में ब्रह्मण्ड चेतना कुछ व्यक्तियों के माध्यम से हलचल में आयी लेकिन… दक्षिण पूर्व एशिया…आर्थिक रूप से रूस, चीन, जापान के लिए महत्वपूर्ण था ही ऐसे में 21 अक्टूबर 1943 ई0 को स्थापित आजाद हिंद सरकार की आय का ठिकाना न रहा लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के परिणाम ने सबकुछ बदल दिया। 15 अगस्त 1947 ई0 के सत्ता हस्तांतरण के बाद देश और विश्व में …. “ अब तो लौंडों का जीना दूभर है? “ - एक पतली सी गली में दीवार से सटे खड़े थे।समीप ही एक नाला और कूड़ा का ढेर पड़ा था। और….. हमारा ध्यान गया - उस बालक पर जो कि दबु चमार। खजुहा (फतेहपुर जिला, उत्तर प्रदेश) में स्थित "बावनी इमली" के पेड़ के नीचे अंग्रेजों ने 28 अप्रैल 1858 को 52 क्रांतिकारियों को फांसी दी थी। यह घटना 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुई, जब ठाकुर जोधा सिंह अटैया और उनके 51 साथियों को कर्नल क्रिस्टाइल की सेना ने गिरफ्तार कर एक साथ लटका दिया। शवों को 37 दिनों तक लटकाए रखा गया ताकि दहशत फैलाई जा सके। यह पेड़ आज भी स्मारक के रूप में खड़ा है, हालांकि स्थानीय मान्यता है कि घटना के बाद यह बढ़ना बंद हो गया। वह बालक…..?! उसका नाम …दबु चमार। सर जी कभी कभार दबु चमार का जिक्र करते रहते थे जिसका जिक्र हिंदी साहित्य में मिलता है। औऱ…. जब मैं कक्षा नौ में आया तो पहले दिन सर जी ने पढ़ाया - " पहला चैप्टर क्या है इतिहास में ? " " फ्रांसीसी क्रांति ! " " हां , फ्रांस की क्रांति ! " ग्रीन बोर्ड पर लिखते हुए - पाठ 01,फ्रांस की क्रांति । " क्रांति किसे कहते हैं?क्रांति के क्या कारण हैं? एक मानव के जीवन में क्या क्या समस्याएं होती है? एक इंसान के जिंदा रहते उसके तत्काल में क्या क्या समस्याएं होती हैं? " रक्तहीन क्रांति का क्या मतलब है?" रक्तहीन क्रांति (Bloodless Revolution) का अर्थ है एक ऐसी क्रांति या परिवर्तन, जिसमें हिंसा, रक्तपात या युद्ध के बिना सत्ता, व्यवस्था या समाज में बड़े बदलाव लाए जाते हैं। यह आमतौर पर शांतिपूर्ण तरीकों जैसे प्रदर्शन, बातचीत, असहयोग आंदोलन, या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है।उदाहरण के लिए:भारत में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसक आंदोलन, जैसे नमक सत्याग्रह, को रक्तहीन क्रांति का हिस्सा माना जा सकता है।विश्व इतिहास में, 1989 की मखमली क्रांति (Velvet Revolution) में चेकोस्लोवाकिया में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के माध्यम से कम्युनिस्ट शासन का अंत हुआ, जो एक रक्तहीन क्रांति का उदाहरण है।इस प्रकार, रक्तहीन क्रांति का मतलब है बिना खून-खराबे के समाज या शासन में परिवर्तन लाना। इंग्लैंड की रक्तहीन क्रांति, जिसे "Glorious Revolution" (गौरवपूर्ण क्रांति) भी कहा जाता है, 1688 में हुई एक ऐतिहासिक घटना को संदर्भित करती है। इसका मतलब है कि इस क्रांति में बड़े पैमाने पर हिंसा या रक्तपात नहीं हुआ। इस दौरान इंग्लैंड के राजा जेम्स द्वितीय को सत्ता से हटाया गया, और उनकी जगह उनकी बेटी मैरी द्वितीय और उनके पति विलियम ऑफ ऑरेंज को संयुक्त रूप से राजा-रानी बनाया गया। इस क्रांति को "रक्तहीन" इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें कोई बड़ा युद्ध या हिंसक संघर्ष नहीं हुआ। जेम्स द्वितीय ने बिना ज्यादा प्रतिरोध के सत्ता छोड़ दी और फ्रांस भाग गए।इस क्रांति ने इंग्लैंड में संवैधानिक राजतंत्र को मजबूत किया। बिल ऑफ राइट्स (1689) के माध्यम से संसद की शक्ति बढ़ी, और राजा की शक्तियों को सीमित किया गया।जेम्स द्वितीय एक कैथोलिक राजा थे, और उनके कैथोलिक-समर्थक नीतियों से प्रोटेस्टेंट जनता और संसद में असंतोष था। विलियम और मैरी, जो प्रोटेस्टेंट थे, के सत्ता में आने से प्रोटेस्टेंट धर्म की स्थिति मजबूत हुई।इस क्रांति ने इंग्लैंड में संसदीय लोकतंत्र की नींव रखी और निरंकुश राजतंत्र को कमजोर किया। यह आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणालियों के विकास का एक महत्वपूर्ण कदम था। क्रांति क्या है? क्रांति का अर्थ है किसी समाज, व्यवस्था, या स्थिति में मूलभूत और व्यापक परिवर्तन, जो अक्सर तेजी से और कभी-कभी हिंसक रूप से होता है। यह पुरानी व्यवस्था को उखाड़कर नई व्यवस्था स्थापित करने की प्रक्रिया है, जो सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, या सांस्कृतिक क्षेत्रों में हो सकती है। उदाहरण के लिए, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एक राजनीतिक क्रांति थी, जिसने औपनिवेशिक शासन को समाप्त कर स्वतंत्र भारत की स्थापना की। क्रांति का लक्ष्य आमतौर पर अन्याय, असमानता, या दमन को खत्म करना और बेहतर भविष्य बनाना होता है। क्रांति क्यों आवश्यक है? क्रांति आवश्यक हो सकती है जब मौजूदा व्यवस्था में गहरी खामियां या अन्याय स्थापित हो जाएं, जो सामान्य सुधारों से ठीक न हो सकें। यह निम्नलिखित कारणों से जरूरी हो सकती है: अन्याय का अंत: जब समाज में असमानता, शोषण, या उत्पीड़न चरम पर पहुंच जाता है, जैसे जातिगत भेदभाव, आर्थिक विषमता, या राजनीतिक दमन, तो क्रांति व्यवस्था को बदलने का रास्ता बन सकती है। उदाहरण: भारत की स्वतंत्रता संग्राम एक क्रांति थी जो औपनिवेशिक शासन के खिलाफ थी। प्रगति की मांग: पुरानी व्यवस्थाएं कभी-कभी सामाजिक, आर्थिक, या तकनीकी प्रगति में बाधा बनती हैं। क्रांति नए विचारों और मूल्यों को लागू करने का अवसर देती है। जैसे, औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन और अर्थव्यवस्था को बदल दिया। जागरूकता और सशक्तिकरण: क्रांति जनता में जागरूकता लाती है और उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा देती है। यह सामूहिक शक्ति को उजागर करती है, जैसे फ्रांसीसी क्रांति ने लोकतंत्र के विचार को बढ़ावा दिया। टूटे हुए तंत्र को ठीक करना: जब सरकार या संस्थाएं भ्रष्ट, अक्षम, या जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रहतीं, तो क्रांति एकमात्र रास्ता हो सकता है। उदाहरण: रूसी क्रांति ने जारशाही के दमनकारी शासन को उखाड़ फेंका।हालांकि, क्रांति हमेशा अंतिम उपाय होनी चाहिए, क्योंकि यह अस्थिरता, हिंसा, और अनिश्चितता ला सकती है। सुधार और संवाद पहले आजमाए जाने चाहिए। क्रांति तभी अपरिहार्य होती है, जब व्यवस्था पूरी तरह से जनता की जरूरतों को नजरअंदाज कर दे। वर्तमान में क्या क्रांति की आवश्यकता नहीं है? वर्तमान में किसी भी तरह की हिंसक या उग्र क्रांति की आवश्यकता नहीं है। समाज में परिवर्तन के लिए शांतिपूर्ण, रचनात्मक और सहयोगात्मक दृष्टिकोण अधिक प्रभावी हैं। शिक्षा, तकनीकी नवाचार, और सामाजिक संवाद के माध्यम से बदलाव लाना आज के समय की मांग है। क्रांति की बजाय, सुधार और समावेशी विकास पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन यह सम्भव कहाँ है? आज का सिस्टम इंसान को सबकुछ बना रहा है लेकिन इंसान नहीं।एक टॉपर बालक जरूरी नहीं एक अच्छा इंसान हो? आपका सवाल गहरा और विचारोत्तेजक है। क्रांति के बिना प्रगति की बात करें तो आज का सिस्टम—चाहे वह शिक्षा, तकनीक, या समाज हो—निश्चित रूप से इंसान को कई चीजें दे रहा है: ज्ञान, कौशल, संसाधन, और अवसर। लेकिन यह सिस्टम अक्सर इंसानियत, नैतिकता, और संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर देता है।एक टॉपर बालक का उदाहरण लें। आज की शिक्षा प्रणाली उसे अंक, डिग्री, और नौकरी के लिए तैयार करती है, लेकिन क्या वह उसे सहानुभूति, ईमानदारी, या दूसरों के लिए बलिदान जैसे गुण सिखाती है? जरूरी नहीं। अच्छा इंसान बनने के लिए सिर्फ अकादमिक सफलता काफी नहीं; इसके लिए मूल्यों, संस्कारों, और आत्म-जागरूकता की जरूरत होती है, जो मौजूदा सिस्टम में अक्सर गौण हो जाते हैं।क्रांति की बात करें तो, शायद अब जरूरत ऐसी क्रांति की है जो सिस्टम को इंसान बनाने की दिशा में ले जाए—जहाँ शिक्षा सिर्फ दिमाग न भरे, बल्कि दिल को भी तराशे। आप क्या सोचते हैं, इस सिस्टम को बदलने का पहला कदम क्या हो सकता है? फ्रांस की क्रांति के जो कारण थे, वे क्या आज भी मौजूद नहीं हैं? फ्रांस की क्रांति (1789-1799) के कारण जटिल और बहुआयामी थे, जिनमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक कारक शामिल थे। इन कारणों की आज की दुनिया में मौजूदगी की तुलना करने के लिए हमें पहले उन प्रमुख कारणों को समझना होगा और फिर यह देखना होगा कि क्या वे आज भी प्रासंगिक हैं। नीचे इस प्रश्न का विश्लेषण किया गया है: फ्रांस की क्रांति के प्रमुख कारण सामाजिक असमानता: फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों (एस्टेट्स) में बंटा था। प्रथम वर्ग (पादरी), द्वितीय वर्ग (कुलीन), और तृतीय वर्ग (सामान्य जनता)। तृतीय वर्ग, जो समाज का सबसे बड़ा हिस्सा था, को भारी करों और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता था।आर्थिक संकट: फ्रांस की अर्थव्यवस्था 18वीं शताब्दी के अंत में गंभीर संकट में थी। युद्धों (जैसे अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में सहायता), शाही खर्च, और खराब फसलों के कारण रोटी की कीमतें बढ़ गईं, जिससे जनता में असंतोष बढ़ा। राजनीतिक अक्षमता: लुई सोलहवें की कमजोर और अनिर्णायक शासन शैली ने राजशाही के प्रति अविश्वास को बढ़ाया। इसके अलावा, कोई प्रभावी सुधार नहीं हो रहे थे।प्रबुद्ध विचारों का प्रभाव: रूसो, वॉल्टेयर और मॉन्टेस्क्यू जैसे दार्शनिकों के विचारों ने स्वतंत्रता, समानता और जनता की संप्रभुता जैसे विचारों को प्रोत्साहित किया, जिसने क्रांति को वैचारिक आधार प्रदान किया।करों का बोझ: तृतीय वर्ग पर भारी कर लगाए गए, जबकि प्रथम और द्वितीय वर्ग को करों में छूट थी, जिससे असंतोष बढ़ा। नैतिक और सामाजिक पतन: राजशाही और कुलीन वर्ग की विलासिता और भ्रष्टाचार ने जनता में आक्रोश पैदा किया।क्या ये कारण आज भी मौजूद हैं? आज की दुनिया में इन कारणों की मौजूदगी को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर विश्लेषित किया जा सकता है: सामाजिक असमानता:तब: तृतीय वर्ग को सामाजिक और आर्थिक भेदभाव का सामना करना पड़ता था।अब: आधुनिक समाजों में सामाजिक असमानता अभी भी मौजूद है, खासकर आर्थिक असमानता के रूप में। विश्व बैंक और अन्य स्रोतों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर आय असमानता (जैसे Gini coefficient) और अमीर-गरीब के बीच की खाई बढ़ रही है। हालांकि, फ्रांस जैसे देशों में सामाजिक कल्याण योजनाएं और लोकतांत्रिक व्यवस्था इस असमानता को कम करने का प्रयास करती हैं। फिर भी, जाति, नस्ल, लिंग, और आर्थिक स्थिति के आधार पर असमानता आज भी कई समाजों में देखी जा सकती है। सामाजिक असमानता आज भी मौजूद है, लेकिन इसका स्वरूप और तीव्रता फ्रांस की क्रांति के समय से भिन्न है। आर्थिक संकट:तब: भारी कर्ज, युद्धों में खर्च, और खाद्य संकट ने क्रांति को बढ़ावा दिया।अब: आज कई देश आर्थिक संकटों का सामना करते हैं, जैसे मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, और सार्वजनिक कर्ज। उदाहरण के लिए, हाल के वर्षों में कोविड-19 महामारी और यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई, जिससे खाद्य और ऊर्जा की कीमतें बढ़ीं। हालांकि, आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं पहले की तुलना में अधिक लचीली हैं और केंद्रीय बैंक, अंतरराष्ट्रीय संगठन (जैसे IMF), और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं संकट को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। निष्कर्ष: आर्थिक संकट आज भी मौजूद हैं, लेकिन उनके प्रबंधन के लिए बेहतर तंत्र उपलब्ध हैं। राजनीतिक अक्षमता:तब: लुई सोलहवें की कमजोर शासन शैली और सुधारों की कमी ने क्रांति को बढ़ावा दिया।अब: आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन कई देशों में भ्रष्टाचार, नेतृत्व की अक्षमता, और नीतिगत विफलताएं अभी भी देखी जाती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ देशों में जनता का सरकारों पर भरोसा कम हुआ है, जैसा कि विश्व आर्थिक मंच (WEF) की रिपोर्ट्स में देखा गया है। फिर भी, निरंकुश राजशाही जैसी व्यवस्था अब दुर्लभ है। राजनीतिक अक्षमता आज भी मौजूद है, लेकिन लोकतांत्रिक तंत्र इसे सीमित करते हैं। प्रबुद्ध विचारों का प्रभाव:तब: प्रबुद्ध विचारकों ने स्वतंत्रता और समानता के विचारों को बढ़ावा दिया।अब: आज सूचना क्रांति और सोशल मीडिया ने विचारों के प्रसार को और तेज कर दिया है। मानवाधिकार, सामाजिक न्याय, और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे विचार वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली हैं। हालांकि, गलत सूचना और ध्रुवीकरण भी बढ़ा है, जो सामाजिक अशांति का कारण बन सकता है। वैचारिक क्रांति का प्रभाव आज भी मौजूद है, लेकिन इसका माध्यम और प्रभाव भिन्न है। करों का बोझ:तब: तृतीय वर्ग पर भारी करों ने असंतोष को बढ़ाया।अब: आधुनिक कर प्रणालियां अधिक समावेशी हैं, लेकिन कई देशों में करों की असमानता या उच्च कर दरों के कारण असंतोष देखा जाता है। उदाहरण के लिए, फ्रांस में ही 2018-19 में "येलो वेस्ट" आंदोलन ईंधन करों के विरोध में शुरू हुआ था। करों से संबंधित असंतोष आज भी मौजूद है, लेकिन इसका स्वरूप कम तीव्र है। नैतिक और सामाजिक पतन:तब: राजशाही और कुलीन वर्ग की विलासिता ने जनता में आक्रोश पैदा किया।अब: आज भी कुछ देशों में नेताओं और अभिजात वर्ग की विलासिता या भ्रष्टाचार जनता के असंतोष का कारण बनता है। सोशल मीडिया पर ऐसी घटनाओं का तुरंत खुलासा होने से जनता का गुस्सा तेजी से फैलता है। यह कारक आज भी प्रासंगिक है, लेकिन लोकतांत्रिक जवाबदेही इसे नियंत्रित करती है। फ्रांस की क्रांति के अधिकांश कारण—सामाजिक असमानता, आर्थिक संकट, राजनीतिक अक्षमता, वैचारिक उथल-पुथल, करों का बोझ, और नैतिक पतन—आज भी विभिन्न रूपों में मौजूद हैं। हालांकि, आधुनिक लोकतांत्रिक और आर्थिक व्यवस्थाएं, सामाजिक कल्याण योजनाएं, और वैश्विक सहयोग इन समस्याओं को क्रांतिकारी स्तर तक पहुंचने से रोकते हैं। फ्रांस की क्रांति जैसी परिस्थितियां आज दुर्लभ हैं, क्योंकि आधुनिक समाजों में सुधार और संवाद के लिए संस्थागत तंत्र मौजूद हैं। फिर भी, इन कारकों की उपस्थिति सामाजिक अशांति या आंदोलनों (जैसे येलो वेस्ट या ब्लैक लाइव्स मैटर) को जन्म दे सकती है, जो क्रांति से कम तीव्र लेकिन प्रभावशाली हो सकते हैं। आधुनिक समाजों में सुधार और संवाद के लिए संस्थागत तंत्र मौजूद तो हैं लेकिन भृष्टाचारी,जातिवादी,मजहबी, लोभी -लालची, पक्ष पाती आदि के चलते अनेक लोग पीड़ित होते देखे जाते हैं? हां, यह एक गंभीर मुद्दा है। आधुनिक समाजों में सुधार और संवाद के लिए संस्थागत तंत्र जैसे न्यायपालिका, लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं, और सामाजिक संगठन मौजूद हैं, लेकिन भ्रष्टाचार, जातिवाद, मजहबी कट्टरता, लोभ, और पक्षपात जैसे कारक इन तंत्रों की प्रभावशीलता को कमजोर करते हैं। ये समस्याएं निम्नलिखित तरीकों से लोगों को पीड़ित करती हैं:भ्रष्टाचार: सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों में भ्रष्टाचार के कारण संसाधनों का दुरुपयोग होता है, और जरूरतमंद लोगों तक लाभ नहीं पहुंचता। उदाहरण के लिए, कल्याणकारी योजनाओं का पैसा गलत हाथों में चला जाता है।जातिवाद और मजहबी भेदभाव: सामाजिक और संस्थागत स्तर पर जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव के कारण कई समुदाय अवसरों और न्याय से वंचित रहते हैं। यह सामाजिक तनाव को बढ़ाता है। लोभ और पक्षपात: व्यक्तिगत स्वार्थ और पक्षपात के कारण नीतियां और निर्णय निष्पक्ष नहीं रहते, जिससे आम जनता को नुकसान होता है।समाधान के उपाय:पारदर्शिता और जवाबदेही: संस्थानों में पारदर्शी प्रक्रियाएं और कड़े जवाबदेही तंत्र लागू करना।शिक्षा और जागरूकता: सामाजिक बुराइयों जैसे जातिवाद और मजहबी कट्टरता के खिलाफ जागरूकता फैलाना।कानूनी सुधार: भ्रष्टाचार और पक्षपात को रोकने के लिए कठोर कानून और उनका प्रभावी कार्यान्वयन।सामाजिक भागीदारी: नागरिकों को संस्थागत प्रक्रियाओं में सक्रिय रूप से शामिल करना।इन समस्याओं का समाधान जटिल है, लेकिन निरंतर सामूहिक प्रयासों और सुधारों से समाज में बदलाव संभव है। इन समस्याओं का समाधान जटिल है, लेकिन निरंतर सामूहिक प्रयासों और सुधारों से समाज में बदलाव संभव है? देश की आजादी का मतलब क्या होना चाहिए था?सन 1947 ई0 में इसके लिए क्या हमारे नेता दोषी नहीं हैं? आधुनिक समाजों में भ्रष्टाचार, जातिवाद, मजहबी कट्टरता, लोभ, और पक्षपात जैसी समस्याएं गहरी जड़ें जमा चुकी हैं, और ये सामाजिक न्याय और समानता के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। इनका समाधान जटिल है, लेकिन असंभव नहीं। निरंतर सामूहिक प्रयास, सुधार, और जागरूकता से बदलाव संभव है। इसके लिए कुछ कदम निम्नलिखित हो सकते हैं:संस्थागत सुधार: पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्थाएं बनाना, जैसे कि कठोर भ्रष्टाचार-रोधी कानून, स्वतंत्र निगरानी संस्थाएं, और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रियाएं। शिक्षा और जागरूकता: शिक्षा के माध्यम से जातिवाद और मजहबी कट्टरता जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता फैलाना। स्कूलों में समावेशी मूल्यों को बढ़ावा देना।सामुदायिक भागीदारी: समाज के सभी वर्गों को संवाद और निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना, ताकि कोई भी समूह हाशिए पर न रहे।नेतृत्व और नीति: नेताओं को नैतिकता और जनहित को प्राथमिकता देनी होगी। नीतियों में समानता और सामाजिक न्याय को केंद्र में रखना जरूरी है।देश की आजादी का मतलब1947 में भारत की आजादी का मतलब सिर्फ औपनिवेशिक शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की स्थापना होना चाहिए था जहां सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक समानता हो। आजादी का अर्थ था:सामाजिक न्याय: जाति, धर्म, और लिंग के आधार पर भेदभाव का अंत।आर्थिक स्वतंत्रता: सभी के लिए अवसरों की समानता और गरीबी का उन्मूलन। सांस्कृतिक एकता: विविधता में एकता को बढ़ावा देना।नेताओं की जिम्मेदारी1947 के समय के नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन कुछ कमियां भी रहीं। जैसे:जाति और धर्म का राजनीतिकरण: कुछ नेताओं ने सामाजिक सुधारों पर ध्यान देने के बजाय, वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा दिया, जिससे जातिवाद और मजहबी विभाजन गहराया।आर्थिक नीतियों में कमी: सामाजिक और आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए ठोस नीतियों का अभाव रहा। भूमि सुधार और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में और अधिक ध्यान देना चाहिए था।संस्थागत कमजोरियां: भ्रष्टाचार और पक्षपात को रोकने के लिए मजबूत संस्थागत ढांचे की स्थापना में देरी हुई।हालांकि, यह कहना कि केवल नेता ही दोषी थे, पूरी तरह उचित नहीं। समाज के हर वर्ग की भी जिम्मेदारी थी कि वह इन समस्याओं के खिलाफ एकजुट हो। आजादी के बाद के वर्षों में सामाजिक सुधारों की गति धीमी रही, लेकिन यह एक सामूहिक चुनौती थी, जिसका समाधान भी सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। कुछ नए सङ्गठन उभरे हैं! देश के अंदर सबकुछ ठीक ही नहीं है। कहीं पर एक असंतुष्टि भी पैदा हो रही है? आजादी का असली मतलब सामाजिक और आर्थिक समानता के साथ एक प्रगतिशील समाज बनाना था। नेताओं की कुछ कमियां रहीं, लेकिन आज की पीढ़ी को उन गलतियों से सीखकर, सुधारों और सामूहिक प्रयासों के जरिए समाज को बेहतर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। 21 अक्टूबर 1943 ई0 के आजाद हिंद सरकार से हम क्या उम्मीद कर सकते थे कि देश की आजादी का मतलब क्या होना चाहिए था?आज के हालातों के लिए सन 1947 ई0 में इसके लिए क्या हमारे नेता दोषी नहीं हैं? 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित आजाद हिंद सरकार का उद्देश्य भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराना और एक स्वतंत्र, समृद्ध, और समावेशी राष्ट्र की स्थापना करना था। इस सरकार की नींव सैन्य संघर्ष और राष्ट्रीय एकता पर आधारित थी, जिसने स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं माना, बल्कि सामाजिक-आर्थिक समानता, सांस्कृतिक गौरव, और आत्मनिर्भरता को भी इसका अभिन्न हिस्सा माना। आजाद हिंद सरकार से हम यह उम्मीद कर सकते थे कि स्वतंत्र भारत में:सामाजिक समानता: जाति, धर्म, और लिंग के आधार पर भेदभाव को खत्म करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते। आजाद हिंद फौज में महिलाओं की रानी झांसी रेजिमेंट इसका उदाहरण थी। आर्थिक आत्मनिर्भरता: औपनिवेशिक शोषण से मुक्त अर्थव्यवस्था, जिसमें स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा और जनता के लिए रोजगार के अवसर हों।राष्ट्रीय एकता: विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्द और एक साझा राष्ट्रीय पहचान का निर्माण।मजबूत शासन: भ्रष्टाचार और विदेशी प्रभाव से मुक्त एक मजबूत, जन-केंद्रित प्रशासन।आजादी का मतलब क्या होना चाहिए था?आजाद हिंद सरकार के दृष्टिकोण से, आजादी का मतलब केवल ब्रिटिश शासन का अंत नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की स्थापना था, जहां हर नागरिक को सम्मान, अवसर, और न्याय मिले। यह एक समतामूलक समाज की स्थापना थी, जिसमें विदेशी शोषण की जगह स्वदेशी विकास और आत्मनिर्भरता हो।1947 के नेताओं की जिम्मेदारी और दोष1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, लेकिन आज के हालात—जैसे सामाजिक असमानता, आर्थिक असंतुलन, भ्रष्टाचार, और सांप्रदायिक तनाव—के लिए उस समय के नेताओं को आंशिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। निम्नलिखित बिंदु इसकी व्याख्या करते हैं: बंटवारे का दुखद परिणाम: नेताओं ने धार्मिक आधार पर देश के विभाजन को स्वीकार किया, जिसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों की जान गई और सांप्रदायिक तनाव आज तक बरकरार है। यह एकता के सिद्धांत के खिलाफ था, जिसे आजाद हिंद सरकार ने प्राथमिकता दी थी।सामाजिक सुधारों की कमी: स्वतंत्रता के बाद सामाजिक सुधारों, जैसे जाति व्यवस्था और लैंगिक असमानता को खत्म करने के लिए पर्याप्त जोर नहीं दिया गया। संविधान ने समानता की बात की, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव धीमा रहा।आर्थिक नीतियों की कमियां: शुरुआती दशकों में मिश्रित अर्थव्यवस्था के नाम पर न तो पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल हुई और न ही सामाजिक कल्याण को प्राथमिकता दी गई। औद्योगीकरण और भूमि सुधार जैसे मुद्दों पर सुस्ती रही।नेतृत्व की दूरदृष्टि का अभाव: कुछ नेताओं ने सत्ता के केंद्रीकरण और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को प्राथमिकता दी, जिससे लंबी अवधि की योजना और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं के समावेशी दृष्टिकोण को लागू करने में कमी रही।हालांकि, यह कहना अनुचित होगा कि नेता पूरी तरह दोषी थे। उन्हें एक जटिल, विविध, और आर्थिक रूप से कमजोर देश को संभालना था। विश्व युद्ध के बाद की वैश्विक परिस्थितियां, संसाधनों की कमी, और आंतरिक मतभेदों ने उनकी चुनौतियों को और बढ़ाया। फिर भी, अगर आजाद हिंद सरकार के आदर्शों को स्वतंत्रता के बाद की नीतियों में अधिक शामिल किया गया होता, तो शायद आज का भारत सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक मजबूत और एकजुट होता।आज के हालातआज भारत में सामाजिक-आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, और सांप्रदायिक तनाव जैसी समस्याएं मौजूद हैं। ये समस्याएं आंशिक रूप से उन नीतियों और निर्णयों का परिणाम हैं, जो 1947 के बाद लिए गए। लेकिन इसके लिए केवल नेताओं को दोष देना उचित नहीं; आज की पीढ़ी और वर्तमान नेतृत्व की भी जिम्मेदारी है कि वे उन आदर्शों को पुनर्जनन करें, जिनके लिए आजाद हिंद सरकार और स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया था।निष्कर्ष: आजाद हिंद सरकार से प्रेरणा लेकर, हमें आजादी को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे सामाजिक न्याय, आर्थिक समृद्धि, और राष्ट्रीय एकता के रूप में देखना चाहिए। 1947 के नेता कुछ हद तक अपनी कमियों के लिए जिम्मेदार हैं, लेकिन आज का भारत हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। एक दिन आप कह रहे थे कि शिक्षा स्वयं क्रांति है, लेकिन जिसे वर्तमान समाज व अभिवावक नहीं नहीं ? "शिक्षा स्वयं क्रांति है" का अर्थ है कि शिक्षा व्यक्ति और समाज को बदलने की शक्ति रखती है। यह न केवल ज्ञान प्रदान करती है, बल्कि सोच, चरित्र और सामाजिक जागरूकता को भी आकार देती है। हालांकि, वर्तमान समाज और कुछ अभिभावकों द्वारा इसे पूरी तरह समझा नहीं जा रहा, क्योंकि:उपयोगितावादी दृष्टिकोण: कई अभिभावक और समाज शिक्षा को केवल नौकरी पाने का साधन मानते हैं, न कि व्यक्तित्व विकास या सामाजिक परिवर्तन का। इससे शिक्षा का गहरा उद्देश्य खो जाता है।पारंपरिक सोच: कुछ लोग शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रखते हैं और रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन या नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाली शिक्षा को महत्व नहीं देते।आर्थिक दबाव: समाज में आर्थिक जरूरतें शिक्षा के क्रांतिकारी पहलू को नजरअंदाज कर देती हैं, क्योंकि लोग तत्काल रोजगार पर ध्यान देते हैं।जागरूकता की कमी: कई अभिभावकों को यह समझ नहीं कि शिक्षा सामाजिक असमानताओं को दूर करने और सशक्तिकरण का साधन हो सकती है।शिक्षा को क्रांति के रूप में देखने के लिए समाज और अभिभावकों को इसके व्यापक प्रभावों—जैसे सामाजिक न्याय, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता—पर ध्यान देना होगा ये कैसे वास्तव में शिक्षा समाज व अभिवावक नहीं चाहता ?! सामान्य रूप से, अगर आप शिक्षा के संदर्भ में बात कर रहे हैं, तो कई बार समाज और अभिभावकों की अपेक्षाएँ पारंपरिक या व्यावहारिक परिणामों (जैसे नौकरी, स्थिरता) पर केंद्रित होती हैं। कुछ कारण हो सकते हैं:पारंपरिक सोच: समाज और अभिभावक अक्सर ऐसी शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं जो तत्काल रोज़गार या सामाजिक प्रतिष्ठा दे, न कि ऐसी शिक्षा जो रचनात्मकता या दीर्घकालिक सोच को बढ़ावा दे।आर्थिक दबाव: अभिभावक चाहते हैं कि शिक्षा बच्चों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाए, इसलिए वे नवाचार या वैकल्पिक शिक्षा मॉडल से हिचक सकते हैं।जागरूकता की कमी: समाज में नई शिक्षण पद्धतियों या सुधारों के बारे में जानकारी का अभाव हो सकता है, जिससे वे पुराने ढांचे को ही स्वीकार करते हैं।सांस्कृतिक रूढ़ियाँ: कुछ समुदायों में शिक्षा के प्रति रूढ़िगत धारणाएँ (जैसे केवल विज्ञान या इंजीनियरिंग को महत्व देना) बदलाव का विरोध करती हैं। 25 जून 2025 ई0 सायंकाल हम मोहिउद्दीनपुर बाजार में उपस्थित थे। हम वहां पिताजी के चचेरे भाई रामशरण के पुत्र रजत के साथ आये हुए थे। कुछ समय हम उससे दूर हो वीडियो बनाने में व्यस्त हो गये थे। इस बीच हमारी ममेरे भाई रवि गंगवार से मुलाकात हुई ही,हमें एक बुजुर्ग व्यक्ति मिल गया जो पीले रंग के कुर्ते पायजामे में था और माथे पर सफेद चंदन में गोल तिलक लगा था। उससे आकर्षण की प्रतिक्रिया में हमने उसे " राम राम " बोल दिया। " हमने आपको पहचाना नहीं? " हम हाथ जोड़े जोड़े ही - " यहाँ रोशन लाल गंगवार ,मैं उनका भांजा हूँ! " " अच्छा ,आप छात्रा देवी बहिन जी के बेटे हो ? " " हां! " "आपने तो इंटगाँव में बारात घर बनवा लिया है? " " मैं अशोक हूँ।वो तो मेरे भाई अवनीश ने बनवाया है। " " आप क्या कर रहे हो ? हां, कोई कह तो रहा था कि आप तिलहर - कटरा में कहीं किसी स्कूल में पढ़ा रहे हो? " " भाई आपके पिता भी न जाने क्या चाहते थे? श्यामाचरण की मौत के बाद उन्हें ददीयूरी या बण्डा में व्यवस्था करनी चाहिए थी?वहां प्राइवेट आप पढ़ा रहे हो बैसे ही यहां कहीं पढ़ाते और सम्पत्त्ति कि भी देख भाल करते ? " " अब क्या हो सकता है? " " सुना है तुम सीधे साधे हो ? तुम्हारे भाई व पिता जी को सम्पत्त्ति की व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए था?अपना अपना तो सब कर लेते हैं लेकिन पितरों की व्यवस्था को यों छिन्न भिन्न नहीं कर देना चाहिए? " "हम तो चाहते रहे, हम तो चाहते थे कि बण्डा में रहकर हम कहीं स्कूल में पढ़ाएं और जमीन जायदाद को भी देखें। हमारी पत्नी यहां रही भीं लेकिन कोई यहाँ यह बर्दाश्त नहीं कर पाये? " " तुम्हारे मामा रोशन लाल मामा कहते थे कि वे तो सब भूत योनि के हैं कोई पितर स्तर का नहीं है। एक गुड्डू था और एक आप? गुड्डू तो चल बसा? तुम भी सावधान रहना। " हमें ददीयूरी में किसी की नियति पर विश्वास नहीं। दुनियाबी अपनापन ही तो खतरा है हमारे अपनेपन के विकास में? " " अभी तो रामशरण देख रहे हैं तुम्हारी जमीन? " "उससे क्या ?उनकी नियति पर भी विश्वास थोड़ी है ?यहां से लेकर बीसलपुर तक सब क्या हैं?हमारे लिए कोई अनुकूल नहीं है। " " जो हुआ सो हुआ। बस, स्वयं ईश्वर के भरोसे व अपने नियति पर बने रहो। " " रजत आ रहा है। " " वास्तव में क्रांति की संभावनाएं हमेशा बनी रही हैं? " "लेकिन वेदव्यास व विदुर की भूमिका क्या रही है? " "हां, समझता हूं? " हमने आगे बढ़कर उनसे दूरी बना ली। हम सोंचने लगे थे आगे बढ़कर … 😢जातिगत सब कुछ चाहिए लेकिन जातिगत आरक्षण नहीं चाहिए!!😢 😢हर गांव /वार्ड में बाहुल्य आबादी का प्रकोप चाहिए लेकिन अल्प आबादी के लोगों की सच्चाई तक नहीं चाहिए? 😢 😢धर्म व भक्ति का मतलब धर्म व भक्ति नहीं वरन अल्पमत -बहुमत का संघर्ष है! 😢 मन में सजती रहीं जातियाँ! जातियों के झुरमुट में सहती बेटियां।। आरक्षण तो बना रे दोषी, मगर कबीरों की किसने जलायीं झोपड़ियां? ज्योतिबा फुले विरोधी वंशज आज कहाँ हैं? देहज और घरेलू अपराधों से सज वो झुरमुट, जातियों के झुरमुट में सहती बेटियां ।। जातिगत आरक्षण नहीं चाहना! अपने जाति में ही ब्याहें मगर बेटियां।। पुरोहित चाहिए अपनी ही जाति का, नहीं मतलब वेद में पुरोहित क्या ? श्री कृष्ण के सदेशों पे न चलना , अपनी जाति के अपराधी सहें बेटियां।। और … भक्ति, प्रेम,धर्म , आस्तिकता क्या है ? मन की गहराई से पैदा हुआ भाव न कि किसी से उम्मीदें रखना? कर्म व ज्ञान भी उसी भाव में रहकर जो हमारे आकाश तत्व में महसूस हो?जहां ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग, भक्ति मार्ग एक में लय?! 👍आओ जाति मजहब, धर्म स्थलों आदि के चक्कर में न पड़ कर कल्कि अभियान में सज्ज हों?! हम जमाने की नजर में कुछ भी हों इससे क्या ?👌 हमें 10 जून 2025 को मैसेज मिला है कि महा परिवर्तन को अब समाज मे सबसे नीचे स्तर के स्त्री पुरुषों या फिर सबसे ऊंचे स्तर के व्यक्तियों को योजना में लाओ। जो समाज, जाति, धर्मस्थलों,वर्तमान सिस्टम की मौज में सिर्फ हैं वे परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर सकते। @@@@@ @@@@@ @@@@ जब हम बण्डा ( शाहजहांपुर) पैत्रक गांव जाना होता तो खेतों व खेतों की हरियाली के बीच सिक्ख परिवारों का मकान बना कर रहना बड़ा अच्छा लगता था। हमारे मन में भी विचार आते थे कि काश आगे चल कर हमारा मकान भी हरियाली के बीच हो? ' हरित नगर ' - उन दिनों हरित क्रांति विद्या मंदिर के आसपास खेत खलिहान व बाग बगीचे ही थे। विद्यालय सटे एक ओर अवश्य चीनी मिल था लेकिन हम सबका उसमें आना जाना जारी रहता था।वह चीनी मिल अब बंद पड़ी थी। शैक्षिक सत्र सन 1984 -85 ई0 था। हर सायंकाल अधिकतर हम दीपक सिंह विष्ट, दिनेश सिंह, रजनीश सिंह, सर्वेश सिंह कुशवाह ,राजेश शर्मा, धर्मेंद्र सक्सेना आदि के साथ रहते थे। हम खेलते तो नहीं थे लेकिन इनके साथ बने रहते थे। क्षेत्र हुआ करता था - बीसलपुर में रामलीला मेला मैदान, पीलीभीत मार्ग पर स्थित चीनी मिल ,बाला जी मढ़ी का मैदान आदि । मनोज गंगवार व उसकी फैमिली हरित क्रांति विद्या मंदिर , हरित नगर ,बीसलपुर में ही निबास कर रही थी। अवकाश के दिन उनके पास भी आना रहता था। पीलीभीत मार्ग पर एक सिक्ख सहपाठी सिन्दर सिंह का आवास व खेत था । उसके साथ हमारी सिक्ख पंथ को लेकर जिज्ञासाएं रहती थीं। एक गुरुद्वारा में किसी सिक्ख के द्वारा किया जाने वाले धार्मिक आचरण व जयघोष व कथन आदि क्या होते है? हम पूछते रहते थे कि अरदास क्या है? पंच प्यारे क्या हैं? लंगर क्या है ?आदि आदि ..?! हम किशोरावस्था से चिंतन मनन, कल्पना, स्वप्न में स्रोता, दृष्टा बन या पढ़कर खोने लगे थे। ऐसे में ' आओ सिक्ख बनें ! ' पर भी हमारा चिंतन चलने लगा था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बरेली में दौरा किया था, और उनका अंतिम दौरा 1938 में दर्ज है। उस समय उन्होंने सरस्वती सेकेंडरी स्कूल में एक सभा की थी, जहाँ उन्होंने कहा था कि देश को आजादी अहिंसा से नहीं, बल्कि क्रांति से मिलेगी। सुभाष नगर, बरेली में कुछ बुजुर्ग अब (198-86) भी बरेली में नेता जी के आने का जिक्र करते थे। इस बीच हनुमान गिरी ..?! हनुमान गिरी के नाम से जो सन्त आगे चल 1945 के बाद बरेली आया था उसे भी लोग नेता जी ही कहते थे। हम देख रहे थे, सुन रहे थे कि समाज, देश, कुल में कुछ ऐसा होता रहता है जिस पर बोलने वाला कोई नहीं होता । ऐसे में प्रतिहिंसा, जबरदस्ती , कठोरता आदि जरूरी हो जाती है। ऐसे में हथियार रखना क्या जरूरी नहीं है? पुलिस, कानून, नेता, अमीर आदमी, अदालत आदि का सहयोग कुछ लोगों को मुश्किल हो जाता है। मजहबी, पत्थर बाज, भीड़ हिंसा ,जातीय मनमानी आदि के चलते कुछ लोग शोषण ,अन्याय आदि के ही शिकार होकर रह जाते हैं?उनको समाधान किधर से मिलता है? अनुभव सक्सेना, मनोज गंगवार, रजनीश सिंह, दिनेश सिंह अब भी हमारे सम्पर्क में थे जो कभी हमारे साथ हरित क्रांति विद्या मंदिर, हरित नगर, मो0दुर्गा प्रसाद ,बीसलपुर में सहपाठी हुआ करते थे। हमें ध्यान आया कि उन दिनों इस विद्यालय के सामने से गुजर कर पीलीभीत मार्ग पर सुबह सुबह टहलने जा रहे थे। एक सन्यासी बोला था कि “ इस स्कूल से देखना कुछ बच्चे निकल कर इतिहास रचेंगे? “ तब उसके साथ चल रहा एक बुजुर्ग सन्यासी बोला कि सम्भवनाएं तो हर ज़र्रे ,हर स्तर से होती हैं अनन्त तक की । डगर में कठनाइयों बीच काफी बड़ी संकल्प शक्ति, साहस व और भी बहुत कुछ चाहिए। हम दौड़ लगाते हुए आगे निकल गये थे। आगे हमें मनोज गंगवार भी मिल गया था।जिसके साथ हम धीमे धीमे चलने लगा।वह एक पैर से कमजोर था। मोहल्ला दुबे में चौसरा मार्ग पर एक फैमिली रहने लगी थी जिसका एक इकलौता एक आठ वर्षीय बालक था। वह रोज तालाब के पास लगने वाले एक ठेले से रोज समोसे खाता था। जब उसके पेट में दर्द उठा और उसे अस्पताल में एडमिट कराया गया तो सात दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो गयी। जांच से पता चला कि उसके पेट भयानक रूप से फेट जमा था। आओ न देखा ताव उसका पिता लाठी लेकर उस समोसे वाले पर टूट पड़ा था।कुछ लोगों ने जिससे समोसे बिक्रेता को बचाया।उसे शुद्ध तेल व खाद्य पदार्थ से समोसे बनाने की सलाह दी गयी। “ क्रांति की सम्भवनाएं कब और कहां नहीं हैं? “- मैं सोंच रहा था। क्रांति कैसी? वह आठ वर्षीय बालक का चाचा था जो पैत्रक सम्पत्त्ति इसे दूर एक आश्रम में रह रहा था।जिससे हिस्से की जमीन जायदाद को हड़पा जा चुका। उसके पिता ने सब सम्पत्त्ति हड़प रखी थी। गुस्से में आकर न जाने क्या क्या सोंचने को विवश हो जाता था लेकिन… “ हमें क्या चाहिए?शांति, मानव शान्ति, समाज शांति, मानवता और फिर तीन कन्याएं हैं उनके प्रति फर्ज निभाएं? “ उसने आश्रम से सटी जमीन तालाब किनारे अपने आवास के लिए कब्जा कर रखी थी। जिसमें उसने झोपड़ी व खपरैल डाल रखा था।उसकी पत्नी व तीनों कन्याएं वहां रखा करती थीं। समाज में उसकी छबि उसके भाई से बेहतर थी। “ हूँ, पहले ज्यादा अपने सोंच से ही परेशान रहता है? “ वह एक प्राइवेट स्कूल में भी काम करता था, जहां वह NC,KGआदि के बच्चों की व्यवस्था देखता था। “ लोगों के बीच तभी जाओ तब लोगों को झेल सको! “ - अचानक उसके मन में विचार आ गया था। वह कुछ दिनों से स्कूल नहीं जा रहा था। परसों हाफ डे के दिन जब पहुंचा भी तो परेशान हो उठा। उसका नाम रामेश्वर शर्मा । @@@@ @@@@ @@@@ अंकित यादव किसी सोंच में था। सामने एक बुजुर्ग को देख कर … “ आपने जयगुरुदेव को पढा है, इसलिए आप कह रहे हैं कि दिल्ली की गद्दी से देश का भला कब हुआ है?राजधानी परिवर्तन से देश का भला होगा? “ “ जब से भारत का इतिहास शुरू होता है, तब से अध्ययन कीजिए। किस काल खंड में किस राजधानी नगर से गौरबशाली स्वर्णमयी विकास हुआ है? प्राचीन काल से स्वर्ण काल कब था ?तब क्या दिल्ली राजधानी थी?राजधानी के रूप में दिल्ली से कब देश का भला हुआ है? “ “स्थान का क्या कोई महत्व नहीं? “ ' महाकश्यप आदि गोत्रीय वृद्धाश्रम ! ' मुम्बई के समीप बाहरी इलाके में यह आश्रम ,जहां अंकित यादव बुजुर्गों के बीच उपस्थित था। जहां एक बालक इकबाल भी। बालक इकबाल वृद्धाश्रम में एक बेंच पर बैठा बुजुर्ग स्त्री - पुरुषों को देख कर सोंच रहा था …” आठ दिन बाद मदर डे होगा।सोशल मीडिया पर जो मदर डे हैपी हैपी का तूफान सा ला देंगे वे क्या रोजमर्रे 365 दिन इन वृद्धों व वृद्धाश्रमों के बारे में क्या कुछ करते हैं? “ ये बुजुर्ग ..?! बुजुर्ग ..मेरे पिताश्री किस अवस्था में थे ? वे बुजुर्ग ही थे । जब मैं इस दुनिया में आया तो मेरे पिता जी लगभग पचास साल के थे। इकबाल अपने पिता की दूसरी पत्नी से था। पहली पत्नी से तीन लड़कियां थीं।पहली पत्नी फरीदपुर में एक साम्प्रदायिक हिंसा में मार दी गयी थी,जहां उसका मायका था। अभी पिछले साल पिताश्री चल बसे, लोग तो कहते हैं कि उन्हें कोरोना है। मां कोरोना के डर से मायके से आयी ही नहीं थी। परिवार वालों ने भी दूरी बना ली थी। तीनों बहिनों ने पिता की सेवा की थी, मैं भी संग लगा रहता था। तीनों बहिनें दहशत में थीं और डॉक्टरों ने उन्हें भी कोरोना साबित कर दिया था।हमें भी बुखार व सर्दी रहने लगी थी।कोई करीब आना तो दूर एक नजर देखना भी नहीं चाहता था।होटल का काम धंधा भी चौपट। बात यहां पर बुजुर्गों के दशा की है।घर का मुखिया जब बुजुर्ग हो तब भी हालत खस्ता और जब परिवार का मुखिया जब बुजुर्गों व अन्य भाइयों को अलग थलग कर सोंचने लगे तो भी हालत खस्ता हो। एक तरफ राजा दशरथ दूसरी तरफ राजा रावण!!दोनों बुजुर्ग हो चले थे।राजा दशरथ ने बुढापा में पुत्रों की प्राप्ति की।जो भी हो? लेकिन बुढापा की संतानों व जवानी की संतानों में फर्क होता है। अनेक फैमलीज में मैं देखता था ,जहां माता पिता जवान हैं, वहां बच्चे ज्यादा उत्साह महसूस करते हैं यदि माता पिता बच्चों व बुजुर्गों के साथ सिर्फ गम्भीर ही नहीं रहते वरन खेलते हैं, खिलखिलाते हैं, कॉमेडी देखते हैं। साथ साथ मार्केटिंग,शॉपिंग में व्यस्त रहते हैं, अपने विचार फ्री स्टाइल शेयर करते हैं।एक दूसरे की समस्याओं व कार्यों में सहयोगी रहते हैं। एक दूसरे की समस्याओं व कार्यों में सहयोगी रहते हैं ।वहीं दूसरी ओर बुजुर्ग माता पिता थकान, ऊब ,ज्यादा कार्य, व्यस्तता आदि के बीच उदास, निराश ,खिन्नता का वातावरण निर्मित करते हैं। हम एक संकरी ,पतली गली से निकल कर जा रहे थे। किनारे किनारे नाला और कूड़े का ढेर। एक स्थान पर नाला पे सीमेंट का पटला पड़ा था जिस पर दो लड़के दीवार का सहारा लिए खड़े थे। “ अब तो लौंडों का जीना दूभर है? “ “ करें तो करें क्या? “ “ बिजनिस नहीं कर सकते,पढ़ भी ठीक से पाये नहीं?सरकारी स्कूल में पढ़े लेकिन क्या पढ़े?प्राइवेट में पढ़ाने को बाप के पास रुपया नहीं?लेबरी भी कर नहीं सकते? “ सब खुदा की मर्जी कैसे?भूखा हूँ, बेरोजगार हूँ?सब खुदा की मर्जी कैसे? खुदा की ने इंसान को ‘ आजाद इच्छा ‘ से पैदा किया है?लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अपने देह, अपने कुनबे, अपने मजहब के लिए कायनात में और इंसानों की जमातों में शांति सुकून को छीन कर हिंसा, उन्माद से सारी इंसानी सभ्यता को भर देना? ऐसे में ऐसे में वास्तव में ‘ रोजा रखने ‘ का मतलब क्या है? हर हालत में अपने को व दूसरों को सहज रखना। भूख, प्यास, सेक्स भावों के बाबजूद इसके बाद लिए दूसरों को परेशान न करना, मानव समाज को अशांति में न धकेलना न ही प्रकृति विदोहन व प्रदूषण में? जो प्रकृति विदोहन ,प्रदूषण में सहायक है विकास के नाम पर वे कैसे तेरे मर्जी से चल रहे हैं?वे ही स्वयं कह ने रहे हैं कि "सब प्रभु की मर्जी! " मानव पथ क्या है आखिर? विकास के का मतलब क्या है ?वन्य, ग्रामीण जीवन जीना पशुपालन, कृषि, बागवानी आदि के बीच न कि बड़ी बड़ी फैक्ट्रियां लगा कर प्रदूषण फैलाने का काम करना? आपका प्रश्न गहरा और विचारोत्तेजक है। यह ईश्वर की इच्छा (प्रभु की मर्जी), मानव स्वतंत्रता, प्रकृति के शोषण, प्रदूषण और विकास के बीच के विरोधाभास को छूता है, तथा अंत में पूछता है कि मानव का सच्चा पथ आखिर क्या है? प्रभु की मर्जी और मानव कर्म का संबंधभारतीय दर्शन (विशेषकर हिंदू, वेदांत और कर्म सिद्धांत) में सब कुछ "प्रभु की मर्जी" से ही होता है, यह सही है – क्योंकि ब्रह्म या परमात्मा सर्वव्यापी है। लेकिन यह fatalism (नियतिवाद) नहीं है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन – तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। मानव को स्वतंत्र इच्छा (free will) दी गई है, जो ईश्वरीय योजना का हिस्सा है। जो लोग प्रकृति का विदोहन करते हैं, प्रदूषण फैलाते हैं और विकास के नाम पर जंगलों को काटते हैं, नदियों को विषैला बनाते हैं – वे अपनी स्वतंत्र इच्छा का दुरुपयोग कर रहे हैं। वे कहते हैं "सब प्रभु की मर्जी", लेकिन यह बहाना मात्र है। यह उनकी जिम्मेदारी से भागना है। असल में, उनके कर्मों का फल (कर्मा) उन्हें और पूरी सृष्टि को भुगतना पड़ता है – जलवायु परिवर्तन, बाढ़, सूखा, बीमारियां आदि।प्रभु की मर्जी से सब चलता है, लेकिन मानव को धर्मपालन का दायित्व दिया गया है। प्रकृति का शोषण अधर्म है।प्रकृति और मानव का संबंध भारतीय दर्शन में वेदों, उपनिषदों और पुराणों में प्रकृति को देवतुल्य माना गया है: पृथ्वी को माता कहा गया (पृथ्वी सूक्त में: माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः)।नदियां (गंगा, यमुना), पर्वत, वृक्ष, वायु, जल – सभी में दिव्यता है।अहिंसा (non-violence) सभी जीवों और प्रकृति पर लागू होती है।अपरिग्रह (non-possessiveness) और संयम सिखाया गया, ताकि लालच से अतिदोहन न हो।हिंदू धर्म में पांच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से शरीर बना है, और प्रकृति से हम अलग नहीं। उसका शोषण स्वयं का शोषण है।

गुरुवार, 19 मार्च 2026

एलियन्स धरती पर गुप्त रूप से कार्य कर रहे हैं?!

अलिअयन(एलियन्स )काफी गुप्त रूप से इस धरती पर कार्य कर रहे हैं? आखिर वे गुप्त रूप से कार्य क्यों कर रहे हैं? दरअसल धरती पर जिन मनुष्यों की सत्ताएं हैं वे ईश्वरीय मन, ब्रह्मण्ड चेतना, प्रकृति अभियान के अनुरूप नहीं हैं यहाँ तक कि मानव शांति, मानवता के लिए तक नहीं, प्रत्येक के द्वारा अपनेपन को जीने के अवसर को भी नहीं। अब चर्चा है कि अमेरिका अलिअयन के सम्पर्क में है? अमेरिका अलिअयन के सम्पर्क में है, चलो हम ये मानते हैं लेकिन इसको लेकर रहस्य हैं। हमारा मानना है अंतरिक्ष में एक नहीं वरन अनेक अलिअयन सभ्यताएं हैं. हमने अपने ब्लाग #भविष्यकथाअंश में यह व्यक्त किया है। अमेरिका का ' एरिया 51' इसके लिए अनेक रहस्य छिपाए है। पुस्तक : ऐतिहासिक सूक्ष्मवाद !! एक भविष्य कथांश

शनिवार, 13 सितंबर 2025

अग्नि काल ?!😢😢

एक अन्य सर जी अशोकबिन्दु ने कहीं पर लिखा है कि हमें तो जल प्रलय के बाद अग्निकाल भी दिखाई दे रहा है जिसमें शायद ही इंसान बचे। इसमें वे स्वयं को भगवान शंकर के साथ अंतरिक्ष में जाते देखते हैं। और… पृथ्वी का कोर ग्रह की सबसे भीतरी परत है, जो एक घना और गर्म गोला है जो मुख्यतः लोहे और निकल से बना है। यह हमारे ग्रह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो इसके चुंबकीय क्षेत्र से लेकर इसकी आंतरिक ऊष्मा तक, हर चीज़ को प्रभावित करता है। कोर दो अलग-अलग परतों में विभाजित है: ठोस आंतरिक कोर और तरल बाहरी कोर। संरचना और संरचना कोर दो मुख्य भागों से बना है: * आंतरिक कोर: यह सबसे भीतरी भाग है, लगभग 1,221 किमी (759 मील) की त्रिज्या वाला एक ठोस गोला। 5,400°C (9,800°F) तक के तापमान, जो सूर्य की सतह के बराबर है, के बावजूद, ऊपर की परतों से आने वाला अत्यधिक दबाव लोहे और निकल को ठोस अवस्था में रखता है। * बाहरी कोर: आंतरिक कोर के चारों ओर लगभग 2,260 किमी (1,400 मील) मोटी एक तरल परत है। यह परत भी लोहे और निकल से बनी है, लेकिन दबाव उतना ज़्यादा नहीं होता, इसलिए धातुएँ पिघली हुई, कम श्यानता वाली अवस्था में होती हैं। इस तरल धातु की अशांत, संवहनी गति पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को उत्पन्न करने के लिए ज़िम्मेदार है। तापमान और दबाव क्रोड के भीतर तापमान और दबाव अत्यधिक होते हैं और गहराई के साथ बढ़ते हैं। तापमान मेंटल की सीमा पर लगभग 4,500°C (8,132°F) से लेकर आंतरिक कोर के केंद्र में 5,400°C (9,800°F) से अधिक तक होता है। दबाव भी बहुत ज़्यादा होता है, जो समुद्र तल पर वायुमंडलीय दबाव से 3.6 मिलियन गुना अधिक होता है। चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण तरल बाहरी कोर के भीतर की गति ही पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण करती है। इस प्रक्रिया को जियोडायनेमो कहते हैं। जैसे-जैसे बाहरी कोर ठंडा होता है, आंतरिक कोर की सीमा के पास तरल लोहा जम जाता है, जिससे ऊष्मा और हल्के तत्व निकलते हैं। यह तरल बाहरी कोर के भीतर अशांत संवहन धाराओं को प्रेरित करता है। चूँकि पिघला हुआ लोहा एक उत्कृष्ट विद्युत चालक है, इसलिए ये गतिशील धाराएँ विद्युत धाराएँ उत्पन्न करती हैं। ये विद्युत धाराएँ, बदले में, एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती हैं जो अंतरिक्ष में दूर तक फैला होता है और चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटोस्फीयर) का निर्माण करता है। यह चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी को हानिकारक सौर हवाओं और ब्रह्मांडीय विकिरण से बचाता है, जिससे हमारे ग्रह पर जीवन संभव होता है। लेकिन पार्वती ,गणेश को वो धरती पर ही देखते हैं। अर्थात पार्वती व गणेश स्तर की चेतना धरती पर तब भी होती है।
भविष्य त्रिपाठी अब खामोश। " और भविष्य…..?! " " नादिरा! सर जी कहते रहे हैं कि धरती ही नहीं ब्रह्मण्ड का कण कण,जर्रा जर्रा को व्याख्या सनातन है । " मखानी इंटर कालेज में ही … " और अशोक बिंदु जी?! सुनाओ ? " " सुनाओ कुछ ? " " क्या सुनाये ?!" " क्या सोंच रहे थे ? वही सुनाओ? " " भविष्य : कथांश नाम से हमारी एक पुस्तक की योजना है ।उस पर ही सोंच रहे थे। " "कुछ पढ़ाया भी करो ? " " इसका भी वक्त आएगा । " " रस्तोगी मैडम आपको बहुत याद करती हैं। दैनिक जागरण में वे आपको पढ़ती रहती हैं। " " ठीक है । हां , हम ' उरमज्द ' के बारे में भी सोंच रहे थे । " " यह क्या है ? " " अवेस्ता में वरुण का नाम 'उरमज्द' मिलता है। "

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

एलियन्स पृथु महि के मानवों से क्या नाराज हैं?

सर जी का एक ब्लॉग " भविष्य : कथांश?! " जिसमें सर जी ने सम्भवतःसन 10000 ई0 तक की अपनी कल्पनाओं , स्वप्न, अहसास आदि को प्रस्तुत किया है।
सम्भवतः ..?! सन 6050 ई0 तक तो है ही ? एक चरित्र भविष्य त्रिपाठी के नाम से जिसमें।उसके माध्यम से सर जी ने अपनी कल्पनाओं , स्वप्न, अहसास आदि को इसमें प्रस्तुत किया है। लगभग एक वर्ष बाद सन 2165 ई0 की फरबरी! भारतीय उपमहाद्वीप एवं चीन को दो भागोँ मेँ बाँटने की योजना? आखिर सफलता पा ली कुशक्तियोँ ने . 24 फरबरी को भूमि तीब्र भूकम्प के साथ चटक गयी.इन दो भूमियों के बीच अब सागर....?! भूकम्प और सुनामी लहरेँ;बाँधोँ के टूटने से बाढ़ . गुजरात के सूरत से हरिद्वार,उत्तर काशी,मानसरोवर होते हुए चीन की भूमि को चीरते हुए उत्तरी दक्षिणी कोरिया आदि से हो इस चटक ने अरब की खाड़ी और उधर चीन सागर से हो कर प्रशान्त महासागर को मिला दिया . भारतीय उपमहाद्वीप की चट्टान खिसक कर पूर्व की ओर बढ़ गयी थी. म्यामार, वियतनाम, आदि बर्बादी के गवाह बन चुके थे. इससे क्या मिला कुशक्तियोँ को? लेकिन ! जन धन प्रकृति की हानि जरुर हुई. प्रकृति के अन्धविदोहन एवं कृत्रिम जीवन के स्वीकार्य ने पृथ्वी पर दो हजार चार ई0 से ही तेजी के साथ परिवर्तन प्रारम्भ कर दिए थे. सुनामी लहरोँ के बाद यह परिवर्तन और तेज हो गये थे . सुनामी लहरेँ भी क्या प्राकृतिक थीँ या फिर किसी कुशक्ति की हरकत थी ?इस पर मतभेद रहा था. एलियन्स के सम्बन्ध मेँ ? सन 1947 ई0 मेँ कुछ शक्तियोँ के एलियन्स से क्या सम्पर्क हुए थे कि वे पृथ्वी और अन्तरिक्ष मेँ अपनी साजिशेँ रचने लगे. पृथ्वी का मनुष्य आखिर कब तक जगेगा?अपने स्वार्थोँ मेँ अन्धा हो प्रकृति व ब्राह्माण्ड मेँ भी विकृतियाँ फैला दीँ . सर जी की ही एक पुस्तक - " ऐतिहासिक सूक्ष्मवाद!! एक भविष्य कथांश… " जो सन 2023 ई0 के आखिर तक मार्केट (बाजार ) में आ चुकी थी। पहली बार सर जी ने 2023 ई0 जुलाई में अलिअयन (एलियन) को बड़ा क्रुद्ध देखा था । उनका कहना था कि सन 2018 ई0 से वे धरती पर अनेक बार अलिअयन का अहसास कर चुके थे । हालांकि उन्होंने अनेक बार यह कहा था कि वे किशोरावस्था से इस पर विश्वस्त हैं कि अलिअयन हैं। जून 2023 ई0 से सर जी अपने अंदर काफी बड़ा बदलाव महसूस कर रहे थे । इसके साथ ही उनकी पुस्तकों के प्रकाशन का सिलसिला शुरू हुआ था और दूसरी ओर श्रीरामचन्द्र मिशन & हार्टफुलनेस में ' प्रत्याशी प्रशिक्षक ' हो चुके थे। हालांकि वे अपने प्रशिक्षक हो न पाये थे। उन्होंने महसूस किया था कि प्रेम, आध्यत्म, आत्मा तंत्र ,मानवता, प्रकृति अभियान, ईश्वरता, कल्कि महाराज आदि के लिए काम करने का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति, कुल, संस्था आदि की नजर में जीना।ऐसे में किसी संस्था के अंतर्गत प्रशिक्षक न हो पाने का मतलब ' इसे दिल पर लेना ' नहीं है। बहिर्मुखी होने, समाज में शरीर से सक्रिय होने से वे अपने को असहज महसूस करते थे लेकिन विशेष परिस्थितियों में नहीं। मार्च 2020 ई0 से कोरोना संक्रमण व लॉकडाउन ले दौरान तो उन्होंने अपने को काफी शांति -सुकून में महसूस किया था। समस्या, शंका, भ्रम आदि था भी तो वह मानव ,समाज व मानव व्यवस्था के कारण। उन दिनों वह अपने अंदर पैर से लेकर सिर तक सदाशिव शंकर के रूप में अपने अंदर चेतना को देख रहे थे । यह भी भाव वह अपने अंदर देखते थे कि काश 100 साल इस तरह लॉकडाउन लग जाये? सन 2014 ई0 से 2025 ई0 महत्वपूर्ण तो है भारत के लिए लेकिन सन 2043 ई0 तक क्या दुनिया में सब कुछ बदल जाना है? आखिर उज्ज्वल भविष्य ..?! माता पिता, अभिभावक, शिक्षक के अलावा कौन नई पीढ़ी के लिए वास्तव में अब ईमानदार है ?क्या वास्तव में ईमानदार है भी?! यदि ऐसा है तो फिर टकराव क्यों ?!हमारे उनसे मतभेद क्यों ? उनके द्वारा हमको अस्वीकारना क्यों? " हम अपनी इच्छाओं के गुलाम हैं, जो हमारे जीवन में बाधक है। " इतिहास महान योध्दाओं से भरा है लेकिन उनके सूक्ष्म शरीरों का क्या हाल ? आजकल के टॉपर भी क्या हैं? आज कल शिक्षित का ज्ञान भी व्यवहारिक जीवन व रोजमर्रे में क्या है? एक घर में चार चार आईएएस,पीसीएस लेकिन सुकून नहीं? खुदकशी करने को मजबूर ? यूनिवर्सिटी टॉपर भी एक अपराधी ? और सज्ज होता जो समाज, नई पीढ़ी ,जो विकास वह मानवता , प्रकृति अभियान, ईश्वरीय अभियान के अनुकूल कितना ? कैसा भविष्य?! सन 2026 ई0 की शुरुआत के साथ ..?! लगता है कि हमारे आसपास कोई है जो कहता है कि हादसे तो जरूरी हैं। उसमें भी कुछ छिपा है जो हमें मानवता,नई मनुष्यता के लिए अवसर देता है। प्रकृति व ब्रह्मण्ड में समस्या तो मानव बन चुका है । सृजन के साथ विध्वंस भी प्रकृति में है । ऐसे में विध्वंस की स्थिति क्यों?सफाई तो आवश्यक ही है पवित्र सृजन को। हम महसूस करते रहे हैं कि एलियन्स प्रकृति के खिलाफ नहीं हैं।ऐसे में वे मानव के खिलाफ भी नहीं हैं लेकिन जो मानव प्रकृति व ब्रह्मण्ड में समस्या हैं तो क्या कर्तव्य बना है ? समस्या को खत्म करना। अलिअयन सक्रिय हैं लेकिन वे खुल कर नहीं आ सकते। खुलकर तो सामने धमाकेदार ढंग से आएंगे। जून 2025 के आते आते धरती में हकचल बढ़ी लेकिन क्या अब अलिअयन आक्रमण की तैयारी में हैं? पहली बार सर जी ने 2023 ई0 जुलाई में अलिअयन (एलियन) को बड़ा क्रुद्ध देखा था । उनका कहना था कि सन 2018 ई0 से वे धरती पर अनेक बार अलिअयन का अहसास कर चुके थे । हालांकि उन्होंने अनेक बार यह कहा था कि वे किशोरावस्था से इस पर विश्वस्त हैं कि अलिअयन हैं। वे मानवता व प्रकृति के दुश्मन नहीं हैं ऐसे में हमें मैसेज हैं कि अपनी प्रार्थना,भाव को बदलो - हे प्रभु! मुझे तेरे सिवा कुछ भी न चाहिए।तू हमें अपने मिशन में लगा। ऐसे में 2023 ई0 की जुलाई ..?! सन 2023 ई0 की जुलाई का अहसास?!

बुधवार, 13 अगस्त 2025

हमारी एक पुस्तक " लंका में विभीषण ?! " से !!सन 2075..90ई0 ?!

पुस्तक के बारे में ..
सन 2075 -90 ई0 के बीच का समय !! भूकम्प!बाढ़!तूफान!!भूस्खलन!!चटकती धरती!!फूटते ज्वालामुखी !! पूरे के पूरे खाली होते शहर व गांव!! लोगों को स्वयं को बचाना ही मुश्किल !! क्या अमीर क्या गरीब ?सबकी हालत एक सी बराबर !!  शहर व गांव से भागते लोग !!जिस बीच अनेक अमीरों, बनाबटी जीवन जीने वालों की मौतें !! एक अधेड़ जिसे अभी तक लोग सनकी पागल आदि कह कर  उपेक्षित किए पड़े थे ,वह चीख - चीख कह रहा था - हमें तुम लोग उस वक्त भी गिजाइयों की तरह दिखाई देते थे। पड़े थे न जाने किस - किस के पीछे ?अब उन्हें बुलाओ मदद के लिए ? अब तुम्हें क्यों वे लोग याद आ रहे है जिन्हें तुम सब उपेक्षित कर दिए ? पड़े थे गांव, वार्ड, नगर के अमीरों के,जाति के अमीरों के,मजहब के अमीरों के ? और ऊपर से कहते हो कि हमारा क्या दोष ? दोष है क्यों नहीं? नेताओं को चुन कर तुम ही लोग भेजते रहे? वेद गीता की बातों को नजरअंदाज करने वाले पुरोहितों के पीछे पड़े रहे? विभिन्न उपासना पद्धितियों में उलझे रहने से क्या ?धर्म नजर ही नहीं आता। जब कोई शोषित,परेशानहोता है और अपनी बात कहना चाहता है तो पूरा का पूरा तन्त्र उसके खिलाफ ही होता है?किसी के राज्य के आदेश पर चलना अलग बात है और प्रकृति अभियान ,मानवता आदि में सज्ज होना अलग बात है? इस बीच अब्दुल नाम का एक किशोर कुछ ध्यान आया और भाग खड़ा हुआ शहर की ओर ! उसके पीछे पीछे किशोरी रश्मि भी भागी। पूरा का पूरा शहर स्त्रियों-पुरूषों से विहीन था। दोनों एक मकान में घुसे जहां बड़ी देर में एक पांडुलिपि मिली - " लंका में विभीषण ! " अब दोनों जंगल के बीच आर्य समाज के एक कार्यक्रम में उपस्थित थे।जहां कुछ सन्त आते है और रश्मि व अब्दुल को दूर कहीं जंगल के बीच एक खंडहर में ले जाते है जहाँ 'विश्व जगेबा ' का आश्रम था। एक बुजुर्ग सन्त जो दोनों को बताते हैं कि सन 1883 ई के आसपास यह अब्दुल ' आबो रतन ' के नाम का एक युवक था और तुम रश्मि रश्मि नाम की ही एक युवती। जब तुम दोनों कक मालूम चला कि कुछ पुरोहित ज्योतिबा फूले व सावित्री फूले की हत्या करने की योजना बनाये हैं तो तुम दोनों कुछ सशत्र घुड़सवारों के साथ निकल पड़े थे लेकिन जंगल के बीच एक संघर्ष में 'आबो रतन' मारा गया।इस पुस्तक में बताया गया है कि लेखक का सूक्ष्म शरीर  विभीषण के सूक्ष्म से मिलता है। तब कुछ वार्ता होती है। वार्ता के दौरान विभीषण कहता है कि  आजकल राम भक्त हों या रावण भक्त कोई मुझ चरित्र को अपने कुनबे में नहीं चाहता। यहाँ तक कि राम भक्त भी कहते मिल जाते हैं कि परिवार का मुखिया या अपने बिरादरी या अपने रिश्तेदारी में कोई कितना बड़ा अपराधी हो उसका विरोध नहीं करना चाहिए। यह भी सुनने को मिलता है कि लाख मतभेद के बावजूद भी अपने घर के शेर को मत मारो, वरना बाहर के गीदड़ तुम्हें नोच खाएँगे.. !! लेकिन हमें तो धर्म से मतलब है,भक्ति से मतलब है। अंदर - बाहर से क्या मतलब ? क्रांतियां तभी घटित होती हैं जब त्याग होता है?कफ़न बांध कर जब चला जाता है।हमें दुःख है, धर्म में जीने का मतलब है धर्म में जीना न कि अपने देह,कुनबा,जाति ,समुदाय आदि को बचाना वरना धर्म को बचाना । इसी तरह नारद ऋषि के चरित्र को अब खुद को ब्राह्मण व सनातनी मानने वाले नहीं समझ पर रहे हैं। विभीषण यह भी कहता है कि आदि काल से अब भी अनेक सूक्ष्म शरीर  धरती व धरती के चारो ओर विचरण कर रहे हैं,जो उस समय के ही ठहराव में है जब वे अपनी देह त्यागे थे।               लेखक कहता रहा है कि ये देह, अन्य  देहें, जगत की हर वस्तु, घटना तो पर्दा है  सूक्ष्म जगत, आभा तन्त्र, आत्मा तन्त्र, अनन्त यात्रा का । अब इसे क्वांटम साइंस भी कह रहा है। हम क्वांटम साइंस में  किसी देह के सुई के नोंक से भी कम अंश से अनन्त के अहसास की ओर पहुंच सकते हैं।ऐसा ही होता है उन कब्रों, खंडहरों, किलों आदि में छिपे कुछ अतीत के अवशेषों से,यदि वह अतीत के किसी जीव या मनुष्य के देह का कोई सूक्ष्म से सूक्ष्म अंश है तो उसके माध्यम कोई उसके त्रिकाल दर्शन तक पहुंच सकता है।

मंगलवार, 5 अगस्त 2025

मेरी पुस्तक - "लंका में विभीषण ?! "से...

पुस्तक :: लंका में विभीषण .?! लेखक :: अशोक कुमार वर्मा 'बिंदु' मनुष्य को छोड़ो अब कुछ लोग कहते हैं कि पर अब काफी उलट फेर हो जाना है।जहां रेगिस्तान है वहां जंगल ,जहां जंगल है वहां रेगिस्तान भी हो सकता है। सन 2002 ई0 से धरती पर बदलाव के संकेत नजर आने लगे थे। 98 प्रतिशत मनुष्यों के हालात बड़े खस्ता हैं। कुछ लोग सन 2025 ई0 के समय अमेरिकी प्रशासन मिशनरीज पर अंगुली उठाने लगे थे। राष्ट्रपति ट्रम्प को तो कुछ लोगों ने कलि से तुलना कर दी थी। ऐसे में एलन मस्क ..?! एलन मस्क पर भी कुछ लोगों के यह विचार थे कि उनकी भूमिका धरती के खतरनाक हो सकती है यदि अलिअयन के मैसेज के जवाब यदि यहां से अलिअयन की समझ से उलट हो गये। कुछ ने इस पर सावधान रहने को कहा है कि अलि अयन की ओर से आने वाले मैसेज का जवाब न दिया जाये तब ही ठीक है। माता कणिका ने कहा है कि सर जी ने एक बार महसूस किया है कि अलिअयन धरती के मानवीय भौतिक विकास से क्षुब्ध हैं । हालांकि काफी वर्षों से वे मनुष्यों को बदलने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन मनुष्य को जो मैसेज उनके आकाश तत्व में आते हैं, उन्हें मनुष्य सपना समझ कर नजरअंदाज कर देता है। लेकिन इस बीच …. अब जो धर्म पैदा होगा वह पश्चिम से पैदा होगा। मनु हिमालय पर आये तो पश्चिम से ही आये । हम देख रहे हैं कि कोई शक्ति पश्चिम से आते हुए?! कभी कश्यप देश में मनु वरुण हो चुके हैं ।ऐसे ही अब क्या एलन मस्क भावी मनु होंगे ?वे मंगल व चंद्रमा पर जीवन बसाने की तैयारी में हैं? लेकिन इस बीच अलिअयन को लेकर संदेह बने हुए हैं -एक उन व्यक्तियों के मित्र के रूप में जो की आध्यात्मिक मिशन में लगे हैं दूसरे उनके लिए शत्रु के रूप में जो सिर्फ भौतिक विकास के सहारे पंचतत्व ,प्रकृति व ब्रह्मण्ड में प्रदूषण में लगे हैं?! वास्तव में प्रकृति अभियान ,ईश्वरता में जाकर योग के लिए ,संतुलन के लिए कौन जीना चाहता है ? देवता भी कौन थे ? वे जो संतुलन बनाना चाहते थे। सिंधु के इस पार 'राम' और सिंधु के उस पार ' इहराम ' को वास्तव में कौन महसूस करना चाहता है? सिर्फ कर्मकांड के अलावा ?! कल्कि सेना का योद्धा

शनिवार, 15 मार्च 2025

हलचल 2025,16मार्च ..?!

सत्र 2006 - 07 ई0 ! छत पर कुछ विद्यार्थी उपस्थित थे। यूपी बोर्ड की परीक्षाएं चालू हो गयीं थी। किराये पर अनेक विद्यार्थी रहने को आ पहुंचे थे। दो विद्यार्थी नोयडा से भी थे। कहाँ वो सत्र 2006 - 07 ई0 ! और कहां अब सत्र 2024 -25 ई0 .?! भारतीयों पर बहुत जल्द एक बहुत बड़ा कहर ढहने वाला है। अपने परंपरागत कामों को छोड़कर व्हाइट कालर नौकरियों को प्रेफरेंस देने वाले भारतीयों को अब AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मार पड़ने वाली है। जो काम एक आम व्यक्ति हाथ से एक माह में और कंप्यूटर की मदद से एक सप्ताह में करता है वह काम AI की मदद से कुछ ही मिनटों या घंटों में होने लगेगा और वह भी बिना किसी व्यक्तिगत मदद के। यानी कि व्हाइट कालर वाली नई नौकरियों का सृजन बिल्कुल खत्म होने जा रहा है और पहले से प्राप्त नौकरियां पर भी संकट छाने वाला है। अधिकतर भारतीयों के बच्चों ने प्लंबर, कारपेंटर, पेंटर, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिकस, एयर कंडीशनिंग, ऑटोमोबाइल आदि की रिपेयरिंग के कामों, फैक्ट्री में भी होने वाले सभी तरह के लेबर के कार्यों को लगभग परधर्मियों ने संभाल लिया है और हिंदुओं के बच्चे क्लैरिकल वर्क आदि करने में ही इंटरेस्ट लेते हैं और ऐसा कोई भी काम करने में हीन भावना से ग्रस्त होते हैं जिसमें हाथ गंदे हों। अब जब यह सब काम AI करने लगेगी तो हिंदुओं द्वारा की जाने वाली अधिकांश नौकरियां तो खत्म हो जाएंगी। हुनर से तो पहले ही हाथ धो बैठे हैं और कंप्यूटर जनित नौकरियां भी आने वाले समय में AI की मेहरबानी से खत्म हो जाएगीं तो फिर यह बच्चे आगे जिंदगी में क्या करेंगे। जाहिर है समय का चक्र एक बार फिर उल्टा भागेगा और अपने पेट की भूख को शांत करने के लिए परधर्मियों के यहां हमारे बच्चे आने वाले समय में नौकरियां करेंगे। अगर हमें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है तो हमें अपने बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ हाथ से करने वाले कामों में भी निपुण करना होगा। इस बारे में आप सबका क्या ख्याल है भविष्य त्रिपाठी का वहीं कायस्थान (मीरानपुर कटरा,शाहजहांपुर ) में पैतृक मकान था । पैतृक मकान की क्या हालत हो जाती है? भारतीय में उसके बखूबी दर्शन होते रहते हैं?न बेचने में, न ही उसकी मरम्मत आदि लगाने को रुपये खर्च होने? न ही बंटवारे की हालत ? ऐसा ही कुछ था - भविष्य त्रिपाठी के मकान का हाल ?! @@@@ @@@ @@@@ जंगल के नीचे भूमिगत एक प्रयोगशाला?! आलोक वम्मा अनेक विद्यार्थियों को 1857 क्रांति के 150 वी वर्षगांठ के उपलक्ष्य पर देश के अनेक भूभाग पर हुई परिवर्तन को हलचल में अपने अनेक विद्यार्थियों को प्रभावित कर गायब हो गया था। जिसमें उसकी प्रिय शिष्या ' शिक्षा ' ने अपनी जान ही गवां दी थी।
सन 2011 -2025 ई0 का समय संक्रमण। कंदराओं, गुफाओं, दुर्गंम क्षेत्र में गुप्त रूप से रहने वाली अनेक सूक्ष्म शरीर शक्तियां, सूक्ष्म शरीर शक्तियों से प्रभावित मानव शक्तियां जाग उठीं। सन 2025 ई0 के आते आते कल्कि अवतार की गतिविधियां तेज हो ही गयीं लेकिन कलि असुर की गतिविधियां भी तेज हो गयीं। फरबरी 2025 ई0 के लास्ट में ज्ञात हुआ कि कुछ विदेशी कुशक्तियों के माध्यम से भारतीय लोकसभा 2024 के चुनाव में भाजपा व मोदी सरकार को हराने के लिए काफी विदेशी धन भी खर्च किया गया ?! लेकिन मोदी व उनकी टीम तब भी तीसरी बार सरकार बनाने में सफल हुई थी। रात्रि - 01.30 AM !! दिन -रविवार !! 16 मार्च 2025 ई0 !! मानवीय सूक्ष्म जगत में एक बड़ी हलचल हुई। जो मानव अपने वर्तमान जीवन या पिछले जन्मों में कभी प्रकृति अभियान // ईश्वरीय सत्ता //विश्व सरकार आदि के लिए काम करने को यदि आंशिक विचार// भाव भी यदि लाये थे, वे जाग उठे। अधिचेतना की ओर से सन 1926 के आसपास हुई हलचल धरती पर अनेक स्थानों पर काम कर रही थी। जो अब भौतिक रूप से भी लगभग 98.98 प्रतिशत मानवों के सूक्ष्म जगत में हलचल कर गयी थी। उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बांग्ला देश ,पाकिस्तान, बिलुचिस्तान , अरुणाचल के उत्तर चीनी क्षेत्र आदि में बदलाव को नये बयार के रूप में आयी थी जिसे उन्होंने ही महसूस किया था जिनका मन पहले से ही आंतरिक रूप से या अंतर्मुखी रूप से विभिन्न साधनाओं के माध्यम से सक्रिय थे।जिनमें 80 प्रतिशत हिन्दू, पारसी, यहूदी ,सिक्ख आदि थे और मुस्लिम मामूली 01 प्रतिशत से भी कम। सर जी ..?! उनके साथ कक्षा 10 तक सहपाठी रहे अनुभव सक्सेना व उनके पिता जी के साथ एक टीम सूक्ष्म रूप से सर जी के स्वप्न में आयी। रात्रि 01.30 AM , सर जी नींद से जाग उठे। " हम तो 23 साल बाद अब जगे हैं! " - अनुभव सक्सेना ' सर जी ' से बोला था। उसने 23 साल बाद पुनः पढ़ना और पढ़ना शुरू किया था। उसके साथ उसके पिता जी व उसकी माता जी भी पुनः सक्रिय सूक्ष्म रूप से सक्रिय हुई थीं। ' सर जी ' को भी इस माध्यम से जागरूक होने का सन्देश मिला था। दूसरी ओर जंगल के बीच रह रहे आलोक वम्मा के जीवन में एक नया मोड़ आया। वह भूमिगत एक प्रयोगशाला में कार्य करते हुए अपनी योग्यता बढ़ाने को प्रेरित हुआ। एक भूमिगत प्रयोगशाला में एक लंबी गली के दोनों ओर अनेक कक्ष बने हुए थे । जिसमें वैज्ञानिक अपने अपने प्रयोगशाला में लगे हुए थे। एक बुजुर्ग आगे बढ़ता जा रहा था। अचानक सामने से गली में विश्व मित्र अलक्षेन्द्र उसकी ओर ही बढ़ा । जिसे हम देख कर … " आप?! आपको यहां पहली बार देख रहा हूँ? " " मैं विश्व मित्र अलक्षेन्द्र ?! " " ओह! नमस्ते सर । पहचाना नहीं। अब तो आप काफी बदल गये हो? मैं भबिष्य त्रिपाठी ?! " " शाम की मीटिंग में मुलाकात होगी ? " " यस, सर ! "

शुक्रवार, 15 मार्च 2024

सन 2075 ई0 !! कढ़ेर चरित!?

सन 2075 ई0!! ऊपर उन चट्टानों के बीच उस दरार में उस बुजुर्ग ने अपना आवास बना रखा था। "आप पचास साल से यहीं हैं?" "मुम्बई का यह बिच?!" "कढ़ेर नाम का वह व्यक्तित्व उस पर चिंन्तन करते हुए हम यहाँ पर?" "यह अंदर क्या चल रहा है?लगता है कोई आत्मा अंदर आकर बैठ गयी है और हमें वर्तमान से हटकर भविष्य का आभास हो रहा है।" रात भर भी हम इस आभास में रहे कि..... लेकिन अभी तो यहां कुछ भी नहीं।न भीड़ न वह बुजुर्ग यहां?" "ऐसा लगता जैसे कि हम भांग खाए हुए हों?और सन 2075ई0 के वे दृश्य देखे जा रहे हैं।लेकिन यह तभी से है जब से हम कढ़ेर किरदार के बारे में सोंचना शुरू किया है।" आशीष विसु ने जब अपनी आंखें खोली तो उसने अपने को एक कमरे में विस्तर पर पाया।                @@@    @@@   @@@ समुद्र की लहरें! दुनिया भर में समुद्र के किनारे समुद्र में विलीन होते जा रहे थे। समुद्र का तल पचास साल पहले की अपेक्षा का ऊपर उठ चुका था। "आशीष....आशीष....आशीष विसु ....विसु....आशीष विसु...!! कहीं कोई व्यक्ति नजर नहीं आ रहा था। एक चट्टान पर खड़ा एक बुजुर्ग इधर उधर देखने लगता था। "कोई नजर नहीं आता।लेकिन ये मन भी कैसा हो जाता है?यह आवाजें कैसी?" वह वापस नगर की ओर चल दिया। नगर के बाहर ही एक ओर पड़ी झोपड़ियों की ओर वह आ गया। देखा कि वहां तो जहां - तहां छतरियों के नीचे पड़ी बांस की कुर्सियों पर युवा जोड़े बैठे हुए थे। वह बुजुर्ग रास्ता बदल कर अन्यत्र आ गया। एक कुर्सी पर बैठते हुए गहरी गहरी श्वासें लीं। कुछ पर्यटक उधर ही आ गए। "अरे,सर आप?"-पर्यटको में से एक युवक बोला। "यह कौन?" - उस बुजुर्ग की ओर देखते हुए । "अरे,आशीषविसु!भूल गए।उस दिन टीबी पर इसको देख नहीं रहे थे एक सीरियल में?" "अच्छा?!तो आओ मिलते हैं ।" यह बुजुर्ग जो आकर कुर्सी पर बैठा था..." वो आवाज कैसी गूंज रही थी मेरे ही अंतर्मन में?!मेरा ही नाम?" इसके बाद अब बुजुर्ग अवस्था में पहुंचा यह आशीष विसु आये पर्यटकों से वार्ता करने लगा था। उधर समुद्र किनारे प्रयत्न -- बुजुर्ग भंगन्ना की नजर में अब प्रयत्न ही कढ़ेर था।

मंगलवार, 26 सितंबर 2023

चलते फिरते शहर !!

मनु को जब आभास हुआ कि जल प्रलय होने वाला है तो उन्होंने मध्य एशिया में जल तत्व में प्रशिक्षित एक नबी के सहयोग से दिव्य नौका के निर्माण को अंजाम दे प्राणियों के बीजों को संचय कर हिमालय की ओर चूक किया ! इस घटना की याद के साथ वह विचार करने लगा कि आजकल अर्थात अब सन 6050 ईस्वी में एक एक लाख आबादी की क्षमता वाले तैरते शहर , जिन पर आवश्यक अन्य जंतु व वनस्पति की भी व्यवस्था ..?! इक्कीसवीं सदी में सर जी ठीक कहते थे कि हमारी नजर जब पूरी धरती पर जाती है तो हमें अब भी और तब भी अनेक स्थानों का सूक्ष्म एक ही दिखाई देता है । क्यों न भौगोलिक, मानवीय, बनावटी प्रतिमान बदल गये हों ? कैसे ? कभी कश्यप देश के नाम से पुकारा जाने वाले क्षेत्र का

गुरुवार, 24 अगस्त 2023

किशोरावस्था में सर जी!!

सत्र 2006 - 07 ई0 ! छत पर कुछ विद्यार्थी उपस्थित थे। यूपी बोर्ड की परीक्षाएं चालू हो गयीं थी। किराये पर अनेक विद्यार्थी रहने को आ पहुंचे थे। दो विद्यार्थी नोयडा से भी थे। कहाँ वो सत्र 2006 - 07 ई0 ! और कहां अब सत्र 2024 -25 ई0 .?! भारतीयों पर बहुत जल्द एक बहुत बड़ा कहर ढहने वाला है। अपने परंपरागत कामों को छोड़कर व्हाइट कालर नौकरियों को प्रेफरेंस देने वाले भारतीयों को अब AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मार पड़ने वाली है। जो काम एक आम व्यक्ति हाथ से एक माह में और कंप्यूटर की मदद से एक सप्ताह में करता है वह काम AI की मदद से कुछ ही मिनटों या घंटों में होने लगेगा और वह भी बिना किसी व्यक्तिगत मदद के। यानी कि व्हाइट कालर वाली नई नौकरियों का सृजन बिल्कुल खत्म होने जा रहा है और पहले से प्राप्त नौकरियां पर भी संकट छाने वाला है। अधिकतर भारतीयों के बच्चों ने प्लंबर, कारपेंटर, पेंटर, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिकस, एयर कंडीशनिंग, ऑटोमोबाइल आदि की रिपेयरिंग के कामों, फैक्ट्री में भी होने वाले सभी तरह के लेबर के कार्यों को लगभग परधर्मियों ने संभाल लिया है और हिंदुओं के बच्चे क्लैरिकल वर्क आदि करने में ही इंटरेस्ट लेते हैं और ऐसा कोई भी काम करने में हीन भावना से ग्रस्त होते हैं जिसमें हाथ गंदे हों। अब जब यह सब काम AI करने लगेगी तो हिंदुओं द्वारा की जाने वाली अधिकांश नौकरियां तो खत्म हो जाएंगी। हुनर से तो पहले ही हाथ धो बैठे हैं और कंप्यूटर जनित नौकरियां भी आने वाले समय में AI की मेहरबानी से खत्म हो जाएगीं तो फिर यह बच्चे आगे जिंदगी में क्या करेंगे। जाहिर है समय का चक्र एक बार फिर उल्टा भागेगा और अपने पेट की भूख को शांत करने के लिए परधर्मियों के यहां हमारे बच्चे आने वाले समय में नौकरियां करेंगे। अगर हमें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है तो हमें अपने बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ हाथ से करने वाले कामों में भी निपुण करना होगा। इस बारे में आप सबका क्या ख्याल है भविष्य त्रिपाठी का वहीं कायस्थान (मीरानपुर कटरा,शाहजहांपुर ) में पैतृक मकान था । पैतृक मकान की क्या हालत हो जाती है? भारतीय में उसके बखूबी दर्शन होते रहते हैं?न बेचने में, न ही उसकी मरम्मत आदि लगाने को रुपये खर्च होने? न ही बंटवारे की हालत ? ऐसा ही कुछ था - भविष्य त्रिपाठी के मकान का हाल ?! @@@@ @@@ @@@@ जंगल के नीचे भूमिगत एक प्रयोगशाला?! आलोक वम्मा अनेक विद्यार्थियों को 1857 क्रांति के 150 वी वर्षगांठ के उपलक्ष्य पर देश के अनेक भूभाग पर हुई परिवर्तन को हलचल में अपने अनेक विद्यार्थियों को प्रभावित कर गायब हो गया था। जिसमें उसकी प्रिय शिष्या ' शिक्षा ' ने अपनी जान ही गवां दी थी। सन 2011 -2025 ई0 का समय संक्रमण। कंदराओं, गुफाओं, दुर्गंम क्षेत्र में गुप्त रूप से रहने वाली अनेक सूक्ष्म शरीर शक्तियां, सूक्ष्म शरीर शक्तियों से प्रभावित मानव शक्तियां जाग उठीं। सन 2025 ई0 के आते आते कल्कि अवतार की गतिविधियां तेज हो ही गयीं लेकिन कलि असुर की गतिविधियां भी तेज हो गयीं। फरबरी 2025 ई0 के लास्ट में ज्ञात हुआ कि कुछ विदेशी कुशक्तियों के माध्यम से भारतीय लोकसभा 2024 के चुनाव में भाजपा व मोदी सरकार को हराने के लिए काफी विदेशी धन भी खर्च किया गया ?! लेकिन मोदी व उनकी टीम तब भी तीसरी बार सरकार बनाने में सफल हुई थी। रात्रि - 01.30 AM !! दिन -रविवार !! अमर सिंह प्रथम जयंती!! 16 मार्च 2025 ई0 !! मानवीय सूक्ष्म जगत में एक बड़ी हलचल हुई। जो मानव अपने वर्तमान जीवन या पिछले जन्मों में कभी प्रकृति अभियान // ईश्वरीय सत्ता //विश्व सरकार आदि के लिए काम करने को यदि आंशिक विचार// भाव भी यदि लाये थे, वे जाग उठे। अधिचेतना की ओर से सन 1926 के आसपास हुई हलचल धरती पर अनेक स्थानों पर काम कर रही थी। जो अब भौतिक रूप से भी लगभग 98.98 प्रतिशत मानवों के सूक्ष्म जगत में हलचल कर गयी थी। उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बांग्ला देश ,पाकिस्तान, बिलुचिस्तान , अरुणाचल के उत्तर चीनी क्षेत्र आदि में बदलाव को नये बयार के रूप में आयी थी जिसे उन्होंने ही महसूस किया था जिनका मन पहले से ही आंतरिक रूप से या अंतर्मुखी रूप से विभिन्न साधनाओं के माध्यम से सक्रिय थे।जिनमें 80 प्रतिशत हिन्दू, पारसी, यहूदी ,सिक्ख आदि थे और मुस्लिम मामूली 01 प्रतिशत से भी कम। सर जी ..?! उनके साथ कक्षा 10 तक सहपाठी रहे अनुभव सक्सेना व उनके पिता जी के साथ एक टीम सूक्ष्म रूप से सर जी के स्वप्न में आयी। रात्रि 01.30 AM , सर जी नींद से जाग उठे। " हम तो 23 साल बाद अब जगे हैं! " - अनुभव सक्सेना ' सर जी ' से बोला था। उसने 23 साल बाद पुनः पढ़ना और पढ़ना शुरू किया था। उसके साथ उसके पिता जी व उसकी माता जी भी पुनः सक्रिय सूक्ष्म रूप से सक्रिय हुई थीं। ' सर जी ' को भी इस माध्यम से जागरूक होने का सन्देश मिला था। दूसरी ओर जंगल के बीच रह रहे आलोक वम्मा के जीवन में एक नया मोड़ आया। वह भूमिगत एक प्रयोगशाला में कार्य करते हुए अपनी योग्यता बढ़ाने को प्रेरित हुआ। एक भूमिगत प्रयोगशाला में एक लंबी गली के दोनों ओर अनेक कक्ष बने हुए थे । जिसमें वैज्ञानिक अपने अपने प्रयोगशाला में लगे हुए थे। एक बुजुर्ग आगे बढ़ता जा रहा था। अचानक सामने से गली में विश्व मित्र अलक्षेन्द्र उसकी ओर ही बढ़ा । जिसे हम देख कर … " आप?! आपको यहां पहली बार देख रहा हूँ? " " मैं विश्व मित्र अलक्षेन्द्र ?! " " ओह! नमस्ते सर । पहचाना नहीं। अब तो आप काफी बदल गये हो? मैं भबिष्य त्रिपाठी ?! " " शाम की मीटिंग में मुलाकात होगी ? " " यस, सर ! " सन 2022 - 2023 ई0 !! मेरी पुस्तक - ' ऐतिहासिक सूक्ष्मवाद !! एक भविष्य कथांश …. ' जिसे हम देख रहे थे । हम (अशोकबिन्दु ) सत्र 2022 - 23 ई0 में लगभग तीन बार एलियंस का आभास कर चुके हैं। इससे पूर्व किशोरावस्था से हम एलियन्स के अस्तित्व पर विश्वस्त रहे हैं। हमारी पुस्तक ' ऐतिहासिक सूक्ष्मवाद ! एक भविष्य कथांश !! ' - में हमने अपनी विभिन्न कल्पनाओं, अहसास, चिंतन आदि के माध्यम इसे लिखा है। इस पर हमारा ब्लॉग - ' भविष्य कथांश ' - भी है । सन 2010 ई0 के समीप ' क्षेत्र 51 ' के सम्बंध में धुंधली सी छवि मन में आयी थी। सन 2017 ई0 , अगस्त तक हम अपने सूक्ष्म शरीर को किसी सूक्ष्म शरीरों के समूह के साथ अमेरिका की यात्रा व अमेरिका में स्वयं को देखते थे लेकिन अब नहीं। किशोरावस्था में हम ..?! हम कक्षा आठ हरित क्रांति विद्या मंदिर ,हरित नगर, बीसलपुर (पीलीभीत) से पास कर कक्षा नौ में एस आर एम इंटर कालेज, बीसलपुर में पढ़ाई कर रहे थे। उस दौरान हम एलियन्स के सम्बन्ध में अपने अंदर चिंतन मनन, स्वप्न, कल्पनाएं देखने लगे थे। और ..?! हमारे कल्पना जगत में -' भविष्य कथांश ' - हमारा मुख्य चरित्र ' भविष्य त्रिपाठी ' - ही है लेकिन क्यों न अभी उसके व्यक्तित्व को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त न कर पाया होऊं ?

मंगल पर तिरंगा!!

चांद की जड़ में भारत !!

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

एलियन्स लिपि ..?!

"सर जी ने सन 2010ई0 में ही एक नई लिपि इजहाद कर ली थी।" उनके उपन्यास 'भविष्य कथांश ' में जिसका संकेत मिलता है। एस एस कालेज,शाहजहांपुर के प्रांगण में एक ओर तीन छात्राएं व दो छात्र बैठे बात कर रहे थे।

बुधवार, 3 अगस्त 2022

सन 2165 ई0 में वो चटक!!

भारतीय हिन्द महाद्वीप चट्टान यूरोपीय चट्टान की ओर बढ़ी तो थी लेकिन दोनों चट्टानों के बीच टकराहट ने नई स्थिति पैदा कर दी थी।
एक चालकहीन कम्प्यूटरीकृत यान सनडेक्सरन धरती पर आ कर सम्कदेल वम्मा के मृतक शरीर को छोड़ गया था. आरदीस्वन्दी भागती हुई मृतक शरीर के पास आयी और शान्त भाव मेँ खड़ी हो गयी. उसके मन मस्तिष्क मेँ सम्कदेल वम्मा के कथन गूँज उठे. ".....शरीर तो नश्वर है . हमे तू मारेगा? भूल गया कुरुशान को अर्थात गीता सन्देश को ? ..... हमारी कोशिसेँ बेकार नहीँ जाएगी. क्योँ न बार बार मर कर बार बार जन्म लेना पड़े?" आरदीस्वन्दी अभी कुछ समय पहले सम्कदेल वम्मा व देव रावण की वार्ता को सचित्र देख रही थी.आरदीस्वन्दी ने सिर उठा कर देखा कि यान अन्तरिक्ष से वापस आ रहे थे. कुछ दूर एक विशालकाय स्क्रीन पर अन्तरिक्ष युद्ध के चित्र प्रसारित हो रहे थे. देव रावण के अनेक यानोँ को नष्ट किया जा चुका था. अब भी- "..... तेरा अहंकार जाग कर जब तक सौ प्रतिशत नहीँ हो जाता तब तक तू भी मोक्ष नहीँ पा सकता है, इसके लिए तुझे भी बार बार जन्म लेना पड़ सकता है. और.... जंगल के बीच एक विशालकाय इमारत ! इमारत के बाहर अनेक जीव जन्तुओँ एवं महापुरूषोँ-कृष्ण विदुर ,महावीर जैन ,बुद्ध, चाणक्य, ईसा मसीह ,सुकरात, कालिदास ,दारा शिकोह, कबीर, शेरशाह सूरी ,गुरूनानक ,राजा राममोहनराय, सावित्री फूले ,राम कृष्ण परमहंस ,महात्मा गाँधी, एपीजे अब्दुल कलाम, साँई बाबा, ओशो , अन्ना हजारे, आदि की प्रतिमाएँ पेँड़ पौधोँ के बीच स्थापित थीँ . इमारत के अन्दर वातावरण आध्यात्मिक था. वेद कुरान बाइबिल आदि से लिए गये अमर वचन जहाँ -तहाँ दीवारोँ पर लिखे थे. इसके साथ ही सभी ग्रन्थोँ के प्रतीक चिह्न अंकित थे. मन्द मन्द 'ओ3म -आमीन' की ध्वनि गूँज रही थी. जहाँ अनेक औरतेँ नजर आ रही थीँ पुरुष कहीँ भी नजर नहीँ आ रहे थे. हाँ,इस इस इमारत के अन्दर एक अधेड़ पुरुष उपस्थित था जो श्वेत वस्त्र धारी था .इस इमारत का नाम था-'सद्भावना' .एक अण्डाकार यान आकाश मेँ चक्कर लगा रहा था. एक कमरे के अन्दर दीवारोँ पर फिट स्क्रीन्स के सामने किशोरियाँ एवं युवतियाँ उपस्थित थे. अधेड़ पुरुष के सामने उपस्थित स्क्रीन पर अण्डाकार यान को देख कर उसने अपना हाथ घुमाया और वह स्क्रीन गायब हो गयी. सामने रखी माचिस के बराबर एक यन्त्र लेकर फिर वह उठ बैठा. इधर अण्डाकार यान हवाई अड्डे पर उतर चुका था. * * * * पृथ्वी से लाखोँ प्रकाश वर्ष दूर एक धरती-सनडेक्सरन . जहाँ मनुष्य रहता तो था लेकिन ग्यारह फुट लम्बे और तीन नेत्रधारी . एक बालिका 'आरदीस्वन्दी'जो तीननेत्र धारी थी , वह बोली -देखो ,माँ पहुँची पृथ्वी पर क्या?एक किशोर 'सम्केदल वम्मा' दीवार मेँ फिट स्क्रीन पर अतीत के एक वैज्ञानिक, जिन्हेँ लोग त्रिपाठी जी कहकर पुकारते थे, को सुन रहा था . जो कह रहे थे कि आज से लगभग एक सौ छप्पन वर्ष पूर्व इस ( पृथ्वी) पर एक वैज्ञानिक हुए थे एपीजे अब्दुल कलाम. उन्होने कहा था कि हमेँ इस लिए याद नहीँ किया जायेगा कि हम धर्म स्थलोँ जातियोँ के लिए संघर्ष करते रहे थे. आज सन 2164ईँ0 की दो अक्टूबर! विश्व अहिँसा दिवस . आज मैँ इस सेमीनार मेँ कहना चाहूगा कि कुछ भू सर्वेक्षक बता रहे हैँ कि सूरत , ग्वालियर, मुरादाबाद, हरिद्वार ,उत्तरकाशी, बद्रीनाथ ,मानसरोवर, चीन स्थित साचे ,हामी, लांचाव, बीजिँग, त्सियांगटाव ,उत्तरी- द्क्षणी कोरिया, आदि की भूमि के नीचे एक दरार बन कर ऊपर आ रही है, जो हिन्दप्राय द्वीप को दो भागोँ मेँ बाँट देगी. यह दरार एक सागर का रुप धारण कर लेगी जिसमेँ यह शहर समा जाएँगे. इस भौगोलिक परिवर्तन से भारत और चीन क्षेत्र की भारी तबाही होगी जिससे एक हजार वर्ष बाद भी उबरना मुश्किल होगा. सम्केदल वम्मा आरदीस्वन्दी से बोला -" त्रिपाठी जी कहते रहे लेकिन पूँजीवादी सत्तावादी व स्वार्थी तत्वोँ के सामने उनकी न चली. सन2165ई0 की फरवरी! इस चटक ने अरब की खाड़ी और उधर चीन के सागर से होकर प्रशान्त महासागर को मिला दिया. भारतीय उप महाद्वीप की चट्टान खिसक कर पूर्व की ओर बढ़ गयी थी. म्यामार,वियतनाम आदि बरबादी के गवाह बन चुके थे." बालिका बोली कि देखो न,माँ पृथ्वी पर पहुँची कि नहीं... आज सन 5010ई0 की 19 जनवरी! उस अण्डाकार यान से एक तीन नेत्र धारी युवती के साथ एक बालिका बाहर आयी जो कि तीन नेत्रधारी ही थी. अधेड़ व्यक्ति कुछ युवतियोँ के साथ जिनके स्वागत मेँ खड़ा था. * * * * "सर ! आपके इस इमारत 'सद्भावना' मेँ तो मेँ प्रवेश नहीँ कर सकूँगी?"- सनडेक्सरन से आयी महिला बोली. तो अधेड़ व्यक्ति बोला कि अफस्केदीरन !तुम ऐसा क्योँ सोचती हो? अफस्केदीरन बोल पड़ी-"सोचते होँगे आपकी धरती के लोग,आप जानते हैँ मैँ किस धरती से हूँ?" जेटसूट से एक वृद्धा उड़ कर धरती पर आ पहुँची. "नारायण!" वृद्धा को देख कर अधेड़ व्यक्ति बोला- "मात श्री !"फिर नारायण उसके पैर छूने लगा. " मैँ कह चुकी हूँ मेरे पैर न छुआ करो." "तब भी......" नारयण ने वृद्धा के पैर छू लिए. इमारत'सद्भावना' के समीप ही बने अतिथिकक्ष मेँ सभी प्रवेश कर गये. आखिर अफस्केदीरन ने ऐसा क्योँ कहा कि सद्भावना मेँ तो मैँ प्रवेश नहीँ कर सकूँगी? दरअसल सद्भावना मेँ औरतोँ का प्रवेश वर्जित था.क्योँ आखिर क्योँ ?इस इमारत को महागुरु ने बनवाया था. जहाँ उन्होँने अपना सारा जीवन गुजार दिया. उन्होँने ही यह नियम बनाया कि इस इमारत मेँ कोई औरत प्रवेश नहीँ करेगी. यह क्या कहते हो आप ? एक को छोड़ कर सब औरतेँ हैँ. तब भी...... बात तब की है जब महागुरु युवावस्था मेँ थे. वह अपनी शादी के लिए लेट होते जा रहे थे. परम्परागत समाज मेँ लोग तरह तरह की बात करने लगे थे. तब वह मन ही मन चिड़चिड़े होने लगे थे कि कोई लड़की हमसे बात करना तक पसन्द नहीँ करती, हमेँ अपने जीवन मेँ पसन्द करना दूर की बात. सामने वाले पर अपनी इच्छाएँ थोपना क्या प्रेम होता है? सद्भावना मेँ उपस्थित स्त्रियाँ ह्यूमोनायड थे. भविष्य त्रिपाठी की फाइलों से ज्ञात होता है कि सर जी ने लिखा है कि है कि उन्हें सन 2018ई0 से पहले ही एक रात स्पष्ट हो चुका था कि धरती पर प्रलय है।पार्वती व गणेश धरती पर ही रुक जाते हैं लेकिन शिव जी धरती को छोड़ देते हैं।सर जी का तीसरा सूक्ष्म शरीर शिव जी से कह रहा था कि हम इन्हें छोड़ क्यों जा रहे हैं तो वे कहते हैं कि वे मिट्टी व प्रकृति से ही हैं।हम असमंजस्य में पड़ जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों?हम सृष्टि से पहले के प्रकृति व ब्रह्म सम्बन्धों पर सोंचने लगें थे। सर जी कभी कभी भावुक हो जाते थे कि हम वास्तव में दुनिया की नजर में एक तुच्छ व्यक्ति हैं।तथाकथित भक्तों की नजर में भी, खुदा के बंदों की नजर में भी। सर जी ने अनेक बार पृथ्वी को तेज स्पीड में देखा था।पहली बार तब जब सुनामी लहरें आयी थीं। क्या एक ही व्यक्ति में 24 घण्टा में एकबार ऐसे हालात हो सकते हैं कि वह आत्महत्या करना चाहे?और एक बार ऐसे भी हालत कि उसे खुद से बड़ा दुनिया में कोई न दिखे जो जाति मजहब व दुनियाबी चीजों से परे अपने को अनन्त यात्रा में प्रकाश के रूप में देखे। भविष्य त्रिपाठी खुले आसमान के नीचे टहलते टहलते बरामदे से निकल कर आ गया था।

मंगलवार, 5 जुलाई 2022

त्रिदेव विज्ञान की भाषा में एलियन्स?!

हम किशोरावस्था से ही एलियन्स के अस्तित्व पर चिंतन मनन में रहे हैं।
हम किशोरावस्था से ही एलियन्स के अस्तित्व को स्वीकार करते रहे हैं। ऐसे में हमारे काल्पनिक पात्रों में से कुछ पात्र एलियन्स भी रहे हैं। हमने अपने जीवन से जाना है कि चिन्तन- मनन,कल्पनाओं का असर अंदर किस गहराई तक जाता है और फिर अपने व आसपड़ोस के सूक्ष्म जगत के माध्यम से कैसे व प्रकृति व आनुवंशिकता,भविष्य में काम करता है?हम महसूस कर सकते हैं। सन 6050ई0 में भी हम पहुंचते रहे है। तीन नेत्री एलियन-'हफदमस'-सन सन6050ई0!  सन 6050ई0! हफदमस जो कि तीन नेत्री एक एलियन था। "यह समुद्र देखरहा हूँ मैं, इसके अंदर एक पूरा का पूरा शहर मुंबई मौजूद है।" उड़न तश्तरी यान के अंदर एक स्क्रीन पर समुद्र के अंदर की मुंबई को दिखाया जा रहा था जिसमें 4 गोताखोर मौजूद थे ।  मानव आबादी के प्रमाण 250 ईसा पूर्व तक मिलते हैं। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यह दीप समूह मौर्य साम्राज्य का भाग बने जब बहुत सम्राट अशोक महान का शासन था । कुछ आरंभिक शताब्दियों में मुंबई के नियंत्रण से संबंधित इतिहास सातवाहन साम्राज्य और इंडो सीथियन वेस्टर्न सैट्रेप के बीच विवाद था । बाद में हिंदू सिल्हारा वंश के राजाओं ने यहां 1343 ईस्वी तक राज्य किया। जब तक की गुजरात के राजा ने सप्त दीपों पर अधिकार नहीं कर लिया। एलीफेंटा गुफाओं ,बलकेश्वर मंदिर आदि में इस काल के अवशेष मिले थे। सन 15 34 ईसवी में पुर्तगालियों ने गुजरात के बहादुर शाह से यह  द्वीप समूह छीन लिए जो कि बाद में चार्ल्स   द्वितीय इंग्लैंड को दहेज रूप में दे दिए गए । यह द्वीप सन 1668 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी  को मात्र 10 पाउंड प्रतिवर्ष की दर पर पट्टे पर दे दिए ।सन 1687 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने मुख्यालय सूरत से हस्तांतरित कर यहां मुंबई स्थापित किए। अंततः नगर मुंबई प्रेसीडेंसी का मुख्यालय बन गया सन 1817 के बाद नगर को विस्तृत पैमाने पर सिविल कार्यों द्वारा वर्तमान शहर के रूप में स्थापित किया गया ।इसमें सभी दीपों को एक जुड़े हुए दीप में जोड़ने की परियोजना मुख्य थी । इस परियोजना को हार्न बाय बेल्लार्ड कहा गया ।जो सन 1845 में पूर्ण हुआ तथा सन 18  53 में भारत की प्रथम यात्री रेलवे लाइन स्थापित हुई। अमेरिकी नागर युद्ध के दौरान विश्व का प्रमुख सूती व्यवसाय बाजार बना  जिससे इसकी अर्थव्यवस्था मजबूत हुई। साथ ही साथ नगर का विस्तार कई गुना बढ़ गया । सन 18 69 में स्वेज नहर के खुलने के बाद से अरब सागर का सबसे बड़ा  पत्तन बन गया । हम गूगल से सर्च करते हुए मुंबई के संबंध में विभिन्न जानकारियां एकत्रित करते रहे।  हम सोच रहे थे - वो एलियंस पृथु मही की मानव जाति से काफी नाराज थे । मानव जाति इस धरती को ही नहीं बरन अंतरिक्ष को भी प्रदूषित कर चुकी थी। प्रकृति व ब्रहमांड में मानव जाति के विकास ने सहज और स्वत:  जीवन में विकार खड़े क र दिए थे। जिसका प्रभाव स्वयं मानव जाति की ही प्रकृति स्थूलता और सूक्ष्म पर पड़ा ।मानव जाति दयनीय अवस्था में पहुंच चुकी थी । वन्य समाज,आदिवासी अपना सहजीवन और व्यवस्था को बचाए हुए तो थे लेकिन जीवन संघर्ष बढ़ गया था । उत्तरी ध्रुव, साइबेरिया आदि क्षेत्र पुन: हरियाली से भरने लगे थे । अनेक ग्लेशियर पिघल चुके थे। गोमुख से ऊपर सेआने वाली अनेक जलधाराएं सूख चुकी थी । समुद्रों के तल बढ़ गए थे । अनेक समुद्र तटीय क्षेत्र डूब चुके थे। बचे खुचे मानवों में 85% जनता को अपना जीवन जीना मुश्किल हो रहा था । आपसी कलह, संघर्ष और युद्ध बढ़ गए थे । परिवार व्यवस्था ,रिश्ते नाते बिखर चुके थे ।अनेक शहरों को समुद्र निगल चुके थे । इन शहरों में एक शहर- मुंबई।   4 गोताखोर उसमें थे । तीन नेत्री एलियन 'हफदमस' उड़न तश्तरी के अंदर स्क्रीन से विभिन्न स्रोतों से विभिन्न सूचनाएं एकत्रित कर रहा था उड़नतश्तरी की गति बहुत धीमी हो चुकी थी । धरती पर खड़ी एक उड़नतश्तरी में से एक छोटा सा यान निकल कर आकाश में गति करने लगा था। हफदमस ने अपनी उड़नतश्तरी को नीचे धरती पर उतार दिया इस पृथु मही के अनेक बड़े हवाई अड्डों का पुनर्निर्माण और परिमार्जन किया जा रहा था ।  पेरू की प्राचीन सभ्यता इका के अवशेषों को आधुनिक ढंग से ठीक किया जा रहा था। दूर-दूर तक पत्थरों की जड़ाई से बनी सीधी और वृत्ताकार रेखाओं वाले स्थल को  पुनः जीवित किया जा रहा था। जिसकी एक दीवार पर एक राकेट बना हुआ था । राकेट के बीच में एक व्यक्ति आश्चर्यजनक हेलमेट लगाए हुए दिखाया गया था । जिसे मातृ देवी भी कहा जा रहा था। दक्षिण अमेरिका की इंडीज पहाड़ियों में बसी एक झील के पास एक प्राचीन नगर के अवशेषों को भी पुनर्जीवित किया जा रहा था। वहां के सूर्य मंदिर को पुनः स्थापित किया जा रहा था। महाभारत युद्ध के बाद विश्व में विभिन्न नगरों में इक्ष्वाकु वंश की मूर्ति निर्माण कला प्रसारित हुई थी।कोणार्क के सूर्य मंदिर के तरह पश्चिम के अनेक देशों में सूर्य मंदिर भी स्थापित किए गए थे या स्थापित की जाने लगे थे। लेकिन... लेकिन...  हफदमस उड़नतश्तरी से बाहर निकलते हुए जब आगे बढ़ा तो काले रंग के अनेक लड़के लड़कियों ने उन्हें घेर लिया और साथ-साथ चलने लगे। सन 1498 ईस्वी में जब वास्कोडिगामा भारत आया तब उन दिनों भी मुंबई वर्तमान नगर की तरह स्थापित नहीं हो पाया था।वह उस समय भी 7 दीपों के रूप में था । जहां का वातावरण पूर्ण रूप से प्राकृतिक था। इन द्वीपों पर कश्यप वंशी मछुआरे रहा करते थे जो अपने को यवन  आर्य  (ययाति पुत्र तुर्वसुवंशी)कहते थे।कुछ अपने को रावण (र - अवन) वंशी भी मानते थे। सन 1498 ईस्वी में वास्कोडिगामा की यात्रा के वक्त, उस समय का 'सर जी'- का एक चरित्र था-दितान्त ,जो कि समाज में तुर्क माना जाता था लेकिन वह अपने को यवन आर्य कहता। वह कहता था कि हमारे पूर्वज कभी कृष्ण सागर के आसपास विशेषकर आनातोलिया में बस गए थे । जो मलेक्षों में ब्राह्मण के रूप में सम्मानित थे। साइबेरिया की प्रयोगशाला से!   साइबेरिया के जंगलों के बीच एक प्रयोगशाला। तीन नेत्रधारी दो युवक रूस की एक युवती के साथ बैठे थे। सामने डिजिटल बॉल पर चल चित्र आ रहे थें। चलचित्र में--- ईशा पूर्व लगभग 567 वर्ष। तब एक पांच छह साल का बालक?जिसे कोई 'प्र-ओत', तो कोई 'प्रा-ओटा' पुकारते थे। वह समुद्री तट?! समुद्र में समुद्र की ऊंची ऊंची कुश्ती लहरों के बीच एक नौका में आंख बंद पड़ी वेदों की छोरियां सुना जाता है की वे दोनों की छोरियां भारत से आई थी समुद्री लुटेरों ने एक जहाज को लूटा था वह जहाज कलिंग राज्य भारत के किसी बंदरगाह से चला था और समुद्र में लूट लिया गया जब यह जहाज भारत से चला था तो दोनों किशोरियों बालिका थी उन्हें किसी व्यापारी ने बेच दिया था कुछ व्यक्तियों के साथ बे बालिकाएं भी समुद्र में कूद गई थी उस जहाज से लूट के दौरान आग भी लग गई थी बेहोशी हालत में दोनों एक द्वीप के तट पर लग गई थी जब होश आया तो कुछ समय उनके परेशानी और बेचैनी में बीता घास फूस पत्ते खाकर काम चलाया । उन्हें ध्यान आया की उनकी मां मुसीबत के समय आंख बंद करके बैठती थी और मन ही मन बुदबुदा टी  थी हमारी कोई समस्या नहीं है हम तो दिव्य प्रकाश से भरे हैं जिसके प्रभाव हमारे सारे विकार नष्ट हो रहे हैं दोनों उस टापू पर अधिकतर समय ध्यान में बिताते थी लगभग 5 साल बीत गए 1 दिन समुद्री तूफान आया जिसमें वह दोनों बहे गई जब तूफान शांत हुआ तो उन पर कुछ मछुआरों की निगाह पड़ी एक सन्यासी ने अपनी झोपड़ी में उसे आश्रित दिया बड़ी को  प्रे फेस नाम से व छोटी को प्रेमबल नाम से पुकारा जाने लगा। दोनों के बीच पांच छह वर्षिय प्रोटागोरस कुछ समय के लिए खेलने लगा और ध्यान करना भी सीखा। "पूर्व के सन्तों को नमन!" अपने 'राष्ट्रपिता' - राइटिंग प्रोजेक्ट के तहत हम सोंचने लगे थे कि कैसे देश के अंदर भविष्य में मुसलमानों की भूमिका घटित होने वाली है? पाकिस्तान व हिंदुस्तान का बंटवारा धर्म के आधार पर नहीं वरन एक सुरक्षित पूर्वनिर्धारित गांधार-संस्कृति     के नकारात्मक पक्ष के तहत हुआ था।जो भारत विरोधी मुहिम में शकुनि व कैकई  के समय से  लगा है।जिसकी जड़ भूमध्य सागर के क्षेत्रों तक फैली हैं। सन 1700 ई0पूर्व एशिया माइनर (वर्तमान तुर्की) से आए हिटाइट्स नामक आक्रमणकारियों ने बाबुल साम्राज्य अर्थात इराक मेसोपोटामिया सभ्यता नष्ट - भ्रष्ट कर दिया था। हिटाइट्स के साथ - साथ उस वक्त हाइकसोस खानाबदोश  आक्रमणकारी..?! हिटाइट्स तो तुर्की थे लेकिन ..... हाइकसोस ..?! हाइकसोस  खानाबदोशों ने मिस्र सभ्यता को नष्ट करने की कोशिश की थी।  अब तो कुछ मनोबैज्ञानिक तक कहने लगे हैं कि हमारे आदतों,दिनचर्या,सोंच आदि का असर इस हाड़मास शरीर के नष्ट होने के बाद भी रहता है।जो हमारे अचेतनमन में।काफी गहरे में पहुंच जाता है। वर्तमान में जो मतभेद दिख रहे हैं वह अनेक पीढ़ियों से हैं।क्यों न उनकी संस्कृति ,सभ्यता ,रहनसहन में ,पहचान में परिवर्तन होते रहे हैं।यहूदी,पारसीव हिन्दू के अलावा शेष अनेक समुदायों का आभा मंडल,सूक्ष्मजगत बड़ा ही विकृत है अब भी । अनेक व्यक्तियों के द्वारा हिन्दू देवी देवताओं पर लोग मजाक ,उपहास आदि करते रहे हैं लेकिन विज्ञान की भाषा में हमारी नजर उन देवी देवताओं के प्रति वही है जो एलियन्स के प्रति है। अनेक अध्ययनों से हमने जाना है कि जिन्हें पौराणिक कथाओं में देवी देवता आदि कहा जाता है ,वे एलियन्स ही हैं। उनकी सभ्यता हमारे इस धरती पृथु-महि के मानव -समाज की अपेक्षा काफी उच्च स्तर की व सहज-स्वाभाविक है। वे सब हम पर तो नजर रखे हैं लेकिन हमारी नजर से वे दूर हैं। भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में अब भी कुछ मूलनिवासी हैं जिनका कहना है कि हमारे पूर्वज दूसरी  धरती से आये थे जो मत्स्य मानव था। हमारा मानना है कि ब्रह्मण्ड में अनेक तरह की एलियंस सभ्यताएं है जो हमसे काफी पवित्र अर्थात सहज,स्वाभाविक व उच्चस्तरीय ज्ञान की हैं। दुनिया के अनेक पुरातत्विक अवशेषों से ज्ञात होता है कि समय समय पर एलियंस इस धरती पर आते रहे हैं और मानव समाज को प्रशिक्षित करने की परिस्थितियां तैयार करते रहे हैं। अपने इस 'भबिष्यकथांश' - राइटिंग प्रोजेक्ट में हमारा एक कैरेक्टर है - भबिष्य व अशोक। जिसके माध्यम से हमने एलियन्स की अनेक सभ्यताओं का जिक्र किया है।

मंगलवार, 28 जून 2022

एलियन्स के आने से संभावना!?

नीचे सिर झुकाए एक युवक धीमी गति से टहल रहा था। "हूँ, इस धरती पर सबसे खतरनाक प्राणी मनुष्य क्योंकि वह मनुष्य है ही नहीं।" सर जी ठीक कहते हैं कि इस धरती के लिए ही नहीं वरन पूरे ब्रह्मांड के लिए खतरा बन चुका है है यहाँ का मनुष्य। मानव समाज के अंदर मानव जाति मजहब के नाम पर एक दूसरे का कत्ल भी करने के लिए तैयार है। ऊपर वालों की नजर में यह सब कुछ नहीं है।इस धरती पर ही है हम सब के द्वारा बनाये गए जाति मजहब। तो फिर हम ऊपर वालों की नजर में बेहतर कैसे? हम उनका मर्डर करने को तैयार बैठे हैं जो हमारे पैगम्बर के बारे में ऐसा कहता है जो हमें बुरा लगता है। जिसका हम मर्डर करने को तैयार बैठे हैं उसका क्या फैसला करने वाले हम कैसे?क्या कुदरत व खुदा उसके कर्मों का परिणाम उसे भुगतवाने के लिए सक्षम नहीं है? अमेरिका के वाशिंगटन में किसी गुप्त स्थान पर एक मीटिंग हो रही थी। इस मीटिंग में वायुसेना कर्मी, अंतरिक्ष वैज्ञानिक,कुछ दार्शनिक ,डॉक्टर आदि उपस्थित थे। एक वृद्ध जिसके सिर व दाड़ी के बाल काफी।है हुए छिपाए सम्भावनाएं अनेक लंबे लंबे थे। वह बोल रहा था कि एलियन्स को बुलाना यहाँ अनेक सम्भावनाएं छिपाए हुए है। वह युवक कुर्सी पर बैठ गया। जब इस धरती पर एलियन्स आक्रमण करना शुरू करेंगे तो क्या मानव की वर्तमान आदतों, आचरणों में बदलाव होगा? एलियन्स को धरती पर बुलाने वालों को अभी से ही कोई जय चन्द्र, कोई द्रोही, कोई गद्दार कह कर पुकारने लगा है जबकि अभी एलियन्स की गतिविधियां तेज नहीं हुई हैं। एलियन्स आक्रमण से सर जी मानवता की संभावनाएं भी तलाश रहे हैं। मानव समाज को एक ऐसा व्यक्तित्व चाहिए जो कि मानव समाज को जाति मजहब से ऊपर उठ कर मानवता से जोड़ सके लेकिन अभी ऐसा असम्भव है।ऐसे में एलियन्स आक्रमण से ही मानवता जागरण के अवसर पैदा हो रहे हैं। ।

शुक्रवार, 24 जून 2022

सूर अज पर विस्फोट ?! #अशोकबिन्दु

 सूरज पर विस्फोट?!कुछ दिनों से तेज हो गए हैं सूरज पर विस्फोट.....#अशोकबिन्दु

#अग्निवीर  


सूर+ज....?! सूर+अज...!?

.

.

हम सन्तों व वैज्ञानिक  की वाणियों से किशोरावस्था से ही प्रभावित होते रहे है। तभी से हम सूरज पर विस्फोट के बारे में भी सुनते आये हैं।

वे गृह युद्ध, राजनैतिक अस्थिरता, विश्व युद्ध, अनाज दिक्कत आदि का भविष्य में जिक्र करते रहे हैं सूरज पर विस्फोटों की बात भी करते रहे हैं।जिसको सबसे ज्यादा #भारत और #अफ्रीका झेलेगा।100करोड़ जनता लगभग प्रभावित होगी।

और इसके साथ ही हम बता दें कि उत्तर भारत के नीचे हजारों परमाणु बमों के बराबर ऊर्जा हरकत में है। जो यदि एक साथ #भूकंप के माध्यम से ऊपर आ जाये तो सम्भवतः पूरे एशिया व यूरोप का भविष्य ही हजारों साल तक प्रकृति परम्परा को खो दे।


और हम..?!आप जानते होंगे कि धरती अनेक शैलो, चट्टानों के टुकड़ों से बनी है ।जिनके बीच #दरारें बढ़ती सिमटती रहती हैं। जिसका असर समुद्र के अंदर भी है।समुद्र के अंदर जहां एवरेस्ट के समान पहाड़ियां है वहीं दूसरी ओर अनेक दर्रे व गुफाएं भी हैं। हां, हम कह रहे थे कि भविष्य में चट्टानों के बीच दरारें बढ़ती व सिमटती रहती हैं।जिसका असर भी #भविष्य में भारत और अफ्रीका को देखने को मिलेगा।


भारत का कभी भी किसी आक्रमण से नुकसान नहीं हुआ है।

आक्रमकारियों,घुसपैठियों, विदेशी एजेंटों को भारतीय मदद से नुकसान हुआ है या प्राकृतिक प्रकोप, गृह युद्ध से नुकसान हुआ है। हमें नहीं लगता कि भारत को विश्व युद्ध से ज्यादा नुकसान होगा अन्य देशों की अपेक्षा लेकिन भारत को भारत के लोगों से ही नुकसान होगा।


कुछ भी कहें यहाँ की सरकारों, शासकों में कमी तो रही है।एक देश या राज्य को क्या चाहिए ?इस पर देश या राज्य ने गम्भीरता से कार्य नहीं किया।देश या राज्य ने नागरिकों का स्तर देश या राज्य के लिए बड़ा महत्व पूर्ण रहा है।इस लिए हम कहते रहे हैं कि सबसे बड़ा #भ्रष्टाचार है शिक्षा ।हमारे देश व राज्य के नागरिक कैसे होने चाहिए ?इसका फैसला शिक्षा ही कर सकती है लेकिन #शिक्षा जैसी होनी चाहिए वैसी है ही नहीं।


हां, हम यहां पर #सूरज पर #विस्फोट पर चर्चा कर रहे थे।


सूरज का इस धरती के लिए काफी महत्व रहा है लेकिन इन विस्फोटों से पुनः एक बार 100 करोड़ स्त्री पुरुष व बच्चे प्रभावित होने वाले हैं। मध्यएशिया, अरब आदि के भांति सूरज के विपरीत खड़े होने से काम नहीं चलने वाला। भारतीय संस्कृति ने अमेरिका, यूरोप में तक सूर्य मंदिर दिए हैं।मंदिरों का दर्शन सिर्फ मूर्ति पूजा तक सीमित नहीं था।मूर्ति पूजा तो काफी दिनों के बाद शुरू हुई है।मंदिर,हम यहां पर 1500 वर्ष पुराने मंदिरों की बात कर रहे हैं, वे एक दर्शन का पर्याय हैं जो स्वयं में अनेक विविध रहस्य छिपाए हैं।इसके साथ ही व्रत परम्परा का भी मानव के जीवन में बड़ा महत्व है।ऐसे में एकादशी व्रत विशेष रूप से निर्जला/भीम एकादशी व्रत का बड़ा महत्व है ।इस पर तो वैज्ञानिक भी अब महत्व को कह रहे हैं।व्रत का मतलब है, हमें किसी बचाव के लिए  कृत्रिमताओं, बनावटी बस्तुओँ, दुनियाबी वस्तुओं का इस्तेमाल कम से कम करना। हम भी प्रकृति का हिस्सा हैं।हमें पांच तत्वों में साधना में रहकर  पारंगत करने की जरूरत है। हमे अपने अंदर के स्वतः, निरन्तर, शाश्वत से जुड़ने की आवश्यकता है। निरन्तर अभ्यास से हम अपने अंदर के ही स्वतः, निरन्तर, शाश्वत से जुड़कर जगत और ब्रह्मण्ड के स्वतः, निरन्तर, शाश्वत से जुड़ने का उपक्रम शुरू कर सकते हैं। जहां से बसु परम्परा की एक स्थिति की ओर हम बढ़ते हैं।

#अशोकबिन्दु  #विश्वबन्धुत्व  #अखण्डभारत  #तृतीयविश्वयुद्ध  #मिशन2025  #मिशनpok  #लोहिया  #श्यामा_प्रसाद_मुखर्जी  #सुभाषसेना  #अग्निवीरों


शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

उफ्फ, यह क्या?!


 


"सर जी ने अपनी डायरी में  लिखा है कि 22 अप्रैल 2022 की रात्रि वे सो न सके थे। "

"आखिर क्यों"

"लोक मत में 19 अप्रैल 2022 को प्रकाशित एलियन्स सम्बन्धी समाचार को 22 अप्रैल 2022 की सुबह को जो देखी थी, उस को लेकर...."


 सर जी लगातार  17 - 18 अप्रैल की रात्रि को निद्रा, अर्द्ध निद्रा आदि की दशा में धरती पर एलियन्स को उतरते देख रहे थे।


सर जी हमें बताते रहे हैं कि धरती के कुछ वैज्ञानिक व राष्ट्राध्यक्ष मानते हैं कि एलियन्स हैं और वे धरती पर आक्रमण भी कर सकते हैं। अमेरिका से उनके सम्बंध भी हो सकते हैं।हम तो यही कहेंगे कि अमेरिका से उनके सम्बन्ध हैं।





सर जी का कहना रहा है कि हमारे मास्टर जी बाबूजी महाराज और