Powered By Blogger

रविवार, 3 जुलाई 2011

ओशो जन्मशताब्दी वर्ष :एक झलक!



श्री रामचन्द्र महाराज फतेहगढ़ की पुण्य शताब्दी!!

ओशो जन्मशताब्दी !

यानि कि-
2031

हिन्द भूमि पर ओशो जन्मशताब्दी समारोहों व श्री रामचन्द्र जी फतेहगढ़ की पुण्य तिथि शताव्दी समारोहों का सिलसिला प्रारम्भ हो चुका था.विदेशों से भी इसकी खबरें थीं.



प्रात:काल का समय ! अभी सूर्य उदित भी न हुआ था.चर्चित अकेले ही पैदल गांव से बाहर खेतों की ओर चल दिया था.शीत ऋतु,हल्का हल्का कोहरा छाया हुआ था.खेतों में चारो ओर सरसों लहलहा रही थी.चर्चित अपने में खोया खोया आगे चलता जा रहा था.



अचानक!


चर्चित ने अचानक इधर उधर देखा -
उसके होंठों पर मुस्कान जगी.चर्चित चारो ओर से राइफलधारियों द्वारा घिरा हुआ था.वह मुस्कुराते हुए आगे बढ़ा.



"ठहरो!" - और एक ने चर्चित की ठोंढ़ी पर राइफल की नाल तान दी लेकिन चर्चित के होंठोँ पे मुस्कान ही थी.



चर्चित का स्थिर शरीर , लेकिन अपनी चलायमान आंखों से सामने उपस्थित राइफलधारियों के चेहरों पर नजर डाली.


फिर-


जिसने चर्चित पे राइफल तान रखी थी,उसके चेहरे पर पसीना देख कर,


"ऐसा काम क्यों करते हो जिससे भय पाये दिल?तुम तो अनेक राइफलधारियों के साथ हो,ऐसे में डर....?क्या दिल मेँ असलियत चुभ रही है और ऊपर से ढोंग किये जाते हो? "



"ऐ,स्पीच देना बन्द कर." -दूसरा बोला.


उसे देख कर चर्चित-

"रण में जाया जाता है,बुजदिली से नहीं जाया जात.तुम की ये आवाज भी बनी बनायी है,दिल की आवाज नहीं है . "



"हमें तू डिगा नहीं सकता."


एक बोला-

"हम लोग तुम्हारे साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं करना चाहते .हम लोगों का कहना है कि यदि तुम भला चाहते हो तो अपना प्रचार प्रसार बन्द करो,नहीं तो फिर.... ."


"नहीं तो फिर......"


"हमारा कहना मानो."



"हम....?वह भी तुम्हारा!बड़े हिम्मती बनते हो तभी तो हम लोगों की बातों का जबाब बातोँ से न दे अपनी राइफलों पर गुमान करते हो.स्वयं तुम.........?!और इस शरीर को मार भी दोगे तो भी मेरे शरीर को ही सिर्फ नष्ट करोगे मुझे नहीं.इससे अच्छी और क्या बात होगी कि मेरे शरीर का मरना भी तुम लोगों के शायद काम आये."



सब एक दूसरे का चेहरा देख रहे थे.चर्चित के होंठों पे हल्की सी मुस्कान अब भी बनी हुई थी.



चर्चित पर तानी गयी राइफल हटा ली गयी.




शाम को व दूसरे दिन सुबह -



समाचार पत्रों,टीवी चैनलों व आकाशवाणी ने ओशो जन्मशताब्दी पर प्रकाश डालने के साथ चर्चित के सामने राइफलधारियों के समर्पण की घटना को भी हाईलाइट किया गया था.जानकारी दे दूं कि अब भी कुछ लोग ओशो व ओशो जन्मशताब्दी कार्यक्रम के खिलाफ थे.




एक नवयुवती कुर्सी पर बैठी मेज पर डायरी रख कर उस पर कुछ लिखे जा रही थी.सामने विस्तर पर ओशो जन्मशताब्दी समारोह सम्बन्धी अनेक सामग्री पोस्टर बैनर आदि बिखरे पड़े थे .



कुछ समय पश्चात उस नवयुवती ने लिखना बन्द कर दिया और अपने गुलाबी होँठों पर सुन्दर डाटपेन टच कर रखी थी.


वह मन ही मन-"ओशो ने कहा था कि न मुझे स्वीकारो और न ही हमें भूलो."



जम्हाई लेते हुए उसने ओशो की तश्वीर पर निगाह डाली.



फिर वह युवती डाटपेन मेज पर रख कर कमरे से बाहर निकल कर बरामदे में पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी.


कुछ मिनट बाद वह कुर्सी से उठ बैठी .



अब वह एक सड़क पर कुछ युवक युवतियों के थी.कुल सात थे,तीन नवयुवक व उस सहित चार नवयुवती.सभी अपनी अपनी साईकिल पर थे.सब अपने अपने माथे पर एक एक भगवा पट्टी बांधे थे ,जिस पर लिख था-ओशो.



आगे सड़क पर एक विशाल पीपल व उसके समीप एक बिल्डिंग नजर आ रही थी.



एक नवयुवक उस नवयुवती को देख कर -


"ओ मेरी मोनिका! क्यों न ......"


" देख मैं कितनी बार कह चुकी हूँ कि......कहाँ मोनिका और कहां मैं ? मैं तो उसके पैर की जूती तक नहीं.अब अपनी बात बोल."



" मैं मानता हूँ तेरी बात लेकिन यहां इस सोसायटी में तो तू ही मोनिका भांति,तू ही....(फिर मुस्कुराते हुए) क्यों न आगे पीपल नीचे कुछ पल रुक लिया जाये."



" जैसी मर्जी " - वह नवयुवती बोली.



फिर सभी आकर पीपल के नीचे रुक गये.



पड़ोस में एक हैण्ठपम्प था.उसके समीप एक विशाल बरामडा.आगे कुछ दूरी पर दो मंजिल कई कमरों सहित एक बिल्डिंग,जिसके सामने श्री कृष्ण की आदम कद एक प्रतिमा लखी थी.पीपल वृक्ष के दूसरी ओर एक छोटा सा बरामडा,जिसके ऊपर एक कमरा व बरामदा बना हुआ था.छत के इस बरामदा पर खपरैल पड़ा था.



सातो युवक युवतियां चबूतरे पर बैठ आपस में बात करने लगे थे.


कि-


एक गेंहुआ व स्वेत वस्त्रधारी अधेड़ उन ओर आया तो सभी उठ कर उससे नमस्ते करने लगे.


वह अधेड़ बोला-

"हां भाईयों एक खुशखबरी दे दूँ.व्यवस्था समिति यहां ओशो की प्रतिमा लगवाने के लिए मेरा सुझाव पर मान गयी है."

यह नवयुवती ओर कोई नहीं मंजुला ही थी.मंजुला बोली-
"धन्यवाद."
"अरे हम तो..... भाई आप जैसों के सामने विशेष रुप से चर्चित के सामने मैं नतमस्तक हूँ.मुझे अखबार से सूचना मिली कि चर्चित ने अकेले ही सशस्त्र बल से अपनी वाकपटुता माध्यम से कैसे मुकावला किया.वास्तव में अब बुद्ध कृष्णा के तटस्थ मार्ग पर तुम.

शनिवार, 2 जुलाई 2011

सन चार हजार साठ ई0 की त��यारी ....

चर्चित इस समय नवयुवती मंजुला के साथ था.


"अशोक सन छियानवे के बाईस जून को इस धरती से जा चुका था लेकिन उसकी कल्पनाओं को विस्तार देना अभी काफी बाकी है.अशोक भी कहा करता था कि मुझमें इतना भण्डार है कि एक हजार बार जन्म होने के बाद भी उसे कागजों पर नहीं उतार सकता.कहानी के अन्दर कहानी ,हर पात्र पर एक श्रंखला...."



"अभी पुरानी बातें छोंड़ों ....चर्चित,भविष्य की बातें छोंड़ो.वर्तमान की बात करो .अगले ओशो जन्मशताब्दी वर्ष के व्यवस्था सम्बन्धी......!? "


दूसरी ओर अधेड़ उम्र का एक व्यक्ति-किशोर.वह एक वैज्ञानिक अनुसंधानशाला में एक सेमीनार मेँ शामिल था.जिसमें निर्णय लिया जा रहा था कि डायनासोर के जीवित अण्डों पर कार्य करके डायनासोर की नस्ल की उत्पत्ति की जाए.



"नहीँ,मैं नहीं बर्दाश्त कर सकता.आप लोगें का निर्णय मेरी दृष्टि से प्राकृतिकता नहीं " - फिर गोष्ठी के मध्य से किशोर उठ बैठा तो लोगों में प्रतिक्रिया हुई-"रुकिए सर!रुक जाईए सर!कहाँ चले?" - आदि वाक्य लोगों के मुख से निकले लेकिन किशोर न रुका,वह वहां से चलता बना.



किशोर जब बाहर आया तो अपने पच्चीस वर्षीय बेटे को देख कर -"सुबिधा कहां है?"तो उसका बेटा उससे बोला-"पापा,वो तो नहेसुडेल्स के साथ गयी है."किशोर बोला-"चलना नहीं है उसे,उसे बुलाओ."

" वो तो अभी मना कर रही है ."


"तो मैं चलता हूं.तुम उसे ले आ जाना."-कहते हुए किशोर अपने यान की ओर बढ़ गया.
यान के दक्षिण ओर उसकी सात वर्षीय पुत्री सुविधा अपने हमउम्र तीन नेत्रधारी एक लड़की-नहेसुडेल्स के साथ
यान की ओर ही आ रही थी.इधर पीछे गोष्ठी भवन से ग्यारह फुटातीन नेत्रधारी व्यक्ति किशोर की आ रहा था.



सुविधा पास आते हुए किशोर से बोली-"आप तो अभी ही जा रहे हैं?"



" हां ,बेटी! मैं चलता हूँ.तुम भाई के साथ आ जाना. "


तब तक तीननेत्रधारी
व्यक्ति किशोर के समीप आ कर बोला-"सर,सुप्रीमो रुकने को कहते हैं."



"नहीं,मैं नहीं रुक सकता."


फिर किशोर अपने यान के अन्दर पहुंच गया.यान उड़ने के कुछ समय पश्चात अन्यत्र उतर गया.दो युवतियां जिसका इन्तजार कर रही थीँ.
किशोर जब यान से उतर कर आगे चल दिया तो दोनों युवतियां उसके दायें बायें चल दीँ.कमरे में जा कर किशोर कुर्सी पर बैठते हुए-


"न जाने उन्हें क्या हो गया?मैं तो नहीं चाहता कि अपनी इस धरती पर पुन:डायनासोर अपना अधिपत्य जमायें."


"लेकिन सर,डायनासोर यहां अधिपत्य कैसे जमायेँ? "



किशोर कुछ सोंचने लगा.







अब से लगभग बीस वर्ष पूर्व लगभग सन बीस सौ बारह या पन्द्रह की दो अक्टूबर तिथि-गांधी जयन्ती.


गांधी शास्त्री जयन्ती !



एक विशाल जनसभा !

मंच के पीछे तीन विशाल आकृतियां बनी थीं,जो दो स्पष्ट थी-गांधी व शास्त्री का चेहरा लेकिन तीसरा चेहरा अस्पष्ट था.उस पर अखण्ड भारत का नक्शा बना था.जिस पर लिखा था-दो अक्टूबर.


अनेक वक्ता बोल चुके थे.मंच का संचालन एक विकलांग सुन्दर युवती कर रही थी.



जब मंच पर एक वृद्ध व्यक्ति प्रवेश करता है तो सारा माहौल गूंज उठता है-जय विश्व ! जय ब्राह्माण्ड! !



जय विश्व जय ब्राह्माण्ड से सारा बातावरण गूंजते देख कर वह वृद्ध प्रफुल्लित होते हुए बोला-


"मैँ खुश हूँ कि एक लेखक मात्र की कल्पनाओं में गुञ्जारित होने वाला यह जयघोष इतना शीघ्र जनमानस मेँ छा गया लेकिन हमें मन से भी लक्ष्यों की ओर जाने का परिवेश बनाना होगा.आज दो अक्टूबर है ,सब जानते हैं.हमारे गांधी जी की भी कल्पना थी कि एक विश्वसरकार स्थापित हो.अपनी संस्कृति तो वसुधैव कुटुम्बकम की बात करती आयी है.अच्छाईयां होती हैं जहाँ ,तो वहां बुराईयां भी है.गांधी जी शास्त्री जी......."




अब सन बीस सौ चौबीस आने को आयी. आर एस एस अपनी स्थापना की 100 वीं वर्षगांठ की तैयारी कर चुका था। वह राजनीति के माध्यम से भी अपना अस्तित्व चमक में लिए था..चर्चित मंजुला के साथ था.चर्चित मंजुला से कह रहा था-



"उस मंगल यात्रा के बाद लेखक अशोक एवं उसके साहित्य का जिक्र समाचार पत्रों में एक बार फिर चर्चे में था."



"तो फिर अशोक के साहित्य में वर्णित उस अशोक शक्ल का भी चर्चा होगा. क्योंकि लेखक अशोक ने एक जगह पर अपने शक्ल के......... ."



"और फिर वह वृद्ध....."



"हूँ ....हूँ...."चर्चित मुस्कुराते हुए गर्दन हिलाता है.



और -

" प्रशासन के बीच एक बार वह वृद्ध बोला था कि मैं वो अशोक शक्ल नहीं हूं,चाहें मेरा परीक्षण भी करवा लें .कहां अशोक की उम्र कहां अशोक की उम्र और कहां वह वृद्ध...?! "





किशोर की एक न चली थी.



अधेड़ किशोर चिन्तित था कि वैसे भी पृथ्वी खतरे में है.भविष्य त्रिपाठी के अनुसार आगे दो सौ वर्षों के अन्दर हिन्दप्राय द्वीप दो भू भागों में विभक्त होने वाला है . ऊपर से यह सिरफिरे वैज्ञानिकों के हाथ डायनासोर के जीवित अण्डें क्या लगे कि वे इस धरती पर डायनासोर नस्ल को पुनर्जीवित करने का ख्वाब देखने लगे हैँ.



लेकिन...



अब सन चार हजार साठ !



वनमानव के दोनों पैर कांटों से घायल थे.

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

सन2031ई0:यहां ऐसे वो.

हिमालय प्रकृति की अनुपम देन !
चारो ओर बर्फ ही बर्फ!कुछ समय पश्चात....लेकिन यह क्या....?!ताज्जुब......?!एक चोटी पर का वर्फ तेजी के साथ पिघलने लगा था.सिर्फ एक चोटी पर ही ऐसा क्यों?




एक अण्डाकार अन्तरिक्ष यान हिमालय के एक स्थान पर उतरा.इस यान से एक तीननेत्रधारी बालिका के साथ तीननेत्रधारी दो युवतियां बाहर आयीं थीं.इन तीनों के स्वागत में एक चार वर्षीय बालक अपने माता पिता के साथ खड़ा था.

उस तीन नेत्रधारी बालिका का नाम था-माजेडीसीकल दी.जो चार वर्षीय बालक से बात करने लगी थी.यह चार वर्षीय बालक काफी उम्र का लगता था.




इधर-


हिमालय की एक चोटी ,जिसका वर्फ तेजी के साथ पिघलने लगा था.
जब सारा वर्फ पिघला तो....?!यह क्या.....?!यह चोटी तो शीशे की बनी......



कि-


पिरामिड आकार की इस इमारत के सभी शीशे एक पुष्प के पंखुड़ियों की तरह खुल गये.जिसमें से एक यान निकल कर तेजी से आकाश में उड़ने लगा.



और फिर वह पंखुड़ियों की तरह के शीशे ......?!शीशे पूर्व स्थिति में आ गये.अब फिर वही चोटी सा.धीरे धीरे कर उस पर वर्फ जमने लगी.




* * *



भयंकर जंगल!


जंगल मेँ एक ओर डायनासोर व दूसरी ओर विशालकाय अजगर .जंगल के किनारे एक पहाड़ी पर स्थित दुर्ग,जिसके अन्दर एक बालक श्री कृष्ण की प्रतिमा के सामने हाथ जोड़े आंख बन्द कर बैठा था.



यह जंगल अन्य धरती का नहीं अपनी इस धरती का ही,लगभग सन चार हजार साठ ई0का रहा होगा.दक्षिणी भाग में-




एक विशालकाय डायनासोर उत्तर पश्चिम की ओर तेजी के साथ आगे बढ़ता जा रहा था.वह डायनासोर झाड़ियों के मध्य एक खण्डित दीवार को पार कर जब आगे बढ़ता है तो झाड़ियों से घिरी एक चबूतरे पर लगी ओशो की प्रतिमा से टकरा जाता है.उस छोटे से चबूतरे सहित वह प्रतिमा गिर जाती है.



एक आदिमानव नग्न अवस्था में एक पेंड़ से दूसरे पेंड़ पर छलांग लगाते हुए आगे जा रहा था.डायनासोर को देख कर एक पल तो वह वनमानव भयभीत हुआ फिर वह तेजी से छलांग लगा ज्यों ही दूसरे पेंड़ पर पहुंचा त्यों ही जिस वृक्षशाखा को उसने पकड़ा ,वह शाखा सहित नीचे आ गया.पीछे डायनासोर काफी नजदीक था .वह तेजी से आगे भागा लेकिन आगे एक विशालकाय अजगर को देख वह ठिठका.उसके पैरों से खून निकल रहा था.ऐसा कांटे चुभने के कारण हुआ था.तेजी से दौड़ते दौड़ते वह जमीन पर गिरी ओशो की प्रतिमा के पास आ गया.उसने एक विशाल पत्थर उठा कर उसकी ओर मुख बढ़ाते डायनासोर के चेहरे पर मारा.जिससे डायनासोर की बायीं आंख फूट गयी.फिर भी डायनासोर को आगे बढ़ते देख उसने ओशो की प्रतिमा उठा ली कि आसमान से आयी तेज किरणों से डायनासोर स्थिर हो जमीन पर गिर पड़ा.ओशो की प्रतिमा ऊपर उठाये उठाये ही उसने ऊपर देखा-आसमान पर वही यान उड़ रहा था जो कि वर्फीली चोटी के नीचे से निकला था.


स्क्रीन पर दिखायी दे रहा था कि एक बालक प्रार्थना में था.


अपने समीप बैठे एक एक युवक से युवती बोली-"चर्चित! यह बालक कौन है?"


"मंजुला,आगे सब जान जाओगी."



चर्चित पुन: मंजुला से बोला-

"किशोर की कल्पनाओं के माध्यम से युवा लेखक अशोक ने आगे दो हजार तीस वर्ष बाद के अपने काल्पनिक जगत में जाने का प्रयत्न किया."


"हूँ"-मंजुला सिर्फ गर्दन हिला देती है.




चर्चित फिर मुस्कुराते हुए बोला-
"गणेश जी को देख आयीं?"


" हां "


फिर

"बीसवीं सदी में जुरासिक पार्क,द लास्ट वर्ल्ड,जैसी फिल्में लोंगों के लिए मनोरंजन मात्र बन कर रह गयी थीं लेकिन वे फिल्में एक संकेत भी थीं भविष्य की,लेखक अशोक के अनुसार."



"बाईस जून को यदि लेखक अशोक की मृत्यु न होती तो शायद हमारी उससे मुलाकात होती."



"सम्भवत:...."



"सन उन्नीस सौ चौरानवे के बाद रोबोट कृत डायनासोर लोगों के लिए विशेषकर बच्चों के लिए एक अच्छा मनोरंजन बन गये थे लेकिन अशोक की कल्पना के अनुसार चवालीसवीं सदी के बाद इस धरती पर भी डायनासोर........"



"हूँ! जैसा तुम जिक्र कर चुके हो,चर्चित."



इस धरती पर डायनासोर....?चवालीसवीं सदी के बाद .....?!



कैसे..?




यहां ऐसे वो....



डायनासोर के वे जीवित अण्डे इस धरती पर कहां से आये ? किशोर अपनी उम्र की अधेड़ावस्था में जी रहा था .उसने इन अण्डों को नष्ट करने की वकालत की थी लेकिन उसकी न सुनी गयी.


"क्या सोंच रहे हो?"
"सोंचता हूँ- सन 610 ई0 से पहले भी यवन हिन्द द्वीप के लिए खतरनाक थे। हिंदुओं,पारसियों, यहूदियों के लिए खतरा थे अब भी हैं।"

"आत्मघाती बनने को तैयार रहे है ये ।"

"ये विषाणु बम भी विषकन्याएं भी बनाने को तैयार हैं।इन्हें सारी मनुष्य जाति, धरती में शांति से मतलब नहीं।"

"तभी तो...सन2020 ई0 में ये भारत सरकार की समस्या बन गए।"
"इस साल की बात करो।क्या धूमकेतु पृथु महि से टकराएगा?"
"कुदरत जाने।"


सोमवार, 23 मई 2011

सन 2011ई0 की मई........... र��हुल गांधी अचानक स े स���ी देयोल हो गए

राहुल गांधी अचानक से सनी देयोल हो
गए
*गुंजेश*
*दखल की दुनिया *

अगर यह समझना हो कि कैसे 'पापुलर तरीकों' का प्रयोग कर शोहरत बटोरी जा सकती है
तो हमें बुधवार को राहुल गांधी के द्वारा किये गए धारणा प्रदर्शन और उसके बाद
होने वाली गिरफ्तारी का अध्ययन करना चाहिए। इस घटना को जिस तरह से समझाया
दिखाया गया है उससे राहुल गांधी एकदम हीरो दिख रहे हैं। किसानों के मसीहा नज़र
आ रहे हैं। राहुल गांधी अचानक से सनी देयोल हो गए।
पढ़ते रहिये...
यह था एक बेवसाईट पर उन दिनों .




सन 5020 ई0 का किसान दिवस.

सब कुछ बदल चुका था।इक्कीसवीं सदी के अधिकतर नायक  खलनायक हो गए।
चीन, सेक्युलरवाद, कांग्रेस, सपा आदि का मुस्लिम प्रेम देश में अनेक विषंगतियाँ ला दी थीं।
एक नेता ने देश की अनेक समस्याओं को कम तो किया था लेकिन 85 प्रतिशत जनता को अनेक परेशानी झेलनी पड़ी थीं। कुछ लोग इसके लिए उनको ही दोषी मानते थे।
85 प्रतिशत लोग जीते भी किस सम्भावना से?85 प्रतिशत ही क्या उस वक्त 98.08प्रतिशत लोग भूतगामी ही थे।


मंगलवार, 17 मई 2011

विप्लव विकल्प विक ास सरकारी दमन में अगला

शर्म आती है हिन्दुस्तानी कहते हुए अपने को.

कहाँ है मीडिया ! क्या इस बार कोंग्रेस मीडिया को नहीं खरीद पाई या उससे अच्छी
बोली बलात्कारीओं ने दे दी .

2011/5/17 Ashu

> *ग्रेटर नोयडा ,भट्टा पारसौल में मायावती सरकार के पुलिसिया गुंडों ने लगभग
> ८० किसानों को मारकर वहीँ जला दिया...गांव की सारी फसल जला दी गयी.महिलाएं
> शौच के लिए घर से बाहर नहीं निकल रही लगभग ११० महिलों के साथ पुलिसिया गुंडों
> ने बलात्कार किया...हाँ उत्तर प्रदेश सरकार के रिकॉर्ड में कोई लापता नहीं
> है और सिर्फ २ किसान मरे..*
>
> **
>
> *लगभग ५०० ग्रामीण लापता हैं...मीडिया चुप बैठा है...और खबर दिखाई भी तो जिन
> पे जुल्म हुआ उनका कवरेज कम और राहुल बाबा का ज्यादा... *
>
> *आज भारत में जिस तरफ देखें जमींन की लूट चल रही है...कुछ परदे के पीछे ,कुछ
> लालच से,कुछ मायावती सरकार की तानाशाही के रास्ते पर चलकर हत्याएं करवाकर..
> विकास की चकाचौध और अर्थव्यवस्था का गणित समझकर हमारी माननीय केंद्र सरकार भी
> एक के बाद एक परियोजनाओं को हरी झंडी दिखा रही है और अब किसी से छिपा नहीं
> है की इन सबकी दलाली भी ये नेता और कार्पोरेट खा रहें हैं...किसान से जमीन ली
> जाती है १ लाख रूपये या उससे कम के मुआवजे पर और बेचीं जाती है २ करोण
> रूपये एकड़ बिल्डरों को..अब तो मुझे लगता है हमे अरब खरब नील या मिलियन
> ट्रिलियन से आगे जा कर कोई नयी इकाई बनानी पड़ेगी सरकारों की इस दलाली की
> गाड़ना के लिए ..*
>
> *अगर नोएडा की बात करे तो नोएडा रूपी राक्षस बढ़ता ही जा रहा है..कभी फेज -
> २,कभी नोएडा एक्सटेंसन तो कभी ग्रेटर नोएडा तो कभी ग्रेटर नोएडा एक्सटेंसन...
> किसनो की खेती की जमीन का अधिग्रहण औने पौने दामों पर करके सरकारें सद्दाम
> हुसैन और हुस्नी मुबारक की तरह अपना घर भर रही हैं..काहिरा और इराज के लोग
> सौभाग्यशाली थे की एक ही मुबारक या एक ही सद्दाम था ..भारत की विडंबना ये है
> की यहाँ तो सददामों और हुश्नियों की पूरी फ़ौज ही है..मायावती ,राहुल गाँधी ,
> शरद पवार,अमर सिंह,कर्णाटक के रेड्डी ऐसे कुछ गिद्धों के नाम हैं जो इस देश
> को नोच नोच कर खा रहें हैं और हम अपने वातानुकूलित घरों में बैठे जश्न मना
> रहे हैं..भले ही ८० करोड़ लोगो को रोटी नहीं मिले २ जून की, नोएडा से आगरा तक
> दिल्ली-आगरा एक्सप्रेस वे बनेगा वो भी किसानों की लाश पर उनकी घरों की
> महिलाओं की इज्जत की कीमत पर..कारण सिर्फ इतना है की सरकार को तो बिल्डर और
> दलाल चलातें हैं..अब ये जमीन जो अधिग्रहित की जा रही है हजारगुना जयादा दाम
> पर बिल्डरों को बेचीं जाती है..उसमें भी दलाली खाते है हमारे जनसेवक और नेता
> जी लोग..उसके बाद इन दलाली के पैसों को रियल इस्टेट में इन्ही बिल्डरों के
> यहाँ लगा देते हैं इस देश के कर्णधार बिल्डर से फ्लैट खरीदने वाला भी आम आदमी
> , जो पुरे जीवन किश्त भरता है और वो दलाली की कमाई अब तक १० गुना बढ़ चुकी
> होती है...वो भी बिलकुल सफ़ेद धन...
> पिछले कुछ सालों में इस आर्थिक चकाचौंध की दौर में बिल्डरों और दलालों की
> एक पूरी व्यवस्था भी बन गयी है जो प्रकारांतर से सरकारी और पुलिसिया सहयोग से
> निरीह ग्रामीणों का सुनियोजित दमन कर रहा है और चुकी ये खबर समाज के सबसे
> कमजोर तबके से है इसलिए बहुत आसनी से इसे दबा दिया जाता है..इस कार्य में सभी
> पार्टिया सामान रूप से भागीदारी कर रही हैं...अगर यही खरोंच किसी युवराज की
> गाड़ी पर आई होती तो हम आप और मीडिया शुरू कर देता चिल्ल पों मचाना ..मगर जो
> मरा,जो जलाया गया वो किसान है..क्या हुआ जो हम उसकी मेहनत का पैदा किया हुआ
> अन्न ठूस ठूस कर कहते हैं हम सब तो अब नमकहराम होते जा रहे हैं..मरने दो उसे
> ..होने दो उसकी बेटियों का बलात्कार किसान होता ही है इसलिए...*
>
> *अब न तो उन किसानों के लिए कोई जंतर मंतर पर धरना होगा न ही ब्लॉग लिखा
> जाएगा न ही कोई कैंडिल मार्च होगा..क्यूकी आज की व्यवस्था और परिवेश में
> हमारी सोच है की "IT HARDLY MATTERS TO US " *
>
> *अब मेरी उम्र का किसी किसान का लड़का हाथ में बन्दूक उठा ले तो उसे माओवादी
> कहा जाएगा..क्या करेगा वो..बाप की लाश भी नहीं छोड़ी इस सरकार ने ..माँ और
> बहन का सामूहिक बलात्कार पुलिसिया गिद्धों ने उसके सामने किया फिर भी हम
> कहेंगे की अहिंसा परमो धर्मः....किसान किसी को मारे तो वो मुख्य समाचार बन
> जाता है और ८० किसानों को जला दिया गया उसकी चर्चा भी नहीं..ये SEZ बना कर
> दलाली खाने का जो खेल सरकार ने शुरू किया है वो कई नंदीग्राम और सिंगूर पैदा
> करने वाला है...क्यूकी व्यवस्था से असहाय व्यक्ति के पास शस्त्र उठाने के
> अलावा कोई चारा नहीं रहता है...
> आज जो भी व्यक्ति ये ब्लाग या ईमेल पढ़ रहा होगा उसे शायद कोई लेना देना नहीं
> होगा इस किसानो से मगर बंधू उन किसानो के बाद आप का ही नम

बुधवार, 11 मई 2011

देहदान से क्या हर्ज ?

दान का मानव जीवन मेँ बड़ा महत्व रहा है.दान अनेक तरह के हैं,उनमें से
एक दान है-देहदान. देहदान के प्रति मुझमें जिज्ञासा रही है कि देहदान कौन
कर सकता है?क्या अस्वस्थ व्यक्ति भी अपना शरीर दान कर सकता है?शरीरदान के
लिए जिले में कहां सम्पर्क किया जाए?आदि आदि.बरेली मण्डल के एक जनपद
बदायूं सात व्यक्ति अपना शरीरदान कर चुके हैं.जिसके परिचय ,जीवनी आदि से
सम्बन्धित पुस्तक बदायूं के दानदाता एक सजग सिंहावलोकन जून मास में
प्रकाशित की जाएगी.ऐसा एक समाचार पत्र से हमें संज्ञान हुआ.

: कतरा कतरा मरता हूँ हर रोज!

कतरा कतरा मरता हूँ हर रोज ,


बूंद बूंद जहर दिया इन अपनों से न मौज.


कहते हैं सुख दुख सोंचने का ढंग है


इस बात से संवारते थे खुद को हर रोज.

कौन है अपना ऐसा ,समझे अपने हाल को जो


अपनों की भीड़ बीच ,हर रोज मेरी मौत.

कहें सब अपनी अपनी,रंग न पाये बात कोई

इन अपनों के मरहम,घावों को बढ़ायें हर रोज.


भीड़ से हट एकान्त ने ही दिया मरहम


खून के आंसू पीकर रह जाएं ,भीड़ के मौज.


एकान्त के प्रभुस्मरण से ही पायें सुकून

भीड़ की संत्वना में
कहां मरहम,भीड़ में न पाया मौज.

शनिवार, 7 मई 2011

सद्भाव वाणी !

सद्भाव अब भी युवा था ,इसका एक मात्र कारण आयुर्वेद योग,तप,आदि था.वह आरदीस्वन्दी व धधस्कनक निवासी हलदकरोड़ा युवती,दस् रलकम व फदरस्लन की उपस्थिति में सामने उपस्थित पशु पक्षियों व विभिन्न मानवों को सम्बोधित कर रहा था.




विधाता की सत्ता शक्ति का सृष्टि में अंशविभाजन है-ब्रह्मा,विष्णु व महेश.इन तीनों से ऊपर है वह विधाता ,जिसे ब्लेक होल में आने व जाने की शक्ति प्राप्त कर लेने के बाद ही जाना जा सकता है.जहां तक अभी श्री कृष्ण ही अर्जुन को लेकर पहुंचे हैं.तब जब वे एक के मरे हुए पुत्रों को लेने पहुंचे थे.श्री कूष्ण के बाद ऐसी क्षमता कल्कि भगवान में ही होगी.ब्रह्मा जी एक बार नारद जी की जिज्ञासा को शान्त करते हुए बोले थे कि उन भगवान वासुदेव की मैं वन्दना करता हूँ और ध्यान भी,जिनकी दुर्जय माया से मोहित होकर लोग मुझे जगतगुरु कहते हैं.वेद नारायण के परायण हैं.देवता भी नारायण के ही अंगों में कल्पित हुए हैं और समस्त यज्ञ भी नारायण की प्रसन्ता के लिये ही हैं तथा उनसे जिन लोकों की प्राप्ति होती है,वे भी नारायण में ही कल्पित हैँ.वे द्रष्टा होने पर भी ईश्वर है,स्वामी हैं;निर्विकार होने पर भी सर्वस्वरुप हैं.उन्होने ही मुझे बनाया है और उनकी दृष्टि से ही प्रेरित होकर मैं उनके इच्छानुसार सृष्टि रचना करता हूँ.



सद्भाव एक विशालकाय अजगर को देख कर बोला कि आप लोग महान आत्मा रखते हैँ,एक साथ आपसब की यहाँ उपस्थिति इस बात का परिचय है.विज्ञान की खाद्य श्रंखला भी यहाँ पर फेल हो जाती है,क्यों कि खाद्यश्रंखला की अवधारणा में प्रकृति व्यवस्था है.चेतना की व्यवस्था काफी आगे की है.एक दूसरे के प्रति जन्माधारित हिँसात्मक सम्बन्ध रखने वाले जन्तु भी अपनी आत्मा में आने पर अहिंसक हो सकते हैं.चाहें को भी सम्प्रदाय हो सब जगह उसी विधाता के स्मरण के असफल कार्य हैं लेकिन कोई भी हम से आगे का एहसास या वखान नहीं रखते.ब्लेक का अन्धकार का बखान नहीं कर पाते,जो कहते हैं ईश्वर नहीं है और ब्रह्म से भी आगे के शून्य की बात करते हैं तो लोग उन्हें अनिश्वरवादी कह उठते,हालांकि उन्हें अनिश्वरवादी कहने वाले क्यों न अभी तक हम तक पहुंचे हों.देवी देवताओं ,पितरों,भूतों,आदि में ही रमण कर रहे हों.शून्य या शून्य से आगे की बात करने वाले बुद्धों को लोग अनिश्वरवादी कह ही उठते हैं.वहां पर हम जैसे व अन्य देवी देवता व भगवान नहीं होते.ब्लेक व शून्य को झेलने के बाद ही कोई उस सत्नारायण से साक्षात्कार पा सकता है.आम आदमी चन्द पल के लिए ब्लैक व शून्य का सामना करने पर परेशान हो उठता है,मतकटा का शिकार हो जाता है क्यों कि वह दृष्टा न बन दुनिया की नजर में बेहतर प्रदर्शन व अपने अहंकार व अस्तित्व को बचा कर रखना चाहता है .वह घबरा तो जाता है लेकिन इस बात से अन्जान होता है कि ब्लैक व शून्य प्रति तटस्थ होने पर ही हम अपने चेतना के स्रोत यानि कि उस बासुदेव को पा सकते हैं.



युवती हलदकरोड़ा बोली -" यह कलाप गांव कहाँ अस्तित्व में आयेगा?जिसकी जमीन में स्थित तहखाने में मरु मेडिटेशन में है? "


सद्भाव बोला-
"समय आने पर सब सामने आ जाएगा.मरु कलियुग के अन्त में नजर आयेगा और सूर्यवंश को फिर चलायेगा.अनेक योगसाधक है जो दुनियां से अन्जान हो मेडिटेशन में हैं. "



"हाँ,ऐसा तो है.पृथु मही पर एक टीले की खुदाई मेँ एक तहखाने मेँ एक व्यक्ति मेडिटेशन में मिला.उसने कलियुग खत्म हो जाने के बाद ही दुनिया में सक्रिय होने की बात की.फिर तहखाने से बाहर नहीं निकला और तहखाना बन्द कर दिया गया."




* * * * *


पृथु मही पर हिमालय के तराई क्षेत्र में स्थित माधव(माधौटांडा) वन में एक मन्दिर के के चारो ओर चक्कर लगा कर चला जाता था.



युवती फदेस्हरर बालक हफ्कदम के साथ इसी जंगल में थी.मन्दिर के चबूतरे पर आकर दोनों बैठ गये.मन्दिर के अन्दर दो साधु दरबाजे बन्द कर बैठे थे.



"अरे,अन्दर आ जाओ .शेर आने वाला है फांड़ डालेगा."



बालक हफ्कदम बोला-" किस स्तर के साधु हो. ".


युवती फदेस्हरर बोली
"हफ्कदम,क्या बोलते हो?".



मन्दिर के अन्दर खुसुरफुसुर हुई कि कोई लेडीज है ,अन्दर ले ले. ....क्या,हर वक्त नियति खराब न रखा रख,कहीं शेर आ गया तो...?.....आ गया.



शेर आकर मन्दिर का एक चक्कर लगाने के बाद फदेस्हरर व हफ्कदम के सामने रुक कर दहाड़ा.
दोनों शान्त भाव में बैठे रहे.



बालक हफ्कदम शेर से बोला-"तुम पिछले जन्म यहां साधु थे.अब चले आते हो चक्कर लगाने.बिचारे यह साधु डरते है .तू भी निर्जीव के पीछे पड़ गया?तेरा जल्दी ही मोक्ष होगा.तेरा अभी कुछ काम रह गया है.देवरावण को मारने वाला पैदा होने वाला है.भूम्सनदा पर आरदीस्वन्दी व सद्भाव की मुलाकात हो चुकी है".



मंगलवार, 3 मई 2011

तृतीय विश्व युद्ध की ��ूमिका:अमेरिका भारत म��ँ.

चीन का साम्राज्यवाद ,मुस्लिम आतंकवाद , अमेरिका की चीन से चिढ़ व चीन के द्वारा मुस्लिम देशों का नेतृत्व ने दुनिया को तृतीय विश्वयुद्ध में झोंक दिया था.


सन 2011ई0
एक मई को अमेरिका के द्वारा आतंकवादी सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराया गया था.




इस दौरान पूर्व विदेश सचिव ललित मान सिंह का मानना था कि देखना होगा कि ओबामा के समर्थन में ओसामा के समर्थन में कितने व्यक्ति व राज्य है?दुनिया को खतरे बढ़े है विशेष कर भारत को.'हिन्दुस्तान' समाचार पत्र अपने सम्पादकीय में लिखा था कि जब भी शान्ति व सद् भावना की बात चली है आतंकवादी घटना हुई है.



पाकिस्तान में लादेन की उपस्थिति व पाकिस्तान में ही लादेन की मृत्यु ने पाक सरकार पर संदिग्ध निगाहें डाल दी थीं.ऐसे में उसकी भारत के खिलाफ मुहिम में तेजी की सम्भावनाएं बढ़ गयीं थीं.इधर भारत के अन्दर भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन एवं काले धन की बापसी पर जन आन्दोलन तेज हो गये थे.जिससे ध्यान हटाने के लिए भ्रष्ट नेताओं द्वारा युद्ध की पहल की शंकाएं बढ़ गयीं थीं.उप्र सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने चीन की साम्राज्यवादी नीति पर कुछ नेपाल संसदों से बातचीत प्रारम्भ कर दी थी.कुछ लोग देश के अन्दर मुस्लिम वोट को देश की अखण्डता व सम्प्रभुता के लिए खतरा मान रहे थे. गुरु अफजल ,कसाब ,आदि जैसे आतंकवादी को फांसी में मुस्लिम वोट का लोभ आड़े आ रहा था.लोगों को भारतीय मुस्लिमों पर से उम्मीदें उठने लगीं थीं.ऊपर से भ्रष्ट नेता.....?



2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले मामले में रिपोर्ट की सच्चाई के विरोध में पीएसी समिति में सपा ,बसपा व कांग्रेस एक साथ नजर आये.......इसका मतलब क्या था ? हालातों से तंग आकर एक मानवतावादी अण्डर वर्ल्ड ग्रुप 'सेक्यूलर फोर्स' को मजबूरी में सैनिक कार्रवाही का समर्थन करना पड़ा था.दृसरी तरफ चीन व माओवादियोँ की करतूतेँ......?!कहना पड़ा-"अमेरिका भारत आओ" . बदलाव के लिए प्रजातन्त्र पर उम्मीदें करना मुश्किल हो गया था क्योंकि भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन के खिलाफ एवं कालेधन की वापसी के लिए जो सामने आये भी थे,उन्हें मुस्लिम वोट व हिन्दुओ में अपनी जाति के नेताओं से निकलने की गुंजाईश नहीं थी.भ्रष्ट नेताओं को उनकी जाति के लोग समर्थन से बाहर निकल नहीं पा रहे थे. 'म' ग्रुप मनमोहन सिंह,मुलायम सिह,माया वती, मुस्लिम मत,पाक मेँ मुशर्रफ व इनसे अलग अपने निजी स्तर पर माओ वादी देश के लिए .......?!हालांकि कुछ माओवादी कुछ भ्रष्टनेताओं को मार रहे थे लेकिन मारे गये नेताओं की लाशों पर.....!?भारतीय संविधान की भी धज्जियां उड़ायी जाने लगी थीं.ऐसे में देश में सैनिक कार्रवाही व अमेरिका के आने की उम्मीदें बढ़ गयीं थीं. अग्रेजों के आने से पूर्व देश की राजनैतिक दशा क्या थी?देश के आजादी के वक्त देश की राजनैतिक दशा क्या थी?अब भी देशी रियासतें आधुनिक रुप में जन्म लेने की क्षमता रखती हैँ.

रविवार, 1 मई 2011

'सद्भावना'क्योँ?

कभी पूर्वोत्तर भारत में जंगलों के बीच हुआ करती थी एक इमारत-'सद्भावना'.


जून सन 5020 ई0 को 'सद्भावना' के एक मात्र वारिस को अज्ञातबास में पहुंचा दिया गया था.इस घटना के एक हजार वर्ष बाद-



तीननेत्रधारी आरदीस्वन्दी अब जवान थी.वह भुम्सन्दा धरती पर थी.जब वह ध्वनी थेरेपी से 'ओम आमीन' ध्वनि के आधार पर भुम्सनदा धरती पर आ गयी थी .



'धधस्कनक'धरती (अर्थात उड़नतश्तरी यान वालों की धरती) तीन निवासी -हलदकरोड़ा(युवती),दस् रलकम व फदरस्लन भी भुम्सनदा पर उपस्थित थे.जिन्होने 'सद्भाव' से आरदीस्वन्दी की मुलाकात करवायी थी.



'सद्भाव' कौन ?


'सद्भाव' ही था -'सद्भावना' का अन्तिम बारिस.जिसके हितैषी यहां भुम्सन्दा पर उसे ले आये थे.



* * * *




चार हजार वर्ष पूर्व पृथु मही पर घटित हुई एक घटना,गोधरा काण्ड के नाम से जानी गयी.जिसकी प्रतिक्रिया में गुजरात काण्ड!



गुजरात में दंगे चल रहे थे.



एक अण्डर वर्ल्ड ग्रुप की चीफ-मोनिका . जो अब वृद्धावस्था की दहलीज पर कदम रख चुकी थी.वह अण्डर वर्ल्ड से जरुर थी लेकिन उसकी हरकतें जातिवादी द्वेष, साम्प्रदायिकता, निर्दोष हत्याओं ,
आदि के खिलाफ थीं.इस अण्डरवर्ल्ड प्रवृत्ति से दुनिया अन्जान थी.हाँ,इसका एक एहसास 'हिन्दू आतंकवाद' के नाम से काल्पनिक तथ्यों के आधार पर अवश्य उठाया गया था.



मोनिका खुश थी कि उसके द्वारा लगाया गया वट वृक्ष अब काफी बड़ा हो चुका था.जिसकी अनेक शाखाएं निकल कर जमीन से जुड़ चुकी थीं.



मोनिका को स्मरण हो आये अपनी वृद्ध माँ रुचिको के अन्तिम शब्द-


"हमारे पिता जिन्हें दुनिया मि एस के नाम से जानती थी.भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन के खिलाफ शहीद हो गये थे.इस धरती के कुछ भ्रष्ट मानवों ने भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन को अन्तरिक्ष तक पहुंचा दिया था.मैं जिन्दगी भर लड़ती रही भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन के खिलाफ .अब आगे की लड़ाई तुमको लड़नी है मोनिका. "



मि एस कौन था?


14जून1946ई0 को न्यू मैक्सिको में गिरी उड़नतश्तरी की घटना का एक गवाह था-अन्तरिक्ष वैज्ञानिक मि एस.जो उड़नतश्तरी यान से आये एलियन की मदद करना चाहता था और भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ लड़ना चाहता था लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने उसे मरवा दिया.



हाँ,गुजरात काण्ड व अन्य ऐसे ही काण्डों के दौरान प्रत्येक पक्ष के उन कट्टरपन्थियों को मारने का काम किया था मोनिका ग्रुप ,सेक्यूलर फोर्स व अन्य ग्रुप के देशबासियों ने;जो निर्दोषों का खून बहा रहे थे.



इन्हीं ग्रुपों के परिणामस्वरुप सामने आयी एक इमारत -'सद्भावना'.


गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

पुट्टीपर्थी का संत!

एक अधेड़ तब्बती महिला त्रिनेत्रधारी युवती फदेस्हरर से बोली -

" सत्य साईं बाबा का असली नाम था-सत्य नारायण राजू.जो सन1926ई के 23 नवम्बर को इस धरती पर आये और सन 2011ई0 24 अप्रेल की सुवह इस दुनिया से चले गये.कुछ लोगों का मानना था कि अमेरिका मे ओशो को जिस तरह धीमा जहर दिया गया था ,उसी तरह सत्य साईं को भी धीमा जहर दिया गया था.14 साल की अवस्था मे ही इनके जीवन मे चमत्कार होने लगे थे.20 अक्टूबर 1940ई0 को उन्होने अपने अवतार की घोषणा करते हुए कहा था कि वह शिरडी के साईं बाबा के दूसरे अवतार हैं.06 जुलाई 1963ई0 को गुरु पर्णिमा के दिन सत्य साईं ने घोषणा करते हुए कहा कि साईं बाबा के कुल तीन अवतार होंगे.उन्होने एक बार कहा था कि वह मांड्या क्षेत्र मे पुनर्जन्म लेंगे.इस धरती पर उनकी उम्र 85 वर्ष की हो चुकी थी लेकिन चन्द्रमा के पंचांग आधार पर उनकी उम्र 96 वर्ष हो चुकी थी . "



बालक हफ्कदम सोंचने लगा-"मांड् या मे.......दिवाकर सत्य साईं के गुजरने से एक माह पूर्व ही मांड् या पहुंच चुका था?"



"कुछ दुष्ट व्यक्ति संतो तक को तो नहीं बख्शते.खुद का स्तर इनका इतना गिरा होता है कि जो सुधरना चाहे या सुधर कर समाज में सुधार की मुहिम चलाना चाहे,गड़े मुर्दे उखाड़ने से बाज नहीं आते.उन दिनो अन्ना हजारे ,बाबा रामदेव ,आदि की टीम के साथ भी ऐसा था.दुष्ट लोग लगातार इन पर आरोप ही लगाते रहे लेकिन सुधार की कोई भूमिका नहीं."



"सत्य साईं बाबा की मृत्यु के साथ उनके करीबी सत्यजीत व निजी चिकित्सक डा अय्यर की जान को खतरा हो गया था.महापुरुष की मृत्यु के बाद अन्य धर्मस्थलों की तरह यहां भी सत्य साईं के कुछ अनुयायीयों का चरित्र संदिग्ध हो गया था.इस घटना के 22साल पहले ओशो ने सम्भवत:कहा था कि अनुयायी झूठे ही होते है,वे जिस के अनुयायी होते हैं उससे काफी गिरे स्तर के होते है.महापुरुष जिस मशाल को लेकर चलते है,उनके खत्म होने के साथ वह मशाल खत्म हो जाती है.अनुयायियों की पकड़ मे रह जाता है सिर्फ मशाल का मूठ(डण्डा) ".



* * *



' मांड् या ' शहर एक टीले में तब्दील हो चुका था,कुछ धार्मिक स्थलों को छोँड़ कर.



"ओम आमीन तत सत ,ओम आमीन तत सत ,ओम आमीन तत सत ओम आमीन तत सत ,ओम आमीन तत सत ,ओम आमीन ..... " खुदाई करने वाले मजदूर चौंके, जब कुछ ईंटे निकालने के बाद नीचे एक तहखाना दिखाई दिया जिसमे से किसी के 'ओम आमीन तत सत ' जपने की ध्वनि सुनाई आ रही थी.




"अरे,तुम लोग क्यो रुक गये?अपना अपना काम करो".

" सर! यहां तो आना ."


जब ठेकेदार आया तो तहखाने से आती आवाज को सुन-
आप लोग इधर काम करना बन्द करो .


फिर ठेकेदार ने आगे बढ़कर अपने को खामोश कर लिया.उसके मस्तिष्क ने दूर स्थित किसी के मस्तिष्क से सम्बन्ध स्थापित किया.


"हैलो!सुनती हो क्या?मैने सुबह उठ कर जिस स्वपन का जिक्र किया था,वह असलियत है.यहां एक तहखाना है,जिसमें से किसी के 'ओम आमीन तत सत' जप करने की आवाज आ रही है ."


" अच्छा! तो उस जगह पर काम रुकवा दो अभी."


"हाँ,रुकवा दिया है."

ठेकेदार पश्चिम की ओर लगभग एक किलोमीटर दूरी पर बनी श्रीअर्द्धनारीश्वर की विशालकाय प्रतिमा की ओर देखने लगा.
एक ओर शिला पर ॐ तत सत लिखा था।उससे कुछ दूरी पर सत साहिब एक पत्थर पे खुदा था।जिस पर नीचे एक कोने में।छोटा से लिखा था-निशाअंत!



आसमान से एक अण्डाकार यान नीचे की ओर आ रहा था.इस यान मे बैठी युवती फदेस्हर व बालक हफ्कदम आपसी बातचीत में थे.

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

गोधन के लिए संघर्ष!

गरीब तबके के लोग एक परिवार से संघर्ष करके एक गाय को अपने कबीले मे ले आये थे.


बालक फदेस्हरर बोला -" एक गाय के लिए मानव मानव के बीच संघर्ष ? "

"इतनी ही अक्ल होती तो बात ही फिर दूसरी होती.हर सृष्टि के बाद ऋग्वैदिक काल मे आर्य विद्वान एक 'आर्ट आफ लिविंग' देते हैं लेकिन मानव आगे चल कर साम्प्रदायिकता , सत्तावाद व पूंजीवाद की कठपुतली बन कर रह जाता है . 21 मई 2011ई0 के दो माह पूर्व लगभग! दिन गुरुवार 24 मार्च रंगपंचमी पर्व,दोहा नदी के तट पर स्थित एक शहर अंगदीय(शाहजहाँपुर) के समीप स्थित एक कस्बा ईश गढ़ (खुदागंज) मे यह पर्व बड़ी धूम से मनाया जा रहा था.जहां स्थित एक देवि स्थल पर अपने धरती के कुछ व्यक्ति अपने सूक्ष्म शरीर मे उपस्थित थे. इसी धरती के निबासी चर्चा कर रहे थे. "



* * * *

खुदागंज का ही एक देवि स्थल के प्रांगण मे एक पीपल वृक्ष के नीचे-



"आदिकारण श्रीनारायण अर्थात ईश्वरीय तत्व से ही है सब कुछ."


"सब कुछ कैसे ? वर्तमान के प्रलय काल के लिए तो मनुष्य दोषी है ! मनुष्य से क्या प्रकृति प्रभावित नही होती ? "


" प्रकृति ही प्रकृति को प्रभावित करती है .मनुष्य जो करता है वह अपनी ऐच्छिक व शारीरिक आवश्यकताओं वश चेष्टाएं करता है.कर्म तो आत्मा से होते है. "



"रेडियोएक्टिव प्रदूषण से बचने के उपाय तो होंगे ? जापान मे देखो क्या चल रहा है,रेडियशन से क्या उपाय हो सकते हैं गरीब व्यक्ति के सामने ? "



"आध्यात्मिक ज्ञान के साथ साथ योग,कलर थेरेपी सुगन्ध थेरेपी प्रकाश थेरेपी आदि,गाय का गोबर मूत्र दूध घी आदि...और आत्मबल."



"गाय के गोबर से लिपी जमीन दीवारों पर रेडियेशन का प्रभाव नहीं पड़ता."


"हमारे पूर्वजों ने कहा था कि गाय के सींगों पर पृथ्वी टिकी है,तो इसका मतलब क्या है? यहां गाय के सींगों से मतलब गाय के सम्मान से है."



"भविष्य में बचे खुचे मनुष्यों के द्वारा गाय का सम्मान एक मजबूरी हो जाता है.गोमूत्र तो मनुष्य के प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का अच्छा उपाय है ही,रेडियेशन आदि के कारण कैंसर होने की संभावना समाप्त करता है."



"इस पर अब तो अनेक वैज्ञानिक शोध भी सामने आये हैं."



"यदि बाल्यावस्था से ही मनुष्य गौमूत्र व उसके दूध से बने उत्पाद के साथ साथ आयुर्वेद आदि को दिनचर्या का हिस्सा बना लिया जाए तो मनुष्य अपनी उम्र व स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से उबरा रह सकता है. "




"गौरबशाली भारत का इतिहास घर घर मे गाय पालन व सम्मान का इतिहास था."



" रुसी वैज्ञानिक सिरोविच ने कहा है कि आण्विक विकरण से रक्षा पर अपने प्रयोग के दौरान पाया कि गाय के घी की अग्नि में आहुति देने पर उसकी जो सुवास निकलती है वह जहाँ जहाँ तक फैलती है उससे सारा वातावरण आण्विक विकरण से मुक्त हो जाता है. "



" शायद हजरत मोहम्मद साहब ने भी कहा है कि गाय का दूध गिजा है,घी दबा है और गोस्त बीमारी है . "



" हमने सुना है कि दिवाकर अपना घर बच्चे छोंड़ मांड् या चला गया है. "



" सही ही सुना है."



"जब बाबा ही बनना था तो शादी क्यों की ?"



"क्या गृहस्थ सन्यासी नहीं हो सकता ? और फिर पहले अपने परिवार को मना कर वह सन्यासी बना.साल मे दो तीन बार घर आता भी रहता है."



"हाँ,बात गोधन की हो रही थी.सर जी के साहित्य से पता चलता है कि जीवों वनस्पतियों की प्रजातियां खत्म हो रही हैं ऐसे में दो तीन हजार वर्ष बाद गोधन को पाने की लालसा मे संघर्ष तेज हो सकते है ."



अब इकसठवीं सदी-



युवती फदेस्हरर व बालक हफ्कदम एक तिब्बती अधेड़ स्त्री के साथ पैदल ही समुद्र तट के विपरीत दिशा में आगे बढ़ते जा रहे थे . मत्स्य मानव की विशालकाय प्रतिमा पीछे ही छूट गयी थी.



दायीं ओर कुछ लोग गाय को लेकर झगड़ रहे थे.जब उन्होने इन तीनो को देखा तो कुछ पल के लिए स्थिर हो गये.
जब तीनों उधर ही बढ़ गये तो वे सब शान्त भाव से इधर ही बढ़ चले.


* * * *




युवती फदेस्हरर व बालक हफ्क्दम तिब्बती अधेड़ स्त्री के साथ मिट्टी से बने एक चौकोर चबूतरे पर बैठे हुए थे . कबीला के लोग सामने जमीन पर बैठे थे .गाय को घेरे कुछ दबंग युवक खड़े थे.
इस गरीब कबीला के कुछ लोग गाय को चुरा कर ले तो आये थे लेकिन फिर यहां गाय के दूध ,मूत्र व गोबर के इस्तेमाल को लेकर आपस मेँ झगड़ पड़े थे.



फदेस्हरर गाय को घेरे दबंग युवकों से बोली-



"आप सब को अब भी सीख नहीं लेनी अपने पुरखों की करतूतों से.मानव शक्ल हो सब ,सनातन महापुरुषों के सम्मान में कुछ तो करो.आपके परिजन सामर्थ्यवान है,बस इतना ही काफी है ? इन गरीबों को आप सब बन्धुआ तो रख सकते हो लेकिन इनके बच्चों के लिए गोरस की व्यवस्था क्यों नहीं? वीर भोग्या बसुन्धरा!यदि यह बिचारे गरीब अपने बच्चों के जीवन के लिए वीरता दिखाते है तो इसके लिए सिर्फ यही दोषी न."

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

मत्स्य अवतार पर सवाल !

भुम्सनदा के बर्फीले भू भाग पर एक ब्रह्मा शक्ल व्यक्ति-'यल्ह' .



"यल्ह आर्य! तुमको इस धरती की ओर से मिशन का चीफ बनाया गया है. कल्कि अवतार को पृथु मही के आधार पर हालांकि सैकड़ो वर्ष हैं लेकिन इससे पूर्व देवरावण के अन्त के लिए....... . "



"कल्कि अवतार की तैयारी का सम्बन्ध देव रावण के अन्त.......?! विधाता ,जिसके हम सब मे तथा सभी धरतियों के प्राणियों मे समाहित है, उस चेतना पर देव रावण क्या दखलंदाजी भी कर सकता है? हमे आश्चर्य है! "



" यल्ह आर्य! चेतना का स्थूल शरीर धारण कर स्थूल या प्रकृति परिस्थितियों मे उलझना स्वाभाविक है लेकिन कल्कि अवतार के लिए स्थूल या प्रकृति से वैराग्य प्राप्त चेतनांशों की बहुलता चाहिए."



पृथु मही पर वह(फदेस्हरर) हफ्कदम को क्यों ले गयी है?विधाता के त्रीअंश अवतारों मे से एक शिव के लोक से चेतनांशों मे इस वक्त हफ्कदम मे मोक्ष प्राप्त यल्ह चेतनांश है.हफ्कदम को विभिन्न स्थूल व प्राकृतिक स्थितियों का अध्ययन आवश्यक है.युवती फदेस्हरर बालक हफ्कदम के साथ पृथु मही अर्थात इस पृथ्वी पर थी.दोनों मत्स्य मानव की विशालकाय प्रतिमा के समीप थे.



"क्या साइरियस अर्थात लुन्धक से ही आया था मत्स्य मानव ? "



" हफ्कदम! मत्स्य मानवों का मूलनिवास लुन्धक ही था.वहीं से......?! "



"था .....?! क्या अब है नहीं? "



" इस पर फिर कभी बताऊंगी ? हफ्कदम! अनेक चेतांश के समूह से विधातांश पदेन ब्रह्मा महेश व विष्णु तथा पदेन अग्निदेव के सहयोग से लुन्धक के एक निबासी बालक को दिव्य शक्तियां दे मत्स्य अवतार के रुप मे इस धरती पर भेजने के लिए तैयार किया गया था."



मत्स्य मानव की विशालकाय प्रतिमा समुद्र किनारे एक चट्टान पर बनी हुई थी.लहरें जिसको स्पर्श कर वापस लौट जाती थीं.


यह सन 6020ई0 का ही समय था.



अमेरिका झुठलाता रहा था इस बात को कि सन 1947ई0 में न्यूमैक्सिको में दुर्घटनाग्रस्त होकर दो उड़नतश्तरी गिरी थीं लेकिन सन2011ई0के अप्रैल माह मे उसे इस बात को स्वीकार करना पड़ गया था.एक ब्लाग < www.akvashokbindu.blogspot > मे इस सच्चाई को पहले ही उजागर कर दिया था.इस पर ब्लागकर्ता ने विकिलिक्स वेबसाइट से भी सम्भवत: सम्पर्क साधा था.

बुधवार, 9 मार्च 2011

सदभावना का अन्तिम वारिस

भुम्सनदा के बर्फीले भू भाग पर से कुछ बर्फीले टीलों से बर्फ खिसकना प्रारम्भ हुई और जिसमे से ब्रह्मा शक्ल व्यक्ति नजर आना प्रारम्भ हुए .पृथु मही के समयानुसार सैकड़ो वर्ष मेडिटेशन के बाद अब इन्होने अपनी आँखे खोली .



उड़नतश्तरी यान जब जमीन पर उतरा तो ब्रह्मा शक्ल व्यक्तियोँ ने यान की ओर देखा.


"यल्ह आर्य !"--उड़नतश्तरी यान से निकल कर धधस्कनक निबासी तीनो व्यक्ति एक साथ बोले.



" यल्ह !यल्ह!! "



"देव रावण के साम्राज्य के खिलाफ अपने स्थूल कर्म मे आने का वक्त आ गया है."-हलदकरोडा बोली.



" ब्रह्मा पद हेतु चुनाव के बाद हम सब स्थूल जगत के लिए कार्यक्रम तैयार करेगे .शाश्वत नियमों पर अवरोध नही लगाये जा सकते.हम सब निर्गुण रुप से सामर्थ्यवान व एक होकर भी प्रकृति को धारण कर प्रकृति से प्रभावित हो जाते है अर्थात चेतन यात्रा मे अन्य स्थूल सम्भावनाएं बनती बिगड़ती रहती हैं."


" हम लोगोँ के लिए आदेश !"



इसी धरती पर ही जंगल के बीच सूर्य मन्दिर जाओ. वहाँ सनडेक्सरन से आरदीस्वन्दी आयी हुई है.वह इस धरती पर सदभाव की ध्वनि संकेतो के आधार पर आ तो गयी है लेकिन सदभाव से उसकी मुलाकात तुम लोग ही कराओगे .



" जैसी आज्ञा आप सब की."



* * *


काफी समय बीत चुका था.



वह तीन नेत्रधारी वृद्ध अब भी बर्फीले मैदान मे एक गुफा के समीप ध्यान मुद्रा मेँ बैठा था.
जिसके शरीर के अधिकतर हिस्से बर्फ से ढक चुके थे.अनेक नर नारी इस तीन नेत्रधारी वृद्ध के इन्तजार मे खड़े स्वयं ध्यान मुद्रा मे लगभग हो चुके थे.



गुफा मे से एक युवती एक बालक के साथ बाहर आयी,जो कि तीन नेत्रधारी ही थी.



* * * वह युवती बालक के साथ एक अण्डाकार यान मेँ थी.यान पृथु मही के नजदीक था.



युवती बालक से बोली-"हफकदम!निन्यानवे प्रतिशत व्यक्ति प्रकृति व अपने शरीर पर प्रभावो प्रति तटस्थ नहीं रह पाता.हालांकि चेतना की सनातन यात्रा तटस्थ भाव ही होती है.वह समय के बन्धन से मुक्त हो वर्तमान मे जीती है."



बालक हफ्कदम बोला-" अपने लोग तो वर्तमान मे ही जीते है,उस वर्तमान मे जिसका न भूत है न भविष्य.वर्तमान, भूत, भविष्य तो स्थूल वस्तुओ व स्थूल जगत का होता है."


"मै पृथु मही के मनुष्यो के सम्बन्ध मे कह रही हूँ."


" जो भी होता है वह पूर्व नियोजित है,शाश्वत नियमो से बंधा होता है.मनुष्य के द्वारा भी जैसा होना होता है,वैसा उसके मन बुद्धि मे आ जाता है.इस धरती पर पैतालीस हजार साल पहले ही प्रलय की कहानी प्रारम्भ हो गयी थी.देखो तो कैसी हो गयी है यह धरती?लेकिन अब भी तो सुधरने का नाम नही लेता यहाँ का मनुष्य. निर्गुण शक्तियाँ कल्कि अवतार लेंगी तो कहीं कुछ समय ठीक रहेगा लेकिन फिर....यहाँ आ माया मोह लोभ मेँ उलझ कर रह जाता है प्राणी."



"पृथु मही पर जीवन कैसे आया?यहाँ से लगभग आठ प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित लुन्धक तारे से."


"साइरियस से ?! "


"हाँ वही, साइरियस को ही लुन्धक कहते हैं. पृथ्वी पर सर्व प्रथम मानव का जन्म अफ्रीका महाद्वीप मे मत्स्यमानव के रूप मेँ हुआ था.डोगिन कबीले की शुरुआत अन्तरिक्ष से आये 'नोम्नो' नाम के एक विचित्र प्राणी ने की थी."


".....तो फिर तिब्बत मे .?!"



"तिब्बत आर्यो की उत्पत्ति का स्थान कहा जाना उचित होगा,मानव जाति की उत्पत्ति का स्थान नही ."



यान पृथु मही अर्थात पृथ्वी के करीब आकर पृथ्वी के चारो ओर चक्कर लगाने लगा था.



" साइवेरिया मे भी तो कोई एलियन्स अन्तरिक्ष से आ कर रहा था ? "



" सुनो,जिस धरती पर मानव जीवन की संभावनाएं नजर आती है तो वहाँ एलियन्स के द्वारा ही मानव सत्ता का उदय होता है.जिसके लिए निर्गुण शक्तियाँ ब्रह्मा विष्णु महेश व उनके परिवार तथा परिषद के रुप में स्थूल जीवन का संचालन करती हैं. "



भू मध्य सागरीय क्षेत्र मे स्थित जंगल के समीप यान उतरते ही डोगोन मनुष्य यान के करीब आ गये.



* * *



पृथ्वी पर ही पूर्वोत्तर भारत मे स्थित एक अन्तरिक्ष व विज्ञान संस्थान के समीप बनी एक इमारत 'सदभावना' ,


सन5020ई0 की जून!


सद्भावना इमारत के सामने कुछ दूरी पर अपने यान के करीब खड़ी आरदीस्वन्दी ,जो कि उस वक्त किशोरावस्था मेँ थी,क्रोध भाव मेँ एक मैरुन वस्त्रधारी एक वृद्व सन्यासी से बोली-"यदि सदभाव को कुछ हो गया तो हमसे बुरा कोई न होगा.सारी पृथ्वी को हिला कर रख दूँगी."




" आप गलत सोच रही है.वह सदभावना का अन्तिम वारिस है,गंगा जमुनी संस्कृति का अन्तिम वारिस है.उसे सुरक्षा की ......"



" तुम्हारी धरती पर होगी गंगा जमुनी संस्कृति,प्रकृति मेँ निर्गुण मेँ ....सनातन यात्रा मे क्या गंगा क्या जमुना? जाती हूँ सात दिन का वक्त देकर!"




फिर वह यान पर बैठ कर चली गयी.आज लगभग 1000वर्ष बाद अब.....




मंगलवार, 8 मार्च 2011

भम्सनदा के ब्रह्मा !

अन्तरिक्ष!


विभिन्न पिण्डोँ,उल्काओँ,सूक्ष्म ग्रहों आदि के बीच से अपना बचाव करते हुए तेजी के साथ जाता 'उड़नतश्तरी ' यान . इस यान में उपस्थित दो पुरुष व एक स्त्री तीन फुट कद ,वाह्य कर्णविहीन थे.उनके शरीर पर कहीं भी बाल नहीं थे,न भवेँ व पलकें,बिल्कुल वैसे ही जैसे'कोई मिल गया' फिल्म मेँ एलियन्स.




पृथु मही पर स्थित न्यू मैक्सिको मे सन 14जून1946ई0 को दो उड़नतश्तरी दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थीँ.दूसरे दिन इस घटना को समाचार पत्रो ने प्रकाशित किया था लेकिन अमेरीकी सरकार ने समाचार पत्रो की इस सम्बन्धित खबरो का खण्डन कर कहा था कि कही भी न तो उड़नतश्तरिया पायी गयी और न ही उड़नतश्तरियो से सम्बन्धित कोई एलियन्स.



आखिर इस घटना को अमेरीकी सरकार ने क्यो छिपाया?लगभग दो सौ वर्षो तक यह रहस्य बना रहा था लेकिन......??लेकिन सन 2147ई0मेँ.....?!



" दस् रलकम ! पृथु मही के मनुष्यो की करतूतो के बारे मे क्या सोचना?उन्हे अपने किए की सजा मिल तो गयी."



"मै सोचता हूँ कि क्या वास्तव मे उस वक्त अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आतंकवादी नही था ? हलदकरोडा! "



हलदकरोडा बोली--
" मै जानती हूँ कि अमेरिका पृथु मही का अपराधी था ही वह अन्तरिक्ष अपराधी भी था ? "



सामने स्क्रीन पर 'भुम्सनदा' ग्रह को देख कर दस्करलकम बोला....

" फदरस्लन! भुम्सनदा करीब आ गया है ."



" भुम्सनदा क्या वास्तव मे ब्रह्मा की धरती है? "



"हलदकरोडा ! भुम्सनदा पर ही चल रहे है, जान जाओगी ."


" हूँ,पृथु मही के हिन्दू पौराणिक कथाओ मे वर्णित ब्रह्मा विष्णु महेश का अस्तित्व क्या स्थूल रुप से भी वास्तविक नही है? "



"हाँ,उस वक्त पृथु मही के एक वैज्ञानिक ने यह कहा भी था कि कही ऐसा तो नही कि ब्रह्मा विष्णु महेश एलियन्स ही हो ? "



"....और एक ने यह भी कहा था कि आत्माएँ एलियन्स ही होती है."


"खैर....! "




* * *


भुम्सनदा धरती पर गैरबर्फीली भूमि पर लैण्ड मार्क के करीब सूर्यमन्दिर के खण्डहर के पास ,जहाँ दीवार पर एक यान व विशेष वेशभूषा पहनी एक युवती का चित्र बना था.जिसे पशु पक्षियो ने फूल पत्तियो से लाद दिया था.



खामोशी !


पत्थर पर आरदीस्वन्दी खामोश हुए बैठी.चारो ओर काफी मात्रा मे फूल पत्तियाँ पड़ी हुई थी.पशु पक्षी भी खामोश थे.कुछ पशु पक्षियो के आँखो मे आँसू थे.



आत्म साक्षात्कार खामोशी ही कराती है,एक दूसरे आत्म का भी.खामोशी हमे एकाग्रता ,लयता व निरन्तरता देती है -आत्म मे बनाये रखने को.उपनिषद का भी क्या अर्थ है ,उपासना का भी क्या अर्थ है,खामोशी का भी क्या अर्थ है?-" बैठना" बैठकर अर्थात अपने मन को स्थिर कर अपने आत्म से जोड़ना.वेद को प्राप्त कर वेदान्त तक पहुँचना.क्यो मूर्तियाँ,क्यो तश्वीरे,क्यो धर्म स्थल?यह सब तो इस धरती की ही बाते है? वेद(ज्ञान)तक जाने की बात तो दूर ,इस धरती की स्थूल सामग्री मे ही उलझ गये हो.सत की ओर यदि चल दिए तो फिर अब क्या जरुरत मूर्तियो तश्वीरो धर्मस्थलो मे उलझने की?फिर क्या जरुरत अमरूद से'अ',आम से 'आ,'.......जब चल दिए तो अ ,आ ,इ ,ई,.....इनसे शब्द .......?!इसका मतलब यह नही कि अमरूद ,आम,.....भोग भाव रखे या फिर बुजुर्ग होने के बाद भी ' अ','आ', ..... के करीब जाने के लिए अमरुद,आम, ..... के करीब जाये ,फिर तो यह एक विकार है.जीवन भर तब तुमने किया भी क्या? ऐसे मे तो फिर जब सारी इन्द्रियाँ कमजोर पड़ जाऐगी बुद्धि कमजोर पड़ जाएगी तो फिर अ, आ , .....याद नही करोगे ,भोग लालसा के लिए याद करोगे.पानी सूखने के वाद भी वेल सूखने के वाद भी आकार जरुरी न बदले.आंतें जबाब दे जायेगी ,दाँत जबाब दे जायेगे ,जीभ जबाब दे जायेगी लेकिन......?!



खामोशी !


खामोशी हमे तटस्थता की ओर भी ले जाती है-भावनाओ लालसाओ के प्रति भी.



आत्म साक्षात्कार के लिए सांसारिक वस्तुओ ,तश्वीरो मूर्तियो धर्मस्थलोँ आदि की आवश्यकता जरुरी नहीँ है.



ओ3म आमीन !


ओ3म आमीन दोनो क्यो?



सिन्धु के इस पार ओ3म तो सिन्धु के उस पार आमीन !



......लेकिन शक्ति एक ही,सिर्फ भाषा व नजरिया का फर्क.



आरदीस्वनदी के अन्त:कर्ण मे पड़ने वाली ध्वनि-" ओ3म आमीन ".....



आरदीस्वन्दी के अन्त:कर्ण मे "ओ3म आमीन" ध्वनि प्रसारित करने वाला कौन था ?...और फिर उसका "ओ3म आमीन"ध्वनि से क्या सम्बन्ध था?भुम्सनदा के लिए चलने से पूर्व उसमे घबराहट लेकिन जब उसके अन्त : कर्ण मे "ओ3म आमीन" ध्वनि पड़ी तो उसकी घबराहट दूर हो गयी और उस ध्वनि के आधार पर यहाँ भुम्सनदा आ पहुँची?



गैर बर्फीले भूमि पर पीपल नीम वृक्षोँ की अधिकता थी व पशुओ मे गौ वंशीय पशुओ की.




इधर आकाश मे उड़नतश्तरी यान भुम्सनदा के काफी करीब आ चुका था.वह इस वक्त भुम्सनदा के बर्फीले भाग के ऊपर आकाश मेँ था.

बर्फीले भाग पर अनेक बर्फीले टीलों से बर्फ खिसकना प्रारम्भ हुआ जिससे ब्रह्म....

उधर आंध्र क्षेत्र में.... उत्तर भारत का एक आंदोलन अपना गढ़ बना चुका था!

सोमवार, 7 मार्च 2011

भुम्सनदा पर आरदीस्वन���दी !

एक वृद्ध सन्यासी ,जो कि तीन नेत्रधारी!



वह एक पर्वतीय वर्फीले क्षेत्र में ध्यान मुद्रा में बैठा था.कुछ चिन्तित नर नारी जिनमेँ से अधिकतर तीन नेत्रधारी ही थे,शान्त मुद्रा मेँ खड़े थे और उस वृद्ध सन्यासी के आँखेँ खोलने का इन्तजार कर रहे थे.



समय गुजरा ,पृथु मही पर लगभग एक वर्ष से ज्यादा वक्त गुजरने को आया.



" 'आरदीस्वन्दी' साधना को बीच में छोंड़ कर भुम्सनदा पर जा पहुंची है.उधर शिव पद के लिए भावी उम्मीदवार (ध्यान मुद्रा में बैठे उस वृद्ध सन्यासी)के पास सभी सत जन इकट्ठे हो उस अंशशक्तिवान की आँखे खुलने का इन्तजार कर रहे हैँ.ब्राह्माण्ड मेँ इधर शैतानी शक्तियाँ अपनी मनमानी करने को ओर भी ज्यादा स्वतन्त्र हो गयी हैं. "



"कक्कय! यह वाल्मीकी की तरह दूरदर्शी हैँ,सब जानते हैं.पृथु मही पर कल्कि अवतार को अभी वहाँ के समयानुसार काफी वक्त है लेकिन कुछ धरतियोँ के लिए यह वक्त बहुत कम समय है,अत:शैतानी रणनीतियों को कामयाबी मिलते देख हम सब का भ्रम में पड़ना स्वाभाविक है.नकली कल्कि अवतार की शैतानी कोशिसें समय आने पर धराशायी हो जायेंगी."


" विश्वारि ! कक्कय को बोलने दो. सांसारिक बातोँ को मन मेँ रखना ठीक नहीं."



"कक्कय ! तुम एक स्त्री हो,संसार से ऊपर उठ हर नारी की शक्ति मातृ शक्ति है.यहाँ तो रिश्तों का जाल है लेकिन वहाँ कोई रिश्ता नहीं.आने वाले समय मेँ तुम्हें माँ का कर्त्तव्य निभाना है.मन्दरा तुम्हारी सलाहकार के रूप मेँ रहेगी."



"विश्वारि !सत ने सबको अपने अपने किरदार के आधार पर पहले से ही बाँध रखा है.तुम अपने कर्त्तव्योँ को समझो.कहीँ फिर तुम्हारे साथ भी विश्वामित्र की तरह न हो जाए?जिसके गर्भ मेँ जाना होगा तुम्हें उसके गर्भ मेँ न जा कर अन्य के गर्भ मेँ जा कर शरीर धारण कर बैठो?शैतानी शक्तियाँ बैसे भी अपने षड़यन्त्रोँ मेँ लगी हुई हैँ."



" देवरावण का अन्त ऐसे ही नहीं हो जाने वाला है.विभिन्न संसाधनों व बायो तकनीकि के बल पर वह लगभग डेढ़ हजार वर्ष तक जीता चला आ रहा है.न जाने कितनी शक्तियां उसके क्रूर साम्राज्य को समाप्त करने मेँ लगी रहीँ लेकिन समाप्त न कर पायीं. "



" इस चक्कर में तो सम्कदेल वम्मा को अपना शरीर त्यागना पड़ गया."



"सम्कदेल वम्मा....?! लगभग सन 5012-19 ई0 के करीब देव रावण के द्वारा सम्कदेल वम्मा के शरीर को मार दिया गया था . "



उधर लाखों प्रकाश दूर वह आकाशीय पिण्ड जिसका अस्सी प्रतिशत भाग लगभग बर्फीला था.उसी के गैरबर्फीले क्षेत्र मेँ स्थित लैण्डमार्क पर 'आरदीस्वन्दी' का यान उतर चुका था.जिसके स्वागत मेँ खड़े थे अनेक पशु पक्षी.भुम्सनदा के इस भूभाग को 'आरदीस्वन्दी' ने नाम दिया था-पेरु.





शुक्रवार, 4 मार्च 2011

दूसरा पेरु :अन्तरिक्ष मेँ इंका सभ्यता

एक अण्डाकार यान अन्तरिक्ष मेँ काफी तेजी के साथ आगे बढ़ता जा रहा था.इस यान मेँ 'सनडेक्सरन' धरती निवासी तीन नेत्रधारी कन्कनेरसु,सस्कनपल व हह्नसरक थे .जो कि एक धरती'हा हा हूस ' पर जा रहे थे.इस सफर को कांच की टेबिल पर रखे एक अण्डाकार पारदर्शी पत्थर पर दर्शाया जा रहा था .जिसके सामने थी एक तीन नेत्रधारी युवती ' आरदीस्वन्दी'.




* * *





आरदीस्वन्दी के अन्त: कर्ण मेँ अब भी किसी अज्ञात व्यक्ति की आवाज'ओ3म आमीन' गूँज रही थी.वातावरण में मौजूद इन ध्वनि तरंगों के आधार पर आरदीस्वन्दी का यान आगे बढ़ता जा रहा था. अनेक आकाशीय पिण्डोँ के समीप से गुजरता
हुआ यह यान एक ऐसे आकाशीय पिण्ड का चक्कर लगाने लगा जिसका अस्सी प्रतिशत भू भाग वर्फ से आच्छादित था.



यान के स्पीकर पर अब 'ओम आमीन तत सत ' की ध्वनि तेज हो गयी थी.



अचानक आरदीस्वन्दी को याद आया ,जब वह किशोरावस्था मेँ थी.पृथु मही के समयानुसार लगभग
एक हजार वर्ष पूर्व सन5020ई0की 28 नबम्बर,अग्नि अण्कल से सम्वाद के दौरान 'दस सितम्बर' उपन्यास का जिक्र हुआ था.सेरेना की आत्मकथा मेँ किसी'सर जी' व्यक्ति का जिक्र अनेक बार हुआ था.जिन्होने यह उपन्यास लिखा था लेकिन जिसे किसी ने गुम कर लिया था.'सर जी'के कुछ उपन्यासोँ मेँ भी
ऐसे चरित्र रहे थे जो 'ओम आमीन 'पर विश्वास करते थे.उन्होने कही पर विदुरराज गोडसे का जिक्र किया था.जिसने 27फरबरी2002 के गोधरा काण्ड के बाद गुजरात काण्ड मेँ अपने सेक्यूलरवाद का परिचय देते हुए दोनोँ पक्षों के कट्टरपन्थियोँ पर खत्म किया था.जिसके साथ भी 'ओम आमीन' का जयघोष था, 'जय कुर आन जय कुरशान' का जयघोष था.





हालाँकि गोडसे सेक्यूलर फोर्स का मेम्बर था ,गुजरात काण्ड मेँ अपने किरदार से हट कर ' मिशन:जय माँ काली ' मेँ उसका किरदार था.



' सनडेक्सरन ' धरती की गुफा में रखी एक पाण्डुलिपि के कुछ अंशोँ को किसी अज्ञात भाषाविज्ञ के सहयोग से समझने का दाबा कर उसने एक पुस्तक लिखी थी-'पैगम्बरों के पुरखे '.


"आरदीस्वन्दी,गोडसे पर सोँचने लगीं?"
'पैगम्बरों के पुरखे' पुस्तक का आधार क्या वही है -सनडेक्सरन की गुफा मेँ रखी पुस्तक ...?


"दर असल गोडसे भी ओम आमीन पर..."


"वे सेक्यूलर ही थे.हाँ, तो आप यहाँ तक आ ही गयी."


" लेकिन आप कहाँ हैं?ध्वनि तरंगोँ के आधार पर आ तो गयी लेकिन......."




" जल्दी क्या है ? "



* * *



अन्जान आकाशीय पिण्ड के चक्कर लगाते लगाते जब यान की स्पीड धीमी हो गयी तो यान उस आकाशीय पिण्ड की ओर चल दिया .


नीचे इसी आकाशीय पिण्ड पर.....




खण्डहर हो चुकी एक दीवार , बची हुई दीवार पर एक यान व एक विशेष वेशभूषा मेँ एक युवती की तश्वीर बनी हुई थी.



इस तश्वीर के सामने अनेक हाथी व कुत्ते इकट्ठे होने लगे थे.



आरदीस्वन्दी का यान जब उस धरती के काफी नजदीक पहुंचा तो...




"अरे,यह क्या ?कहीं यह पृथु मही पर एक स्थान पेरु की तरह तो नहीं?जहां के इंका सभ्यता के लैंडमार्क की तरह यहाँ भी ये रेखाएं दिखाई दे रही हैं? जरूर यह भी यहाँ का लैंडमार्क होगा?"



कुछ सेकण्ड बाद यान लैंडमार्क पर उतर चुका था.हाथी ,कुत्ते, कुछ अन्य पशु पक्षी यान के करीब आ चुके थे.


अब क्या हो?


कुछ मिनट के लिए आरदीस्वन्दी यान के अन्दर ही बैठे पशु पक्षियों को देखती रही . जब उसने एक हाथी को यान की ओर बढ़ते देखा जिसके सूंड़ मेँ फूलों से लदी एक टहनी थी व उसके ऊपर बैठा एक बन्दर भी फूलों से लदी एक टहनी पकड़े था.


<यह है क्या DUSRA PERU?>

बुधवार, 2 मार्च 2011

विदुरराज गोडसे संदेश

कुछ हिन्दू कहते फिरते हैँ कि जब तक देश मेँ हिन्दू बहुमत मेँ हैँ तब तक देश मेँ सेक्यूलरवाद की बात चल रही है और वह भी तुष्टीकरण के कारण छद्म .गैरमुसलमान व मुसलमान नेता पन्थनिरपक्षता प्रति कितने ईमानदार हैँ ?अभी कुछ महीनों से कुछ मुस्लिम नेता अपनी स्वयं निर्मित पार्टी के विज्ञापन के साथ अखबारों में नजर आ रहे हैं जो कि हिन्दू मुसलमान के साथ साथ चलने,हिन्दू मुस्लिम भाईचारा ,आदि सन्देशों के साथ नजर आ रहे है.यदि इन मुस्लिम नेताओं की लड़कियां गैरमुस्लिम लड़कोँ से शादी करना चाहें तो क्या ये रुकावट तो नहीं बनेगे ?रुकावट बनेगे ,अवश्य बनेगे क्योंकि यह सब मजहबी ही हैं न कि धार्मिक या सेक्युलर ? इसी तरह सेक्यूलर हिन्दू नेता.


ओशो ने ठीक कहा था कि यह कहने की क्या आवश्यकता है कि हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई आपस मेँ सब भाई भाई .यह क्यों नहीँ कहते कि हम एक हैँ .



देश के अन्दर इन्दिरा गांधी परिवार व इन्द्रकुमार गुजराल के परिवार को ही मैं सेक्यूलरवादी कहता हूँ.उन व्यक्तियों को मैं धार्मिक नहीं मान सकता जो सिर्फ अपने मजहबी रीति रिवाजोँ व्यक्तियों में रहने को ही धार्मिकता मानते हैँ और गैरमजहबियों व गैरजातियों के प्रति द्वेषभावना व छुआ छूत रखते हैं.



मुगलकाल में अनेक बादशाह हुए लेकिन अकबर को ही महान क्यों कहा जाता है ? जो सेक्यूलर के रास्ते पर चलना चाहते है उन्हें अकबर के दीन ए इलाही पथ पर चलना चाहिए लेकिन एक कदम आगे,एक कदम आगे कैसा ? अकबर ने हिन्दू लड़कियों को स्वीकार तो किया लेकिन मुस्लिम लड़कियोँ को हिन्दुओं मेँ नहीं दिया .जिस दिन परिवारों के अन्दर पति पत्नी में से एक हिन्दू व एक मुसलमान तथा वेद व कुरान एक साथ होगा उस दिन यह देश महान होगा ही अपने अखण्ड रुप में भी होगा.



जो मुस्लिम नेता हिन्दू मुस्लिम को एक साथ चलने की बात कर रहे हैं उन्हेँ इस बात पर गौर करना चाहिए.दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी किया है कि यदि किसी मुस्लिम लड़के लड़की ने किसी गैर मुस्लिम से शादी की तो उसकी खैर नहीं.
यह मुस्लिम नेता चाहें वे पीस पार्टी के प्रमुख ही क्योँ न हों,कहते फिर रहे हैँ कि हिन्दू मुसलमान साथ चलेगा ;क्यों नहीँ दारुल उलूम देवबंद के फतवे के विरोध मेँ बयान दें?जिससे कि हम जैसे इनके सेक्यूलरवाद पर विश्वास कर सकें.



लेकिन यह सब कैसे होगा?हर कोई अभी मानसिक रूप से गुलाम है.कोई भी धर्म को समझने की कोशिस नहीं कर रहा है.मजहबी व जातीय सोँच से बाहर निकलने की कोशिस ही नहीं.














गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

अब घबराना क्या?ओ3म - आम��न!

एक चमकीला अण्डाकार पारदर्शी पत्थर ! जो कि जो कि उच्चस्तरीय सम्वेदी सुपर कम्पयूटर पीढी का था.पारदर्शी दीवारों से बने एक पिरामिड के अन्दर एक पारदर्शी टेबिल पर वह रखा था.जिस पर निगाहें थीं-सनडेक्सरन धरती निबासी तीन नेत्रधारी युवती 'आरदीस्वन्दी 'की .'त्राटक' योग मेँ बैठी वह - " ओ3म आमीन तत सत! " की बारम्बार उच्चारण कर रही थी.



कुछ समय बाद उस अण्डाकार पारदर्शी पत्थर के अन्दर विभिन्न रंग के प्रकाश किरण उभरना प्रारम्भ हुईं.उन रंगीन प्रकाश किरणों ने तश्वीरों का रूप धारण कर लिया.अन्तरिक्ष के बीच 'सनडेक्सरन' धरती की तश्वीर उभरी.



और....


एक तीन नेत्रधारी बालिका-'सहक्न्न' जो कि क्रोध मेँ थी.एक बर्फीला मैदान.......'सहक्न्न' का यान अब बर्फीले मैदान के ऊपर आकाश में था.कुछ मिनट बाद बर्फीली पहाड़ियां आना प्रारम्भ हो गयीं,जिसके बीच से अपना यान बड़ी आसानी से निकालते हुए आगे जा कर एक स्थान पर उतार दिया.यान से बाहर आते हुए-"कक्लेश्श ककइ जजएया! " जयघोष के साथ वह आगे बढ़ गयी.




यह क्या....?!


पृथु मही पर स्थित कैलाश पर्वत की भांति यह सामने का पर्वत !



वह उस पर्वत की ओर बढ़ी.वह जो स्पेशल सूट पहने हुई थी,जिस पर अनेक रंग बिरंगी रोशनी करते मटर के दाने के बराबर उभार थे.सूर्य चक्र स्थान से एक स्वीच आन हुआ और सामने पर्वत के एक हिस्से की बर्फ पिघलने लगी.बर्फ पिघलते ही एक गुफा नजर आने लगी.गुफा के अन्दर एक मूर्ति-'एक तीन नेत्रधारी की जिसके एक हाथ मेँ अजगर दूसरे हाथ मेँ दूज का चन्द्रमा ' .

'सहक्न्न' कुछ समय तक मूर्ति के सामने आँख बन्द कर खड़ी रही.पृथु मही के समयानुसार लगभग आधा घण्टा और वहाँ के बारह दिन बाद उसने अपनी आँखे खोलीं.



अब वह शान्त भाव मेँ थी.



दाहिने ओर गुफा के अन्दर ही एक और गुफा......दाहिनी ओर मुड़ कर वह उस गुफा मेँ प्रवेश कर गयी.....और एक चौकोर काले पत्थर पर रखी एक पाण्डुलिपि को उठाती है,उठाती है तो.....?!



"जजएया कक्ल एश्श ! "
- जयघोष के साथ गुफा से बाहर आगयी.बर्फीली चोटियों का तेज कम्पन से हिल रही थीं. उसका यान हिमखण्डों से ढक चुक था.


कुछ देर बाद पुन: अन्दर वाली गुफा मेँ आकर पाण्डुलिपि के पन्नों को पलटते हुए -


" न जाने यह किस भाषा मेँ लिखी गयी है ? पुरातत्वविदों के अनुसार इसे सम्भवत: पृथु मही के समयानुसार ईस्वी बाद छठी या सातवीं शताब्दी में लिखा गया है?"



इधर पृथु मही पर-




14 अगस्त 1947 !

इस तारीख को समाप्त होने मेँ अभी लगभग पैँतालीस मिनट कम थे.एक कमरे मेँ एक कुर्ताधारी युवा नेता बेचैनी के साथ कमरे मेँ टहल रहा था कि कमरे का दरबाजा खुला तो -



" क्या खबर लाये हो ? बात में कितनी सच्चाई है? "




आने वाला युवक एक मुसलमान था.



"सर! खबर सत्य है.देश की आजादी ......."



- कि पाँच शस्त्रधारी तेजी से अन्दर आ घुसे और दोनोँ को जबरदस्ती पकड़ कर बाहर खींच लाये. बाहर भी पाँच शस्त्रधारी व्यक्ति खड़े थे.जंगल में ले जाकर दोनों की हत्या कर दी गयी.



"साले ,बड़े ईमानदार बनते थे . सुभाष को छोड़ो , पटेल अम्बेडकर शायद ही सन पचास तक बच सकें? "




सभी हत्यारे जंगल से चले गये लेकिन.......'सनडेक्सरन ' धरती के तीन निवासी अपने अण्डाकार यान से उतर कर टहल रहे थे कि दोनोँ लाशों को देख कर एक लाशों को स्पर्श करते हुए -

"यय्ह्ह त्त अअभ्भ जज्लल्द मर् र ! "

अर्थात यह तो अभी जल्दी मरे हैं.

* * *



'आरदीस्वन्दी' की निगाहें अब भी अण्डाकार पारदर्शी पत्थर पर थीं.जिस पर स्पष्ट था कि तीनों सनडेक्सरन निवासी दोनों हिन्दुस्तानी नेताओं की लाशों को ले कर पृथु मही को छोड़ कर अपने यान से अन्तरिक्ष में यात्रा पर थे.



"यह तीनों तो - कन्कनेरसु,सस्कनपल और हह्नसरक हैं लेकिन यह जा कहाँ रहे हैं ? यह.... यह..... यह तो.............जरुर यह'हा हा हूस 'पर जा रहे हैँ. "



"सावधान ! " - 'आरदीस्वन्दी' के अन्त : कर्ण मेँ यह आवाज गूँजी.



"यहाँ,यहाँ ऐसा .......?! कोई सुपर माइण्ड है ?कौन.... ? "



अण्डाकार पत्थर पर उभरने वाली तश्वीरें विलीन हो चुक थी.


'आरदीस्वन्दी' अन्त:मुख अर्थात मन ही मन बोली-"कौन हैँ आप?"



आरदीस्वन्दी के अन्त:कर्ण में-



"सब पता चल जाएगा.चली आओ मेरी इन ध्वनि तरंगों के आधार पर मेरे पास. "



"क्या?"


"घबराओ मत!ओ3म आमीन!"



"ओ3म आमीन....?!"फिर आरदीस्वन्दी मुस्कुरायी.



"आती हूँ!अब घबराना क्या?ओ3म आमीन! "



* * *



< www.kenant814.blogspot.com >



< www.slydoe163.blogspot.com >



< akvashokbindu >

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

नारको परीक्षण कराने का हर कोई को मिले अधिक���र:सेरेना की डायरी से

देश को कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए ब्रेन मेपिँग व नारको परीक्षण की मैँ काफी समय से वकालत करता रहा हूँ.जो इस वकालत के विरोध मेँ हैँ वे वास्तव अपराधी हैं या मन मेँ खोँट रखते हैँ.विभिन्न परिस्थियोँ, नियुक्तियोँ ,प्रत्याशियोँ के चयन,आदि मेँ नारको परीक्षण व ब्रेन रीडिंग को अनिवार्य किया जाना चाहिए.काफी समय पहले ही पीस पार्टी प्रमुख यह मांग रख चुके हैँ.कल शाम योगगुरू रामदेव बाबा के सन्देश को मीडिया के द्वारा जान कर मन को चैन आया कि सभी मंत्रियोँ का नार्को टेस्ट कराया जाना चाहिए.मेरी सोँच तो इससे भी आगे की है. न्याय पाने के इच्छुक हर व्यक्ति को किसी का भी नारको परीक्षण करवाने का संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए.मैँ फिर कहूँगा कि ऐसी माँगोँ का विरोध करने वाले अपराधी न सही मन मेँ विकार जरुर रखते हैँ.झूठी गवाही, अफवाह ,शंका ,भ्रम ,आदि के आधार पर लोगोँ का चरित्र ही नहीँ जीवन बदल दिया जाता है.प्रजातन्त्र का मतलब यह कदापि नहीँ होना चाहिए कि किसी भी कारण किसी का पक्ष ले मनमानी ,दबंगता
,आदि के सामने नेताशाही व नौकरशाही खामोश हो जाए व देश मेँ न्याय व सुप्रबन्धन की व्यवस्था मेँ व्यवधान पहुँचे.


अशोक कुमार वर्मा'बिन्दु'

www.slydoe163.blogspot.com



www.kenant814.blogspot.com


ए बी वी इण्टर कालेज,


मीरानपुर कटरा,

शाहजहाँपुर, उ ,प्र.

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

भविष्य मेँ इतिहास....

विभिन्न पदोँ हेतु प्रत्याशी होने को ब्रेन रीडिँग व नारको परीक्षण को अनिवार्य करने की माँग के साथ आने वाले समय मेँ इतिहास पीस पार्टी के साथ होगा.यह माँग भविष्य की महत्वपूर्ण माँग होगी.जिस तरह सति प्रथा के समाप्ति के लिए राजाराम मोहन राय नाम इतिहास मेँ जुड़ चुका है , उसी तरह ब्रेन रीडिँग व नारको परिक्षण को लेकर पीस पार्टी प्रमुख का नाम इतिहास मेँ होगा.यह सत्य है कि नब्वे प्रतिशत से भी ऊपर जनता,नेता,बेरोजगार,संस्था प्रमुख,आदि इस माँग के समर्थन मेँ कभी नहीँ खड़े हो सकेँगे .आज भी भ्रम,शंका,अफवाह,मतभेद,ईर्ष्या,आदि से प्रभावित मन लोगोँ का चरित्र ही नहीँ जीवन बदल देता है.भविष्य मेँ इस सम्बन्ध मेँ भी अदालत की महत्वपूर्ण भूमिका होगी.


माता पिता बनने का अधिकार :-


किसी विचारक ने कहा है कि माता पिता बनने का अधिकार सभी को नहीँ होना चाहिए.जो की भविष्य की पीढ़ी को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक है.

चलो ठीक है कि स्त्री पुरुष को साथ साथ रहने का अधिकार प्रकृति भी देती है लेकिन भावी पीढी के सर्बांगीण बिकास के लिए हर कोई को माता पिता बनने का अधिकार नहीँ होना चाहिए.हमेँ देखने को मिल रहा है कि भावी पीढी की कमजोरियोँ के लिए कहीँ कहीँ मात पिता भी दोषी हो सकते हैँ.
घर की चारदीवारी के अन्दर सामाजिक मर्यादाओँ के नाम पर जीवन कैद है और घरेलू अपराधोँ के लिए बने कानून बौने साबित हो रहे हैँ.माता पिता व बच्चोँ के बीच सम्बन्धोँ की ऋणात्मक स्थिति
उजागर न होने को मजबूर है . समाज भी आज छिन्न भिन्न है.माता पिता ही परिवार मेँ अशान्ति व फूट के कारण बने हुए हैँ.



अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'


सहसम्पादक


मर्म युग मासिक पत्रिका


शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

प्रेम पीड़ानाशक : श्री श्री रविशंकर

प्रेम पीड़ानाशक है.

हम कल्पना नहीँ कर सकते हैँ कि प्रेम के बिना कैसा होगा जीवन?बेशक नामुमकिन.जैसे,मकड़ी खुद अपना जाल बुनती है.क्या वह उस जाल को छोँड़ सकती है?नहीँ.जिस तरह जाल के बगैर मकड़ी का होना नामुमकिन है,उसी तरह मानव जीवन भी प्रेम के बिना असंभव है.प्रेम के बिना उसका अस्तित्व नहीँ हो सकता.जैसे मकड़ी अपने थूक से अपना जाल बुनती है,वैसे ही हम प्रेम से अपनी दुनिया बुनते हैँ और फिर अपनी ही दुनिया के बीच फंसे रहते हैँ.


कैसे जगाएं अंतस का प्रेम?


पूर्णता के तीन स्तर हैँ-मन,कर्म और वाणी की पूर्णता.यह पूर्णता प्रेम से ही सम्भव है.प्रेम प्रत्येक व्यक्ति के भीतर ही होता है. इस आत्मिक प्रेम को हम मन,कर्म और वाणी की पूर्णता से जागा सकते हैँ.मन से कुत्सित विचारोँ को त्याग देँ,जनहित के लिए सोँचे, अपने कर्म को महत्व देँ और वाणी को संयमित रखेँ,तो हम ध्यान का सहारा ले सकते हैँ. फिर प्रेम के आगे पीड़ा छोटी पड़ जाती है.


प्रेम मेँ पीड़ाएं छोटी:


प्रेम मेँ अपार शक्ति होती है.इस शक्ति को जिसने जान लिया ,वह पूर्णता को पा लेता है.प्रेम की संवेदना को जो ऊपर उठाने मेँ कामयाब हो जाता है,उसे भौतिक पीड़ाएं नहीँ सतातीँ .

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

लिंग भेद: इन पर्वोँ का मतलब!

करवाचौथ पर आज फिर वही चिन्तन.रक्षा बन्धन ,भैया दूज,करवाचौथ ,आदि पर्व क्या आज के नवीनतम ज्ञान के परिवेश मेँ क्या लिँग भेद का पर्याय नहीँ है ?साल भर हम चाहेँ इन्सानोँ के प्रति कैसा भी व्यवहार करेँ?धर्म क्या यही सीख देता है कि जीवन के कुछ दिवस ही सात्विक जीवन जिएं?यदि हाँ,तो हम ऐसे धर्म पर लात मारता हूँ.यह झूठा धर्म है.यह पर्व मनाने का मतलब है जिनसे हम अपने व्यवहारिक जीवन मेँ अलग हो गये हैँ उसको कुछ दिवस याद कर लेना.जिसे इन्सान अपने जीवन से दूर किए हुए है,बस कुछ दिन याद कर रहा है और जो जीवन भर अपन आचरण मेँ लाने का प्रत्यन कर रहा है,उस पर कमेँटस कसते हैँ यहाँ उन्हेँ उपेक्षित कर देते हैँ.आज के अवसर मैँ उन्हेँ अपने जीवन से वहिष्कृत करता हूँ,उनके लिए मेरे दिल मेँ कोई जगह नहीँ है.




मैँ तो चार आर्य सत्य व आष्टांगिक मार्ग ही धर्म पर चलने का श्रेष्ठ मार्ग मानता हूँ.
अब आप मुझे बौद्ध या जैन मत का कहेँगे.जैसा लोग कहते आये हैँ.आप लोग मतभेद मेँ ही जीते आये हैँ.ईमानदारी से धर्म मेँ कहाँ जिए हैँ.मेरा तो मानना है कि व्यक्ति चाहेँ किसी मत से हो ,वह यदि धर्म के प्रति ईमानदार है तो चारो आर्य सत्य व आष्टांगिक मार्ग को उपेक्षित नहीँ कर सकता .


मधुरता व उदारता के बिना धर्म रिश्तेदारी ढोँग है.धर्म मेँ तो बदले का भाव भी नहीँ चलता.



अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

नक्सली कहानी : न शान्त��� न क्रान्ति !

बुधवार की दोपहर घर से धान की बाली तोड़ने गई बालिका का शव नग्नावस्था मेँ गन्ने के खेत से खून से लथपथ पाया गया.बालिका का रेप के बाद गला काट कर हत्या कर दी.शव मिलने की खबर से गांव मेँ सनसनी फैल गयी.घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंच गयी.शव को कब्जे मेँ लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.


मीरानपुर कटरा (शाहाजहांपुर) थाना क्षेत्र के ग्राम कबरा हुसैनपुर निवासी रामनिवास राठौर की पुत्री क्रान्ति गांव के प्राथमिक जूनियर हाईस्कूल मेँ कक्षा सात की छात्रा थी.बुधवार की दोपहर वह घर से धान के खेत से बाली तोड़ने गई थी.अचानक वह लापता हो गई जब देर शाम वह घर नहीँ पहुंची तो उसके परिजनोँ ने उसकी तलाश की लेकिन उसका कोई पता नहीँ चला.इस पर परिजनोँ ने दूसरे दिन थाने मेँ मामले की गुमशुदी दर्ज कराई.


कल सुबह ग्रामीणोँ नेँ एकत्र हो कर आसपास के खेतोँ को खंगाला तो रामचन्द्र के गन्ने के खेत मेँ क्रान्ति का नग्नावस्था मेँ शव पड़ा था तथा उसका गला कटा हुआ था.उसके कपड़े तथा धान काटने वाली दराती खून से सनी हुई पड़ी थी.



न शान्ति न क्रान्ति !
है सिर्फ भ्रांति....सिर्फ कागजी पुतलोँ की राजनीति!रामायण के रावण पर अंगुली उठाते हैँ.आज के रामोँ की शरण मेँ खड़े रावणत्व को संरक्षण दे दे रावण के कागजी पुतलोँ के दफन के साथ मुस्कुराते हैँ.धन्य ,आज के पात्र!



सैनिक (सिपाई)आज भी हैँ,राजा(शासक)आज भी हैँ लेकिन....


आज के राम भक्तोँ की भीड़ मेँ भी आज के राम अयोध्या (अपने राज्य)के मदद से दूर हैँ .साथ हैँ आदिवासी और .....?!और सुग्रीब का राज्य....


सन2025ई0 की विजयादशमी ! रामलीला के मैदान मेँ रावण का पुतला जल रहा था.


"आप कागजी पुतलोँ को जला कर दुनिया को क्या मैसेज देना चाहते हो?आप से अच्छे हम हैँ जिन्दा रावणोँ को जला रहे थे.यदि हम गलत थे, केशव कन्नौजिया गलत था तो आप ही अपने को ठीक साबित हो कर दिखाओ.पुतलोँ को नहीँ रावणत्व को जला कर दिखाओ."


एक नक्सली नेता एक टीवी चैनल पर अपना इण्टरव्यु दे रहे थे.


"क्रान्ति हो या शान्ति दोनोँ को कुचलने वाले के साथ खड़े है श्वेतवसन अपराधी .हम पर अंगुलियाँ उठाने वाले इनको उजागर हो कर दिखायेँ.यह अच्छा है कि हमारे कारण सरकारेँ अपनी व्यवस्थाओँ मेँ कुछ तो परिवर्तन तो कर रही हैँ.लोग जब तक सभ्य नहीँ हो जाते तब तक कोरे सत्याग्रह से काम नहीँ चलने वाला.तब तक टेँढ़ी अँगुली से भी काम चलाना पड़ेगा ही. आप भी स्वयं कहते फिरते हो कि टेंढ़ी अँगुली से घी नहीँ निकलता.जैसे 1947तक के स्वतन्त्र ता संग्रामोँ मेँ से भगत सिँह,चन्द्रशेखर,सुभाष,आदि के महत्व को निकाल नहीँ पाते ,धर्म शास्त्रोँ मेँ से हिँसा के महत्व को निकाल नहीँ पाते तो हमारी हिँसा के महत्व को क्योँ नगण्य कर देते हो? गीता अर्थात कुरुशान के गीता सन्देश को अपमान क्योँ नहीँ देते हो?सीमा पर की हिँसा का अपमान क्योँ नहीँ करते हो?हाँ,अपने साथियोँ कुछ निर्दोष हत्यायोँ पर मुझे दुख है. लेकिन....हाँ,और गेँहू के साथ घुन पिसता है. गेँहू के घुन क्योँ बनते हो.तब तो निज स्वार्थ के सिवा कुछ भी दिखता नहीँ."


क्रान्ति प्रकरण से अपना पल्ला झाड़ने के लिए पुलिस ने कुछ निर्दोष व्यक्तियोँ पर भी कार्यवाही कर दी थी. जिसका प्रमुख कारण दबंगोँ की कूटनीति थी.यह निर्दोष पीड़ित व्यक्ति अब नक्सलियोँ की शरण मेँ थे.





बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

शिक्षक या कि नक्सली ?

केशव कन्नौजिया अब शिक्षण कार्य से निकल कर नक्सली आन्दोलन से जुड़ गया.


अपना पक्ष साबित करने के लिए वैसे नहीँ तो अब ऐसे.


और फिर जिन के कारण यहाँ तक वे ही कहते फिरते कि भय बिन होय न प्रीति.......घी टेँड़ी अँगुली से ही निकलता है.जब लोग हिँसा व भय मेँ रह कर ही अच्छा कार्य कर सकते हैँ तो हिँसा व भय ही ठीक.


" लातोँ के भूत बातोँ से नहीँ मानते."


केशव कन्नौजिया देखा कि शासन प्रशासन व समाज से कोई भी हमारे पक्ष मेँ खड़ा नजर नहीँ आ रहा है .कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के तन्त्र मेँ उल्टे दलदल मेँ फँसता जा रहा हूँ.वह नक्सलियोँ के साथ आ गया. विचार तो मुस्लिम मत स्वीकार करने का भी आया था लेकिन....


अब सन 2025 ई0 की विजयदशमी ! आर एस एस के स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण !


इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने उन नियुक्तियोँ को अवैध घोषित कर दिया जो सन 1996ई0 मेँ जूनियर क्लासेज के एड के दौरान कन्हैयालाल इण्टर कालेज ,यदुवंशी कुर्मयात (फरीदपुर) मेँ जूनियर क्लासेज के लिए नियुक्त अध्यापकोँ को नियुक्ति न देने के बजाय माध्यमिक स्तर के अध्यापकोँ की नियुक्तियाँ कर दी गयीँ थीँ.अदलात ने केशव कन्नौजिया व उसके साथियोँ पर लगे सभी आरोपोँ से मुक्त कर दिया.


विजयादशमी के दौरान भव्य शस्त्र पूजन समारोह के दौरान आत्मसमर्पण कर दिया.


"क्या करूँ गांधी के देश मेँ अब भय व हिँसा मेँ ही सिर्फ बेहतर काम करने वालोँ की कमी नहीँ हैँ . सन 1996ई0 से पहले मैँ क्या था,यह किसी से छिपा नहीँ है लेकिन फिर मुझे नक्सलियोँ के शरण मेँ जाना पड़ा.मेरी हिँसा निर्दोषोँ के खिलाफ नहीँ थी.अन्याय व शोषण के खिलाफ थी. "


केशव कन्नौजिया के आँखोँ मेँ आँसू आ गये.


पुन :


" जिनके खिलाफ मैँ कोर्ट गया था और फिर नक्सली हुआ वे सब प्रति वर्ष गांधी की जयन्ती मनाते आये थे और अब भी मना रहे हैँ लेकिन अपने व्यवहारिक जीवन मेँ .....वे कम से कम मानसिक हिँसा तो करते आये हैँ.ऐसे लोग कहीँ न कहीँ अपराध की जड़ोँ को सीँचते आये है.मैँ तब भी गांधीवादी था अब भी गांधीवादी हूँ. बीच मेँ....?!बीच के इण्टरवेल मेँ मजबूरन कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचारी तन्त्र मेँ......?! सोरी ! "

इन पन्द्रह वर्षोँ मेँ अदालतेँ भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन के खिलाफ अपने विचार व्यक्त कर चुकी थीँ लेकिन नेताशाही व नौकरशाही अब भी ठीकाने पर नहीँ आयी थी.कुछ कर्मचारियोँ व अन्य पर अदालतोँ मेँ दोष साबित हो गये थे व कुछ को फाँसी की सजा सुनाई गयी थी.दूसरी ओर मुसलमानोँ को अल्पसंख्यक का दर्जा बनाये रखने के खिलाफ देश मेँ वातावरण रहा था लेकिन नेताशाही व सत्तावाद अवरोध खड़े किये थे.


ऐसे मेँ नक्सली...


नक्सली सम्बन्धित नेताओँ कर्मचारियोँ का और उन लोगोँ का मर्डर कर रहे थे जिन्हेँ अदालत ने फाँसी की सजा सुनायी थी लेकिन राजनीति के चलते उन्हेँ फांसी नहीँ दी गयी थी.


केशव कन्नौजिया अब भी नक्सली आन्दोलन के अहिँसक रुप के समर्थन मेँ खड़ा था.


कुछ दस्तावेज गायब होने के मामले मेँ कुछ कांग्रेसियोँ पर भी नक्सलियोँ की निगाहेँ थीँ .जैसे
- नहेरु व गवर्नर लार्ड माउण्टवेँटन के बीच सम्बन्ध, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस,लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु,संजय गांधी की मृत्यु,दीन दयाल उपाध्याय की मृत्यु. भिण्डरावाले
-लिट्टे-बोडो आन्दोलन को प्रोत्साहन,आदि सम्बन्धी दस्तावेज....



इधर हिन्दु समाज पर कट्टर मुसलमानोँ का दबाव बढ़ता जा रहा था.जिससे बचने के लिए हिन्दू सिक्खोँ की शरण मेँ जा रहा था.दिल्ली पर नक्सली सत्ता की सम्भावनाएं बढ़ती जा रही थीँ.

विद्यालयी दंश

मनोज का एक मित्र था -केशव कन्नोजिया.


अभी एक दो वर्षोँ से ' माध्यमिक वित्तविहीन शिक्षक महासभा ,उ प्र ' के माध्यम से कुछ
अध्यापक,प्रधानाचार्य,आदि अपनी राजनीति करते नजर आ रहे थे.प्रदेश मेँ विप के स्नातक व शिक्षक क्षेत्रोँ का लिए चुनाव का वातावरण था.जिस हेतु 10नवम्बर 2010ई0 को मतदान होना तय था. वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापकोँ के साथ अंशकालीन शब्द जोड़ने वाले एक उम्मीदवार जो कि पहले सदस्य रह चुके थे,के खिलाफ थे वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापक . जो कि
'माध्यमिक वित्तविहीन शिक्षक महासभा उप्र ' की ओर से उम्मीदवार संजय मिश्रा का समर्थन कर रहे थे.



लेकिन-


वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापक,व्यक्तिगत स्वार्थ,निज स्वभाव, जाति वर्ग, प्रधानाचार्य व प्रबन्धक कमेटी की मनमानी,आदि के कारण अनेक गुट मेँ बँटे हुए थे.इन विद्यालयोँ मेँ अधिपत्य रहा है -प्रधानाचार्य व प्रबन्धक कमेटी की हाँ हजरी करने वाले व दबंग लोगोँ का.'सर जी' का कोई गुट न था.बस,उनका गुट था-अभिव्यक्ति.अब अभिव्यक्ति चाहेँ किसी पक्ष मेँ जाये या विपक्ष मेँ या अपने ही विपक्ष मेँ चली जाये;इससे मतलब न था.


मनोज दो साल पहले कन्हैयालाल इण्टर कालेज ,यदुवंशी कुर्मयात मेँ लिपिक पद पर कार्यरत था.जो कि फरीदपुर से मात्र 18 किलोमीटर पर था.मनोज को कुछ कारणोँ से प्रबन्ध कमेटी ने सेवा मुक्त कर दिया जो कि अब अदालत की शरण मेँ था.


फरीदपुर के रामलीला मैदान मेँ संजय मिश्रा के पक्ष मेँ हो रही एक सभा मेँ मनोज जा पहुँचा.


"अच्छा है कि आप सब वित्तविहीन विद्यालयी के अध्यापकोँ के भविष्य प्रति चिन्तित हैँ लेकिन यह चिन्ता कैसी?विद्यालय स्तर पर इन अध्यापकोँ के साथ जो अन्याय व शोषण होता है,उसके खिलाफ आप क्या कर सकते हैँ?आप स्वयं उन लोगोँ को साथ लेकर चल रहे हैँ जो कि विद्यालय मेँ ही निष्पक्ष न्याय सत्य अन्वेषण आदि के आधार पर नहीँ चलना चाहते हैँ.मैँ ....."


जब लोग हिँसा व भय मेँ रह कर ही बेहतर काम कर सकते हैँ तो हिँसा व भय क्या गलत है?गांधीवाद तो सभ्यता समाज मेँ चल सकता है.तुम लोग ही कहते हो कि भय बिन होय न प्रीति.लेकिन केशव कन्नौजिया को नक्सली बनाने के लिए कौन उत्तरदायी है?कानून,समाज,संस्था,आदि के ठेकेदार सुनते नहीँ.खुद यही कहते फिरते हैँ कि सीधी अँगुली से घी नहीँ निकलता तो फिर टेँड़ी अँगुली कर ली केशव ने तो क्या गलत किया?सत्य को सत्य कहो,ऐसे नहीँ तो वैसे.


सन 1996ई0के जुलाई की बात है. यूपी सरकार के द्वारा अनेक जूनियर हाईस्कूल को एड दी गयी थी.केशव कन्नौजिया जिस विद्यालय मेँ अध्यापन कार्य कर रहा था , उस विद्यालय के जूनियर क्लासेज भी इस एड मेँ फँस रहे थे.जूनियर क्लासेज की नियुक्ति चार अध्यापकोँ की थी,जिनमेँ से एक केशव कन्नौजिया भी.
शेष 18 अध्यापक माध्यमिक मेँ थे.कानूनन उपरोक्त चार अध्यापक जो कि जूनियर क्लासेज के लिए नियुक्त थे,एड के अन्तर्गत थे.


लेकिन...


जिसकी लाठी उसकी भैस!....चित्त भी अपनी पट्ट भी अपनी,वर्चश्व अपना तो फिर क्या?


दो वर्ष पहले अर्थात सन 1994ई0 मेँ जब अध्यापकोँ का ग्रेड निर्धारित किया गया था तो भी नियति गलत,जूनियर क्लासेज के लिए नियुक्त चारोँ अध्यापकोँ को सीटी ग्रेड के बजाय एलटी ग्रेट मेँ रखा जा सकता था लेकिन कैसे , अपनी मनमानी?और अब जब जूनियर के लिए एड तो...?!


एड मेँ शामिल होने के लिए माध्यमिक से निकल जूनियर स्तर पर आ टिकने के लिए इप्रुब्ल करवा बैठे और जूनियर स्तर पर की नियुक्तियोँ को ताक पर रख दिया गया .


केशव कन्नौजिया इस पर तनाव मेँ आ गया कि हम सभी जूनियर की नियुक्ति पर काम करने वालोँ का क्या होगा ? जो जिस स्तर का है ,उसे उसी स्तर रहना चाहिए.ऊपर की कभी एड आयी तो क्या हम लोग ऊपर एड हो सकेँगे ? होँगे भी तो किस कण्डीशन पर ?


केशव कन्नौजिया अन्य जूनियर स्तर के लिए नियुक्त अध्यापकोँ के साथ हाई कोर्ट पहुँच गया.


अब उसे अनेक तरह की धमकियां मिलने लगी.


" मैँ शान्ति सुकून से अपने हक के लिए कानूनीतौर पर अपनी लड़ाई लड़ रहा हूँ,आपकी इन धमकियोँ से क्या सिद्व होता है?ईमानदारी से आप अब कानूनी लड़ाई जीत कर दिखाओ."



जब केस केशव कन्नौजिया व उनके साथियोँ के पक्ष मेँ जाते दिखा तो विपक्षी मरने मारने पर उतर आये.


"आप लोग कर भी क्या सकते हैँ ? भाई, आप लोग सवर्ण वर्ग से हैँ, यह कुछ ब्राह्मण वर्ग से हैँ. हम कहाँ ठहरे शूद्र.भाई,आप लोग अपने सवर्णत्व का ही तो प्रदर्शन करेँगे?और आप ब्राह्मणत्व का? शूद्रता का प्रदर्शन तो हम ही कर सकते हैँ?"

झूठे गवाहोँ के आधार पर केशव कन्नौजिया व उनके साथियोँ को क्षेत्र मेँ हुए मर्डर ,लूट,अपहरण,बलात्कार,आदि के केस मेँ फँसा दिया था.


रविवार, 3 अक्टूबर 2010

कथा:मतान्तरण क्योँ न��ीँ

राघवेन्द्र जीत यादव की एक गर्ल फ्रेण्ड थी-आसमाँ मन्सूरी.हालांकि उसके ख्वाबोँ की रानी थी 'शिक्षा' नाम की युवती लेकिन........?!



किसी से प्रेम होना अलग बात है.अपने कर्मक्षेत्र मेँ होने के कारण स्त्रियोँ पुरुषोँ से व्यवहार व आचरण रखना एवं अपनी पर्सनल लाइफ मेँ किसी के साथ जीवन जीना अलग बात है.ऐसे मेँ प्रेम ...?प्रेम एक एहसास व मन की स्थिति बन कर रह जाता है.



सनातन इण्टर कालेज से निकलने के बाद राघ वेन्द्र जीत यादव के मासिक आय मेँ कमी आ गयी थी.हालांकि मीरानपुर कटरा के ही एक अन्य कालेज मेँ वह शिक्षण कार्य करने लगा था.मनमानी,नियमहीनता,हाँहजूरी, व्यक्तिगत स्वार्थ,आदि की विद्यालय स्टाप मेँ वर्चस्वता के कारण उसे सनातन इण्टर कालेज मेँ दोषात्मक निशाना बनाया गया था.कुछ लोग यहाँ तक चाहते थे कि राघवेन्द्र जीत यादव मीरानपुर कटरा ही छोँड़ कर चला जाए.


लेकिन....?!



"क्योँ?क्योँ छोँड़ कर जाओगे कटरा?"


"आसमाँ, तुमसे किसने कह दिया मैँ कटरा छोँड़ कर जाऊँगा?जब मेरा दिल दिमाग कहेगा,तब मैँ जाऊँगा."


"राघव! मुझे कुछ रातोँ से नीँद नहीँ आती. तुमने कैसा हाल बना रखा है अपना?"



"ठीक तो हूँ.बस,बाहर से ऊर्जा प्राप्त नहीँ कर पा रहा हूँ लेकिन मैँ महसूस कर रहा हूँ आन्तरिक ऊर्जा जाग्रत होते.और फिर तुमको देख कर तो और ऊर्जा बढ़ जाती है ,उत्साहित हो जाता हूँ."


"तब भी.....शरीर का भी ध्यान रखना जरुरी है .खाओगे पियोगे नहीँ तो शरीर कैसे चलेगा?"


" कौन कहता है खाता पिता नहीँ हूँ."


"अच्छा,दूर से बात करो. मैने कहा न,मुझे छोड़ो."


" दिल से कह रही हो."


तब आसमाँ मु स्कुरा दी.


राघवेन्द्र जीत यादव ने आसमाँ को अपनी बाहोँ मेँ ले रखा था.होँठोँ को होँठोँ ने स्पर्श किया....


"अच्छा,अब छोँड़ो.प्रेम को प्रेम ही रहने दो."


"आसमाँ,नहीँ तो.....?!"


"नहीँ तो मजहब व जाति आड़े आ जायेगी.जानते हो,फिर साम्प्रदायिकता की आग मेँ कटरा भी झुलस सकता है."



".....और हम,हम तड़फते रहेँ बस.."


" तड़फेँ दुश्मन . मुसलमान बन जाओ न. मेरे लिए तुम क्या करोगे?दिल मेँ तो अब भी 'शिक्षा'है. मुझे तो सिर्फ पत्नी बनाने का ख्वाब देखते हो तुम. दिल तो 'शिक्षा 'को दे रखा है न."


ऐसे मेँ राघवेन्द्र जीत यादव !


सात दिन अन्तर्द्वन्द!


यह द्वन्द पहले भी आये थे लेकिन तब सिर्फ मतान्तरण का विचार आया था,अब मतान्तरण करना था. हिन्दू समाज मेँ किसने अभी तक हम पर प्रेम का इजहार किया था?क्या प्रेम को सम्मान नहीँ देना चाहिए?



हूँ!

मन ही मन राघवेन्द्र जीत यादव-


" लोग कह तो देते हैँ मतान्तरण करने की क्या जरूरत ? क्या अपने मत मेँ भावनाओँ का शेयर करने वालोँ का अकाल पड़ गया ? हाँ, मेरे लिए अकाल ही पड़ गया. आवश्यकताएं पूरी नहीँ होतीँ ,यह आपकी कमी है.मेरी कमी..?! और क्या.मेहनत करो रुपया कमाओ.हूँ! भावनाओँ के शेयर के लिए क्या रुपया चाहिए? दोस्ती के लिए क्या रुपया चाहिए?प्रेम के लिए क्या रुपया चाहिए?मुस्लिम समाज मेँ तन्हा क्योँ नहीँ?उस समाज से आसमाँ प्राप्त है,कुछ मित्र प्राप्त हैँ.हूँ,तो हिन्दू समाज से क्योँ नही?उत्साह होता है न ,तो मेहनत करने का रुपया कमाने का रास्ता बनता जाता है.आसमाँ मेरे करीब है ,जीवन के हर मोड़ पर मेरे करीब है.ख्वाबोँ मेँ भी और वास्तव मेँ भी.शिक्षा .....और शिक्षा .....क्या कहूँ उसको लेकर.....वह हमेँ मिलने को रही.तुम्हारे हिन्दू समाज से कौन मेरे करीब है?हूँ,करीबी के लिए पहले रुपया चाहिए,मेहनत चाहिए.मैँ तो कामचोर हूँ मक्कार हूँ?लेकिन क्योँ हूँ? तुम क्या जानो तन्हाई क्या होती है?.....अब जब आसमाँ मेरे साथ है,मेहनत भी मेरे साथ है रुपया भी मेरे साथ है.बस,इन्तजार कीजिए.तुम और तुम्हार हिन्दू समाज ...?!मेरे लिए एक लड़की भी न उपलब्ध करा पाया,जो मेरा उत्साह बन कर मेरे जीवन मेँ आये.अब मुस्लिम समाज से आसमाँ मुझे मिली है,वह मेरा उत्साह बन कर आयी है न कि यह देखने के लिए कि मैँ आलसी हूँ,मैँ रुपया कम कमाता हूँ.उसने मुझे स्वीकारा है सिर्फ मुझे.मुझमेँ कमियाँ ढूंढने के लिए नहीँ,मुझ पर कमेन्टस के लिए नहीँ.प्रेम भी यही कहता है कि व्यक्ति जैसा है,उसे वैसा ही स्वीकारो.प्रेम मेँ तो वह ऊर्जा है कि इन्सान देवता बन जाए."



-यह सोँचते सोँचते राघवेन्द्र जीत यादव के आंखोँ मेँ आँसू आ गये.



आठवेँ दिन-


राघवेन्द्र जीत यादव ने मुस्लिम मत स्वीकार कर लिया ,तो क्या गलत किया ? मत व धर्म मेँ फर्क होता है.



आसमाँ से निकाह के बाद,



दस साल बाद अर्थात अब सन 2025ई0की 25 सितम्बर!


राघवेन्द्र जीत यादव अब राजनीति व साहित्य क्षेत्र मेँ मण्डल स्तर की एक प्रमुख हस्ती बन चुका था.लकड़ी ,फर्नीचर व होटल के व्यवसाय के माध्यम से करोँड़ोँ पा चुका था.

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

02 अक्टूबर:मेरा जन्म द��न भी.

मैँ ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'.... इत्तफाक से मेरा जन्मदिन भी है-02अक्टूबर.मेरे लिए यह सदयता दिवस है.


मन प्रबन्धन के अन्तर्गत मैँ मन ही मन अपने अन्दर करुणा व संयम को हर वक्त स्वागत के लिए हालात बनाता रहा हूँ ,जिसके लिए कल्पनाओँ ,विचारोँ,स्वाध्याय ,इण्डोर अभिनय व अन्य उपाय करता रहा हूँ.वास्तव मेँ अहिँसा के पथ पर चलने के लिए करुणा व संयम के लिए हर वक्त मन के द्वार खोले रखना आवश्यक है.इस अवसर पर मैँ 'प्रेम 'पर भी कुछ कहना चाहुँगा.वे सभी जरा ध्यान से सुनेँ जो किसी से प्रेम मेँ दिवाने हैँ.प्रेम पर न जाने कितनी फिल्मेँ बन चुकी हैँ,किताबेँ लिख चुकी है.कहाँ प्रेम है ?प्रेम जिसमेँ जागता है,उसकी दिशा दशा ही बदल जाती है.प्रेम जिसमे जाग जाता है,उसके मन से हिँसा गायब हो जाती है,स्वेच्छा की भावना समाप्त हो जाती है. 'मैँ' समाप्त हो जाता है.


"दिल ही टूट गया तो जी कर क्या करेँ?"


यह सब भ्रम है.


प्रेम मेँ दिल नहीँ टूटता. हाँ,काम मेँ दिल टूट सकता है.कहीँ न कहीँ प्रेम दिवानोँ या प्रेम दिवानीयोँ से सामना हो जाता है,सब के सब भ्रम मेँ होते हैँ. प्रेम मेँ तो अपनी इच्छाएं खत्म हो जाती हैँ.जिससे प्रेम होता है,उसकी इच्छाएं ही अपनी इच्छाएं हो जाती हैँ.
जो अपनी प्रेमिका या प्रेमी की ओर से उदास हो जाते हैँ, वे प्रेमवान नहीँ हो सकते.अखबारोँ मेँ निकलने वाली आज कल की प्रेम कहानियां हवस की कहानियां है.जो चार पांच साल बाद टाँय टाँय फिस्स..........प्रेम तो अन्त है शाश्वत है जो जाग गया तो फिर सोता नहीँ, व्यक्ति निराश नहीँ होता. करुणा व संयम के बिना प्रेम कहाँ ?प्रेम तो सज्जनता की निशानी हैँ.जो जीवन को मधुर बनाती है.


खैर....



आज गांधी जी का जन्मदिन है.जो कि बीसवीँ सदी के सर्वश्रेष्ठ जेहादी हैँ.जिनका हर देश मेँ सम्मान बढ़ता जा रहा है.

गांधी वास्तव मेँ सभ्यता की पहचान हैँ.जो कहते हैँ मजबूरी का नाम -गांधी,वे भ्रम मेँ हैँ.



शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

जबरदस्ती का विवाद : अयोध्या विवाद

लगता है दुनिया मेँ अब भी लोग ऐसे हैँ जो फिजूल की हरकतोँ से विभिन्न समस्याएं बनाएं हैँ.वे ईमानदार व अन्वेषण से काफी दूर होते हैँ.ऐसे ही कुछ लोग अयोध्या विवाद को बनाये हुए हैँ.


काफी इन्तजार के बाद 30सितम्बर2010ई0के शाम 4.30 के लगभग इलाहावाद उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि

" जहाँ है, वहीँ रहेँगे रामलला."

ईमानदार व सच्चाई का सम्मान करने वाले लोगोँ को यह हजम नहीँ हो रहा है कि तीन हिस्सोँ मेँ बंटेगा विवादित स्थल:निर्मोही अखाड़ा,राम लला पक्ष और सुन्नी वक्फ बोर्ड को बराबर हिस्सा.इस पर अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैँ कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को हिस्सा क्योँ? यह क्या अदालत का फैसला है?अदालत ने फैलता किया है कि विवादित स्थल का बटवारा किया?



जस्टिस एस यू खान का कहना था कि

"विवादित ढांचे को बाबर के आदेश से अथवा उनके द्वारा मस्जिद के तौर पर तामीर किया गया,लेकिन प्रत्यक्ष साक्ष्य से यह सिद्ध नहीँ हो पाया कि निर्मित भाग सहित विवादित परिसर बाबर का था या उसका था,जिसने इसे बनाया.मस्जिद बनाने के लिए कोई मन्दिर नहीँ गिराया गया ,बल्कि उसका निर्माण मन्दिर के खण्डहरोँ पर किया गया,जो बहुत समय से वहाँ मौजूद थे.तीन गुंबदोँ वाले ढांचे के बीच के गुम्बद वाला भाग ,जहाँ भगवान राम विराजमान है,हिन्दुओँ का है ."



जस्टिस धर्मवीर शर्मा का कहना था -



"यह सिद्ध हुआ है कि मुकदमेँ वाली सम्पत्ति रामचन्द्र जी की जन्म भूमि है......विवादित ढांचे का निर्माण बाबर ने करवाया था,किस वर्ष मेँ,यह निश्चित नहीँ है लेकिन यह इस्लाम के सिद्धान्तोँ के खिलाफ था इसलिए इसे मस्जिद नहीँ कहा जा सकता.
"



असलियत सामने है.मुसलमानोँ मेँ क्या सत्य समझने की नहीँ है?क्या सत्य है,यह तो समझना चाहिए?क्या इस्लाम के सिद्धान्तोँ का सम्बन्ध जबरदस्ती ,हिँसा,गैरमुसलमानोँ के आस्था पर चोट ,आदि से है?नहीँ ,ऐसा नहीँ.

पूर्व मुख्यमन्त्री कल्याण सिँह का यह कहना क्या गलत है कि


" जब वक्फ बोर्ड की याचिका खारिज हो गयी है तो मुसलमानोँ को एक तिहाई जमीन देने का कोई औचित्य नहीँ."
लखनऊ से,भारत की कम्युनिस्ट पार्टी माले ने कहा तक कहा कि

" अयोध्या विवाद का सन्तोषजनक हल देने मेँ उच्च न्यायालय असफल साबित हुई है.....यह निर्णय स्थापित कानूनी मान्यताओँ पर आधारित न हो कर राजनीतिक ज्यादा है."



वास्तव मेँ यह विवाद मेँ मुसलमानोँ के द्वारा पैदा किया गया जबरदस्ती का विवाद है.मुसलमानोँ को आत्मसाक्षात्कार की जरुरत है.



JAI HO...OM....AAMEEN!