बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

शिक्षक या कि नक्सली ?

केशव कन्नौजिया अब शिक्षण कार्य से निकल कर नक्सली आन्दोलन से जुड़ गया.


अपना पक्ष साबित करने के लिए वैसे नहीँ तो अब ऐसे.


और फिर जिन के कारण यहाँ तक वे ही कहते फिरते कि भय बिन होय न प्रीति.......घी टेँड़ी अँगुली से ही निकलता है.जब लोग हिँसा व भय मेँ रह कर ही अच्छा कार्य कर सकते हैँ तो हिँसा व भय ही ठीक.


" लातोँ के भूत बातोँ से नहीँ मानते."


केशव कन्नौजिया देखा कि शासन प्रशासन व समाज से कोई भी हमारे पक्ष मेँ खड़ा नजर नहीँ आ रहा है .कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के तन्त्र मेँ उल्टे दलदल मेँ फँसता जा रहा हूँ.वह नक्सलियोँ के साथ आ गया. विचार तो मुस्लिम मत स्वीकार करने का भी आया था लेकिन....


अब सन 2025 ई0 की विजयदशमी ! आर एस एस के स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण !


इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने उन नियुक्तियोँ को अवैध घोषित कर दिया जो सन 1996ई0 मेँ जूनियर क्लासेज के एड के दौरान कन्हैयालाल इण्टर कालेज ,यदुवंशी कुर्मयात (फरीदपुर) मेँ जूनियर क्लासेज के लिए नियुक्त अध्यापकोँ को नियुक्ति न देने के बजाय माध्यमिक स्तर के अध्यापकोँ की नियुक्तियाँ कर दी गयीँ थीँ.अदलात ने केशव कन्नौजिया व उसके साथियोँ पर लगे सभी आरोपोँ से मुक्त कर दिया.


विजयादशमी के दौरान भव्य शस्त्र पूजन समारोह के दौरान आत्मसमर्पण कर दिया.


"क्या करूँ गांधी के देश मेँ अब भय व हिँसा मेँ ही सिर्फ बेहतर काम करने वालोँ की कमी नहीँ हैँ . सन 1996ई0 से पहले मैँ क्या था,यह किसी से छिपा नहीँ है लेकिन फिर मुझे नक्सलियोँ के शरण मेँ जाना पड़ा.मेरी हिँसा निर्दोषोँ के खिलाफ नहीँ थी.अन्याय व शोषण के खिलाफ थी. "


केशव कन्नौजिया के आँखोँ मेँ आँसू आ गये.


पुन :


" जिनके खिलाफ मैँ कोर्ट गया था और फिर नक्सली हुआ वे सब प्रति वर्ष गांधी की जयन्ती मनाते आये थे और अब भी मना रहे हैँ लेकिन अपने व्यवहारिक जीवन मेँ .....वे कम से कम मानसिक हिँसा तो करते आये हैँ.ऐसे लोग कहीँ न कहीँ अपराध की जड़ोँ को सीँचते आये है.मैँ तब भी गांधीवादी था अब भी गांधीवादी हूँ. बीच मेँ....?!बीच के इण्टरवेल मेँ मजबूरन कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचारी तन्त्र मेँ......?! सोरी ! "

इन पन्द्रह वर्षोँ मेँ अदालतेँ भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन के खिलाफ अपने विचार व्यक्त कर चुकी थीँ लेकिन नेताशाही व नौकरशाही अब भी ठीकाने पर नहीँ आयी थी.कुछ कर्मचारियोँ व अन्य पर अदालतोँ मेँ दोष साबित हो गये थे व कुछ को फाँसी की सजा सुनाई गयी थी.दूसरी ओर मुसलमानोँ को अल्पसंख्यक का दर्जा बनाये रखने के खिलाफ देश मेँ वातावरण रहा था लेकिन नेताशाही व सत्तावाद अवरोध खड़े किये थे.


ऐसे मेँ नक्सली...


नक्सली सम्बन्धित नेताओँ कर्मचारियोँ का और उन लोगोँ का मर्डर कर रहे थे जिन्हेँ अदालत ने फाँसी की सजा सुनायी थी लेकिन राजनीति के चलते उन्हेँ फांसी नहीँ दी गयी थी.


केशव कन्नौजिया अब भी नक्सली आन्दोलन के अहिँसक रुप के समर्थन मेँ खड़ा था.


कुछ दस्तावेज गायब होने के मामले मेँ कुछ कांग्रेसियोँ पर भी नक्सलियोँ की निगाहेँ थीँ .जैसे
- नहेरु व गवर्नर लार्ड माउण्टवेँटन के बीच सम्बन्ध, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस,लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु,संजय गांधी की मृत्यु,दीन दयाल उपाध्याय की मृत्यु. भिण्डरावाले
-लिट्टे-बोडो आन्दोलन को प्रोत्साहन,आदि सम्बन्धी दस्तावेज....



इधर हिन्दु समाज पर कट्टर मुसलमानोँ का दबाव बढ़ता जा रहा था.जिससे बचने के लिए हिन्दू सिक्खोँ की शरण मेँ जा रहा था.दिल्ली पर नक्सली सत्ता की सम्भावनाएं बढ़ती जा रही थीँ.

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