शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

प्रेम पीड़ानाशक : श्री श्री रविशंकर

प्रेम पीड़ानाशक है.

हम कल्पना नहीँ कर सकते हैँ कि प्रेम के बिना कैसा होगा जीवन?बेशक नामुमकिन.जैसे,मकड़ी खुद अपना जाल बुनती है.क्या वह उस जाल को छोँड़ सकती है?नहीँ.जिस तरह जाल के बगैर मकड़ी का होना नामुमकिन है,उसी तरह मानव जीवन भी प्रेम के बिना असंभव है.प्रेम के बिना उसका अस्तित्व नहीँ हो सकता.जैसे मकड़ी अपने थूक से अपना जाल बुनती है,वैसे ही हम प्रेम से अपनी दुनिया बुनते हैँ और फिर अपनी ही दुनिया के बीच फंसे रहते हैँ.


कैसे जगाएं अंतस का प्रेम?


पूर्णता के तीन स्तर हैँ-मन,कर्म और वाणी की पूर्णता.यह पूर्णता प्रेम से ही सम्भव है.प्रेम प्रत्येक व्यक्ति के भीतर ही होता है. इस आत्मिक प्रेम को हम मन,कर्म और वाणी की पूर्णता से जागा सकते हैँ.मन से कुत्सित विचारोँ को त्याग देँ,जनहित के लिए सोँचे, अपने कर्म को महत्व देँ और वाणी को संयमित रखेँ,तो हम ध्यान का सहारा ले सकते हैँ. फिर प्रेम के आगे पीड़ा छोटी पड़ जाती है.


प्रेम मेँ पीड़ाएं छोटी:


प्रेम मेँ अपार शक्ति होती है.इस शक्ति को जिसने जान लिया ,वह पूर्णता को पा लेता है.प्रेम की संवेदना को जो ऊपर उठाने मेँ कामयाब हो जाता है,उसे भौतिक पीड़ाएं नहीँ सतातीँ .

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

लिंग भेद: इन पर्वोँ का मतलब!

करवाचौथ पर आज फिर वही चिन्तन.रक्षा बन्धन ,भैया दूज,करवाचौथ ,आदि पर्व क्या आज के नवीनतम ज्ञान के परिवेश मेँ क्या लिँग भेद का पर्याय नहीँ है ?साल भर हम चाहेँ इन्सानोँ के प्रति कैसा भी व्यवहार करेँ?धर्म क्या यही सीख देता है कि जीवन के कुछ दिवस ही सात्विक जीवन जिएं?यदि हाँ,तो हम ऐसे धर्म पर लात मारता हूँ.यह झूठा धर्म है.यह पर्व मनाने का मतलब है जिनसे हम अपने व्यवहारिक जीवन मेँ अलग हो गये हैँ उसको कुछ दिवस याद कर लेना.जिसे इन्सान अपने जीवन से दूर किए हुए है,बस कुछ दिन याद कर रहा है और जो जीवन भर अपन आचरण मेँ लाने का प्रत्यन कर रहा है,उस पर कमेँटस कसते हैँ यहाँ उन्हेँ उपेक्षित कर देते हैँ.आज के अवसर मैँ उन्हेँ अपने जीवन से वहिष्कृत करता हूँ,उनके लिए मेरे दिल मेँ कोई जगह नहीँ है.




मैँ तो चार आर्य सत्य व आष्टांगिक मार्ग ही धर्म पर चलने का श्रेष्ठ मार्ग मानता हूँ.
अब आप मुझे बौद्ध या जैन मत का कहेँगे.जैसा लोग कहते आये हैँ.आप लोग मतभेद मेँ ही जीते आये हैँ.ईमानदारी से धर्म मेँ कहाँ जिए हैँ.मेरा तो मानना है कि व्यक्ति चाहेँ किसी मत से हो ,वह यदि धर्म के प्रति ईमानदार है तो चारो आर्य सत्य व आष्टांगिक मार्ग को उपेक्षित नहीँ कर सकता .


मधुरता व उदारता के बिना धर्म रिश्तेदारी ढोँग है.धर्म मेँ तो बदले का भाव भी नहीँ चलता.



अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

नक्सली कहानी : न शान्त��� न क्रान्ति !

बुधवार की दोपहर घर से धान की बाली तोड़ने गई बालिका का शव नग्नावस्था मेँ गन्ने के खेत से खून से लथपथ पाया गया.बालिका का रेप के बाद गला काट कर हत्या कर दी.शव मिलने की खबर से गांव मेँ सनसनी फैल गयी.घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंच गयी.शव को कब्जे मेँ लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.


मीरानपुर कटरा (शाहाजहांपुर) थाना क्षेत्र के ग्राम कबरा हुसैनपुर निवासी रामनिवास राठौर की पुत्री क्रान्ति गांव के प्राथमिक जूनियर हाईस्कूल मेँ कक्षा सात की छात्रा थी.बुधवार की दोपहर वह घर से धान के खेत से बाली तोड़ने गई थी.अचानक वह लापता हो गई जब देर शाम वह घर नहीँ पहुंची तो उसके परिजनोँ ने उसकी तलाश की लेकिन उसका कोई पता नहीँ चला.इस पर परिजनोँ ने दूसरे दिन थाने मेँ मामले की गुमशुदी दर्ज कराई.


कल सुबह ग्रामीणोँ नेँ एकत्र हो कर आसपास के खेतोँ को खंगाला तो रामचन्द्र के गन्ने के खेत मेँ क्रान्ति का नग्नावस्था मेँ शव पड़ा था तथा उसका गला कटा हुआ था.उसके कपड़े तथा धान काटने वाली दराती खून से सनी हुई पड़ी थी.



न शान्ति न क्रान्ति !
है सिर्फ भ्रांति....सिर्फ कागजी पुतलोँ की राजनीति!रामायण के रावण पर अंगुली उठाते हैँ.आज के रामोँ की शरण मेँ खड़े रावणत्व को संरक्षण दे दे रावण के कागजी पुतलोँ के दफन के साथ मुस्कुराते हैँ.धन्य ,आज के पात्र!



सैनिक (सिपाई)आज भी हैँ,राजा(शासक)आज भी हैँ लेकिन....


आज के राम भक्तोँ की भीड़ मेँ भी आज के राम अयोध्या (अपने राज्य)के मदद से दूर हैँ .साथ हैँ आदिवासी और .....?!और सुग्रीब का राज्य....


सन2025ई0 की विजयादशमी ! रामलीला के मैदान मेँ रावण का पुतला जल रहा था.


"आप कागजी पुतलोँ को जला कर दुनिया को क्या मैसेज देना चाहते हो?आप से अच्छे हम हैँ जिन्दा रावणोँ को जला रहे थे.यदि हम गलत थे, केशव कन्नौजिया गलत था तो आप ही अपने को ठीक साबित हो कर दिखाओ.पुतलोँ को नहीँ रावणत्व को जला कर दिखाओ."


एक नक्सली नेता एक टीवी चैनल पर अपना इण्टरव्यु दे रहे थे.


"क्रान्ति हो या शान्ति दोनोँ को कुचलने वाले के साथ खड़े है श्वेतवसन अपराधी .हम पर अंगुलियाँ उठाने वाले इनको उजागर हो कर दिखायेँ.यह अच्छा है कि हमारे कारण सरकारेँ अपनी व्यवस्थाओँ मेँ कुछ तो परिवर्तन तो कर रही हैँ.लोग जब तक सभ्य नहीँ हो जाते तब तक कोरे सत्याग्रह से काम नहीँ चलने वाला.तब तक टेँढ़ी अँगुली से भी काम चलाना पड़ेगा ही. आप भी स्वयं कहते फिरते हो कि टेंढ़ी अँगुली से घी नहीँ निकलता.जैसे 1947तक के स्वतन्त्र ता संग्रामोँ मेँ से भगत सिँह,चन्द्रशेखर,सुभाष,आदि के महत्व को निकाल नहीँ पाते ,धर्म शास्त्रोँ मेँ से हिँसा के महत्व को निकाल नहीँ पाते तो हमारी हिँसा के महत्व को क्योँ नगण्य कर देते हो? गीता अर्थात कुरुशान के गीता सन्देश को अपमान क्योँ नहीँ देते हो?सीमा पर की हिँसा का अपमान क्योँ नहीँ करते हो?हाँ,अपने साथियोँ कुछ निर्दोष हत्यायोँ पर मुझे दुख है. लेकिन....हाँ,और गेँहू के साथ घुन पिसता है. गेँहू के घुन क्योँ बनते हो.तब तो निज स्वार्थ के सिवा कुछ भी दिखता नहीँ."


क्रान्ति प्रकरण से अपना पल्ला झाड़ने के लिए पुलिस ने कुछ निर्दोष व्यक्तियोँ पर भी कार्यवाही कर दी थी. जिसका प्रमुख कारण दबंगोँ की कूटनीति थी.यह निर्दोष पीड़ित व्यक्ति अब नक्सलियोँ की शरण मेँ थे.





बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

शिक्षक या कि नक्सली ?

केशव कन्नौजिया अब शिक्षण कार्य से निकल कर नक्सली आन्दोलन से जुड़ गया.


अपना पक्ष साबित करने के लिए वैसे नहीँ तो अब ऐसे.


और फिर जिन के कारण यहाँ तक वे ही कहते फिरते कि भय बिन होय न प्रीति.......घी टेँड़ी अँगुली से ही निकलता है.जब लोग हिँसा व भय मेँ रह कर ही अच्छा कार्य कर सकते हैँ तो हिँसा व भय ही ठीक.


" लातोँ के भूत बातोँ से नहीँ मानते."


केशव कन्नौजिया देखा कि शासन प्रशासन व समाज से कोई भी हमारे पक्ष मेँ खड़ा नजर नहीँ आ रहा है .कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के तन्त्र मेँ उल्टे दलदल मेँ फँसता जा रहा हूँ.वह नक्सलियोँ के साथ आ गया. विचार तो मुस्लिम मत स्वीकार करने का भी आया था लेकिन....


अब सन 2025 ई0 की विजयदशमी ! आर एस एस के स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण !


इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने उन नियुक्तियोँ को अवैध घोषित कर दिया जो सन 1996ई0 मेँ जूनियर क्लासेज के एड के दौरान कन्हैयालाल इण्टर कालेज ,यदुवंशी कुर्मयात (फरीदपुर) मेँ जूनियर क्लासेज के लिए नियुक्त अध्यापकोँ को नियुक्ति न देने के बजाय माध्यमिक स्तर के अध्यापकोँ की नियुक्तियाँ कर दी गयीँ थीँ.अदलात ने केशव कन्नौजिया व उसके साथियोँ पर लगे सभी आरोपोँ से मुक्त कर दिया.


विजयादशमी के दौरान भव्य शस्त्र पूजन समारोह के दौरान आत्मसमर्पण कर दिया.


"क्या करूँ गांधी के देश मेँ अब भय व हिँसा मेँ ही सिर्फ बेहतर काम करने वालोँ की कमी नहीँ हैँ . सन 1996ई0 से पहले मैँ क्या था,यह किसी से छिपा नहीँ है लेकिन फिर मुझे नक्सलियोँ के शरण मेँ जाना पड़ा.मेरी हिँसा निर्दोषोँ के खिलाफ नहीँ थी.अन्याय व शोषण के खिलाफ थी. "


केशव कन्नौजिया के आँखोँ मेँ आँसू आ गये.


पुन :


" जिनके खिलाफ मैँ कोर्ट गया था और फिर नक्सली हुआ वे सब प्रति वर्ष गांधी की जयन्ती मनाते आये थे और अब भी मना रहे हैँ लेकिन अपने व्यवहारिक जीवन मेँ .....वे कम से कम मानसिक हिँसा तो करते आये हैँ.ऐसे लोग कहीँ न कहीँ अपराध की जड़ोँ को सीँचते आये है.मैँ तब भी गांधीवादी था अब भी गांधीवादी हूँ. बीच मेँ....?!बीच के इण्टरवेल मेँ मजबूरन कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचारी तन्त्र मेँ......?! सोरी ! "

इन पन्द्रह वर्षोँ मेँ अदालतेँ भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन के खिलाफ अपने विचार व्यक्त कर चुकी थीँ लेकिन नेताशाही व नौकरशाही अब भी ठीकाने पर नहीँ आयी थी.कुछ कर्मचारियोँ व अन्य पर अदालतोँ मेँ दोष साबित हो गये थे व कुछ को फाँसी की सजा सुनाई गयी थी.दूसरी ओर मुसलमानोँ को अल्पसंख्यक का दर्जा बनाये रखने के खिलाफ देश मेँ वातावरण रहा था लेकिन नेताशाही व सत्तावाद अवरोध खड़े किये थे.


ऐसे मेँ नक्सली...


नक्सली सम्बन्धित नेताओँ कर्मचारियोँ का और उन लोगोँ का मर्डर कर रहे थे जिन्हेँ अदालत ने फाँसी की सजा सुनायी थी लेकिन राजनीति के चलते उन्हेँ फांसी नहीँ दी गयी थी.


केशव कन्नौजिया अब भी नक्सली आन्दोलन के अहिँसक रुप के समर्थन मेँ खड़ा था.


कुछ दस्तावेज गायब होने के मामले मेँ कुछ कांग्रेसियोँ पर भी नक्सलियोँ की निगाहेँ थीँ .जैसे
- नहेरु व गवर्नर लार्ड माउण्टवेँटन के बीच सम्बन्ध, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस,लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु,संजय गांधी की मृत्यु,दीन दयाल उपाध्याय की मृत्यु. भिण्डरावाले
-लिट्टे-बोडो आन्दोलन को प्रोत्साहन,आदि सम्बन्धी दस्तावेज....



इधर हिन्दु समाज पर कट्टर मुसलमानोँ का दबाव बढ़ता जा रहा था.जिससे बचने के लिए हिन्दू सिक्खोँ की शरण मेँ जा रहा था.दिल्ली पर नक्सली सत्ता की सम्भावनाएं बढ़ती जा रही थीँ.

विद्यालयी दंश

मनोज का एक मित्र था -केशव कन्नोजिया.


अभी एक दो वर्षोँ से ' माध्यमिक वित्तविहीन शिक्षक महासभा ,उ प्र ' के माध्यम से कुछ
अध्यापक,प्रधानाचार्य,आदि अपनी राजनीति करते नजर आ रहे थे.प्रदेश मेँ विप के स्नातक व शिक्षक क्षेत्रोँ का लिए चुनाव का वातावरण था.जिस हेतु 10नवम्बर 2010ई0 को मतदान होना तय था. वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापकोँ के साथ अंशकालीन शब्द जोड़ने वाले एक उम्मीदवार जो कि पहले सदस्य रह चुके थे,के खिलाफ थे वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापक . जो कि
'माध्यमिक वित्तविहीन शिक्षक महासभा उप्र ' की ओर से उम्मीदवार संजय मिश्रा का समर्थन कर रहे थे.



लेकिन-


वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापक,व्यक्तिगत स्वार्थ,निज स्वभाव, जाति वर्ग, प्रधानाचार्य व प्रबन्धक कमेटी की मनमानी,आदि के कारण अनेक गुट मेँ बँटे हुए थे.इन विद्यालयोँ मेँ अधिपत्य रहा है -प्रधानाचार्य व प्रबन्धक कमेटी की हाँ हजरी करने वाले व दबंग लोगोँ का.'सर जी' का कोई गुट न था.बस,उनका गुट था-अभिव्यक्ति.अब अभिव्यक्ति चाहेँ किसी पक्ष मेँ जाये या विपक्ष मेँ या अपने ही विपक्ष मेँ चली जाये;इससे मतलब न था.


मनोज दो साल पहले कन्हैयालाल इण्टर कालेज ,यदुवंशी कुर्मयात मेँ लिपिक पद पर कार्यरत था.जो कि फरीदपुर से मात्र 18 किलोमीटर पर था.मनोज को कुछ कारणोँ से प्रबन्ध कमेटी ने सेवा मुक्त कर दिया जो कि अब अदालत की शरण मेँ था.


फरीदपुर के रामलीला मैदान मेँ संजय मिश्रा के पक्ष मेँ हो रही एक सभा मेँ मनोज जा पहुँचा.


"अच्छा है कि आप सब वित्तविहीन विद्यालयी के अध्यापकोँ के भविष्य प्रति चिन्तित हैँ लेकिन यह चिन्ता कैसी?विद्यालय स्तर पर इन अध्यापकोँ के साथ जो अन्याय व शोषण होता है,उसके खिलाफ आप क्या कर सकते हैँ?आप स्वयं उन लोगोँ को साथ लेकर चल रहे हैँ जो कि विद्यालय मेँ ही निष्पक्ष न्याय सत्य अन्वेषण आदि के आधार पर नहीँ चलना चाहते हैँ.मैँ ....."


जब लोग हिँसा व भय मेँ रह कर ही बेहतर काम कर सकते हैँ तो हिँसा व भय क्या गलत है?गांधीवाद तो सभ्यता समाज मेँ चल सकता है.तुम लोग ही कहते हो कि भय बिन होय न प्रीति.लेकिन केशव कन्नौजिया को नक्सली बनाने के लिए कौन उत्तरदायी है?कानून,समाज,संस्था,आदि के ठेकेदार सुनते नहीँ.खुद यही कहते फिरते हैँ कि सीधी अँगुली से घी नहीँ निकलता तो फिर टेँड़ी अँगुली कर ली केशव ने तो क्या गलत किया?सत्य को सत्य कहो,ऐसे नहीँ तो वैसे.


सन 1996ई0के जुलाई की बात है. यूपी सरकार के द्वारा अनेक जूनियर हाईस्कूल को एड दी गयी थी.केशव कन्नौजिया जिस विद्यालय मेँ अध्यापन कार्य कर रहा था , उस विद्यालय के जूनियर क्लासेज भी इस एड मेँ फँस रहे थे.जूनियर क्लासेज की नियुक्ति चार अध्यापकोँ की थी,जिनमेँ से एक केशव कन्नौजिया भी.
शेष 18 अध्यापक माध्यमिक मेँ थे.कानूनन उपरोक्त चार अध्यापक जो कि जूनियर क्लासेज के लिए नियुक्त थे,एड के अन्तर्गत थे.


लेकिन...


जिसकी लाठी उसकी भैस!....चित्त भी अपनी पट्ट भी अपनी,वर्चश्व अपना तो फिर क्या?


दो वर्ष पहले अर्थात सन 1994ई0 मेँ जब अध्यापकोँ का ग्रेड निर्धारित किया गया था तो भी नियति गलत,जूनियर क्लासेज के लिए नियुक्त चारोँ अध्यापकोँ को सीटी ग्रेड के बजाय एलटी ग्रेट मेँ रखा जा सकता था लेकिन कैसे , अपनी मनमानी?और अब जब जूनियर के लिए एड तो...?!


एड मेँ शामिल होने के लिए माध्यमिक से निकल जूनियर स्तर पर आ टिकने के लिए इप्रुब्ल करवा बैठे और जूनियर स्तर पर की नियुक्तियोँ को ताक पर रख दिया गया .


केशव कन्नौजिया इस पर तनाव मेँ आ गया कि हम सभी जूनियर की नियुक्ति पर काम करने वालोँ का क्या होगा ? जो जिस स्तर का है ,उसे उसी स्तर रहना चाहिए.ऊपर की कभी एड आयी तो क्या हम लोग ऊपर एड हो सकेँगे ? होँगे भी तो किस कण्डीशन पर ?


केशव कन्नौजिया अन्य जूनियर स्तर के लिए नियुक्त अध्यापकोँ के साथ हाई कोर्ट पहुँच गया.


अब उसे अनेक तरह की धमकियां मिलने लगी.


" मैँ शान्ति सुकून से अपने हक के लिए कानूनीतौर पर अपनी लड़ाई लड़ रहा हूँ,आपकी इन धमकियोँ से क्या सिद्व होता है?ईमानदारी से आप अब कानूनी लड़ाई जीत कर दिखाओ."



जब केस केशव कन्नौजिया व उनके साथियोँ के पक्ष मेँ जाते दिखा तो विपक्षी मरने मारने पर उतर आये.


"आप लोग कर भी क्या सकते हैँ ? भाई, आप लोग सवर्ण वर्ग से हैँ, यह कुछ ब्राह्मण वर्ग से हैँ. हम कहाँ ठहरे शूद्र.भाई,आप लोग अपने सवर्णत्व का ही तो प्रदर्शन करेँगे?और आप ब्राह्मणत्व का? शूद्रता का प्रदर्शन तो हम ही कर सकते हैँ?"

झूठे गवाहोँ के आधार पर केशव कन्नौजिया व उनके साथियोँ को क्षेत्र मेँ हुए मर्डर ,लूट,अपहरण,बलात्कार,आदि के केस मेँ फँसा दिया था.


रविवार, 3 अक्तूबर 2010

कथा:मतान्तरण क्योँ न��ीँ

राघवेन्द्र जीत यादव की एक गर्ल फ्रेण्ड थी-आसमाँ मन्सूरी.हालांकि उसके ख्वाबोँ की रानी थी 'शिक्षा' नाम की युवती लेकिन........?!



किसी से प्रेम होना अलग बात है.अपने कर्मक्षेत्र मेँ होने के कारण स्त्रियोँ पुरुषोँ से व्यवहार व आचरण रखना एवं अपनी पर्सनल लाइफ मेँ किसी के साथ जीवन जीना अलग बात है.ऐसे मेँ प्रेम ...?प्रेम एक एहसास व मन की स्थिति बन कर रह जाता है.



सनातन इण्टर कालेज से निकलने के बाद राघ वेन्द्र जीत यादव के मासिक आय मेँ कमी आ गयी थी.हालांकि मीरानपुर कटरा के ही एक अन्य कालेज मेँ वह शिक्षण कार्य करने लगा था.मनमानी,नियमहीनता,हाँहजूरी, व्यक्तिगत स्वार्थ,आदि की विद्यालय स्टाप मेँ वर्चस्वता के कारण उसे सनातन इण्टर कालेज मेँ दोषात्मक निशाना बनाया गया था.कुछ लोग यहाँ तक चाहते थे कि राघवेन्द्र जीत यादव मीरानपुर कटरा ही छोँड़ कर चला जाए.


लेकिन....?!



"क्योँ?क्योँ छोँड़ कर जाओगे कटरा?"


"आसमाँ, तुमसे किसने कह दिया मैँ कटरा छोँड़ कर जाऊँगा?जब मेरा दिल दिमाग कहेगा,तब मैँ जाऊँगा."


"राघव! मुझे कुछ रातोँ से नीँद नहीँ आती. तुमने कैसा हाल बना रखा है अपना?"



"ठीक तो हूँ.बस,बाहर से ऊर्जा प्राप्त नहीँ कर पा रहा हूँ लेकिन मैँ महसूस कर रहा हूँ आन्तरिक ऊर्जा जाग्रत होते.और फिर तुमको देख कर तो और ऊर्जा बढ़ जाती है ,उत्साहित हो जाता हूँ."


"तब भी.....शरीर का भी ध्यान रखना जरुरी है .खाओगे पियोगे नहीँ तो शरीर कैसे चलेगा?"


" कौन कहता है खाता पिता नहीँ हूँ."


"अच्छा,दूर से बात करो. मैने कहा न,मुझे छोड़ो."


" दिल से कह रही हो."


तब आसमाँ मु स्कुरा दी.


राघवेन्द्र जीत यादव ने आसमाँ को अपनी बाहोँ मेँ ले रखा था.होँठोँ को होँठोँ ने स्पर्श किया....


"अच्छा,अब छोँड़ो.प्रेम को प्रेम ही रहने दो."


"आसमाँ,नहीँ तो.....?!"


"नहीँ तो मजहब व जाति आड़े आ जायेगी.जानते हो,फिर साम्प्रदायिकता की आग मेँ कटरा भी झुलस सकता है."



".....और हम,हम तड़फते रहेँ बस.."


" तड़फेँ दुश्मन . मुसलमान बन जाओ न. मेरे लिए तुम क्या करोगे?दिल मेँ तो अब भी 'शिक्षा'है. मुझे तो सिर्फ पत्नी बनाने का ख्वाब देखते हो तुम. दिल तो 'शिक्षा 'को दे रखा है न."


ऐसे मेँ राघवेन्द्र जीत यादव !


सात दिन अन्तर्द्वन्द!


यह द्वन्द पहले भी आये थे लेकिन तब सिर्फ मतान्तरण का विचार आया था,अब मतान्तरण करना था. हिन्दू समाज मेँ किसने अभी तक हम पर प्रेम का इजहार किया था?क्या प्रेम को सम्मान नहीँ देना चाहिए?



हूँ!

मन ही मन राघवेन्द्र जीत यादव-


" लोग कह तो देते हैँ मतान्तरण करने की क्या जरूरत ? क्या अपने मत मेँ भावनाओँ का शेयर करने वालोँ का अकाल पड़ गया ? हाँ, मेरे लिए अकाल ही पड़ गया. आवश्यकताएं पूरी नहीँ होतीँ ,यह आपकी कमी है.मेरी कमी..?! और क्या.मेहनत करो रुपया कमाओ.हूँ! भावनाओँ के शेयर के लिए क्या रुपया चाहिए? दोस्ती के लिए क्या रुपया चाहिए?प्रेम के लिए क्या रुपया चाहिए?मुस्लिम समाज मेँ तन्हा क्योँ नहीँ?उस समाज से आसमाँ प्राप्त है,कुछ मित्र प्राप्त हैँ.हूँ,तो हिन्दू समाज से क्योँ नही?उत्साह होता है न ,तो मेहनत करने का रुपया कमाने का रास्ता बनता जाता है.आसमाँ मेरे करीब है ,जीवन के हर मोड़ पर मेरे करीब है.ख्वाबोँ मेँ भी और वास्तव मेँ भी.शिक्षा .....और शिक्षा .....क्या कहूँ उसको लेकर.....वह हमेँ मिलने को रही.तुम्हारे हिन्दू समाज से कौन मेरे करीब है?हूँ,करीबी के लिए पहले रुपया चाहिए,मेहनत चाहिए.मैँ तो कामचोर हूँ मक्कार हूँ?लेकिन क्योँ हूँ? तुम क्या जानो तन्हाई क्या होती है?.....अब जब आसमाँ मेरे साथ है,मेहनत भी मेरे साथ है रुपया भी मेरे साथ है.बस,इन्तजार कीजिए.तुम और तुम्हार हिन्दू समाज ...?!मेरे लिए एक लड़की भी न उपलब्ध करा पाया,जो मेरा उत्साह बन कर मेरे जीवन मेँ आये.अब मुस्लिम समाज से आसमाँ मुझे मिली है,वह मेरा उत्साह बन कर आयी है न कि यह देखने के लिए कि मैँ आलसी हूँ,मैँ रुपया कम कमाता हूँ.उसने मुझे स्वीकारा है सिर्फ मुझे.मुझमेँ कमियाँ ढूंढने के लिए नहीँ,मुझ पर कमेन्टस के लिए नहीँ.प्रेम भी यही कहता है कि व्यक्ति जैसा है,उसे वैसा ही स्वीकारो.प्रेम मेँ तो वह ऊर्जा है कि इन्सान देवता बन जाए."



-यह सोँचते सोँचते राघवेन्द्र जीत यादव के आंखोँ मेँ आँसू आ गये.



आठवेँ दिन-


राघवेन्द्र जीत यादव ने मुस्लिम मत स्वीकार कर लिया ,तो क्या गलत किया ? मत व धर्म मेँ फर्क होता है.



आसमाँ से निकाह के बाद,



दस साल बाद अर्थात अब सन 2025ई0की 25 सितम्बर!


राघवेन्द्र जीत यादव अब राजनीति व साहित्य क्षेत्र मेँ मण्डल स्तर की एक प्रमुख हस्ती बन चुका था.लकड़ी ,फर्नीचर व होटल के व्यवसाय के माध्यम से करोँड़ोँ पा चुका था.

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

02 अक्टूबर:मेरा जन्म द��न भी.

मैँ ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'.... इत्तफाक से मेरा जन्मदिन भी है-02अक्टूबर.मेरे लिए यह सदयता दिवस है.


मन प्रबन्धन के अन्तर्गत मैँ मन ही मन अपने अन्दर करुणा व संयम को हर वक्त स्वागत के लिए हालात बनाता रहा हूँ ,जिसके लिए कल्पनाओँ ,विचारोँ,स्वाध्याय ,इण्डोर अभिनय व अन्य उपाय करता रहा हूँ.वास्तव मेँ अहिँसा के पथ पर चलने के लिए करुणा व संयम के लिए हर वक्त मन के द्वार खोले रखना आवश्यक है.इस अवसर पर मैँ 'प्रेम 'पर भी कुछ कहना चाहुँगा.वे सभी जरा ध्यान से सुनेँ जो किसी से प्रेम मेँ दिवाने हैँ.प्रेम पर न जाने कितनी फिल्मेँ बन चुकी हैँ,किताबेँ लिख चुकी है.कहाँ प्रेम है ?प्रेम जिसमेँ जागता है,उसकी दिशा दशा ही बदल जाती है.प्रेम जिसमे जाग जाता है,उसके मन से हिँसा गायब हो जाती है,स्वेच्छा की भावना समाप्त हो जाती है. 'मैँ' समाप्त हो जाता है.


"दिल ही टूट गया तो जी कर क्या करेँ?"


यह सब भ्रम है.


प्रेम मेँ दिल नहीँ टूटता. हाँ,काम मेँ दिल टूट सकता है.कहीँ न कहीँ प्रेम दिवानोँ या प्रेम दिवानीयोँ से सामना हो जाता है,सब के सब भ्रम मेँ होते हैँ. प्रेम मेँ तो अपनी इच्छाएं खत्म हो जाती हैँ.जिससे प्रेम होता है,उसकी इच्छाएं ही अपनी इच्छाएं हो जाती हैँ.
जो अपनी प्रेमिका या प्रेमी की ओर से उदास हो जाते हैँ, वे प्रेमवान नहीँ हो सकते.अखबारोँ मेँ निकलने वाली आज कल की प्रेम कहानियां हवस की कहानियां है.जो चार पांच साल बाद टाँय टाँय फिस्स..........प्रेम तो अन्त है शाश्वत है जो जाग गया तो फिर सोता नहीँ, व्यक्ति निराश नहीँ होता. करुणा व संयम के बिना प्रेम कहाँ ?प्रेम तो सज्जनता की निशानी हैँ.जो जीवन को मधुर बनाती है.


खैर....



आज गांधी जी का जन्मदिन है.जो कि बीसवीँ सदी के सर्वश्रेष्ठ जेहादी हैँ.जिनका हर देश मेँ सम्मान बढ़ता जा रहा है.

गांधी वास्तव मेँ सभ्यता की पहचान हैँ.जो कहते हैँ मजबूरी का नाम -गांधी,वे भ्रम मेँ हैँ.



शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

जबरदस्ती का विवाद : अयोध्या विवाद

लगता है दुनिया मेँ अब भी लोग ऐसे हैँ जो फिजूल की हरकतोँ से विभिन्न समस्याएं बनाएं हैँ.वे ईमानदार व अन्वेषण से काफी दूर होते हैँ.ऐसे ही कुछ लोग अयोध्या विवाद को बनाये हुए हैँ.


काफी इन्तजार के बाद 30सितम्बर2010ई0के शाम 4.30 के लगभग इलाहावाद उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि

" जहाँ है, वहीँ रहेँगे रामलला."

ईमानदार व सच्चाई का सम्मान करने वाले लोगोँ को यह हजम नहीँ हो रहा है कि तीन हिस्सोँ मेँ बंटेगा विवादित स्थल:निर्मोही अखाड़ा,राम लला पक्ष और सुन्नी वक्फ बोर्ड को बराबर हिस्सा.इस पर अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैँ कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को हिस्सा क्योँ? यह क्या अदालत का फैसला है?अदालत ने फैलता किया है कि विवादित स्थल का बटवारा किया?



जस्टिस एस यू खान का कहना था कि

"विवादित ढांचे को बाबर के आदेश से अथवा उनके द्वारा मस्जिद के तौर पर तामीर किया गया,लेकिन प्रत्यक्ष साक्ष्य से यह सिद्ध नहीँ हो पाया कि निर्मित भाग सहित विवादित परिसर बाबर का था या उसका था,जिसने इसे बनाया.मस्जिद बनाने के लिए कोई मन्दिर नहीँ गिराया गया ,बल्कि उसका निर्माण मन्दिर के खण्डहरोँ पर किया गया,जो बहुत समय से वहाँ मौजूद थे.तीन गुंबदोँ वाले ढांचे के बीच के गुम्बद वाला भाग ,जहाँ भगवान राम विराजमान है,हिन्दुओँ का है ."



जस्टिस धर्मवीर शर्मा का कहना था -



"यह सिद्ध हुआ है कि मुकदमेँ वाली सम्पत्ति रामचन्द्र जी की जन्म भूमि है......विवादित ढांचे का निर्माण बाबर ने करवाया था,किस वर्ष मेँ,यह निश्चित नहीँ है लेकिन यह इस्लाम के सिद्धान्तोँ के खिलाफ था इसलिए इसे मस्जिद नहीँ कहा जा सकता.
"



असलियत सामने है.मुसलमानोँ मेँ क्या सत्य समझने की नहीँ है?क्या सत्य है,यह तो समझना चाहिए?क्या इस्लाम के सिद्धान्तोँ का सम्बन्ध जबरदस्ती ,हिँसा,गैरमुसलमानोँ के आस्था पर चोट ,आदि से है?नहीँ ,ऐसा नहीँ.

पूर्व मुख्यमन्त्री कल्याण सिँह का यह कहना क्या गलत है कि


" जब वक्फ बोर्ड की याचिका खारिज हो गयी है तो मुसलमानोँ को एक तिहाई जमीन देने का कोई औचित्य नहीँ."
लखनऊ से,भारत की कम्युनिस्ट पार्टी माले ने कहा तक कहा कि

" अयोध्या विवाद का सन्तोषजनक हल देने मेँ उच्च न्यायालय असफल साबित हुई है.....यह निर्णय स्थापित कानूनी मान्यताओँ पर आधारित न हो कर राजनीतिक ज्यादा है."



वास्तव मेँ यह विवाद मेँ मुसलमानोँ के द्वारा पैदा किया गया जबरदस्ती का विवाद है.मुसलमानोँ को आत्मसाक्षात्कार की जरुरत है.



JAI HO...OM....AAMEEN!