बुधवार, 2 मार्च 2011

विदुरराज गोडसे संदेश

कुछ हिन्दू कहते फिरते हैँ कि जब तक देश मेँ हिन्दू बहुमत मेँ हैँ तब तक देश मेँ सेक्यूलरवाद की बात चल रही है और वह भी तुष्टीकरण के कारण छद्म .गैरमुसलमान व मुसलमान नेता पन्थनिरपक्षता प्रति कितने ईमानदार हैँ ?अभी कुछ महीनों से कुछ मुस्लिम नेता अपनी स्वयं निर्मित पार्टी के विज्ञापन के साथ अखबारों में नजर आ रहे हैं जो कि हिन्दू मुसलमान के साथ साथ चलने,हिन्दू मुस्लिम भाईचारा ,आदि सन्देशों के साथ नजर आ रहे है.यदि इन मुस्लिम नेताओं की लड़कियां गैरमुस्लिम लड़कोँ से शादी करना चाहें तो क्या ये रुकावट तो नहीं बनेगे ?रुकावट बनेगे ,अवश्य बनेगे क्योंकि यह सब मजहबी ही हैं न कि धार्मिक या सेक्युलर ? इसी तरह सेक्यूलर हिन्दू नेता.


ओशो ने ठीक कहा था कि यह कहने की क्या आवश्यकता है कि हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई आपस मेँ सब भाई भाई .यह क्यों नहीँ कहते कि हम एक हैँ .



देश के अन्दर इन्दिरा गांधी परिवार व इन्द्रकुमार गुजराल के परिवार को ही मैं सेक्यूलरवादी कहता हूँ.उन व्यक्तियों को मैं धार्मिक नहीं मान सकता जो सिर्फ अपने मजहबी रीति रिवाजोँ व्यक्तियों में रहने को ही धार्मिकता मानते हैँ और गैरमजहबियों व गैरजातियों के प्रति द्वेषभावना व छुआ छूत रखते हैं.



मुगलकाल में अनेक बादशाह हुए लेकिन अकबर को ही महान क्यों कहा जाता है ? जो सेक्यूलर के रास्ते पर चलना चाहते है उन्हें अकबर के दीन ए इलाही पथ पर चलना चाहिए लेकिन एक कदम आगे,एक कदम आगे कैसा ? अकबर ने हिन्दू लड़कियों को स्वीकार तो किया लेकिन मुस्लिम लड़कियोँ को हिन्दुओं मेँ नहीं दिया .जिस दिन परिवारों के अन्दर पति पत्नी में से एक हिन्दू व एक मुसलमान तथा वेद व कुरान एक साथ होगा उस दिन यह देश महान होगा ही अपने अखण्ड रुप में भी होगा.



जो मुस्लिम नेता हिन्दू मुस्लिम को एक साथ चलने की बात कर रहे हैं उन्हेँ इस बात पर गौर करना चाहिए.दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी किया है कि यदि किसी मुस्लिम लड़के लड़की ने किसी गैर मुस्लिम से शादी की तो उसकी खैर नहीं.
यह मुस्लिम नेता चाहें वे पीस पार्टी के प्रमुख ही क्योँ न हों,कहते फिर रहे हैँ कि हिन्दू मुसलमान साथ चलेगा ;क्यों नहीँ दारुल उलूम देवबंद के फतवे के विरोध मेँ बयान दें?जिससे कि हम जैसे इनके सेक्यूलरवाद पर विश्वास कर सकें.



लेकिन यह सब कैसे होगा?हर कोई अभी मानसिक रूप से गुलाम है.कोई भी धर्म को समझने की कोशिस नहीं कर रहा है.मजहबी व जातीय सोँच से बाहर निकलने की कोशिस ही नहीं.














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